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आर एस एस ने 1948 में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था ?

आर एस एस ने 1948 में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था ?

नई दिल्ली। श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की भाजपा की राजनीति पूरी तरह से उल्टी पड़ चुकी है।

भाजपा की अगुवाई वाले राजग के संयोजक शरद यादव तो पहले ही इस झंडा यात्रा को गलत बता चुके हैं, अब बिहार के मुख्य मंत्री और भाजपा के महत्वपूर्ण सहयोगी नीतीश कुमार ने श्रीनगर में जाकर झंडा फहराने की जिद का विरोध किया है।

शरद यादव ने तो साफ़ कहा है कि जम्मू कश्मीर में जो शान्ति स्थापित हो रही है उसको कमज़ोर करने के लिए की जा रही भाजपा की झंडा यात्रा का फायदा उन लोगों को होगा जो भारत की एकता का विरोध करते हैं।

नीतीश कुमार ने भाजपा से अपील की है कि इस फालतू यात्रा को फ़ौरन रोक दे।

सूचना क्रान्ति के चलते अब देश के बहुत बड़े मध्यवर्ग को मालूम चल चुका है कि झंडा फहराना भाजपा की राजनीति का स्थायी भाव नहीं है, वह तो सुविधा के हिसाब से झंडा फहराती रहती है।

भाजपा की मालिक आर एस एस के मुख्यालय पर 2003 तक कभी भी तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया था। The tricolor flag was never hoisted till 2003 at the headquarters of the BJP’s boss RSS.

वो तो जब 2004 में तत्कालीन भाजपा की नेता उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं तो लोगों ने अखबारों में लिखा कि हुबली में झंडा फहराने के साथ साथ उमा भारती को नागपुर के आर एस एस के मुख्यालय में भी झंडा फहरा लेना चाहिए। तब जाकर आर एस एस ने अपने दफ्तर पर झंडा फहराया।

2004 के विवाद के दौरान भी उतना ही हड़कंप मचा था, जितना आज मचा हुआ है, लेकिन तब टेलीविज़न की खबरें इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए भाजपा की धुलाई उतनी नहीं हुई थी, जितनी कि आजकल हो रही है।

तिरंगा फहराने के बहाने बहुत सारे सवाल भी भाजपा वालों से पूछे जा रहे हैं।

अभी कुछ साल पहले कुछ कांग्रेसी तिरंगा लेकर चल पड़े थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वे आर एस एस के नागपुर मुख्यालय पर भी तिरंगा झंडा फहरा देंगे। रास्ते में उन पर लाठियां बरसाई गयी थीं।

लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उस वक़्त के तिरंगे से क्यों चिढ़ी हुई थी भाजपा, जो महाराष्ट्र में अपनी सरकार का इस्तेमाल करके तिरंगा फहराने जा रहे कांग्रेसियों को पिटवाया था।

भाजपा आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है

जब उमा भारती ने 2004 हुबली में झंडा फहराने के लिए यात्रा की थी तो विद्वान् इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने प्रतिष्ठित अखबार, हिन्दू में एक बहुत ही दिलचस्प लेख लिखा था। उन्होंने सवाल किया था कि भाजपा आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है।

खुद ही उन्होंने जवाब का भी अंदाज़ लगाया था कि शायद इसलिए कि भाजपा की मातृ पार्टी, आर एस एस ने आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था।

1930 और 1940 के दशक में जब आज़ादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आर एस एस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था। यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया, आर एस एस वालों ने कभी उसे सैल्यूट तक नहीं किया।

आर एस एस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व दिया। The RSS always attached more importance to the saffron flag than the tricolor.

30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि आर एस एस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे। यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं।
आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आर एस एस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी। उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे। 24 फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी पीड़ा को व्यक्त किया था। उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आर एस एस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं।

यह तिरंगा हमारी आज़ादी के लड़ाई का स्थायी साथी रहा है जबकि आर एस एस वालों ने आज़ादी की लड़ाई में देश की जनता की भावनाओं का साथ नहीं दिया था। तिरंगे की अवधारणा पूरी तरह से कांग्रेस की देन है।

कैसे बना तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज How the tricolor became the national flag

तिरंगे झंडे की बात सबसे पहले आन्ध्र प्रदेश के मसुलीपट्टम के कांग्रेसी कार्यकर्ता पी वेंकय्या के दिमाग में उपजी थी। 1918 और 1921 के बीच हर कांग्रेस अधिवेशन में वे राष्ट्रीय झंडे को फहराने की बात करते थे।

महात्मा गाँधी को यह विचार तो ठीक लगता था लेकिन उन्होंने वेंकय्या जी की डिजाइन में कुछ परिवर्तन सुझाए।

गाँधी जी की बात को ध्यान में रहकर दिल्ली के देशभक्त लाला हंसराज ने सुझाव दिया कि बीच में चरखा लगा दिया जाए तो ज्यादा सही रहेगा।

महात्मा गाँधी को लालाजी की बात अच्छी लगी और थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

उसके बाद कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में तिरंगा फहराया जाने लगा।

अगस्त 1931 में कांग्रेस की एक कमेटी बनायी गयी जिसने झंडे में कुछ परिवर्तन का सुझाव दिया। वेंकय्या के झंडे में लाल रंग था। उसकी जगह पर भगवा पट्टी कर दी गयी। उसके बाद सफ़ेद पट्टी और सबसे नीचे हरा रंग किया गया। चरखा बीच में सफ़ेद पट्टी पर सुपर इम्पोज कर दिया गया।

महात्मा गाँधी ने इस परिवर्तन को सही बताया और कहा कि राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है।

आज़ादी मिलने के बाद तिरंगे में कुछ परिवर्तन किया गया।

संविधान सभा की एक कमेटी ने तय किया कि उस वक़्त तक तिरंगा कांग्रेस के हर कार्यक्रम में फहराया जाता रहा है, लेकिन अब देश सब का है। उन लोगों का भी जो आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के मित्र के रूप में जाने जाते थे। इसलिए चरखे की जगह पर अशोक चक्र को लगाने का फैसला किया गया।

जब महात्मा गाँधी को इसकी जानकारी दी गयी तो उन्हें ताज्जुब हुआ। बोले कि कांग्रेस तो हमेशा से ही राष्ट्रीय रही है। इसलिए इस तरह के बदलाव की कोई ज़रुरत नहीं है। लेकिन उन्हें नयी डिजाइन के बारे में राजी कर लिया गया।

इस तिरंगे की यात्रा में भाजपा या उसकी मालिक आर एस एस का कोई योगदान नहीं है लेकिन वह उसी के बल पर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने में सफल होती नज़र आ रही है।

अजीब बात यह है कि कांग्रेसी अपने इतिहास की बातें तक नहीं कर रहे हैं।

अगर कांग्रेसी अपने इतिहास का हवाला देकर काम करें तो भाजपा और आर एस एस को बहुत आसानी से घेरा जा सकता है और तिरंगे के नाम पर राजनीति करने से रोका जा सकता है।

शेष नारायण सिंह

About शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं।

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