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आदिवासियों का दो टूक ऐलान – मर जाएंगे पर अडानी को जमीन नहीं देंगे…

आदिवासियों ने ग्रामसभा में अडानी को जमीन नहीं देने का किया प्रस्ताव पारित.

28 सितंबर को प्रस्तावित अधिग्रहण स्थल पर होगी किसानों की महापंचायत.

“सरकार हमको मार देगी तभी हमारी जमीन छीन सकती है। हमारी जमीन कोई बांटने की चीज अथवा पूजा का ‘प्रसाद’ नहीं है! इस देश में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत आदिवासियों ने की थी। यह उसी संथाल विद्रोह का क्षेत्र है और हम उसी तिलकामांझी और सिद्धो-कान्हो-चांद-भैरव के वारिस हैं।”

ये शब्द अडानी के द्वारा झारखंड में किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे भगत हेंब्रम के हैं। वे इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक हैं और किसी भी शर्त पर इलाके की बहुफ़सली-उपजाऊ जमीन अडानी अथवा किसी अन्य को दिये जाने के बिलकुल खिलाफ हैं।
आंदोलनकारी किसानों ने क्षेत्र में एक बोर्ड लगाकर कंपनी के यहाँ घुसने पर पाबंदी के आशय की सूचना भी जारी कर दी है।
दरअसल भाजपा शासित राज्य झारखंड के गोड्डा जिले में आदिवासियों व अन्य किसानों की 1700 एकड़ बहुफ़सली खेती की जमीन का अधिग्रहण अडानी के द्वारा पावर प्लांट लगाने के लिए किया जा रहा है। इससे प्रत्यक्ष-परोक्ष तकरीबन 15 हजार परिवार प्रभावित होंगे। आदिवासियों के चार गांव तो पूरी तरह से अपनी जमीन-जीविका-आवास और संस्कृति से पूरी तरह बेदखल हो जाएंगे। इन आदिवासियों के साथ-साथ इस अधिग्रहण की चपेट में आने वाले ज़्यादातर दलित और अति पिछड़ी जाति के हजारों किसान व खेत मजदूरों की आजीविका सदा के लिए छिन जाएगी। इस सबकी परवाह किये बगैर इस भूमि अधिग्रहण को राज्य सरकार द्वारा मंजूरी दे दी गई है।
संथाल परगना टिनेन्सी एक्ट के तहत यह जमीन ‘अबिक्रयशील’ जमीन है, यानी इसे न तो खरीदा-बेचा ही जा सकता है और न ही किसी दूसरे को हस्तगत ही किया जा सकता है। इसलिए प्रभावित होने वाले किसान यह सीधा सवाल पूछ रहे हैं कि इस कानून के रहते तब फिर आखिर किस आधार पर इसे अडानी के पास बेचा जा रहा है!
किसान इसे अपने खिलाफ षड़यंत्र करार दे रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि यह षड़यंत्र कोई और नहीं बल्कि राज्य की सरकार ही कर रही है।
गौरतलब हो कि पूरी राज्य मशीनरी अधिग्रहण प्रक्रिया को अब तक अत्यंत ही गुपचुप ढंग से चला रही है। इसकी पुष्टि के कई प्रमाण किसानों के पास मौजूद हैं।
इसकी एक बानगी तब दिखी जब पिछले दिनों किसानों को ग्राम सभा की बैठक का नोटिस जारी किया गया।
उक्त नोटिस में बैठक की तारीख और समय तो बताया गया था किन्तु बैठक स्थल का कोई उल्लेख ही नहीं किया गया था।
खैर किसानों ने उसी तारीख को ग्राम सभा की बैठक आयोजित की और किसी भी कीमत पर अपनी बहुफ़सली जमीन अडानी को नहीं देने का लिखित प्रस्ताव पारित कर दिया और इस षड़यंत्र का मुंहतोड़ जवाब पेश कर दिया है।
कुछ दिन पूर्व जब अडानी की कंपनी के लोग पुलिस बल के साथ प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण क्षेत्र की जमीन की नापी के लिए आये तो सैकड़ों की तादाद में किसानों ने संगठित होकर प्रतिरोध किया और उन्हें वापस जाने के लिए बाध्य कर दिया था।
आगामी 28 सितंबर को चिन्हित अधिग्रहण स्थल पर किसान महापंचायत करने का निर्णय लिया है, जिसमें अधिग्रहण से प्रभावित होने वाले किसानों के साथ-साथ झारखंड-बिहार के अलग-अलग हिस्सों से विभिन्न जनांदोलनों से जुड़े लोग बड़ी तादाद में जुटेंगे और इस लड़ाई को गति देने पर विचार-विमर्श करेंगे।
