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आरएसएस के गठन का लक्ष्य दलितों के समानता के संघर्ष को कुचलना भी था

आरएसएस के गठन का लक्ष्य दलितों के समानता के संघर्ष को कुचलना भी था
पुस्तक समीक्षा : अंबेडकर और हिन्दुत्व-राम पुनियानी
-इरफान इंजीनियर और नेहा दाभाड़े
भारतीय समाज इन दिनों मानो एक चौराहे पर खड़ा है।
एक ओर दलितों के विरूद्ध क्रूर हिंसा हो रही है, जैसा कि हमने ऊना में देखा, तो दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं को ‘अंबेडकर भक्त’ बता रहे हैं और अंबेडकर की तुलना मार्टिन लूथर किंग से कर चुके हैं।
यह विडंबना ही है क्योंकि अंबेडकर अपनी पूरी ज़िंदगी दलितों को समान दर्जा दिलवाने के लिए संघर्ष करते रहे जबकि भाजपा के विचारधारात्मक पथप्रदर्शक आरएसएस ने कभी इस पदक्रम और असमानता की निंदा नहीं की।
इस वर्ष, अंबेडकर की जयंती भाजपा और आरएसएस ने बहुत जोर-शोर से मनाई और यह दिखाने की कोशिश की कि अंबेडकर की विचारधारा, आरएसएस के हिंदुत्ववाद से मिलती-जुलती थी। यह अंबेडकर का अपने राजनैतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने का कुत्सित प्रयास है।
राम पुनियानी की पुस्तक ‘‘अंबेडकर व हिन्दुत्व की राजनीति’’ बहुत स्पष्टता से हमें आरएसएस और भाजपा के अंबेडकर व दलितों के प्रति असली दृष्टिकोण से परिचित करवाती है।
लेखक सफलतापूर्वक यह दर्शा सका है कि अंबेडकर और आरएसएस की विचारधारा में कोई मेल संभव नहीं है।
अंबेडकर के चुनिंदा कथनों को उद्धृत कर और उनके विचारों को तोड़-मरोड़ कर संघ और भाजपा, अंबेडकर पर कब्ज़ा ज़माना चाहते हैं और अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए दलितों में अपनी पैठ बनाने के इच्छुक हैं। दोनों विचारधाराओं के बीच के मूलभूत अंतर को लेखक ने अत्यंत सुसंगत तरीके से हमारे सामने रखा है।
पुस्तक, हिन्दुत्व की राजनीति के जाति, धर्म और अंबेडकर के बारे में विचारों को प्रस्तुत करती है।
यह पुस्तक एक ऐसे दौर में प्रकाशित हुई है जब आरएसएस और भाजपा का नेतृत्व यह साबित करने में जी जान से जुटा है कि अंबेडकर और हिन्दुत्ववादियों के बीच कोई मतविभिन्नता नहीं थी और दोनों के लक्ष्य और उद्देश्य एक ही थे।
पुस्तक यह बताती है कि अंबेडकर और हिन्दुत्व की विचारधाराओं में ज़मीन-आसमान का फर्क है।
अंबेडकर ने जाति व्यवस्था के दंश को भुगता था। वे उस भेदभाव और असमानता के व्यक्तिगत रूप से शिकार बने थे, जो जाति व्यवस्था का मूल लक्षण है। अपने अनुभव के आधार पर अंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत में जाति व्यवस्था, हिन्दू धर्म से ही उपजी है और हिन्दू धर्म, मूलतः ब्राह्मणवादी और ऊँचनीच में विश्वास करने वाला है। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म और हिन्दू राष्ट्रवाद, आरएसएस की विचारधारा के आधार हैं और अंबेडकर की दृष्टि में ये दोनों ही अभिशाप हैं।
अंबेडकर ने स्पष्ट लिखा,

‘‘हिन्दू धर्म, जाति के आसपास बुने गए सामाजिक, राजनैतिक और साफ-सफाई संबंधी उथले नियमों का समूह भर है…’’।

वे लिखते हैं,

‘‘हिन्दू चाहे जो भी कहें हिन्दू धर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है और इस कारण वह प्रजातंत्र से असंगत है’’।

