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आदिवासी समाज किसी फोबिया से ग्रस्त नहीं: ज्ञानेंद्रपति

महानगरीय जीवन लोगों को फोबियाग्रस्त कर रहा है। जब कि आदिवासी समाज फोबियाग्रस्त नहीं है।
आदिवासियों के संघर्ष, संस्कृति पूरे देश का विमर्श है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 19 मई को डा रविशंकर उपाध्याय स्मृति सम्मान समारोह में परिचर्चा का विषय था ” हिंदी कविता का आदिवासी परिसर” । इसी बहाने आदिवासी समाज के संघर्ष, उनकी चुनौतियों व संभावनाओं पर चर्चा हुई।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग व डा रविशंकर उपाध्याय स्मृति संस्थान, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में 19 मई को डा रविशंकर उपाध्याय की पहली पुण्यतिथि पर सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। इस समारोह में आदिवासी समाज के विभिन्न पहलुओं पर वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति ने कहा कि महानगरीय जीवन में कई तरह की फोबिया हैं। लोग तिलचट्टे तक से डर जाते हैं। सभा से उठकर भागने लगते हैं। महानगरीय जीवन लोगों को फोबियाग्रस्त कर रहा है। जब कि आदिवासी समाज फोबियाग्रस्त नहीं है। ऐसा क्यों है? प्रकृति से अभिन्नता महसूस करने के गुणों के कारण यह समाज विशिष्ट है। इसलिए आदिवासी समाज को वनवासी कहकर उनकी गरिमा को कम करने का प्रयास कतई नहीं होना चाहिए। भूमंडलीकरण का बुलडोजर इस समाज पर चल रहा है और बुलडोजर चलाने वाली इस सरकार में मानवीय चेतना नहीं है। मानवतावाद अपने आप में पाखंड का पयार्य है। जनसंघर्ष के लिए एकता जरूरी है। अस्मिता की लड़ाई के लिए लोगों का एकजुट होना जरूरी है। बहुजन की एकता में ही भविष्य की राजनीति है।
वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि मेटल कारपोरेशन आफ इंडिया जिस पर आज वेदांता का कब्जा है, इस मानसिकता से प्रेरित हैं कि कुछ लोगों को नष्ट कर देने में ही एक बड़ी आबादी की खुशहाली है। सरकार के साथ आदिवासियों का संघर्ष निरंतर चलता रहा। चंद लोगों की खुशहाली के लिए दुनिया भर में जिस तरह आदिवासियों की हत्या हुई है। चाहे अस्ट्रेलिया, लैटिन अमेरिका, न्यूजिलैंड या अन्य देश हों, वैसा भारत में नहीं हो सका। मिलिट्री कैंप बनाने के नाम पर आदिवासियों को हटाने या पहाड़, नदी बेचने की जितनी घटनाएं इतिहास में नहीं हो सकी, 20-25 वर्षो में यह सब कुछ हुआ। औपनिवेशिक तंत्र का संकट यहां तक आ पहुंचा है। आदिवासियों के संघर्ष, संस्कृति पूरे देश का विमर्श है। कविताएं अपनी परंपराओं को सहेजने के साथ इस संघर्ष को आगे ले जाने की दिशा में भूमिका अदा कर रहीं हैं।
हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका तद्भव के संपादक अखिलेश ने कहा कि स्व डा रविशंकर उपाध्याय की कविताओं में आदिवासी स्वर दिखाई पड़ता है।” तुम्हें भूख है लूटने के लिए, हममें भी भूख है, लुट जाने की वजह से। ” मुख्य धारा के लोग आदिवासी समाज पर कलम चलाते हैं तो उनमें रोमांटिक भाव आ जाता है। आदिवासी समाज पर इतने प्रहार हुए हैं कि उस यथार्थ को किसी रोमांटिक भाव द्वारा नहीं रचा जा सकता।
प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कैसे चेतना और बोध के बीच किसी नस्ल को खत्म किया जाता है। उसकी भाषा, संस्कृति को खत्म किया जाता है। अपने अंदर उस चेतना के प्रकाश को जाने बिना कुछ रचना मुश्किल है। इतिहास में ऐसे रचनाकारों ने ही अपनी अलग पहचान बनाई है। जिनका अपने इतिहास पर पकड़ है। जिसका अपना भूगोल नहीं होता, उसका इतिहास भी नहीं होता। इसलिए अपने इतिहास व भूगोल दोनों पर पकड़ बनाने की जरूरत है। सशक्त इतिहास बोध के बिना रचनाकार सिर्फ दर्शन की बातें कर सकता है।
आदिवासी जमीन से निकलती कविताओं का पाठ करते हुए, उस विषय पर अन्य कई लोगेां ने मंच पर अपने विचार साक्षा किए।
इस दौरान प्रो. राजकुमार ने कहा कि पूरी सभ्यता के विकल्प की चेतना है आदिवासी चेतना। इसलिए दलित व स्त्री विमर्श के साथ इसकी तुलना नहीं की जा सकती है।
‘ परिचय ‘ पत्रिका के सहायक संपादक विंध्याचल यादव ने कहा कि आदिवासी समाज से निकलते कवि न सिर्फ हथियारों से संघर्ष कर रहे बल्कि वे अपने गीत, अपनी संस्कृति को भी हथियार बना रहे। अनुज लुगुन की कविताओं की तरह तीर, धनुष के साथ गीतों से भी बाघ का सामना कर रहे।
डा. सर्वेश ने कहा कि सभ्यता के किसी आवरण में आदिवासी समाज बंधा नहीं है। लोग प्रमाणिकता के साथ जीते हैं।
इस दौरान डा रविशंकर उपाध्याय स्मृति संस्थान के अध्यक्ष रामकृति शुक्ल, सचिव वंशीधर उपाध्याय, प्रो. कुमार पंकज मंच पर उपस्थित थे। सभागार में प्रो.बलिराज पांडेय, प्रो. अवधेष प्रधान, प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी, प्रो. चंपा सिंह, प्रो. वात्णेय, प्रो. वशिष्ठ नारायण, प्रो. नीरज खरे, डा. प्रभाकर सिंह सहित अन्य उपस्थित थे।
इस दौरान वरिष्ठ कवियों ने कहा कि कविता लिखने वालों के साथ स्त्री-पुरूष का भेद मिटना चाहिए। ‘कवयित्री’ की जगह महिला कवियों को भी हम ‘कवि’ ही कहें।
( डा रविशंकर उपाध्याय की स्मृति में मिला यह पहला पुरस्कार मेरी तरह कई अन्य नई पौध व नई संभावनाओं का सम्मान है। जिनसे समाज को उम्मीदें हैं। आदिवासी जमीन से निकलती कविताओं की ओर संभावनाएं जताते हुए यह सम्मान उनसे कह रहा है कि उम्मीद अब भी बाकी है।)
जसिन्ता केरकेट्टा

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