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आम आदमी के हित की राजनीति का सवाल

केवल महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक प्रमुखता के दौर में देश के आम आदमी के हित की राजनीति हुयी है बाकी तो चाकर पूँजी की सेवा ही चल रही है।
शेष नारायण सिंह
अभी एक दोस्त ने ऐलान किया है कि ‘देश की राजनीति में अच्छे, ईमानदार, चरित्रवान, कर्मठ और जुझारू लोगों के आए बिना देश का भला सम्भव नहीं है। इसीलिये सोचता हूँ कि लोकसभा चुनाव में ताल ठोकते हुये उतर ही जाऊँ।’ आज अपना लोकतन्त्र ऐसे मुकाम पर है जब देश के उन लोगों को राजनीति में शामिल होने की जरूरत है जो इस देश की एकता और अखण्डता में विश्वास करते हैं।
देश के सबसे अच्छे विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त यह दोस्त पुलिस की सर्वोच्च सेवा, आईपीएस छोड़कर बिहार शरीफ के अपने घर में रहता है और शान्ति की ज़िन्दगी जीता है। इसके सीने में एक बेहतरीन संवेदनाओं वाले इंसान का दिल धड़कता है और यह अपने देश को प्रेम करता है। आमतौर पर मित्रों को राजनीति की कड़ाही में जाने से रोकने की अपनी आदत के बावजूद इस मित्र के इस ऐलान से खुशी हुयी। हमें मालूम है कि अपनी शान्तिप्रिय जिन्दगी को छोड़कर यह दोस्त चुनावी राजनीति में शामिल नहीं होगा लेकिन खुशी है कि राजनीति में शामिल हो चुके लोगों की स्वार्थपरता अब ऐसे मुकाम पर पहुँच गयी है कि सभ्य लोग भी राजनीति में दोबारा शामिल होने के बारे में कभी-कभी सोचने लगे हैं। दोबारा इसलिये कि महात्मा गाँधी और नेहरू के नेतृत्व में सभ्य लोग ही राजनीति में शामिल होते थे लेकिन पिछले 35 वर्षों में राजनीति ऐसे लोगों का ठिकाना हो चुकी है जो आमतौर पर राजनीति को एक व्यवसाय के रूप में अपनाते हैं। लेकिन शुरू से ऐसा नहीं था। आजादी की लड़ाई में जब बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ शुरू हुयीं तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफल लोग राजनीति में शामिल हुये थे। 1920 से 1942 तक भारतीय राजनीति में जो लोग शामिल हुये वे अपने क्षेत्र के बहुत ही सफल लोग थे। राजनीति में वे कुछ लाभ लेने के लिये नहीं आये थे, अपना सब कुछ कुर्बान करके अपने देश की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को लोकशाही के हवाले करने का उनका जबा उनको राजनीति में लाया था। बाद के समय में भी राजनीति में वे लोग सक्रिय थे जो आज़ादी की लड़ाई में शामिल रह चुके थे और देश के हित में कुर्बानियाँ देकर आए थे। लेकिन जवाहरलाल नेहरू के बाद जब से राजनीतिक नेताओं का नैतिक अधिकार कमजोर पड़ा तो राजनीति में ऐसे लोग आने लगे जिनको चापलूस कहा जा सकता है। आज की तारीख में दिल्ली में अगर नज़र दौड़ाई जाये तो साफ नज़र आ जायेगा कि राजनीति में ऐसे लोगों का बोलबाला है जो राजनीति को एक पेशे के रूप में अपनाकर सत्ता के गलियारों में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं, देश के उजवल भविष्य से उनका कोई लेना देना नहीं है, वे वर्तमान में जीने के शौकीन हैं और वर्तमान को राजाओं की तरह जी रहे हैं।