आंदोलनकारी किसानों के प्रमुख नेता चिंतामणी साह बताते हैं कि इस अधिग्रहण की अधिसूचना भी स्थानीय अखबार में प्रसारित करने के बजाय यहाँ से लगभग तीन सौ किमी दूर राजधानी रांची के अखबारों में प्रसारित कराई गई।
इस पूरे मामले पर अधिकांश राजनीतिक दलों ने शर्मनाक ढंग से चुप्पी की चादर ओढ़ रखी है।
बीजेपी के नये उद्योगपति गोड्डा के सांसद निशिकांत दूबे से लेकर गोड्डा के नवनिर्वाचित भाजपा विधायक अमित मंडल, वर्तमान बीजेपी नेता प्रशांत मंडल, जो पूर्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा से विधायक भी थे, से लेकर स्थानीय बीजेपी नेता व ग्राम पंचायतों के ज़्यादातर प्रतिनिधि पावर प्लांट के पक्ष में झूठी दलीलें पेश कर अडानी के पक्ष में वातावरण तैयार करने में जुट गये हैं।
प्लांट से गोड्डा के विकास की झांसेबाजी करते हुए ये नेता आदिवासी व अन्य किसानों की बहुफ़सली जमीन के अधिग्रहण के पक्ष में माहौल बना रहे हैं।
आसपास के गांवों में धार्मिक स्थलों-देवी-देवता की मूर्ति के निर्माण के लिए पैसा वितरित कर और नौजवानों को खेल-कूद की सामग्री दी जा रही है। लोगों को तरह-तरह से गुमराह कर अडानी के पक्ष में किये जाने का गौरखधंधा चल रहा है।
इस पावर प्लांट के लगने से प्रकृति-पर्यावरण, भूजलस्तर और किसानों-खेत मजदूरों को होने वाले संभावित भयानक नुकसान के गंभीर तथ्यों को छुपाते हुए शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क के विकास, रोजगार-नौकरी, बिजली आदि की उपलब्धता का झूठा सब्जबाग दिखाया जा रहा है।
किसान संगठित होकर इसका अहिंसक व लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध कर रहे हैं।
किसानों ने ऐलान कर रखा है कि हम अपनी जान देंगे किंतु जमीन नहीं देंगे।
किसानों के आदिवासी नेता सुशील हेम्ब्रम, जो गंगटा-गोविंदपुर के ग्राम प्रधान भी हैं हमें बताते हैं कि अगर यह प्लांट यहां लग गया तो हमारा विनाश हो जाएगा। पर्यावरण प्रदूषित हो जाएगा, पानी की समस्या हो जाएगी। प्रकृति-पर्यावरण को लेकर जो चिंता ये सीधे-साधे अनपढ़ किसान कर रहे हैं, वह कॉर्पोरेटों के प्रति मोहग्रस्त हुक्मरानों की चिंता में शामिल नहीं है।
अधिग्रहण के लिए चिन्हित इस जमीन पर किसानों के धान की फसल आज पूरे शान से लहलहा रही है। खादान्न संकट से जूझ रहे देश में किसानों की बहुफ़सली जमीन को कारपोरेटों के हवाले करने की इस प्रक्रिया पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं।
संथाल परगना कमीश्नरी के गोड्डा जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर मोतिया गांव के समीप बिजली उत्पादन के लिए यह पावर प्लांट प्रस्तावित है। यह प्लांट प्रधानमंत्री के चहेते उद्योगपति गौतम अडाणी का है। 1600 मेगावाट प्रतिदिन बिजली उत्पादन की क्षमता वाले इस प्लांट को राज्य सरकार ने एमओयू- मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग पर हस्ताक्षर कर मंजूरी दे दी है।
प्लांट लगाये जाने वाले क्षेत्र की जनता से राय-मशवरा करना तक राज्य सरकार ने जरूरी नहीं समझा।
इस पावर प्लांट के लिए मोतिया गांव के आस-पास 14 मौज़ा के किसानों की 1700 एकड़ बहुफ़सली खेती की जमीन को चिन्हित किया गया है। इस परियोजना से मोतिया, सोनडीहा, पटवा, पूर्वेडीह, रमनिया, पेटनी, कदुआ टीकर, गंगटा, नयाबाद, बसंतपुर, देवन्धा, गुमा, परासी एवं देवीनगर सहित दर्जनों गांव के लगभग 30 हजार से ज्यादा लोग पूर्णतः पीड़ित-विस्थापित होंगे तथा लगभग 1.5 लाख लोग प्रभावित होंगे।
