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आर.टी.ई. के 4 साल – किसकी शिक्षा कहाँ का अधिकार

जावेद अनीस
 हर साल 1 अप्रैल को पूरी दुनिया मूर्ख दिवस मानती है, संयोग से चार साल पहले भारत सरकार ने देश के 6 से 14 साल के सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने के लिये इसी दिन को चुना और एक अप्रैल 2010 को “शिक्षा का अधिकार कानून 2009” पूरे देश में लागू किया गया।
 वैसे शिक्षा के उद्देश्य को लेकर कहा जाता है कि शिक्षा सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिवर्तन के लिये सबसे जरूरी हथियार है और किसी भी राष्ट्र के विकास में शिक्षा एक  बुनियादी तत्व है इसलिये किसी भी लोकतान्त्रिक राज्य के लिये यह जरूरी हो जाता है कि वह  इसके महत्व को समझते हुये यह सुनिश्चित करे की देश और समाज के सभी वर्गों को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिले। परन्तु इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की आजादी के 67 साल बाद भी यह देश आज भी अपने सभी बच्चों को स्कूलों में नामांकन को लेकर ही जूझ रहा है। अभी तक हम सभी बच्चों को स्कूल भेजने में कामयाब भी नहीं हो सके हैं,बच्चों द्वारा बीच में ही पढाई छोड़ने का दर 6% के आस पास बना हुआ है। हैरानी की बात यह है कि अगले पांच सालों के लिये देश के लिये नयी सरकार के लिये चुनाव हो रहे हैं इस चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल के लिये शिक्षा एजेंडा पर ही नहीं है।
अप्रैल 2010 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होते हैं। भारत आधे अधूरे रूप से ही सही उन  देशों  की जमात में शामिल हो जाता है, जो अपने देश  के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा  उपलब्ध कराने के लिये कानूनन जबावदेह हैं। यूनेस्को की ’’एजूकेशन फॉर आल ग्लोबल मानिट्रिंग रिपोर्ट 2010’’ बताती है कि दुनिया के करीब 134 देशों   में बच्चों को निःशुल्क और भेदभाव रहित शिक्षा प्रदान करने के लिये प्रावधान हैं लेकिन इस प्रावधान के बावजूद ज्यादातर देशों में वास्तविक रूप से भेदभाव रहित समान शिक्षा नहीं मिल पाती है। लकिन उपरोक्त रिपोर्ट में विश्व बैंक द्वारा 2005 में किये गये एक अध्ययन का भी जिक्र है, जिसके मुताबिक वास्तविक रूप से दुनिया में मात्र 13 देश ही ऐसे है जहां पूरी तरह निःशुल्क शिक्षा मिल पाती है दुर्भाग्यवश 2014 में हम पाते हैं कि भारत के बच्चे उन 13 देशों के बच्चों की तरह खुश नसीब नहीं है।
भारत ने शिक्षा के अधिकार के लेकर एक लम्बा सफ़र तय किया है और “शिक्षा का अधिकार कानून2009” इस सफ़र की मंजिल नहीं बल्कि एक पड़ाव है ! स्वतंत्रता उपरांत देश के संविधान निर्माता शिक्षा  के अधिकार को संविधान में एक मूल अधिकार के रूप में शामिल करना चाहते थे, लेकिन किन्हीं कारणों से ऐसा नहीं हो सका था और इसको राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 45 के अर्न्तगत ही स्थान मिल सका तथा इसे राज्यों की इच्छा पर छोड़ दिया गया जो कि न्यायालयों में परिवर्तनीय नहीं थे। वर्ष 2002 में भारत की संसद में 86 वें संविधान संशोधन द्वारा नया अनुच्छेद ’’21-क’’ जोड़कर इसे मूल अधिकार के रूप में अध्याय-3 में शामिल कर परिवर्तनीय बना दिया गया। इस संवैधानिक संशोधन के साथ शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार का दर्जा मिल गया तथा इसे नीति निर्देशक तत्वों एवं मूल कर्त्तव्यों में भी शामिल कर लिया गया। लेकिन हमारी सरकारों के पास न तो इसे लागू करने की इच्छाशक्ति थी और न ही सकारात्मक सोच। वैसे तो 1992 के मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में देश की शीर्ष अदालत ने ’अनुच्छेद-21’ के तहत शिक्षा पाने के अधिकार को प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार बताते हुये ऐतिहासिक निर्णय दिया था कि प्रत्येक नागरिक को शिक्षा उपलब्ध करवाना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। लेकिन उन्नीकृष्णन बनाम आन्ध्र प्रदेश (1993) 4scc645 के मामले में निजी कालेज संचालकों ने न्यायालय से मोहिनी जैन मामले में अदालत द्वारा दिये गये फैसले पर पुर्नविचार के लिये आवेदन दिया। इसके बाद अदालत ने शिक्षा को मूल अधिकार तो माना लेकिन इसे 14 साल तक के बच्चों तक सीमित कर दिया। इसी कड़ी में “शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009” है जो केंद्र तथा राज्यों के लिये कानूनी बाध्यता है।
लेकिन इस अधिनियम के लागू होने के चार वर्षों के बाद अगर हम कुछ सुधार देखते हैं तो इसकी कमियां उजागर होकर सामने आने लगी हैं, अब हम देख सकते हैं किस तरह से ना केवल शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की इसको लेकर की गयी आशंकायें सही साबित हो रही हैं बल्कि हम पाते हैं कि इसे जमीनी स्तर पर लागू कराने में भी हम पूरी तरह से कामयाब नहीं सके हैं।