आगे चलकर उन्होंने हिन्दू धर्म को त्याग दिया और वे बौद्ध बन गए।
हिन्दू धर्म की अवधारणाओं और प्रतीकों के संबंध में आरएसएस और अंबेडकर के बीच आधारभूत मतभेद हैं।
अंबेडकर और आरएसएस, भगवान राम को किस रूप में देखते थे, इस बारे में यह पुस्तक हमें बहुत दिलचस्प तथ्यों से अवगत कराती है। भगवान राम, आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक प्रमुख प्रतीक हैं।
संघ की दृष्टि में राम एक आदर्श पुरूष हैं और आदर्श पति व आदर्श शासक भी। परंतु अंबेडकर लिखते हैं कि राम के लिए

‘‘सीता के जीवन का तो मानो कोई महत्व ही नहीं था। महत्व केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और नाम का था। उन्होंने पुरूशोचित राह अपनाकर उन अफवाहों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया जो एक राजा के बतौर वे कर सकते थे और जो एक ऐसे पति के बतौर, जो अपनी पत्नी के निर्दोष होने के संबंध में आश्वस्त था, करना उनका कर्तव्य था‘‘।

‘आदर्श शासक’ राम ने दलितों के खिलाफ किस तरह की हिंसा की, उसका उदाहरण देते हुए पुस्तक बताती है कि शम्बूक नामक दलित का सिर राम ने उस समय काट दिया था जब वह स्वर्ग जाने की इच्छा से तपस्या कर रहा था।
इस उदाहरण से शुरू कर लेखक, दलितों के प्रति आरएसएस के दृष्टिकोण पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं।
लेखक का कहना है कि दलितों को अपने खेमे में शामिल करने के लिए संघ परिवार हर संभव प्रयास कर रहा है परंतु वह उस जातिप्रथा का विरोध नहीं करता जो दलितों की व्यथा का मुख्य स्त्रोत है और जिसके कारण उन्हें सदियों से असमानता और अत्याचारों का शिकार होना पड़ा है।
जातिप्रथा को मनुस्मृति जैसे ग्रंथ वैध ठहराते हैं और उसे धार्मिकता का चोला पहनाते हैं।
महात्मा फुले और अंबेडकर ने दलितों की मुक्ति के लिए चावदार तालाब, कालाराम मंदिर और मनुस्मृति दहन जैसे आंदोलन चलाए। आरएसएस ने इन आंदोलनों में न तो कभी भागीदारी की और ना ही इनका समर्थन किया।
बल्कि सच तो यह है कि आरएसएस के गठन का लक्ष्य दलितों के समानता के संघर्ष को कुचलना भी था।
संघ में हमेशा से ऊँची जातियों के लोगों का बोलबाला रहा है। लेखक कहते हैं कि इस विरोधाभास के बावजूद, आरएसएस, दलितों को अपने खेमे में शामिल कर यह दिखाना चाहता है कि हिन्दू समाज एक है।
आरएसएस ने सामाजिक समरसता मंच नामक संस्था का गठन कर यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि हिन्दू धर्म समावेशी है। परंतु हिन्दुत्व की राजनीति न तो वर्तमान सामाजिक पदक्रम पर प्रश्नचिन्ह लगाना चाहती है और ना ही उस श्रेणीबद्ध जाति व्यवस्था को समाप्त करना चाहती है जो दलितों के दमन का कारण और स्त्रोत हैं।
सामाजिक समरसता मंच जैसे संगठनों का गठन कर और विभिन्न जातियों के बीच ‘सामाजिक सद्भाव’ स्थापित करने का नारा देकर आरएसएस, दलितों की मूल समस्याओं, जिनमें रोज़गार, शिक्षा और गरीबी से मुक्ति शामिल हैं, से ध्यान हटाना चाहता है।
वह गोरक्षा और राम मंदिर जैसे मुद्दों में दलितों को उलझाए रखना चाहता है।
वह दलितों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा है कि विभिन्न जातियों के बीच सद्भाव है और इसलिए उन्हें वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन की मांग को त्याग देना चाहिए।
वनवासी कल्याण आश्रम का गठन आदिवासियों को संघ के खेमे में शामिल करने के लिए किया गया था। दलितों और आदिवासियों का इस्तेमाल, मुसलमानों और ईसाईयों जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ सड़कों पर हिंसा करने के लिए किया जा रहा है, जैसा कि हमने गुजरात और कंधमाल में देखा।
अल्पसंख्यकों को हिन्दुओं और हिन्दू धर्म का शत्रु निरूपित किया जा रहा है।
यह स्पष्ट है कि आरएसएस और उसकी राजनीति न तो दलितों का आर्थिक विकास चाहती है और ना ही उन्हें समान दर्जा देने की इच्छुक है।
पुस्तक इस तथ्य पर भी प्रकाश डालती है कि दलितों के पक्ष में सकारात्मक नीतियों और कार्यक्रमों का ऊँची जातियों ने हमेशा विरोध किया और अब तो वे अपने लिए भी आरक्षण की मांग कर रही हैं।
संघ, आरक्षण की व्यवस्था समाप्त करने का हामी है।
संघ के चिंतक एमजी वैद्य ने कहा था,

