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आर्थिक और राजनैतिक सत्ता चंद घरानों के हाथ में जाना असली देशद्रोह

भारत माता के नारे में मिटता खुदरा व्यापारी
अनुराग मोदी
ईस्ट इन्डिया’ कंपनी और उसकी ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में अपनी कंपनियों के व्यापार को फ़ैलाने के लिए, उस समय के देशी उद्योग धंधों को खत्म करने वाले फैसले लिए, जिसके खिलाफ ‘भारत माता की जय’ के नारे लगे थे। वहीं, भारत माता की जय’, कन्हैया और जे. एन. यू. जैसे भावनात्मक मुद्दों में देश को उलझाकर, मोदी सरकार ने पिछले कुछ महीनों में कुछ ऐसे निर्णय लिए जो खुदरा व्यापार को चंद देशी-विदेशी कॉर्पोरेट समूहों के हाथ में सौपने की दिशा में बड़ा कदम है।
जो लोग मानते हैं – ऐसा नहीं होगा, उन्हें भाजपाई सरकार के उस निर्णय की तरफ देखना होगा: जिससे हमारे बाज़ार चीन के माल से पट गए और छोटे देशी उत्पादकों के उत्पाद बाज़ार में बिकना बंद हो गए। जब, अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में एन. डी. ए. की सरकार केंद्र में थी, तब 24 दिसम्बर 1999 को कंधार विमान आपरहण कांड हुआ था; जो 31 दिसम्बर को सुलझा था – मीडिया में हल्ले के जरिए देश का ध्यान उस घटना में उलझा था। उस बीच, 28 दिसम्बर 1999 को अमेरिका और भारत के बीच एक व्दिपक्षीय समझौता हुआ, जिसके अनुसार: भारत को 1 अप्रेल 2000 तक 714 वस्तुओं और 1 अप्रेल 2001 तक 2015 तक 715 वस्तुओं से ‘मात्रात्मक’ प्रतिबन्ध हटाना था; इस निर्णय के बाद से, लिस्ट में दिए गए 1429 उत्पाद आसानी से कितनी भी मात्रा में भारत में आयात किए जा सकते थे।
मोदी सरकार को उम्मीद है: देश में आगे आने वाला चुनाव अमेरिका की तर्ज पर लड़ा जाएगा – जहाँ बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों के चंदे के दम पर वो अपने नेता की छवि चमकाकर चुनाव जीता जाता है; उसी तरह, उसे भी अपने परम्परागत खुदरा व्यापारी समाज के समर्थन की चिंता नहीं होगी। वैसे भी उसे उम्मीद है कि चुनाव के समय वो भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर इस वर्ग को जैसे-तैसे मना ही लेगी। धीरे-धीरे यह कॉर्पोरेट घराने सरकार से ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे; तब क्या होगा? एक कॉर्पोरेट घराने के हाथ में व्यवसाय आने पर क्या होता है; यह लोग प्लास्टिक दाने का काम अंबानी के हाथ में आने पर समझ गए होंगे।

मोदी सरकार खुदरा व्यापारियों की लूट कर रही है
सरकार: व्यापार सुधारे और देश के विकास के लिए टैक्स वसूली बढ़ाए

यह अच्छी बात है। लेकिन, एक तरफ बड़े-बड़े व्यापारिक घरानों को छूट और खुदरा व्यापारियों की लूट का काम मोदी सरकार कर रही है: बिना बैंकों का पैसा चुकाए माल्या देश से भाग गए; अडानी ग्रुप पर 72 हजार करोड़ रुपए का ॠण है – लेकिन सरकार वसूली में सुस्त है; वहीं 2016-17 के केन्द्रीय बजट में 6 लाख 11 हजार करोड़ से ज्यादा की राजस्व वसूली माफ़ की गई है – जो हमारे कुल बजट का एक तिहाई हिस्सा है। वहीं सरकार देश के साराफा व्यापारियों से 1% उत्पाद शुल्क वसूली पर अड़ी हुई है! व्यापारियों का मानना है – सरकार इंस्पेक्टर राज लाकर उनका व्यापार खत्म करना चाहती है। उनकी शंका गलत नहीं है; आने वाले समय में केंद्र साल में सरकार जो 2 लाख लोगों की भर्ती करने वाली है, उसमें 75 हजार की भर्ती: एक्साइज, राजस्व और इन्कम टैक्स विभाग में होगी।