इस परियोजना में जिनकी जमीन जायेगी, कुछ मुआवजे की कीमत पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी की अपने बाप-दादा की जायदाद हमेशा के लिए खो देंगे।
साथ ही इस जमीन में खेती करने वाले किसान-मजदूर भारी तादाद में बेकारी के शिकार होंगे और पशुओं के चारा के लिए भी पशुपालकों को जूझना पड़ेगा। इस जमीन पर बंटाईदारी पर खेती करने वाले किसानों और हजारों खेत-मजदूर पूरी तरह बेरोजगार हो जाएंगे, जिससे इनमें गहरा आक्रोश व्याप्त है।
परियोजना से होने वाली अनुमानित क्षति के बारे में किसानों के नेता चिंतामणी साह बताते हैं कि इस परियोजना से 48 हजार टन प्रतिदिन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होगा और लगभग बीस हजार टन प्रतिदिन छाई –राख़ (एश) का निष्काषण होगा। प्रतिदिन हजारों टन अन्य जहरीली- स्वास्थ्य के लिये हानिकारक गैसों का भी भारी मात्रा में उत्सर्जन होने से आस-पास की लाखों आबादी खतरनाक बीमारियों से ग्रसित होगी।
वे बताते हैं कि इससे बड़े पैमाने पर ऑक्सीजन के क्षरण के साथ-साथ भयानक जल संकट पैदा हो जाएगा। इस परियोजना के लिए हर रोज 16 करोड़ लीटर जल की आवश्यकता होगी, जिसमें से कहा जा रहा है कि 10 करोड़ लीटर ‘चीर’ नदी से और बाक़ी भूमिगत जल का उपयोग किया जाएगा। लेकिन जिस चीर नदी से पानी आपूर्ति की बात बताई जा रही है उस नदी में केवल बरसात के मौसम में तीन माह तक ही पानी रहता है। यानी यह दस करोड़ लीटर पानी का दोहन भी जमीन के अंदर से ही किया जाने वाला है। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस परियोजना से आसपास के बड़े क्षेत्र का भू-जल स्तर कितना प्रभावित होगा जो आम लोगों के जनजीवन को निकट भविष्य में पूरी तरह से तंग-तबाह कर देगा।
बुजुर्ग किसान श्रीकांत साह बताते हैं कि इस 1700 एकड़ जमीन में ज़्यादातर छोटे-मझोले किसान हैं और ज़्यादातर लोगों के पास खेती ही आजीविका का एकमात्र जरिया है।
 इस परियोजना से बड़े पैमाने पर खाद्यान्न उत्पादन की भी क्षति होगी। सालाना 25 हजार क्विंटल धान एवं 10 हजार क्विंटल – गेहूँ, मक्का, दलहन, तिलहन, ईख आदि का उत्पादन इस जमीन पर होता है। लगभग एक लाख फलदार पेड़-बगीचा से भी हमें फल और आमदनी दोनों होती है। परियोजना लगने से ये सभी पेड़ नष्ट हो जायेंगे जिससे यहाँ का पर्यावरण भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त होगा। 14 में से एक मौज़ा- गयघट को छोड़कर सभी मौजों में गांव बसा हुआ है और यदि यहाँ यह परियोजना लग गई तो वे सभी उजड़ जाएंगे।
स्थानीय ग्रामीण शब्दावली में जिन मौजों में आबादी निवास नहीं करती है, उसे ‘निछ्परा मौज़ा’ और जहां आबादी रहती है उसे ‘छ्परा मौज़ा’ कहते हैं। इस लिहाज से यहां केवल एक ही मौज़ा है जो निछपरा है। बाकी सबमें आबादी बसती है।
वहीं युवा किसान फुटूस कहते हैं कि कंपनी के लोगों द्वारा यह झूठा प्रचार चलाया जा रहा है कि इससे स्थानीय लोगों को रोजगार और बिजली मिल जाएगी और उनका विकास हो जाएगा। जबकि सच तो यह है कि इस संभावित परियोजना से उत्पादित बिजली बांग्लादेश को बेची जायेगी, जिसका लाभांश अडाणी की झोली में जाएगा।
वे बताते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक इस परियोजना से सारे खर्चे काटकर लगभग 1682 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष मुनाफा होगा, जो अडाणी के खाते में जाएगा।
यानी हमारी हर एक एकड़ जमीन पर अडाणी एक करोड़ रुपये हर साल मुनाफा बटोरेगा!