‘‘अब जाति-आधारित आरक्षण की आवश्यकता नहीं रह गई है क्योंकि कोई जाति पिछड़ी नहीं बची है। ज्यादा से ज्यादा केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इसे दस साल और जारी रखा जा सकता है। इसके बाद, इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए’’।

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने भी इसी तरह की मांग की थी।
सरकार की आर्थिक नीतियां भी दलितों और हाशिए पर पड़े अन्य वर्गों के शोषण को बढ़ावा देने वाली हैं।
यद्यपि सैद्धांतिक रूप से हमारा संविधान सभी नागरिकों को समानता की गारंटी देता है परंतु आज भी दलितों को मजबूरी में हाथ से मैला साफ करने जैसे अमानवीय कार्य करने पड़ते हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें बेहतर अवसर उपलब्ध ही नहीं हैं। अंबेडकर हमेशा दलितों की शिक्षा पर ज़ोर देते थे ताकि वे अपने उन पारंपरिक पेशों से मुक्ति पा सकें जो उन्हें सम्मान और गरिमा से जीने से वंचित करते हैं। उल्टे, दलितों के पारंपरिक व्यवसायों का महिमामंडन कर उन्हें वही करते रहने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो वे करते आ रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हाथ से मैला साफ करना एक आध्यात्मिक अनुभव है!
इस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का उद्देश्य दलितों को सामाजिक और आर्थिक जीवन के हाशिए पर रखना और यह सुनिश्चित करना है कि ऊँची जातियों के विशेषाधिकारों को चोट न पहुंचे और वे सार्वजनिक संसाधनों का भरपूर उपयोग करते रहें।
संघ का एकात्म मानवतावाद का सिद्धांत यह कहता है कि सभी जातियों को अपने पारंपरिक व्यवसायों से ही जुड़ा रहना चाहिए।
अंबेडकर का आधुनिक भारत के निर्माण में एक बहुत बड़ा योगदान था, समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित संविधान।
भारतीय संविधान उन मूल्यों का प्रतीक है, जिन्हें अंबेडकर भारत के लिए आवश्यक मानते थे। दूसरी ओर, आरएसएस इस संविधान के पक्ष में नहीं था। उसने संविधान को हिन्दू-विरोधी बताया था, चूंकि उसमें धार्मिक स्वतंत्रता, अछूत प्रथा के उन्मूलन और दलितों के लिए सकारात्मक नीतियों के निर्माण संबंधी प्रावधान थे।
आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गेनाइज़र’ ने अपने संपादकीय में लिखा था,

‘‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास की कोई चर्चा नहीं है। स्पार्टा के लायकरगस और पर्शिया के सोलोन से भी पहले, मनु की विधि लिखी जा चुकी थी। आज भी मनुस्मृति में दिए गए उनके कानून, पूरी दुनिया की प्रशंसा पाते हैं और लोग उनका पालन करने के लिए तत्पर रहते हैं। परंतु हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इसका मानो कोई अर्थ ही नहीं है’’।

