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आधार के रास्ते अब भारत पर इजरायली कंपनियों का धावा

फासीवाद के खिलाफ आपकी लड़ाई कितनी असली है और कितनी नकली!
हमने अपने वामपंथी मित्रों की नापसंदगी की परवाह किये बिना पिछले पूरे एक दशक से बहुसंख्य बहुजनों को आर्थिक मुद्दों पर संबोधित करने की कोशिशें जारी रखी हैं। हमारे बहुजन जब तक मुक्तबाजार के तिलिस्म के तिलिस्म समझते नहीं हैं, किसी तरह के प्रतिरोध की छोड़िये, सही मायने में जनपक्षधरता और जनांदोलन की रस्म अदायगी के अलावा हम कुछ भी करने में असमर्थ हैं।
हम हस्तक्षेप में छपे अपने युवा मेधावी मित्र अभिनव सिन्हा की वाम पहल की अपील से शत फीसद सहमत है, वामपंथ को प्रतिक्रियावादी रुझानों से बचना ही होगा।
जैसे कि हमारे प्रबुद्ध मित्र आनंद तेलतुंबड़े कहते हैं कि मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था का फेनामेनान बेहद जटिल फरेब है, इसे हम पूरी तरह अभी समझ नहीं सके हैं तो मुकाबला करने की हालत में भी हम नहीं है। पहले मुक्त बाजार को समझ तो लें। रणनीति बनायें मुकाबले की और जमीन पर उसे अमल में लाने की कूव्वत रखे। प्रतिबद्धत और समझ हों।
हम तो अपनी औसत मेधा और कामचलाऊ समझ के साथ संवाद का सिलिसिला बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जो समझदार लोग हैं, उनकी खामोशी हैरतअंगेज हैं।
कब तक आखिर पटनायक और बिदवई जैस समझदार अर्थशास्त्री कुलीनों को ही संबोधित करेंगे और कब आखिरकार वे सीधे आर्थिक मुद्दों पर जनता को संबोधित करेंगे, यह हमारे लिए पहेली है। क्या गौतम नवलखा और सुभाष गाताडे पर्याप्त लिख रहे हैं, क्या मुशरर्फ अली, अभिषेक श्रीवास्तव, अमलेंदु उपाध्याय और रियाज जैसे लोग प्रायप्त लोड उठाने को तैयार हैं, हमारी चिंता यह है। हमारे जो समर्थ और समझदार लोग हैं, उनकी निष्क्रियता और उनकी अपर्याप्त सक्रियता हमारे लिए सरदर्द का सबब है।
क्या आनंद स्वरुप वर्मा सिर्फ तीसरी दुनिया तक सीमाबद्ध रहेंगे और पंकज बिष्ट समयांतर तक, हमारे लिए पहेली यह है।
वामदलों की आर्थिक समझ कही कम्युनिकेट क्यों नहीं हो रही है। आर्थिक मुद्दों के विश्लेषण पर पोलित ब्यूरो के प्रेस बयान जारी क्यों नहीं हो रहे हैं और वाम दल क्यों नहीं, देश भर में अब भी बचे हुए कैडर बेस का इस्तेमाल करते हुए इस मुक्त बाजारी तिलिस्म को तोड़ने की कोशिश नहीं कर  रहे हैं, यह हमारी समझ से परे हैं।  
पहेली यह है कि बहुजन राजनीति कब तक अस्मिता केंद्रेत भाववाद के भंवर में फंसी रहेगी और बिन आर्थिक मुद्दों को छुए समता और सामाजिक न्या के दिवास्वप्न जीते हुए बहुजनों को संघ परिवार के हवाले करती रहेगी।
हमारे पास न प्रिंट मीडिया है और न इलेक्ट्रानिक मीडिया, ले देकर हमने अब भी एक तोपखाना हस्तक्षेप के पोर्टल बजरिये चालू रखा है।