ऐशोआराम के शौकीन मौजूदा राजनेताओं की यह फौज भारतीय अर्थव्यवस्था के मनमोहनीकरण की देन है।
जब मनमोहन सिंह ने पीवी नरसिम्हा राव के वित्तमन्त्री के रूप में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश शुरू की तो उन्होंने पूँजीवादी अर्थशास्त्र की सबसे खतरनाक राजनीति की शुरुआत की जिसमें कल्याणकारी राज्य की भूमिका को केवल व्यापार को बढ़ावा देने वाली एजेन्सी के रूप में पेश किया गया। देश की अर्थव्यवस्था को उन्होंने उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की आग में झोंक दिया। मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण को उपचार के रूप में पेश किया और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्वबाजार के साथ जोड़ दिया। डॉ. मनमोहन सिंह ने आयात और निर्यात को भी सरल बनाया और भारत को दुनिया के विकसित देशों का बाज़ार बना दिया। निजी पूँजी को उत्साहित करके सार्वजनिक उपक्रमों को हाशिए पर ला दिया। देखने में आया है कि डॉ. मनमोहन सिंह के 1992 के विख्यात बजट भाषण के बाद इस देश में जो घोटाले हुये हैं, वे हज़ारों करोड़ के घोटाले हैं। इसके पहले घोटाले कम कीमत के हुआ करते थे। बोफोर्स घोटाला बहुत बड़ा घोटाला माना जाता था, लेकिन पिछले 15 वर्षों के घोटालों पर एक नज़र डाली जाये तो समझ में आ जायेगा कि 65 करोड़ का बोफोर्स घोटाला आधुनिक कलमाड़ियों, राजाओं और येदुरप्पाओं के सामने बहुत मामूली हैसियत रखता है।
एक और बात समझ लेने की है कि दोनों ही बड़ी पार्टियों की अर्थनीति वही है, डॉ. मनमोहन सिंह को बेशक भाजपा वाले आजकल दिन-रात कोस रहे हैं, लेकिन जब उनकी पार्टी की सरकार बनी तो छ: साल तक मनमोहन सिंह की ही आर्थिक नीतियाँ चलती रहीं। उन नीतियों को लागू करने के लिये अटल बिहारी वाजपेयी ने वित्त मन्त्री के रूप में किसी पूर्व अफसर को लगा रखा था।
अभी हमने देखा कि भाजपा और काँग्रेस में लोकसभा में तेलंगाना मुद्दे पर बड़ी अपनापे भरी एकता नज़र आयी। यह जो एकता दिखी है वह अकारण नहीं है। दोनों ही पार्टियाँ पूँजीवादी अर्थशास्त्र की राजनीति के लिये काम करती हैं और ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ काँग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं हैं। अभी पिछले दिनों दिल्ली की विधानसभा में भी काँग्रेस और भाजपा में जबरदस्त एकता देखी गयी। यह एकता सारी राजनीतिक तल्खी के बाद बनी रहती है। ऐसा माना जा रहा था कि अरविंद केजरीवाल नाम का व्यक्ति दोनों पार्टियों के जनविरोधी और पूँजीवाद समर्थक रुख को रोकने की कोशिश करेगा लेकिन उन्होंने इस उम्मीद को ध्वस्त कर दिया है। उन्होंने पूँजीपतियों की एक सभा में जाकर ऐलानियाँ कहा कि वे पूँजीवाद की राजनीति की पूरी पक्षधरता के साथ लगे हुये हैं। यानी वे भी आखिर में मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को ही लागू करेंगे। हाँ, सत्ता हासिल करने के लिये वे दोनों ही राजनीतिक पार्टियों का विरोध करने का स्वाँग जरूर कर रहे हैं।
राजनीति में सत्तर के दशक में ऐसे लोगों का आना बड़े पैमाने पर शुरू हुआ जो राजनीति को व्यापार समझते थे। इस तरह के लोगों की भर्ती स्व. इंदिरा गाँधी के छोटे पुत्र संजय गाँधी ने मुख्य रूप से की थी। काँग्रेस पार्टी को 1977 में हार का मुँह देखना पड़ा, लेकिन सत्ता से बाहर रहकर संजय गाँधी ने ऐसे लोगों को काँग्रेस का सदस्य बनाया जिनको राजनीति के उन आदर्शों से कोई लेना-देना नहीं था जो आज़ादी की लड़ाई की मूल भावना के रूप में जाने जाते थे। यही वर्ग 1980 में सत्ता में आ गया और जब मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार के सामने पेश किया तो इस वर्ग के बहुत सारे नेता भाग्य विधाता बन चुके थे। उन्हीं भाग्यविधाताओं ने आज देश का यह हाल किया है और अपनी तरह के लोगों को ही राजनीति में शामिल होने के लिये प्रोत्साहित किया।
पिछले 20 वर्षों की भारत की राजनीति ने यह साफ कर दिया है कि जब तक देश प्रेमी और आर्थिक भ्रष्टाचार के धुर विरोधी राजनीतिक पदों पर नहीं पहुँचते, देश का कोई भला नहीं होने वाला है। इसी शून्य को भरने की कोशिश आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने की और जनता ने उनको सर आँखों पर बिठाया लेकिन उद्योगपतियों की सभा में उन्होंने भी साफ कह दिया है कि वे पूँजीवादी राजनीति के समर्थक हैं। इसका मतलब यह हुआ कि वे चाकर पूँजी के लिये काम करेंगे और उसी तरह से देश का भला करेंगे जैसा ईस्ट इंडिया कम्पनी, ब्रिटिश साम्राज्य और 1970 के बाद की बाकी सत्ताधारी पार्टियों ने किया है। केवल महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक प्रमुखता के दौर में देश के आम आदमी के हित की राजनीति हुयी है बाकी तो चाकर पूँजी की सेवा ही चल रही है।
राजनीतिक दुर्दशा के इस माहौल में मेरे मित्र या उसके जैसे लोगों का चुनाव राजनीति में शामिल होने के बारे में सोचना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विकासक्रम है। आज यह देशहित में है कि ऐसे लोग सभी राजनीतिक पार्टियों में शामिल हों जिससे देश की राजनीति साधारण आदमी की पक्षधरता के बुनियादी कर्तव्य का पालन कर सके, कल्याणकारी राज्य की स्थापना हो सके, और राजनीति के रास्ते देश में फल फूल रहा आर्थिक भ्रष्टाचार खत्म किया जा सके।

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