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Justice

आंदोलनों की धार कुंद कर देगा सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

राजनीति की ऐसी सफाई भी न हो कि

अदालत को प्रभावित करने वाले तो बच जायें और दूसरे फँस जायें

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की वजह से राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव की संसद की सदस्यता जाने वाली है। यह मामला चारा घोटाले के भ्रष्टाचार का था जिसमें अलग- अलग सजा दी गयी है। मसलन इस मामले में ही पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र और सांसद शर्मा को चार साल की सजा मिली है। यादव, मिश्र और शर्मा की सजा अलग-अलग है,यह ध्यान रखना चाहिए क्योंकि मामला बिहार से जुड़ा है  और खुद लालू प्रसाद यादव ने सजा सुनाने वाले जज के खिलाफ बड़ी अदालत में याचिका भी दी थी। पर यह सब पृष्ठभूमि की बात है।

असली मुद्दा यह है कि संघर्ष, आंदोलन और अन्य अपराध के आरोपियों में कोई फर्क नहीं किया तो समाज में बड़ा टकराव पैदा होगा क्योंकि इस देश में गाँधी, नेहरु से लेकर जयप्रकाश और लोहिया तक पर मुक़दमे चले हैं। जार्ज फर्नांडीज पर किस तरह का मुकदमा चला, यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है।

हाल के दिनों में समाज के एक तबके ने शुचिता की बात उठाई थी जिसके बाद राजनीति में अपराधियों की तलाश शुरू हुयी। बहुत से लोग अपराधी बता दिये गये। इन्हीं में से एक लालू जेल चले गये और जिनकी हत्या से लेकर कई मामलों में हिस्ट्रीशीट खुली हुयी है वे संसद में बिना दाग वाले हैं।

एक उदाहरण बाहुबली धनंजय सिंह का है। मेरे ख्याल से किसी परिचय की जरुरत नहीं है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। चुनाव के समय एक संस्था अपराधियों की जो सूची जारी करती है उसमे छात्रसंघ के अपने साथी और विधायक रविदास मेहरोत्रा का नाम होता है। समूचे लखनऊ के लोगों से पता कर लीजिए उन्हें कोई अपराधी नहीं मान सकता क्योंकि वे लगातार आम लोगों के लिये संघर्ष करते हुये जेल जाते रहे हैं। पर वे अपराधी हैं।

दूसरा और रोचक उदाहरण अन्ना हजारे के सहयोगी डॉ. सुनीलम को बावन साल की सजा हुयी है और इतनी ही उनकी उम्र है। यह सजा किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने के खिलाफ हुये आन्दोलनो के चलते हुयी। इस पर उनके जेल जाने के बाद जनसत्ता में मैंने दस ख़बरें दो महीने में की थीं। वे अडानी से लेकर कमलनाथ तक से लड़ रहे थे। जब सत्तारूढ़ दल, विपक्ष और कारपोरेट घराने एक हो जायें तो हर आन्दोलन करने वाला सजा पायेगा और वह सजा बावन साल की हो सकती है।

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र से लेकर गुजरात तक किसानों की जमीन बड़े पैमाने पर छीनी जा रही है। सूखे और भूखे विदर्भ में एक लाख एकड़ जमीन बिजली की बड़ी परियोजनाओं के लिये ली जा रही है। मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल सिंगरौली में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सिंगापुर बनाने जा रहे हैं। वहाँ बड़े कॉर्पोरेट घराने की तरफ से जमीन छीने जाने के खिलाफ आन्दोलन चल रहा है। सिंगरौली की कलेक्टर स्वाति मीना आन्दोलन करने वालों पर मुकदमा दायर करती जा रही है। वे अपराधी बना रही हैं, किसानों को, आदिवासियों को। यह मुख्य मुद्दा है।

वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय हाल के सालों में अपने कई फैसलों को लेकर विवाद में आया है, खासकर लोकतान्त्रिक आंदोलनों को लेकर। और कॉर्पोरेट घरानों का दबाव कैसा होता है यह भी अदालत में दिखता है।

अख़बार के पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिये वेज बोर्ड को किस तरह सर्वोच्च न्यायालय में इन घरानों ने फँसाया यह किसी से छुपा नहीं है। इसलिए अदालत के हर फैसले को सही मान लिया जाये यह उचित नहीं है।

यादव जेल जाए पर उसी अपराध में मिश्र और शर्मा को कम सजा हो तो सवाल जरूर उठता है। दूसरा मुद्दा आमजन के अधिकारों को लेकर आन्दोलन का है इसके भी अपराधी होते हैं, यह ध्यान रखना चाहिए। इसलिए राजनीति की ऐसी सफाई भी न हो कि अदालत को प्रभावित करने वाले तो बच जायें और दूसरे फँस जायें।

अंबरीश कुमार

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