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आप ‘मन की बात’ करते हैं, कभी मां की बात भी कर लीजिए

जेएनयू संघर्ष के जरिये भारत में एक नये जनतांत्रिक वामपंथ का बीजारोपण
[button-red url=”#” target=”_self” position=”left”]अरुण माहेश्वरी[/button-red] जेल से रिहाई के बाद कल, 3 मार्च को जेएनयू परिसर में कन्हैया कुमार के भाषण को देश और दुनिया के करोड़ों लोग सुन चुके हैं, सुन रहे हैं और आने वाले काफी दिनों तक सुनते रहेंगे। अभी इस भाषण की गूंज-अनुगूंज ने भारतीय राजनीति की अनेक झूठी-सच्ची आवाजों को पीछे छोड़ दिया है और साफ तौर पर भारतीय राजनीति के एक नये चरण की पद-ध्वनि का संकेत दिया है।
सन् 2014 में भारत के समूचे मीडिया पर नरेन्द्र मोदी का कब्जा था। धन की अपार शक्ति के सामने सब भौचक थे। और इतने सुनियोजित ढंग से मोदी जी की आवाज के शोर को गुंजाया गया था कि उसमें बुद्धि और विवेक की बाकी सारी आवाजें डूब सी गयी थी। सन् 2002 के बदनाम मोदी को पी सी सरकार के जादू के सम्मोहन से जैसे किसी अलादीन के चिराग का रूप दे दिया गया था। पलक झपकते भारत एक स्वर्ग राज्य में तब्दील हो जायेगा। और इस पूरे ताम-झाम का फल हुआ कि 31 प्रतिशत मतदाता झांसे में आगये। चुनाव के अपने गणित से 31 प्रतिशत बाकी 69 प्रतिशत से इतना भारी होगया कि मोदी जी की पार्टी को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल गया।
अभी इस सरकार को बने दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं। लेकिन देश भर से मोहिनी जादू का असर पूरी तरह से छंट चुका है। व्यापक जनता को ठगे जाने, धोखा खा जाने के अवसाद ने घेरना शुरू कर दिया है। दिल्ली, बिहार से लेकर इधर के सभी छोटे-बड़े चुनावों से एक ही आवाज आ रही है – मोदी अब और नहीं! देश का सांप्रदायिक विभाजन नहीं चाहिए! भाई-भाई को लड़ा कर अपनी राजनीति की गोटियां लाल करने वाले नहीं चाहिए!
लेकिन असल में क्या चाहिए, इसे लेकर ऊहा-पोह की स्थिति आज भी बनी हुई है। चुनने के लिये तो लोग मोदी कंपनी की जगह किसी भी दूसरे को चुन देने के लिये तैयार है, लेकिन कोई ऐसा विकल्प जिसपर पूरा भरोसा किया जा सके, जो लोगों की आस्था और विश्वास को हासिल कर सके, इसकी साफ सूरत आज भी उभर कर सामने नहीं आ पाई है। राहुल गांधी, सीताराम येचुरी और अरविंद केजरीवाल के तर्क और तेवर पर लोगों की आशाभरी निगाहें होने के बावजूद एक नये, जनतांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के निर्माण के लिये व्यापक समाज के पैमाने पर जिस स्तर की गोलबंदी की जरूरत है, समाज के सभी दलित, उत्पीडि़त, वंचित, जनतंत्रप्रेमी और देशभक्त लोगों के जिस व्यापकतम दीर्धस्थायी मोर्चे की जरूरत है, उसके विश्वसनीय संकेत लोगों को नहीं मिल रहे हैं। आम लोगों में आज दिखाई दे रही बेचैनी के पीछे ऐसे नये विकल्प की उनकी तीव्र तलाश भी एक बहुत बड़ा पहलू है, जिसके अभाव में लोगों का आक्रोश अराजक आंदोलनों के रूप में भी अक्सर व्यक्त होने लगता है।

