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आखिर किसके लिये चुनाव

सुनील कुमार
भारत में 16 वीं लोकसभा का चुनाव होने जा रहा है। चुनाव प्रचार का रूप लगातार बदलता जा रहा है। जिस तरह से पूँजीपति अपने उत्पादन को बेचने के लिये एडवरटाइजिंग कम्पनियों का सहारा लेता है ठीक उसी तरह चुनाव में जनता तक पहुँचने के लिये यह कम्पनियां एडवरटाइजिंग एजेंसियों की सहायता ले रही हैं। एडवरटाइजिंग कम्पनियों के माध्यम से 2009 से इलेक्ट्रानिक चुनाव प्रचार पर बहुत बड़ा धन खर्च किया जा रहा है। 2009 में चुनाव प्रचार अभियान मुख्यतः इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों पर चला था। इस बार चुनाव प्रचार अभियान में मुख्यतः दो राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी न्यूज चैनलों के अलावा जीईसी (आम मनोरंजन चैनल), मूवी, व स्पोर्टस चैनलों पर भी विज्ञापन दे रही हैं। कांग्रेस ने जहां इस काम के लिये जापान के कम्पनी डेन्त्सु को जिम्मदारी सौंपी है वहीं भाजपा इसके लिये मैडिसम को चुना है। क्षेत्रीय पार्टियां भी पीछे नहीं हैं वे भी क्षेत्रीय चैनलों के द्वारा प्रचार-प्रसार कर रही हैं।
चुनाव में काले धन का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है, इससे यह माना जाता है कि चुनाव के बहाने ही पर्चा, पोस्टर, बैनर, झंडे, बैच बनाने वाले छोटे कारोबारियों, पेन्टरों इत्यादि की जेब में भी पैसे आ जाते हैं और अर्थव्यवस्था में थोड़ा सुधार होता है। लेकिन जिस तरह से यह चुनाव अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लड़ा जा रहा है उससे यह पैसा भी कुछ मीडिया घरानों की जेब में ही जाता है। एक अनुमान के अनुसार भाजपा व कांग्रेस इस बार के चुनाव में इलेक्ट्रानिक माध्यमों पर 400-500 करोड़ रु. अलग-अलग खर्च कर सकती हैं। विज्ञापन के द्वारा कांग्रेस जहां जनता को अपनी 10 साल की उपलब्धियों का बखान कर रही है, वहीं बीजेपी शासक नहीं सेवक की बात कर रही है, और सुशासन देने की बात कर रही है। आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण की बात कर रही है। कोई भी पार्टी (राष्ट्रीय या क्षेत्रीय) साम्राज्यवाद-पूँजीवाद परस्त नीतियों पर अपना मुँह नहीं खोल रही है जिसके कारण आम आदमी की हालत दिन पर दिन बेहाल होती जा रही है। इन नीतियों के कारण बेरोजगारों की फौज और मेहनतकश जनता आत्महत्या करने पर विवश हैं।
सांसदों को कौन चुनता है ?
चुनाव के नाम पर जनता के ऊपर कुछ धनबली-बाहुबली को पैसा लेकर चुनावबाज पार्टियां थोप देती हैं और उन्हीं में से कुछ संसद में जाते हैं। यही कारण है कि 15 वीं लोकसभा में 300 करोड़पति-अरबपति और 150 आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद संसद में पहुँचे। सभी पार्टियों को कारपोरेट जगत चुनाव में चंदा (रिश्वत) देती है। सरकार उन्हीं पार्टी की बनती है जो कि पूँजीवाद और साम्राज्यवाद की अच्छी से अच्छी सेवा कर सके। इसके बाद कारपोरेट जगत पार्टियों को दिये गये चंदे को सूद समेत कई गुना वसूल करता है। आज तक कोई भी सरकार पूरी जनसंख्या की 12-15 प्रतिशत वोट पाकर ही संसद में पहुँचती है जिसको कि हम बहुमत की सरकार कहते हैं। हमारी काॅलोनियों, बस्तियों, झुग्गी-झोपडि़यों में खद्रधारी झुंड दिखायी देने लगे हैं और उनके साथ-साथ हमारे ही आस-पास के कुछ छुटभैय्ये भी दिखने लगे हैं। वह हमें तरह-तरह के वायदे प्रलोभन दे कर अपने पक्ष में वोट डालने के लिये कह रहे हैं। यह क्रम 1951 से ही चला आ रहा है।
अभी तक चुनाव से क्या मिला है ?