पूर्व में तो अडानी के लोगों के द्वारा एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ मुआवजे की झूठी बात प्रचारित करायी गई थी। जबकि हकीकत यह है कि वर्तमान में हमारी जमीन को चार श्रेणी में बांटकर मात्र 6 से 12 लाख रुपया प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिये जाने की बात हो रही है। बस इतने ही पैसे में हमारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की जमीन एक ही झटके में हमेशा के लिए अडाणी के खाते में चला जाएगा, जहां हम अडाणी की इजाजत के बगैर घुस भी नहीं पाएंगे!
वयोवृद्ध किसान तेजनारायण साह कहते हैं कि जमीन के मुआवजे के तौर पर मिले कुछ रुपये और मुट्ठी भर लोगों को दी जाने वाली छोटी-मोटी नौकरी का लालच देकर हमारी बहुफ़सली-उपजाऊ जमीन सदा-सदा के लिए हड़प ली जायेगी।
वे कहते हैं कि ‘आज हम जमीन बेचकर खा जाएंगे तो हमारे बच्चे क्या करेंगे? यहाँ ज़्यादातर नौकरियां तो बाहर से लाकर उच्च तकनीकी विशेषज्ञों को ही मिलेगी, बाक़ी स्थानीय लोगों के हिस्से तो कुछ मुआवजा राशि के अलावा कुछ आयेगा ही नहीं। लेकिन इसका दुष्परिणाम तो हमें ही भुगतना पड़ेगा। परियोजना के लिए होने वाले अंधाधुंध पानी के उपयोग से भूजल स्तर नीचे चला जाएगा, जिससे आस-पास का जनजीवन और खेती-किसानी बुरी तरह प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा।’
स्थानीय किसान सुबोध कुमार झा कहते हैं कि जेबें तो अडानी की भरेगी और हम ग्रामवासी किसान-मजदूरों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। किसान यह स्वाभाविक सवाल पूछ रहे हैं कि देश के जिन क्षेत्रों में इस प्रकार का भारी-भरकम पावर प्लांट लगा है, वहाँ की स्थानीय जनता आज भी विकास से कोसों दूर हैं और पहले से भी ज्यादा बदहाली की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। जबकि कंपनियां और उनके अफसर-ठेकेदारों की तिजोरी भरती जा रही है। परियोजना से विस्थापित लोगों को आज तक कहीं भी पूर्ण रूप से पुनर्वासित नहीं कराया जा सका है। हमारा भी वही हाल हो जाय, ऐसा हम नहीं चाहते।

इस भूमि अधिग्रहण में ब्राह्मणवाद और कॉर्पोरेट लूट के बीच स्पष्ट रिश्ता बनता दिख रहा है।
किसानों के नेता चिंतामणी साह बताते हैं कि ब्राह्मण जाति के कुछ ऐसे लोग, जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी कभी अपनी जमीन पर खुद से खेती नहीं की है, वे इस भूमि अधिग्रहण के पक्ष में दीख रहे हैं। उनमें से कुछ के पास ज्यादा ज़मीनें हैं। क्योंकि उनको लगता है कि यह सुनहरा मौका है जब यह अबिक्रयशील जमीन बेचकर मोटी रकम वसूल कर लें। इनमें से ज़्यादातर तो गाँव से बाहर रहते हैं और उनके बाल-बच्चे अपनी जमीन पहचानते तक नहीं हैं। वे बंटाईदार किसानों के माध्यम से खेती कराते आए हैं।