crystalisation की प्रक्रिया का प्रारंभ
एक ऐसे माहौल में, रोहित वेमुला की कुर्बानी, जेएनयू का वर्तमान आंदोलन और उसमें कन्हैया की तरह के एक प्रतिभाशाली, तेज-तर्रार छात्र नेता का साफ तौर पर जन-नेता के रूप में उभार बहुत ही अर्थपूर्ण है। यह भारत में जारी व्यापक जन-आलोड़न से पैदा हुई तरल राजनीतिक स्थिति के अंदर जैसे नये सिरे से रवे तैयार करने, स्फटिक बनाने, crystalisation की प्रक्रिया का प्रारंभ है।
जो लोग कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी, उस पर देशद्रोह की तरह की बदनाम धारा के प्रयोग, अदालत के परिसर और अदालत के कमरे तक में उसकी पिटाई, उसकी पतलून को गीला कर देने के अश्लील ब्यौरों में अपने पाशविक उन्माद के साथ डूबे हुए थे, शायद वे भी कल कन्हैया कुमार के राष्ट्र के नाम संबोधन को अपने कमारों के किसी कोने में दुबक कर सुन रहे थे, देख रहे थे। यदि उनके अंदर मनुष्यता का जरा सा अंश भी शेष होगा, तो शायद न्याय की मांग के लिये लड़ रहे इस साहसी छात्र नेता के अद्दम्यता को सराह भी रहे होंगे। निश्चित तौर पर अपनी डंडा-छाप देशभक्ति पर उन्हें लज्जा भी आ रही होगी।

आइये, यहां हम कन्हैया कुमार के पूरे भाषण पर एक नजर डालते हैं।
कन्हैया कुमार ने अपने भाषण का प्रारंभ स्वाभाविक तौर पर जेएनयू के अपने सभी छात्र साथियों, अध्यापकों और कर्मचारियों के साथ ही उस परिसर और उसके आस-पास के दुकानदारों और उनके कर्मचारियों के प्रति और इन सबके साथ ही जेएनयू के साथ अपनी एकजुटता जाहिर करने वाले देश भर के मजदूरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों, मीडिया के चुनिंदा लोगों और नागरिक समाज के लोगों के प्रति आंतरिक आभार व्यक्त करते हुए किया । जेएनयू की लड़ाई रोहित वेमुला को न्याय दिलाने की लड़ाई के साथ एक और अभिन्न है, इसे भी उन्होंने अपने भाषण की शुरूआती पंक्तियों में ही कह दिया। लेकिन गौर करने की बात यह थी कि इस लड़ाई में कदम से कदम मिला कर चल रहे जनता के सभी तबकों का हार्दिक अभिनंदन करने के बावजूद कन्हैया कुमार ने ऐसी किसी ‘सर्वोदयी’ सदाशयता का ढोंग नहीं किया जो राजनीति के बड़े-बड़े अखाड़ेबाजों, पुलिस के पूर्वाग्रह-ग्रस्त अफसरों और मीडिया के बिकाऊ एंकरों और उनके चैनलों पर आने वाले दो-टकिया स्पीकरों की घिनौनी हरकतों को अनदेखा कर दे। कन्हैया ने जिस लहजे में इन सभी शक्तिवानों की हंसी उड़ाई, अनायास ही नागार्जुन की पंक्तियां याद आ गयी –