पुस्तक हमें बताती है कि आरएसएस की संविधान के संदर्भ में क्या सोच थी और किस प्रकार वह यह मानता था कि मनुस्मृति को ही भारत के कानूनों का आधार होना चाहिए।
यह कहना कि अंबेडकर हिन्दुत्व की विचारधारा के समर्थक थे, इसलिए भी आधारहीन है क्योंकि अंबेडकर ने इसी मनुस्मृति, जिसका संघ परिवार महिमामंडन करता है, को दलितों के दमन का उपकरण बताया था और सार्वजनिक रूप से उसका दहन किया था।
भारत में मुसलमानों के खिलाफ गंभीर पूर्वाग्रह व्याप्त हैं। उनकी देशभक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाए जाते हैं और उन पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं।
यह भी कहा जाता है कि मुसलमानों के कारण भारत का विभाजन हुआ। इस दुष्प्रचार को सही ठहराने के लिए आरएसएस, अंबेडकर के उद्धरणों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत कर यह बताने की कोशिश करता है कि अंबेडकर भी द्विराष्ट्र सिद्धांत के हामी थे और यह मानते थे कि मुसलमानों की देश के प्रति वफादारी संदिग्ध है और इसलिए देश का विभाजन अपरिहार्य है।
इसके ठीक विपरीत, अंबेडकर को उद्धृत करते हुए पुस्तक कहती है कि द्विराष्ट्र सिद्धांत सबसे पहले सावरकर द्वारा प्रतिपादित किया गया था और इसके बाद ही जिन्ना ने उसे अपनाया।
अंबेडकर लिखते हैं कि उन्हें जिन्ना और सावरकर के विचारों में बहुत समानता नज़र आती है। उन दोनों में सिर्फ एक मुख्य अंतर है और वह यह कि जहां जिन्ना भारत के विभाजन के पक्ष में थे और चाहते थे कि हिन्दू भारत में रहें और मुसलमान पाकिस्तान में, वहीं सावरकर एक ऐसे अखंड भारत का निर्माण करना चाहते थे जहां हिन्दू और मुसलमान दोनों रहते परंतु वहां हिन्दुओं का राज होता और मुसलमानो को उनके अधीन रहना होता।
सावरकर के विचारों की अंबेडकर की इस विवेचना के जरिए लेखक यह बताने में सफल होते हैं कि हिन्दू राष्ट्रवाद मूलतः भेदभाव पर आधारित है और इस भेदभाव का अंबेडकर ने जीवनपर्यन्त विरोध किया।
अपनी पुस्तक ‘‘मस्ट देयर बी पाकिस्तान’’ में डॉ. अंबेडकर स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं,

‘‘अगर हिन्दू राज स्थापित होता है तो वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ा संकट होगा। हिन्दू चाहे जो भी कहें परंतु यह एक तथ्य है कि हिन्दू धर्म, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। वह प्रजातंत्र का दुश्मन है। हमें हिन्दू राज को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए‘‘।

यह पुस्तक कई कारणों से महत्वपूर्ण है।
अंबेडकर की लेखनी के आधार पर यह संघ के इस दुष्प्रचार का पुरज़ोर खंडन करती है कि अंबेडकर के विचार, हिन्दुत्ववादी शक्तियों की सोच से मिलते-जुलते थे। अत्यंत तर्कसंगत तरीके से यह पुस्तक अंबेडकर के विचारों को तोड़ने-मरोड़ने के संघ परिवार के प्रयासों का पर्दाफाश करती है।
पुस्तक हमें यह बताती है कि अंबेडकर और संघ परिवार के विचारों, और विशेषकर दलितों के बारे में उनकी सोच, के बीच इतने मूलभूत अंतर हैं कि उनमें कोई मेल संभव ही नहीं है।
कुल मिलाकर यह पुस्तक अंबेडकर के विचारों से हमें उनकी ही लेखनी के ज़रिए परिचित करवाती है और यह बताती है कि अंबेडकर पर कब्ज़ा ज़माने का संघ परिवार का अभियान न तो दलितों के हित में है और ना ही राष्ट्र के। बल्कि यह अभियान समानता और प्रजातंत्र का विरोधी है।
(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)
 

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