चिंतामणी आगे बताते हैं कि यह सब उच्च वर्ण वाले वे लोग कर रहे हैं, जो हल छूना ‘पाप’ मानते रहे हैं और आज भी उनके वंशज उन्हीं संस्कारों को ढो रहे हैं। वैसे भी उनकी जमीन कई एक मौजे में है और उनकी यहाँ की जमीन चली भी गई तब भी उनके पास दूसरे मौजे की जमीन बची रह जाएगी। ऐसे लोगों को जमीन की वास्तविक अहमियत का अंदाजा नहीं है। हालांकि ऐसे लोगों की तादाद बहुत ही कम है और ब्राह्मणों का भी एक हिस्सा, जिनके पास रोजगार का कोई दूसरा जरिया नहीं है, वे किसानों की इस लड़ाई के साथ हैं। जिनकी जमीन जा रही है, वे भी और परियोजना को लगने के बाद के खतरे को जो समझ रहे हैं, वे सभी हमारी लड़ाई के साथ हैं।

‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर देश का नहीं केवल ‘अडानी’ और उनसे जुड़े लोगों- ठेकेदारों, दलालों का ही विकास होगा
किसान केंद्र और राज्य की सरकारों पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि इससे ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर देश का नहीं केवल ‘अडानी’ और उनसे जुड़े लोगों- ठेकेदारों, दलालों का ही विकास होगा। किसानों को बहुफ़सली जमीन से बेदखल कर न तो देश की कृषि का विकास होगा और न ही वास्तविक अर्थों में देश का ही विकास हो सकता है। किसान एक स्वर में कह रहे हैं कि हम यह सब यहाँ नहीं दोहराने देंगे। मुनाफे के हवसी इन भेड़ियों को हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के वर्तमान और भविष्य को कुचलने की छूट नहीं दे सकते!
किसान इस बात को लेकर दृढ़ संकल्पित हैं कि- हम लड़ेंगे – अपनी धरती माता के लिए ; अपनी इस अचल उपजाऊ संपत्ति के लिए; आने वाली पीढ़ियों के लिए!

उनके लिए जमीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी के जीवन और जीविका की गारंटी है।
सिंगूर-नंदीग्राम के किसानों की तरह उन्होंने भी मुकम्मल लड़ाई लड़ने की ठानी है और यह उदघोष किया है कि- हम लड़ेंगे और इन लूटेरों के पाँव अपनी जमीन पर नहीं पड़ने देंगे! हमारे पास लड़ने के अलावा और कोई रास्ता भी तो नहीं है!
किसानों के इस आंदोलन को झारखंड के विभिन्न इलाके के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं , छात्र-नौजवानों के समूहों के साथ-साथ पड़ोसी राज्य बिहार के भी युवाओं के समूहों का समर्थन मिल रहा है। इस बीच पड़ोसी राज्य बिहार के भागलपुर जिले के विभिन्न जनांदलनों से जुड़े लोगों की एक टीम ने गोड्डा जिले के युवाओं के साथ अधिग्रहण से प्रभावित होने वाले क्षेत्र का दौरा किया और इस आंदोलन को समर्थन देते हुए किसानों की बैठक में भी हिसा लिया।
इस टीम में न्याय मंच, भागलपुर के रिंकु, डॉ. मुकेश कुमार, नीतीश आनंद, अनंत आनंद, रणजीत कुमार व तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के छात्र नेता अंजनी सहित अन्य शामिल थे।
डॉ. मुकेश ने बताया कि हमलोग किसानों के 28 सितंबर के महापंचायत में भी हिस्सा लेंगे और पूरे देश के भूमि अधिग्रहण विरोधी लड़ाइयों से जुड़े लोगों को इस आंदोलन से जोड़ने

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