झूठे वायदे एवं प्रलोभन के सिवा जनता को कुछ नहीं मिला है। नेताजी आते हैं और जनता को देश सेवा का पाठ पढ़ाते हैं; बताते हैं कि वे जन सेवा करने के लिये चुनाव लड़ रहे हैं और संसद, विधान सभा में जनता के मुद्दे को उठाएंगे और उनकी समस्याओं का हल करेंगे। सन् 47 के बाद इस देश में प्रायः सभी दलों की सरकारें बनीं। यहाँ तक कि देश और प्रदेशों में अलग-अलग क्षेत्रीय सरकारें भी बनीं लेकिन आज तक जनता की समस्याएं कम होने के बजाय क्यों बढ़ती जा रही हैं। यह ‘जन प्रतिनिधि’ संसद विधान सभाओं में जाकर अपने चुनाव में खर्च (निवेश) किए हुये पैसे को सूद समेत निकालने में व्यस्त रहते हैं। कभी इस पार्टी से तो कभी उस पार्टी से पैसे लेकर सरकार बनाते-बिगाड़ते हैं, विदेशों में भ्रमण (मौज-मस्ती) करते हैं। जैसे कि 15 वीं लोकसभा में युवा सांसदों को अमेरिका भेजा गया था लोकतंत्र का पाठ पढ़ने के लिये इसी तरह यूपी के विधायक 5 देशों की यात्रा पर गये हुये थे। देशी-विदेशी पूँजीपतियों से पैसा लेकर यह सरकारें सहमति-पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर करते हैं तथा अपने-अपने क्षेत्र में उनके कारखानों को लगाने के लिये विशेष छूट देते रहते हैं और अपने निवेश किए हुये पैसे को अगले चुनाव तक कई सौ गुना बढ़ाने में लगे रहते हैं। स्विस बैंक सहित अन्य विदेशी बैंको में इनका पैसा जमा है जो कि  भारत के पूरे जीडीपी से भी अधिक है।
मेहनतकश जनता की हालत
भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान-मजदूर हैं लेकिन उनकी स्थिति बद-से-बदतर होती जा रही है। रोटी-कपड़ा-मकान, जो किसी भी देशवासी के मौलिक अधिकार हैं, उससे भी देश की बहुसंख्यक जनता वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी समस्याएं मुँह बाए खड़ी हैं। पीने का स्वच्छ पानी आज तक बहुसंख्यक जनता को नहीं मिल पा रहा है। हाँ, इतना जरूर हुआ है कि जो भी प्राकृतिक संसाधन उपहार स्वरूप मिला था उस पर भी कुछ मुट्ठी भर लोगों का कब्जा होता जा रहा है। जल, जंगल, जमीन से आम जनता को उजाड़ा जा रहा है और देशी-विदेशी लुटेरों को कौडि़यों के मोल में दिया जा रहा है। खनिज सम्पदा की लूट जारी है और ये सफेदपोश नेता एजेन्ट का काम कर रहे हैं। बड़े-बड़े बांध बनाकर आम जनता को उजाड़ा जा रहा है, नदियों के प्रवाह को रोका जा रहा है ताकि इन लुटेरों की लूट को ‘दिन दूनी रात चैगुनी’ बढ़ाया जा सके। जब आम जनता इसका विरोध करती है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर उसे लाठी-डंडों से पीट-पीट कर झूठे केसों में डाल दिया जाता है। यहाँ तक कि संगठित प्रतिरोध करने पर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है। इस देश की ‘महान न्यायपालिका’ उस पर अपना रबड़-स्टाम्प लगा कर कानूनी जामा पहना देती है और उनकी लूट को कानूनी मान्यता मिल जाती है, जिससे आम जनता पर दमन करना और आसान हो जाता है। 1991 में नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद से भारत में सभी पार्टियां केन्द्र व राज्य में सत्ता का सुख भोग चुकी है लेकिन कोई भी पार्टी सत्ता में रहते हुये इन नीतियों के खिलाफ कोई आन्दोलन नहीं की। यह वही नीतियां हैं जिसके कारण किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। किसानों की खेती घाटे में जा रही है। उनकी लागत भी नहीं आ पा रही है। स्वामिनाथन कमिटी की रिपोर्ट 9 साल बाद भी लागू नहीं की गयी बल्कि किसानों को 1 अप्रैल 2013, को एक और कमिटी बनाकर छलने का काम किया जा रहा है। किसानों का उत्पन्न किया हुआ अन्न बेचने वाली कारगिल मेनसेन्टों जैसी कम्पनियां माला-माल होती जा रही हैं। किसानों के अन्न की कीमत संसद में तय की जाती है जबकि खेती में काम आने वाली खाद, कीटनाशक, दवाएं, ट्रैक्टर, ट्यूबवेल इत्यादि उपकरण बनाने वाली कम्पनियां उनका मूल्य खुद निर्धारित करती हैं। देश में अलग-अलग परियाजनाओं के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीन सस्ती दर पर छीनी जा रही है। श्रम कानून में संशोधन किए जा रहे हैं। आए दिन मजदूरों की छंटनी, तालाबंदी के नाम पर सड़कों पर फेंक दिया जा रहा है। शिक्षा का व्यवसायीकरण किया जा रहा है और काॅरपोरेट आधारित शिक्षा को तरजीह दी जा रही है ताकि पूँजीवादियों-साम्राज्यवादियों के लिये सस्ता श्रम उपलब्ध कराया जाए। सरकार द्वारा जन कल्याण के नाम पर चलाई जा रही योजनाएं नरेगा, बीपीएल कार्ड, स्कूल में मध्यान्तर भोजन या आंगनबाड़ी का क्या हश्र है हम सभी जानते हैं। गुजरात विकास माॅडल का ढोल बजाया जा रहा है लेकिन गुजरात में किसका विकास हुआ है यह किसी से छुपी बात नहीं है। ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अपनाते हुये सत्ता के केन्द्र में बने रहने के लिये जनता को धर्म, जाति, क्षेत्र व भाषा के नाम पर बांटा जाता है।
प्रतिनिधियों से सवाल
वे चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? उनको जनता की सेवा करनी है तो संसद और विधान सभा में ही क्यों, जनता के साथ क्यों नहीं रहते? वे जो पैसा खर्च कर रहे हैं क्यों कर रहे हैं, वे इतने पैसे कहां से लाये? जनता को आज तक उनकी बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिलीं? नई आर्थिक नीति, विश्व व्यापार संगठन के विषय में क्या सोच है? प्राकृतिक सम्पदा पर किसका अधिकार होगा? संसद, विधान सभाओं में सांसदों, विधायकों को जूता-चप्पल, मायक, मिर्च स्प्रे क्यों करना पड़ रहा है? राजनीति का अपराधीकरण कैसे हुआ?

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