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जनवरी 2014 में शिक्षा के अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर जारी रिपोर्ट के अनुसार एक भौतिक मानकों जैसे शालाओं की अधोसंरचना, छात्र- शिक्षक अनुपात आदि को लेकर तो सुधार देखने को मिलता है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता, नामांकन के दर आदि मानकों को लेकर स्थिति में में ज्यादा परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है। जैसे प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का नामांकन अभी भी 2009-10  के स्तर 48% पर ही बना हुआ है,यानी इस दौरान प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का नामांकन को लेकर कोई प्रगति नहीं हुई है। इसी तरह से अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों में भी नामांकन दर भी 2009-10 के स्तर क्रमशः 20% और 11% पर बना हुआ है, जबकि मुस्लिम बच्चों के नामांकन दर में वर्ष 2009-10 (13%) के मुकाबले 2012-13 में मात्र 1 प्रतिशत (14%) का सुधार देखने को मिलता है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक देश के 31% प्रतिशत शालाओं में लड़कियों के लिये अलग से शौचालय नहीं है जो कि लड़कियों के बीच में ही पढ़ाई छोड़ने का एक प्रमुख है। अभी भी केवल 88% स्कूलों में शाला प्रबन्धन समिति (एस.एम.सी.) का “गठन” हो सका है, इनमें से कितने  एस.एम.सी. अपनी भूमिका सक्रिय रूप से निभा पाते होंगे, यह जांच का विषय हो सकता है।
एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन की नौवीं रिपोर्ट 2013  शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर पेश करती है रिपोर्ट हमें बताती है की कैसे शिक्षा का अधिकार कानून मात्र बुनयादी सुविधाओं का कानून साबित हो रहा है। स्कूलों में अधोसंरचना सम्बन्धी सुविधाओं में तो लगातार सुधार हो रहा है लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरने के बजाये बिगड़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में कक्षा 3 के 43.8% बच्चे कक्षा एक के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे। 2013 में यह अनुपात कम होकर  32.6 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह से 2009 में कक्षा 5 के 50.3 %  बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे 2013 में यह अनुपात घट कर  41.1 प्रतिशत हो गया है।
गणित को लेकर भी हालत बदतर हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 2009 में कक्षा 3  के 36.5% बच्चे कम से कम घटाव कर सकते थे, लिंक 2013 में यह स्तर कम होकर 18.9 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह से 2009 में कक्षा 5 के36.1% बच्चे भाग कर लेते थे जोकि 2013 में घट कर 20.8 प्रतिशत हो गया है।
 ऐसे में सवाल उठाना लाजमी है कि बच्चों को किस तरह का शिक्षा का हक मिल रहा है ? दरअसल “असर” की ही रिपोर्ट बताती है कि 2013 में भारत के ग्रामीण इलाको में बच्चों के दाखिले प्राइवेट स्कूलों में हुये हैं और पिछले साल के मुकाबले इसमें 7 से 11 प्रतिशत वृद्धि हुई है। ऐसे में राज्य द्वारा निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का सवाल पीछे छूटता नज़र आ रहा है। क्योंकि अब तो देश के ग्रामीण इलाकों में भी प्राइवेट स्कूलों का धंधा बहुत तेजी से अपना पैर पसार रहा है। और तो और देश की 12वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के दशा सुधरने के लिये पीपीपी (सरकारी – निजी सहयोग ) अपनाने की बात की गयी है, जो कि कुछ और नहीं प्राथमिक शिक्षा की पूरी निजी हाथों में सौपने के दिशा में एक और कदम है। ऐसे में शिक्षा अधिकार कानून का क्रियान्वयन और प्राइवेट स्कलों का धंधा एक साथ कैसे चल सकता है?
सीमित मात्रा में ही सही यह कानून सरकार से शिक्षा  के हक मांगने के लिये जनता के हाथ में एक हथियार तो मुहैया कराता ही है। इस अधिनियम के अधीन बच्चों के शिक्षा  के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिये राष्ट्रीय व राज्य कमीशन के अतरिक्त अधिकारितायुक्त स्थानीय प्राधिकरण की भी व्यवस्था की गयी है। इसमें स्थानीय निकायों और शाला प्रबन्धन समिति की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, इन स्थानीय निकायों और समुदाय को अपनी भूमिका निभाने के लिये तैयार करने में सामाजिक संस्थाओं/ संगठनों की भी बहुत महती भूमिका बनती है। लेकिन यह असली इलाज नहीं है।
निश्चित रूप से सरकारी शालाओं गुणवत्ता का सवाल सबसे महतवपूर्ण बन चूका है, ऐसे में हमारा अगला लक्ष्य, निजीकरण को रोकना इस कानून में बची खामियों को दूर करते हुये देश के सभी बच्चों को सामान, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा होना चाहिए।
लेकिन अंत में लोकतंत्र में राजनीति ही सब कुछ तय करती है और इतना सब होने के बावजूद शिक्षा का एजेंडा हमारे राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे में नहीं हैं और ना ही यह उनके विकास के परिभाषा के दायरे में आता है , फिर शिक्षा को  सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिवर्तन के औजार के रूप कोण तैयार करेगा ? निश्चित रूप से यह मात्र वोट डालने से तो नहीं हो सकता इसके लिये हमें इस बैलेट की ताक़त शिक्षा को राजनीत के एजेंडे में शामिल करने के लिये भी इस्तेमाल करनी होगी। तब तक हमारे पास एक अप्रैल को मूर्खदिवस मनाने का ही विकल्प  बचता है।

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जावेद अनीस, लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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