जली ठूंठ पर बैठ कर, गई कोयलिया कूक
बाल न बांका कर सकी, शासन की बंदूक।

कन्हैया ने कहा, वे किसी से नफरत नहीं करते। एबीवीपी से भी नहीं। सच यह है कि जेएनयू का एबीवीपी परिसर के बाहर के एबीवीपी से ज्यादा रेशनल है। हम सच्चे लोकतांत्रिक है। वे हमारे दुश्मन नहीं, हम उन्हें अपना विपक्ष मानते हैं। हमारा आंदोलन सही को सही और गलत को गलत कहने का आंदोलन है।
कन्हैया ने कहा कि जेएनयू को आंदोलन एक स्वत:स्फूर्त आंदोलन बताते हुए कहा कि हमारे विरोधियों की सारी करतूते पूरी तरह से सुनियोजित थी। एफआईआर में हम पर जो अभियोग लगाये गये थे, उन्हें पहले ही एबीवीपी के पर्चें में लिख दिया गया था।
कन्हैया ने रोहित वेमुला की शहादत के साथ ही बाबा साहब अंबेडकर की विरासत और उनके दिये संविधान का उल्लेख किया। एक लोकतांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष और समाजवादी भारत के निर्माण के उद्देश्यों के प्रति अपनी अटूट निष्ठा को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि अभी जो चल रहा है, वह चल नहीं सकता है। बदलाव ही शाश्वत सच है।
जेल के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसके पहले तक हम व्यवस्था के बारे में पढ़ते थे, खूब पढ़ते थे, लेकिन इस बार उसे झेला है। कन्हैया ने मोदी जी की चुटकी ली। कहा कि उनसे तमाम मतभेदों के बावजूद हम भी उनके ट्वीट की बात को मानते हैं – सत्यमेव जयते। लेकिन उन्होंने सिडिशन एक्ट का छात्रों के खिलाफ प्रयोग एक पॉलिटिकल टूल की तरह किया है। सचाई यह है कि मोदी जी उनके गांव के स्टेशन पर जादू दिखा कर झूठी अंगूठियां बेचने वाले एक सेल्समैन है।
कन्हैया ने जोर देकर कहा कि वैसे तो भारत के लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर है, लेकिन इस बार का तमाशा बहुत बड़ा था। काला धन लायेंगे, महंगाई भगायेंगे। हर आदमी के खाते में पंद्रह लाख रुपये जायेंगे। सबका साथ, सबका विकास। इस बार लोग इनकी बातों को कभी नहीं भूलेंगे।
हमारे स्वत:स्फूर्त आंदोलन के खिलाफ डाक्टर्ड वीडियो बनाये जा रहे थे। अब जेएनयू के डस्टबिन में कंडोम गिने जा रहे हैं। सचाई यह है कि यह पूरे जेएनयू पर हमला है। आक्यूपाई यूजीसी, रोहित वेमुला की हत्या से ध्यान हटाने के लिये किया गया हमला। और इसमें प्राइम टाइम (टाइम्स नाउ) का एक्स आरएसएस एंकर शामिल था।
कन्हैया ने भारत की सीमाओं पर अपने प्राणों की बाजी लगा कर सीमा की हिफाजत करने वाले सेना के जवानों को सलाम किया। इसके साथ ही पार्लियामेंट में इन जवानों की बात करने वालों से पूछा कि वे क्या आपके भाई है ? ये जवान हमारे भाई, हमारे पिता है, भारत के उनक गरीब किसानों के बेटे हैं जिन्हें आप भूख से दम तोड़ने या आत्म-हत्या करने के लिये मजबूर किया करते हैं। क्या प्राइम टाइम के दोटकिया स्पीकर इसे जानते हैं ?
कन्हैया ने जेल के सिपाहियों से अपनी बातों के हवाले से कहा कि ये वर्दीधारी सिपाही बड़े लोगों के बेटे नहीं है। ये गरीब किसानों, अनुसूचित जातियों और जन-जातियों के लोग हैं। हरियाणा में अभी के जाट आंदोलन पर वे कह रहे थे, जातिवाद बहुत बुरी चीज है। एक सिपाही ने उससे कहा कि पहले मैं सोच रहा था कि तुम आओगे तो तुम्हें खूब पीटूंगा, लेकिन तुमसे बात करने के बाद अब उन्हें पीटने की इच्छा होती हैै ।
कन्हैया ने बाबा साहब के हवाले से जनतंत्र के महत्व की बाते करते हुए कहा कि लेनिन जनतंत्र को समाजवाद का अविभाज्य हिस्सा मानते थे। इन लोगों को विज्ञान का यह नियम भी नहीं मालूम कि जितना दबाओगे, नीचे से उतना ही ज्यादा प्रेसर पैदा होगा। कमजोरों के उत्थान और उनकी आजादी की लड़ाई कभी नहीं रुकेगी।
कन्हैया ने अपने भाषण में आत्म-समीक्षा की बात भी कही। वे जेएनयू के छात्रों को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि अक्सर हम अपनी बातों को इतनी भारी-भरकम पदावली में कहा करते हैं, जिसे भारत का साधारण आदमी समझ नहीं पाता है। बातें उसके सिर के ऊपर से निकल जाती है। जरूरत है हमें आम लोगों के स्तर पर उतर कर उनसे बात करने की।
उन्होंने जेल में दी गई ब्लू और लाल, दो कटोरियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उन दो कटोरियों में मुझे भावी भारत की तस्वीर दिखाई दे रही थी। आनेवाले दिनों में हम एक ऐसी सरकार बनायेंगे जो सचमुच सबके लिये न्याय और सबकी समानता को सुनिश्चित कर सके।
और, जहां तक सरकार के दमन का सवाल है, कन्हैया ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा कि ‘जब तक जेल में चना रहेगा, आना-जाना लगा रहेगा।’ आज ही प्रधानमंत्री संसद में स्तालिन और ख्रुश्चेव की बात कर रहे थे। मेरी इच्छा हुई कि टीवी के अंदर घुस कर उनके पास जाऊं और धीरे से उनके कोट को खींच कर कहूं कि जरा हिटलर की बात भी कह दीजिये। मुसोलिनी की भी, जिनसे आपके लोगों ने काली टोपी ली है। जिनसे आरएसएस के लोग जाकर मिले थे और जर्मनी की तर्ज पर लोगों को भारतीयता सिखा रहे थे।
कन्हैया ने प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ का भी उल्लेख किया। कहा कि आज लगभग तीन महीने बाद मैंने अपनी मां से बात की है। हम आपस में दर्द की बात कर रहे थे, जिन्हें समझ में यह बात आती है वे रोते हैं, और जिन्हें नहीं आती वे हम पर हंसते हैं। मैं कहता हूं, आप ‘मन की बात’ करते हैं, कभी मां की बात भी कर लीजिए। हम भी किसी मां के बेटे हैं।