सरकार ने पिछले महीनों में खुदरा व्यापार के खिलाफ जो कुछ ऐसे फैसले लिए: पहला, सोने के आभूषणों पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) ; दूसरा, ‘ई कॉमर्स’ में 100% सीधे विदेशी निवेश की छूट ; तीसरा – फ़ूड प्रोसेसिंग के व्यापार में भी 100% सीधे विदेशी निवेश की छूट। वही बिहार चुनाव के परिणामों के शोरगुल के बीच, 12 नवम्बर 15 को: सैन्य समान, भवन निर्माण जैसे 15 क्षेत्रों में 49% सीधे विदेशी निवेश की छूट के साथ- साथ, निजी बैंकों के लिए इस छूट को 75% कर दिया गया।
फ़ूड प्रोसेसिंग का व्यवसाय लगभग 7 से 8 लाख करोड़ का है। वहीं, ई-कॉमर्स का व्यवसाय, जो 2009 में 23 हजार करोड़ रुपए का था, वो 2016 में 2 लाख 35 हजार करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है – 2020 तक, इसके 6 लाख करोड़ रुपए से उपर पहुचने की उम्मीद है। सोने के आभूषणों के कुल 2.5 लाख करोड़ रुपए के धंधे में से अभी 36 हजार करोड़ ई-कॉमर्स के जरिए होता है – जो कुछ सालों में 1.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच जाएगा।
वहीं सोने के आभूषणों के निर्माण और बिक्री के असंगठित धंधे में: 4,50,000 सोनी और 1,00,000 ज्वैलर्स हैं। सरकार 1% के जरिए स्वर्ण-आभूषणों के निर्माण और बिक्री के असंगठित व्यवसाय को मुश्किल बनाकर, उसे संगठित क्षेत्र में कंपनियों के नियंत्रण में देना चाहती है, क्योंकि, उत्पादन शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) लगाने का मतलब है: ज्वैलरी के निर्माण के हर स्तर पर एक्साइज इंस्पेक्टर का नियंत्रण; जिससे इसका निर्माण असंगठित क्षेत्र में मुश्किल हो जाएगा, और, छोटे-छोटे ज्वैलर्स को भी कंपनियों के पास बना माल लेना होगा। वैसे भी, 2008 में, देश में खुदरा ज्वैलरी का 10% व्यापार संगठित क्षेत्र में था; जो पहले ही सरकार की नीतियों के चलते 2014 में बढ़कर 22% हो गया है।
इन देशी-विदेशी कंपनियों के पास सस्ते ब्याज की अथाह पूंजी का बल है: जहाँ विदेशी पूंजी 3% ब्याज दर पर आती है, वहीं देशी पूंजी पर ब्याज दर न्यूनत्तम 12% है। इस सस्ती पूंजी के दम पर, इन विदेशी कंपनियों की नज़र गोल्ड लोन मार्केट पर भी है। आज, मात्र कुछ कंपनियों और बैंकों के पास इस लोन मार्केट का मात्र 25% हिस्सा है – जो 530 अरब का है; 2002 में यह मात्र 25 अरब रुपए था। मुतूहूत फाइनेंस कंपनी का गोल्ड-लोन मार्केट, जो मार्च 2005 में मात्र 756.9 करोड़ रुपए का था वो अप्रेल 2012 में बढकर 25 हजार 388 करोड़ रुपए हो गया।
 ‘मोदी सरकार’ के हालिया निर्णयों से आने वाले समय में लगभग सारे खुदरा और थोक व्यापार धंधों और पूंजी पर पर पुन: विदेशी कंपनियों का शिकंजा कसेगा। इन विदेशी कंपनियों के सामने देशी व्यापारी क्या बड़ी-बड़ी देशी कंपनियां नहीं टिक सकतीं। इनके पास आधुनिक तकनीक और सस्ती पूंजी दोनों हैं – अकेले चीन की अलीबाबा ई-कॉमर्स कंपनी की वेबसाइट पर 12 लाख विक्रेता रजिस्टर्ड है; वो दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में से है।
     अभी भले ही ई-कॉमर्स आदि लोगों को फायदेमंद लगे, लेकिन: एक तो, एक बार खुदरा व्यापारी खत्म होने पर इनका बाज़ार पर एकाधिकार होते ही यह मनमानी कीमत वसूलेंगे -जैसे आज प्लास्टिक बनाने के दाने के बारे में रिलायंस कर रहा है; दूसरा, देश में आज जो और ताकत पूंजी दसियों लाख लोगों में बंटी, उस ताकत और पूंजी का चंद कॉर्पोरेट घरानों में सिकुड़ने से अमेरिका की तरह देश की राजनीति पर उनका कब्जा हो जाएगा।
