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आम आदमी हो गये फिक्की सीआईआई एसोचैम !

आखिर हर साल बजट में कॉर्पोरेट्स/ अमीरों को साढ़े पाँच लाख करोड़ रूपये की टैक्स छूट/ रियायतें भ्रष्टाचार क्यों नहीं है?
 

आनंद प्रधान

अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी की परिभाषा देते हुये कहा कि जो ईमानदारी के साथ है वह सब आम आदमी है, चाहे वह झुग्गी में रहता हो या ग्रेटर कैलाश में।

सर जी, टाटा-बिरला-अम्बानी सहित सारे कारपोरेट और उनके लाबी संगठन-फिक्की/ सीआईआई/ एसोचैम ईमानदारी की कसमें खाते हैं। अपने सम्मेलनों में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रस्ताव पारित करते हैं। लेकिन आप की नई परिभाषा के मुताबिक, वे सब कहीं आम आदमी तो नहीं हो गये? नहीं, सिर्फ पूछ रहा हूँ? आखिर वे सब आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर रहे हैं।

लेकिन एक बात पूछूँ, क्या बेईमान सिर्फ घूस माँगने वाला ही है या घूस देनेवाले की भी कुछ जिम्मेदारी है? क्या घूसखोरी के दो पक्ष नहीं हैं- एक माँग पक्ष और दूसरा आपूर्ति पक्ष?

सर जी, सच यह है कि कॉर्पोरेट्स इस देश में भ्रष्टाचार के मुख्य स्रोत हैं। वे अपने मुनाफे की भूख में सही-गलत काम के लिये नेताओं/ अफसरों को पैसा खिलाते हैं। दबव बनाते हैं। अपनी मर्जी के अफसर और मंत्री बनवाते हैं। फिर अपने मुताबिक, नीतियों और फैसलों को बदलवाते हैं।

क्या यह सही नहीं है कि सिर्फ प्रत्यक्ष घूस लेना-देना ही भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि अमीरों/ कार्पोरेट्स के हित में नीतियों को बनाना कहीं बड़ा भ्रष्टाचार है? आखिर हर साल बजट में कॉर्पोरेट्स/ अमीरों को साढ़े पाँच लाख करोड़ रूपये की टैक्स छूट/ रियायतें भ्रष्टाचार क्यों नहीं है? रिलायंस को केजी बेसिन की गैस की कीमतों में दोगुने की बढ़ोत्तरी की इजाजत भ्रष्टाचार क्यों नहीं है? और उदाहरण दूँ?

फिर ये आम आदमी कैसे हो गये सर जी? जी, बस जी घबरा रहा था, इसलिए पूछ लिया।

About the author

हार्डकोर वामपंथी छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये आनंद प्रधान का पत्रकारिता में भी महत्वपूर्ण स्थान है. छात्र राजनीति में रहकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में AISA के बैनर तले छात्र संघ अध्यक्ष बनकर इतिहास रचा. आजकल Indian Institute of Mass Communication में Associate Professor . पत्रकारों की एक पूरी पीढी उनसे शिक्षा लेकर पत्रकारिता को जनोन्मुखी बनाने में लगी है

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