हम जानते हैं कि हमारे लोग हमारे प्रयास को जारी रखने के लिए किसी किस्म का आर्थिक सहयोग नहीं करने वाले हैं। लेकिन जब तक हम इसे चला सकते हैं, इसी तेवर के साथ हम चलाते रहेंगे।
फासीवाद या मुक्तबाजार का प्रतिरोध कोई हवा में तलवारें चमकाना या लाठियां भांजना नहीं है जबकि दुश्मन दोस्त की शक्ल अख्तयार करके जनता के बीच मारक हमले के लिए घात लगाये बैठे हों।
भेड़ियों से लड़ना सरल है,  जंगल के खूंखार जानवरों से लड़ना सरल है, लेकिन सीमेंट के जगल में मिलियनर बिलियनर राष्ट्रद्रोही फासिस्ट सत्तावर्ग के हितों से टकराना बच्चों का खेल नहीं है।
अगर हम मुक्त बाजार और फासीवाद के खिलाफ अपनी तमाम सीमाओं के साथ मोर्चे पर डटे हैं तो संघ परिवार के एजंडे के खिलाफ जो लोग हैं, उन्हें कम से कम हमारा साथ देना चाहिए, ऐसी हमारी अपील है।
भले ही आप हमें आर्थिक तौर पर कोई मदद देने की हालत में न हो, लेकिन हस्तक्षेप में हम निरंतर जो सूचनाएं मर खप कर रोज-रोज लगा रहे हैं, उन्हें जनता तक पहुंचाने में आप सांगठनिक तौर पर और निजी तौर पर कोशिश करें, कमसकम सोशल मीडिया पर हमरे लिंक शेयर करें तो यह मौजूदा हालत में हमारी सबसे बड़ी मदद होगी।
हम यह मानते हुए कि असली ताकत बहुसंख्य बहुजन समाज में है, इस यथार्थ से इंकार नहीं कर सकेत कि भाववादी मुद्दों को छोड़कर वे सामाजिक यथार्थ और खासतौर पर आर्थिक मुद्दों पर सोचने समझने की हालत में नहीं है।
संघ परिवार को इसका लाभ मिल रहा है।
धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की पैदल सेना में तब्दील है बहुजन समाज और जब तक इस हालात में बदलाव नहीं होंगे, इस देश को फासीवादी हिंदू राष्ट्र बनने से कोई रोक ही नहीं सकता।
बहुजनों को सत्ता में भागीदारी देकर सत्ता की राजनीति के सबसे बड़े मोहरे में तब्दील करने में संघ परिवार को बेमिसाल कामयाबी मिली है तो दूसरी तरफ संघ विरोधी जनपक्षधर मोर्चा अब भी बहुजनों के साथ अस्पृश्यता का आचरण कर रहा है।
संघी नस्ली रंगभेद के मुकाबले यह जनपक्षधर रंगभेद कम खतरनाक नहीं है। ऐसी हालत में फासीवाद के खिलाफ लड़ाई ख्याली पुलाव के किलाफ कुछ भी नहीं है।
मजा तो यह है कि जो लोग हिंदू साम्राज्यवाद का झंडा दुनियाभर में फहराने का एजंडा अमल में ला रहे हैं, जो लोग शत प्रतिशत हिंदुत्व के लिए सोने की चिड़िया भारत के टुकड़े टुकड़े काट काटकर बहुराष्ट्रीय पूंजी के हवाले करने के लिए भारत को अमेरिका और इजरायली उपनिवेश बना रहे हैं सिर्फ मनुस्मृति राजकाज की बहाली के लिए वे अब एक घाट पर सबको पानी पिलाकर अलस्पृश्यता मोचन का नारा लगा रहे है, जिसका बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के एजंडे से कुछ लेना देना नहीं है और समूचा बहुजन समाज इस फरेब में समरसता, समता और सामाजिक न्याय की तस्वीरें देख रहा है।
सबसे कटु सत्य यह कि फासीवाद का मुकाबला कर रही ताकतों का जनता के मध्य दो कौड़ी की साख नहीं है।