सिर्फ झूठ को ही झूठ बनाया जा सकता है
कन्हैया ने देश की मौजूदा स्थिति को एक खतरनाक स्थिति बताया। कहा कि उस देश की कल्पना कीजिए जिस देश में लोग ही न हो। जेएनयू एक ऐसा विश्वविद्यालय है जहां के छात्रों में साठ प्रतिशत लड़कियां है। हम यहां हर स्तर पर रिजर्वेशन की पॉलिसी लागू करने की कोशिश करते हैं। आज हालत यह है कि सीताराम येचुरी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और डी. राजा को देशद्रोही करार दिया जा रहा है। रेशनलिटी खत्म हो रही है। गालियां और धमकियां दी जा रही हैं। वे भूल गये हैं कि 69 प्रतिशत लोगों ने उनके खिलाफ मतदान किया है। वे हमेशा के लिये जीत कर नहीं आए हैं। आप कभी भी सच को झूठ नहीं बना पायेंगे। सिर्फ झूठ को ही झूठ बनाया जा सकता है।
वर्तमान शासन की कड़ी आलोचना करते हुए कन्हैया ने कहा कि ये लोग जनता का ध्यान बंटाने की फिराक में हैं। अब आगे राम मंदिर का मसला उछाला जा सकता है। जेल में एक सिपाही मुझसे धर्म के बारे में बात कर रहा था। हमने कहा, आप जानते हैं कि भगवान ने सृष्टि की रचना की है, लेकिन कुछ लोग हैं जो भगवान के लिये कुछ रचने का गुमान रखते हैं।
सुब्रह्मण्यम स्वामी को चुनौती दी कन्हैया ने
कन्हैया ने सुब्रह्मण्यम स्वामी को चुनौती देते हुए कहा कि वे जेएनयू आएं और खुले में हमसे तर्कों के आधार पर विमर्श करें। वे तर्क से यह साबित करे कि जेएनयू को क्यों चार महीनों के लिये बंद कर दिया जाना चाहिए। अगर वे ऐसा कर पाते हैं तो हम उनकी बात मान लेंगे। अन्यथा वे इस प्रकार की बकवास को बंद करें। कन्हैया ने कहा कि ऐसे तमाम लोगों की लगाम नागपुर के हाथ में है। इनके वकील हो, छात्र हो, साधू हो – सबके प्रदर्शनों में एक ही झंडा, एक ही फेस्टून, एक ही बैनर को लहराया जाता है।
भाषण के अंत में उन्होंने अपनी लड़ाई को एक बहुत लंबी लड़ाई बताया। यह भारत के गरीबों की लड़ाई है। कोई इसे दबा नहीं सकता। जो भी हमें बांटना चाहता है, उसका डट कर मुकाबला करना होगा।
आवाज दो…हम एक हैं और अंत में उन्होंने आजादी का अपना प्रसिद्ध दीर्घ-नारा दिया।
और इस प्रकार, जेएनयू परिसर में एक नये, जनतांत्रिक वामपंथ की आधारशिला रखी गई
नये भारत की लड़ाई के एक नये और व्यापक अभियान का सूत्रपात हुआ। हम सभी टेलिविजन के चैनलों पर इस नये इतिहास के प्रारंभ-बिंदु के साक्षी बने।
यहां हम आज एनडीटीवी पर कन्हैया के उस साक्षात्कार को साझा कर रहे हैं जिसे रवीश कुमार ने लिया है –
https://www.youtube.com/watch?v=uT5h_Ah7A2o

 

http://chaturdik.blogspot.in/2016/03/blog-post.html

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