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आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए

तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए।
मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है।

मराठी जनता अपने साहित्य.संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में 28 मई को बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं।

पलाश विश्वास
दैनिक जनतेचा महानायक या आंबेडकरी चळवळीतील अग्रगण्य दैनिकाचा दशकपूर्ती सोहळा येत्या शनिवारी नागपूर येथे संपन्न होत आहे. उत्तर नागपुरातील इंदोर परिसरातील बेझनबाग मैदानात हा भव्य सोहळा आयोजित करण्यात आला आहे. या सोहळ्यासाठी एक्ष्प्रेस वृत्तसमुहात मागील ३५ वर्षापासून कार्यरत असलेले कलकत्ता येथील प्रसिद्ध पत्रकार पलाश बिस्वास प्रमुख पाहुणे म्हणून उपस्थित राहणार आहेत. त्याचप्रमाणे दिल्ली येथील सुप्रसिद्ध पत्रकार व हस्तक्षेप या वेब पोर्टलचे संपादक अमलेन्दु उपाध्याय हे सुद्धा प्रमुख पाहुणे म्हणून उपस्थित होत आहेत.
आज रात की गाड़ी से नागपुर रवाना हो रहा हूं।
मिशन यह है कि बाबासाहेब के दीक्षाभूमि में अंबेडकरी आंदोलन के कार्यकर्ताओं और समर्थकों, बाबासाहेब के अनुयायियों को हमारे वैकल्पिक मीडिया के अनिवार्य अभियान में शामिल करना है।
वहां जनतेचा महानायक के दशकपूर्ती महोत्सव के मौके पर नागपुर के इंदौरा मैदान में 28 मई को सार्वजनिक सभा में वैकल्पिक मीडिया के हमारे युवा और समर्थ संपादक अमलेंदु उपाध्याय महाराष्ट्र की आम जनता के मुखातिब मुख्य वक्ता होंगे।