वातानुकूलित कमरे से बाहर फासीबाद की लड़ाई, अखबारी क्रांति और चाय की प्याली की तूफान के बाहर हिंदुत्व की सुनामी के मुकाबले, शत प्रतिशत हिंदुत्व के एजंडे के मुकाबले, भारत को इस्लाम और ईसाईमुक्त करने की संघ परिवार की 2021 की टाइम लाइन के मुकाबले, आर्थिक सुधारों के बहाने नरसंहारी अश्वमेध के खिलाफ, बेलगाम सांढ़ों और घोड़ों के खिलाफ हम जनता के बीच प्राथमिक संवाद तो शुरू ही नहीं कर सके हैं, जनता तक अनिवार्य सूचनाएं पहुंचाने के फौरी कार्यभार जो इस केसरिया कारपोरेट तिलिस्म को तोड़ने का सबसे अहम काम है, को फासीवाद विरोधी ताकतें सिरे से नजरअंदाज किये हुए हैं।
प्रधानमंत्री की मन की बातों की हम चाहे धज्जियां उड़ा दें, हकीकत यह है कि सरकारी बेसरकारी हर माध्यम का इस्तेमाल करके संघ परिवार अपने एजेंडे के पक्ष में पूरे 120 करोड़ लोगों को संबोधित कर रहा है।
कटु सत्य यह है कि संघ परिवार की पहुंच के मुकाबले में हमारी आवाज हजारों लोगों तक भी नहीं पहुंच रही है। हमें लेकिन इसका अहसास तक नहीं है। जिन तक आवाज पहुंचती भी है, वे इतने लापरवाह हैं कि वे इस आवाज में अपनी आावाज मिलाने की कोई हरकत करते नहीं हैं।
सूचना नेटवर्क पर यह एकाधिकार ही संघ परिवार को उसके संपूर्ण मास डेस्ट्राक्शन के कयामती एजंडे को अमल में लाने का पारमाणविक मुक्तबाजारी हथियार है।
सूचना नेटवर्क से बेदखली का सीधा संबंध जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता पर्यावरण, नागरिक मानवादिकारों से बेदखली से है। इसे समझते हुए हम इससे निपटने के लिए क्यों कुछ नहीं कर रहे हैं, इससे फासीवाद विरोधी मोर्चे के सरोकार पर ही सवालिये निशान लग रहे हैं।
इन जरूरी बातों के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक जो होने वाला है, वह फिर वहीं निराधार आधार का अंजाम है, जिसके खिलाफ चेता रहे हैं हम यह योजना पेश होते न होते।
सिर्फ लिखकर नहीं, देश भर में दौड़ते हुए देश के कोने-कोने में बहुजनों को सीधे संबोधित करते हुए।
ताजा सूचना यह है कि आधार के रास्ते अब भारत पर इजरायली कंपनियों का धावा है। इस सूचना की गंभीरत समझने वाले लोगों से विनम्र आवेदन है कि इसे अधिकतम लोगों तक पहुंचाने में हमारी मदद करें।
हमारे आदरणीय मित्र गोपाल कृष्ण जी सिलसिलेवार तरीके से यह खुलासा करते रहे हैं कि असंवैधानिक आधार योजना से इंफोसिस कैसे मालामाल होता रहा है।
आईटी कंपनियों ने चांदी काटी लगातार है और उनका ग्रोथ बाकी कारपोरेट कंपनियों के मुकाबले हैरत अंगेज है।
अभी डिजिटल, बायोमेट्रिक रोबोटिक देश बनाकर इसे इजरायली अमेरिका साझा उपनिवेश बनाकर फिर भारत विभाजन का जो आत्मघाती हिंदुत्व का एजेंडा है, उससे मालामाल फिर आईटी कंपनियां होने वाली हैं। जिनमें आधार इंफोसिस अव्वल है।