जैसे: अमरीकी कंपनी उबेर – जो बड़े शहरों में टैक्सी सेवा चलाती है, ने बिना एक भी टैक्सी खरीदे मुंबई शहर की बीस हजार निजी टैक्सी चालकों को अपने साथ जोड़ लिया; और बस उन्हें एक मोबाईल ऐप के जरिए एक बड़ी सी टैक्सी सर्विस कंपनी शुरू कर दी। याने हींग लगी ना फिटकरी और रंग चोखा का चोखा वाली बात। और मुंबई के निजी टैक्सी चालकों को इसके जरिए ज्यादा व्यवसाय मिलने के कारण, वो नियमित –‘काली –पीली’ – टैक्सी सेवा से सस्ते दाम पर सेवा दे पाते हैं। और, इस तरह जिस टैक्सी के व्यवसाय में लाखों लोग अपनी रोजी-रोटी कमाते थे, वो व्यवसाय धीरे-धीरे एक कंपनी के हाथों में जाता जा रहा है। और, जैसे उबेर ने अमेरिका में वहां के स्थानीय टैक्सी वालों को बर्बाद कर दिया; वैसे यहाँ भी होगा। और जब एक बार निजी टैक्सी का व्यवसाय पूरी तरह से उसके कब्जे में आ जाएगा, वो मनमानी कीमत वसूलेगा; जैसे, अभी भी ‘पीक अवर्स’ में वो दुगने पैसे वसूलते हैं।
 लेकिन इन मुद्दों को लेकर व्यापारी समाज, भाजपा के खिलाफ खुली खिलाफत करने की बजाए, कुछ छदम भावनात्मक मुद्दों में उलझा हुआ है।
इस बात का अहसास मुझे तब हुआ – जब मैं, हाल ही में अपने मूल शहर, म. प्र. के सिवनी-मालवा पहुंचा। मेरे नौकरी छोड़ ‘समाजवादी’ आंदोलन से जुड़ने के कारण, अक्सर जब मैं यहाँ आता था; तो मेरी मेरे भाइयों और दोस्तों से कई सारे मुद्दों पर तीखी बहस होती थी।  जब इस बार मैं घर आया, तो मुझे लगा वो लोग मुझसे उनके व्यवसाय पर आने वाले आघात के कारणों पर बहस करेंगे – मेरे घर में पिछली तीन पीढ़ियों से सराफा व्यापार जो होता है। मगर, ऐसा नहीं हुआ; इस बार हमारी बहस के मुद्दे थे: भारत माता की जय, कन्हैया का देशद्रोह, और “जे. एन. यू. ‘देशद्रोहियों’ का अड्डा है! और, तब मुझे समझ आया किस तरह से सरकार इन मुद्दों को एक ‘धुएं की दीवाल’ (स्मोक स्क्रीन) के रूप में इस्तेमाल किया। जैसे, सैन्य कार्यवाही के समय एक कृत्रिम धुएं का पर्दा खड़ा कर, सैनिक अपने सामने खड़े दुश्मन से नज़र बचाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।
   इस संकट के दौर में देश के वैश्य समाज को कई बातों को समझना होगा और ठोस फैसले लेना होंगे। पहला : यह गलतफहमी दूर करना होगा कि देश में समाजवादी विचारधारा रखने वाले लोग उन्हें मिटाना चाहते हैं; आज तक तो एक को भी नहीं मिटाया। बल्कि, यह समझना होगा कि उनकी असली दुश्मन और कोई नहीं, बल्कि 1991 में अपनाई गई ‘वैश्वीकरण’ की नीति है- और भाजपा और कांग्रेस दोनों पाटियों के एजेंडे में यह शामिल है। सिर्फ फर्क इतना है: जहाँ कांग्रेस ने इस काम को धीरे-धीरे किया, वहीं मोदी सरकार इसे पूरी आक्रामकता से लागू कर रही है।
दूसरा: उन्हें इन पार्टियों के प्रति अपनी अंधी राजनैतिक प्रतिबद्धता के बारे में सोचना होगा और भावनात्मक मुद्दों में फंसने से बचना होगा। तीसरा: समाज से जो कमा रहे हैं, उसका कुछ हिस्सा उसे लौटना होगा; और लोगों के साथ पुन: एक रिश्ता जोड़ना होगा। पहले वो आम समाज के लिई कई काम करता था: जैसे शिक्षण संस्थान के लिए दान देना, अस्पताल और धर्मशाला खोलना, तालाब बनवाना आदि। लेकिन, अब उसने आम समाज की इस मूल जरूरत को भी उसने अपना व्यापार बना लिया है; जिसके चलते उसका लोगों से रिश्ता टूट गया। हालाँकि, अब शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बड़ी देशी-विदेशी कंपनियां आ रही हैं। इस समय वैश्य समाज का सारा दान बड़े बाबाओं को जा रहा है –अनेक बाबाओं के पास इस दान के पैसे से हजारों करोड़ की संपत्ति है। जब वैश्य समाज आम लोगों से जुड़ेगा, तभी आम-जनता उसके साथ आएगी।
अगर व्यापारियों और जनता के सहयोग से देशी व्यापार नहीं बचाया गया, तो देश एक बार आर्थिक और राजनैतिक रूप से गुलाम हो जाएगा; देश में आर्थिक और राजनैतिक सत्ता चंद हाथों घरानों के हाथ में में जाना असली देशद्रोह है।

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