स्वागत कीजिये कि जनतेचा महानायक के संपादक सुनील खोब्रागड़े अब वैकल्पिक मीडिया के नये सिपाहसालार होंगे।
मराठी जनता अपने साहित्य, संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं।
इसके साथ ही कृपया गौर करें कि भारत विभाजन के बाद बंगाल की कुल आबादी के बराबर भारत भर में जो दलित बंगाली शरणार्थी छितराये हुए हैं, उनका बहुत बड़ा हिस्सा दंडकारण्य के आदिवासी भूगोल में बसे हैं।
बांग्ला भाषा उनकी मातृभाषा है और वे अपने इतिहास भूगोल और मातृभाषा से भी बेदखल हैं और उनकी चीखों को कहीं दर्ज नहीं किया जाता। मैं भी उन्हीं लोगों में से हूं जिन्हें बांग्ला में अपनी जमीन कभी मिली नहीं है और हिंदी में मेरा प्राण बसा है।
हर भारतीय भाषा और दुनिया भर में मनुष्यता की हर भाषा और हर बोली अब बांग्ला के साथ मेरी मातृभाषा है और बंगाल के इतिहास और भूगोल से बेदखली के बाद यही मेरा असल वजूद है।
बाबासाहेब की दीक्षा भूमि के आसपास महाराष्ट्र के विदर्भ में ऐसे मूक दलित बंगाली शरणार्थी भी बड़ी संख्या में बसे हैं और जनचेता महानायक का मुख्य सस्करण भी मुंबई से निकलता है। विदर्भ के माओवादी ब्रांडेड आदिवासी बहुल चंद्रपुर, गड़चिरौली और गोंडिया में मेरे ये स्वजन बसे हैं तो नागपुर भी मेरा उतना ही घर है जितना समूचा दंडकारण्य, अंडमान निकोबार, उत्तराखंड और यूपी। भारत के चप्पे-चप्पे में हमारे वे लोग बसे हैं, जिनके लिए मेरे पिता जिये और मरे और वे सारे मेरे अपने परिजन है। उनकी अभिव्यक्ति के लिए वैकल्पिक मीडिया का यह अनिवार्य मिशन और जरूरी है।
“हस्तक्षेप” के साथ “महानायक” के समन्वय के आधार पर जो हम मराठी में हस्तक्षेप का विस्तार कर रहे हैं तो इसी मौके पर नागपुर की पवित्र दीक्षाभूमि से ही हस्तक्षेप का बांग्ला संस्करण भी लांच होना है। क्योंकि हमारी लड़ाई के लिए हमें हस्तक्षेप हर कीमत पर जारी रखना है चाहे हमें जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े।
हमें उम्मीद है कि हमारे तमाम स्वजन, मित्र समर्थक सहकर्मी और जनप्रतिबद्ध परिचित अपरिचित इस मुहिम में देर सवेर हमारे साथ होंगे। बाबासाहेब ने इस देश का संविधान रचा और मेहनतकशों के हकहकूक के स्थाई बंदोबस्त भी उनने किया तो बाबासाहेब के अनुायायियों का साथ हमें मिलना ही चाहिए और बाबासाहेब का मिशन आगे बढ़ाना ही हमारा अनिवार्य कार्यभार है तो हमें उनका साथ भी हर कीमत पर चाहिए। जनचेतना महानायक हमारा आधार है। हम इसे राष्ट्रव्यापी बनाने का काम भी करेंगे।
इसी तरह हर भारतीय भाषा में अब देर सवेर हस्तक्षेप होगा और इसका सारा बोझ हम अमलेंदु पर लादने जा रहे हैं। हम हस्तक्षेप को हर बोली तक विस्तृत करना चाहते हैं ताकि वह लोकजीवन और लोकसंस्कृति की धड़कन तो बने ही, उसके साथ ही जनपक्षधरता के लिए नये माध्यम, विधा, व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र भी गढ़ सके।
संपादकीय ढांचा जस का तस होगा और हम बाकी वैकल्पिक मीडिया और पूरे देश के साथ हस्तक्षेप को नत्थी करने के मिशन में हैं और हमें आपका बेशकीमती साथ, समर्थन और सहयोग चाहिए क्योंकि हम बाजार के व्याकरण के विरुद्ध विज्ञापन निर्भरता की बजाये आपके समर्थन के भरोसे यह आयोजन कर रहे हैं।
आप तनिक भी हमारी या हमारे मिशन की परवाह करते हों तो हस्तक्षेप के पोर्टल के टाप पर लगे  पे यू मनी बटन पर तुरंत जो भी आप पे कर सकें तुरंत कीजिये। यह समर्थन मिला तो हम जरूर कामयाब होंगे। वरना हमारी मौत है।
अब आप मानें या न मानें मेरे जीवन में सबसे बड़े आदर्श मेरे गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी, मेरे असल बड़े भाई आनंद स्वरूप वर्मा, पंकज बिष्ट और राजीव लोचन साह अपनी अविराम सक्रियता के बावजूद बूढ़े हो चुके हैं और हम भी अब चंद दिनों के मेहमान हैं।
इनके मुकाबले मेरी हालत बहुत ज्यादा खराब है क्योंकि तमाम वजहें हैं कि मैं अपने पहाड़ और अपने गांव के रास्ते को मुड़कर देख भी नहीं सकता और मैं अपने घर और अपनी जमीन से बेदखल हूं और फिलहाल एक बेरोजगार मजदूर हूं जिसके लिए सर छुपाने की भी जगह नहीं है और निजी समस्याएं इतनी भयंकर हैं कि उनसे निबटने के लिए कोई रक्षाकवच कुंडल वगैरह नहीं है मेरे पास।
ऐसे समय में इस रिले रेस का बैटन अब हमारे युवा ताजा दम साथियों के पास है।