मुक्तबाजार की सारी आर्थिक गतिविधियां अब स्टर्टअप और ऐप्स के हवाले हैं। पेपरलैस इकानामी का प्रयावरण प्रेमी फंडा लेकिन आईटी मुनाफा है।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक सांढ़ों की दौड़ आई टी निर्भर है और आईटी सेक्टर और प्राइवेट बैंकिंग सेक्टर बाजार को आगे लेकर जा सकते हैं। इंफोसिस,  टीसीएस और विप्रो इन सभी शेयरों में अच्छा खासा कंसोलिडेशन देखने को मिला है।
कृषि को खत्म करके केसरिया कारपोरेट राष्ट्र की सर्वोच्च प्राथमिकता आईटी संबद्ध सेवा क्षेत्र हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र के सारे उपक्रमों का जो विनिवेश हो रहा है, सो तो हो ही रहा है, उत्पादन से जुड़े हुए तमाम सेक्टरों का सफाया तय है।
खास बात यह है कि जिस सूचना नेटवर्क पर एकाधिकार की वजह से पूरे एक सौ बीस करोड़ जनता हिंदू साम्राज्यवाद की नरसंहारी मुक्ताबाजारी तिलिस्म में कैद बंधुआ गुलामों में तब्दील है और उनमें मुक्ति कामी नागरिकों का कोई संप्रभू स्वतंत्र लक्षण नहीं है।
आधार परियोजना की अमेरिका और नाटो की निगरानी प्रणाली को भारत में हकीकत में बदलकर मालामाल होने वाली कंपनी वहीं सूचना नेटवर्क अब इजराइल के हवाले करने वाली है।
यह कितना खतरनाक है,  इसे यूं समझिए कि 2021 तक भारत को इस्लाम और ईसाई मुक्त बनाने की टाइम लाइन तय कर चुके संघ परिवार ने पहले ही भारतीय विदेश नीति और राजनय इजराइल के मुताबिक बना लिया है और अरब दुनिया के खिलाफ युद्ध घोषणा के तहत चौथी बार इजाराइल के प्रधानमंत्री बनने वाले प्रचंड इस्लाम और अरब विरोधी नेतान्याहु की जीत पर खामोश इजराइल के सबसे बड़े साझेदार के मुकाबले नेतान्याहु से मित्रता की डींग भरते हुए उन्हे सबसे पहले बधाई देने वाले भारत के प्रधानमंत्री ही रहे हैं।
यह कितना खतरनाक है,  इसे यूं समझिए कि कांग्रेस जमाने से सत्ता वर्ग के हितों के लिए सैन्य राष्ट्र बनाने के सिलसिले में सोने की चिड़िया प्राकृतिक संसाधनों की अकूत संपदा वाले भारत को मुक्त बाजार बनाने के सिलसिले में न सिर्फ इस्लाम के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के युद्ध में भारत ब्रिटेन से बड़ा, नाटो से भी बड़ा पार्टनर बना हुआ है,  बल्कि भारत की सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा भी इजाराइल के हवाले है।
अब आधार परियोजना का सही तात्पर्य फिर भी लोग न समझें तो इस देश को फिर विभाजन और विध्वंस से कोई करिश्मा बचा नहीं सकता।
इंफोसिस ने तो सिर्फ भारतीय मुक्तबाजार का सिंहद्वार इजराइली कंपनियों के लिए खोला है, संघ परिवार का राजकाज आगे भारत में इजराइली पूंजी का जो अबाध प्रवाह सुनिश्चित करने वाला है, उसके बाद भारत ही नहीं, समूचे उपमहाद्वीप में अल्पसंख्यकों,  जिनमें भारत के बाहर फंसे हुए हिंदू भी शामिल है, की जिंदगी जो कयामत बनने वाली है।
अब सोच लीजिये कि फासीवाद के खिलाफ आपकी लड़ाई कितनी असली है और कितनी नकली।
पलाश विश्वास

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