जनांदोलन और जनमोर्चे पर क्या होगा, हम नहीं जानते लेकिन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर अमलेंदु उपाध्याय, यशवंत सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव, रेयाजुल हक, साहिल, प्रमोद रंजन, चंदन, सुनील खोब्रागड़, डा.सुबोध बिश्वास, अशोक बसोतरा, अभिराम मल्लिक, ज्ञानशील, शरदेंदु बिश्वास, संजय जोशी, दिलीप मंडल, संजीव रामटेके, प्रमोड कांवड़े, अयाज मुगल जैसे कार्यकर्ताओं के हाथ बैटन है और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार होना होगा और आपस में समन्वय भी बनाना होगा।
फिर अपना फोकस तय करना होगा क्योंकि मुक्तबाजार में मुद्दे भी वे ही तय कर रहे हैं और जनता के मुद्दे सिरे से गायब हैं। हम भटक नहीं सकते। इस तिलिस्म को तोड़ना है तो इसके तंत्र मंत्र यंत्र से बचने की दक्षता सजगता अनिवार्य है वरना हम लड़ ही नहीं सकते। कभी नहीं। सावधान।
वे अपने एजंडा लागू करने के लिए इंसानियत के मुल्क को खून के महासमुंदर में तब्दील कर रहे हैं सिर्फ भारत में ही नहीं, दुनिया भर में तो यह मोर्चाबंदी इस विश्वव्यवस्था  के खिलाफ विश्वव्यापी होनी चाहिए और इस चुनौती का सामना उन्हें करना है।
हम हरचंद कोशिश में हैं कि अपने जनप्रतिबद्ध तमाम साथियों को एकजुट करें और दुनिया जोड़ने की बात तो बाद में करेंगे अगर आगे भी जियेंगे, फिलहाल देश जोड़ना बेहद जरूरी है। तुरंत जरूरी है।
गौरतलब है कि राजाधिराज मान्यवर डोनाल्ड ट्रंप के राज्य़ाभिषेक से पहले नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन के पचासवें साल की शुरुआत आज से हो रही है। इसे हम बसन्त गर्जना या बज्रनाद के रूप में जानते हैं। तेभागा और तेलंगाना किसान आंदोलन की कड़ी में किसानों के इस आंदोलन ने जनवादी भारत का सपना देखा था जिसकी बुनियाद मजदूर किसान राज था।
आज उस सपने की विरासत,उस किसान आदिवासी मेहनतकश मजदूर के बदलाव की लड़ाई,राष्ट्र को जनवादी लोकतांत्रिक बनाने के कार्यभार का जो हुआ सो हुआ,तय यह है कि सत्तर के दशक की हमारी जिस पीढ़ी ने दुनिया बदलने की कसम ली थी,उसके बचे खुचे लोग अब अलविदा की तैयारी में हैं।
दूसरी तरफ भारत में जो असल सर्वहारा हैं,जो बहुसंख्य हैं,जो जल जमीन जंगल के साथ साथ नागरिक और मानवाधिकार से भी इस स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में लगातार बेदखल हो रहे हैं और जिनके लिए मुक्तबाजार की यह व्यवस्था नरसंहारी है,वे लोग ख्वाबों की उस लहलहाती फसल से भी बेदखल हैं।
जनता के बेशकीमती ख्वाबों की बहाली अब जनप्रतिबद्धता का सबसे बड़ा कार्यभार है और इसलिए बाबासाहेब का जाति उम्मूलन का मिशन सबसे ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि जाति व्यवस्था की नींव पर ही यह धर्मोन्माद का तिलिस्म मुक्त बाजार है।
जातिव्यवस्था के बने रहते हम भारत के लोग न देशभक्त हैं और न राष्ट्रवादी और न लोकतांत्रिक और हम एक अनंत रंगभेदी वर्चस्व के आत्मघाती गृहयुद्ध में स्वजनों के वध के लिए महाभारत जी रहे हैं।
जाति व्यवस्था के बने रहने पर न समता संभव है और न न्याय और समरसता का धर्मोन्माद आत्मघाती है।
धर्मोन्मादी मुक्तबाजार का यह मनुस्मृति अनुशासन बंटी हुई मेहनतकश जनता के नरकंकालों का बेलगाम  कारोबार है तो जाति उन्मूलन के बाबासाहेब का एजंडा ही प्रतिरोध का प्रस्थान बिंदू है क्योंक बंटे हुए हम न अलग अलग जी सकते हैं और न हमारा कोई जनमत या जनादेश है और बच निकलने का कोई राजमार्ग।
दुनिया के लिए आज सबसे बुरी खबर है कि डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन जीत चुके हैं और व्हाइट हाउस के तमाम दरवाजे और खिड़कियां उनके लिए खुले हैं उसी तरह जैसे अबाध पूंजी के लिए हमने अगवाड़ा पिछवाड़ा खोल रखा है।
संजोगवश आज ही भारत के चक्रवर्ती महाराज के राज्याभिषेक की दूसरी वर्षी के मौके पर भारत में विज्ञापनों की केसरिया सुनामी है। भारत और अमेरिका ही नहीं, सोवियत संघ के विघटन के बाद टुकटा-टुकड़ा लेनिन का ख्वाब और गिरती हुई चीन की दीवार पर भी धर्मध्वजा फहरा दिया गया है।
यह धर्मध्वजा मुक्तबाजार का है, इसे आस्था में निष्णात मनुष्यता को समझाना बेहद मुश्किल है क्योंकि इतिहास की मृत्यु हो गयी है और विचारधारा भी बची नहीं है।
यह समझाना भी बेहद मुश्किल है कि मुक्तबाजार के व्याकरण के मुताबिक धर्म और नैतिकता, भाषा और संस्कृति, लोक जीवन का भी अवसान हो गया है। हम बेरहम बाजार में नंगे खड़े हैं और क्रयशक्ति ही एकमात्र सामाजिक मूल्य है।
अब हम मनुष्य भी नहीं रहे हैं।
हम बायोमेट्रिक डिजिटल रोबोटिक नागरिक अनागरिक हैं और हमारा कोई वजूद नहीं है।
मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है।
तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए।

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