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इंसाफ का पलड़ा गरीबों और वंचितों के खिलाफ अमीरों के पक्ष में-शाहिद आजमी की पांचवी बरसी पर आनन्द स्वरूप वर्मा

वक्त को और भी शाहिद आजमियों की जरूरत – आनन्द स्वरूप वर्मा

शाहिद आजमी की पांचवी बरसी पर ’लोकतंत्र, हिंसा और न्यायपालिका’ विषय पर यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में प्रख्यात पत्रकार आनन्द स्वरूप वर्मा का हुआ व्याख्यान

लखनऊ, 11 फरवरी 2015। शाहिद आजमी की पांचवी बरसी- आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को इंसाफ दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाले मुम्बई के वकील शाहिद आजमी की शहादत की पांचवी बरसी पर रिहाई मंच ने ‘लोकतंत्र, हिंसा और न्यायपालिका’ विषय पर सेमिनार किया।

यूपी प्रेस क्लब में मंगलवार को आयोजित सेमिनार में मुख्य वक्ता के बतौर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि हमारे लोकतंत्र के सामने कई बार चुनौतियां पेश हुई हैं। उन्होंने कहा कि जब भी लोकतंत्र पर खतरे बढ़ते हैं उस खतरे के खिलाफ हिंसा भी बढ़ जाती है। दिल्ली में आए चुनावी नतीजों को इंगित करते हुए उन्होंने कहा कि ये नतीजे इस हिंसा पर केवल एक फौरी राहत भर महसूस कराते हैं। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्वरूप पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आजादी के समय भी इस आजादी के स्वरूप को लेकर कई सवाल उठे थे। कई लोगों ने इसे झूठी आजादी तक कहा था।

आनन्द स्वरूप वर्मा ने कहा कि बेगुनाहों को फंसाने से उनके मन में राज्य के प्रति नफरत पैदा हो जाती है और राज्य मशीनरी यही चाहती है। हमारी अदालतों द्वारा आज फर्जी मुठभेड़ों को जस्टीफाई किया गया है। आज मंत्री इसे सावर्जनिक तौर पर जस्टीफाई करते हैं। कल्याण सिंह ने खुद विधानसभा में फर्जी एनकाउंटर को जस्टीफाई किया था। शर्मनाक तो यह है कि अदालतें भी इसे मान रही हैं। राजनाथ सिंह ने मिर्जापुर में 16 दलितों की फर्जी हत्या करवाई थी। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सार्वजनिक तौर पर पुलिस को निर्देश दिया था कि वे खुलकर मारें डरने की कोई बात नही है। बिल क्लिंटन के भारत दौरे के समय छत्तीसिंह पुरा में 36 लोगों को सेना ने मार डाला। लेकिन आज जब यह साफ हो गया कि यह फर्जी मुठभेड़ थी तो भी आज तक दोषी दंडित नही हुए। क्या बेगुनाहों की ये हत्याएं इस लोकतंत्र का गला नहीं घोट रही हैं?

उन्होंने कहा कि इशरत जहां के फर्जी एनकाउंटर में आरोपियों की जमानत हो गई इसके दूरगामी असर होने तय हैं। इंसाफ से वंचित लोगों का हिंसक होना क्या गलत है? उन्होंने कहा कि इस मुल्क में गरीबों को ही फांसी होती है और दबंग सामन्त बच जाते हैं शंकर बिगहा हत्याकांड इस बात की तस्दीक कर देता है। आखिर राज्य का ऐसा रुख क्यों रहता है? राज्य का यह रुख रहता है कि गरीब लोग स्वाभाविक तौर पर अपराधी होते ही हैं। आज भी यह मानसिकता काम कर रही है। यह इंसाफ के लिए बहुत ही खतरनाक है।

Shahid Azmi has given his martyrdom for truth

संघ द्वारा देश को फासीवाद के रास्ते पर लेकर जाने की कोशिशों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कल के दिल्ली नतीजे 2025 तक देश को हिन्दू राष्ट्र होने की संघ की मुहिम को थोड़ा सा रोकते हैं। लेकिन अभी भी समस्या जस की तस है। संघ के विचारक आज भी भी मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। भारत हिन्दुओं का देश है यह मानसिकता ही खतरनाक है। इस समय वे सत्ता में हैं। यह दौर तब और खतरनाक हो जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के खिलाफ शाहिद आजमी ने सच के लिए अपनी शहादत दी है और इसे हमें आगे बढ़ाना है।

People confronted with fascism during the Emergency

उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौर में जनता ने फासीवाद का मुकाबला किया। वह एक दूसरा दौर था लेकिन 1990 में उदारीकरण के दौर में नए खतरे भी लोकतंत्र पर आए। नेहरू के समय में ऐसा लगता है कि राज्य अपनी कल्याणकारी भूमिका में था, लेकिन आज उदारीकरण के बाद यह नहीं कहा जा सकता। उन्होंने इसकी वजहें गिनाते हुए कहा कि विश्व बैंक ने राज्य की भूमिका पर जोसेफ इस्टगलीज, जो विश्व बैंक के अध्यक्ष भी रहे हैं, को आगे कर राज्य की भूमिका पर नए सिरे से बहस की। एक दस्तावेज में उन्होंने कहा था कि राज्य को कल्याणकारी कामों से अपनी भूमिका खत्म करके केवल फैसिलेेटर की ही भूमिका में आना चाहिए। राज्य के सारे कल्याणकारी काम प्राइवेट कंपनियों को ही करना चाहिए। अगर हम देखें तो अब राज्य फैसिलिटेटर मात्र है। सब कुछ विदेशी कंपनिया ही उपलब्ध कराएंगी। अगर इसमें कमी की शिकायत भी आम जनता ने की या इनकी लूट के खिलाफ कोई आवाज उठाई तो राज्य दमन करेगा। उन्होंने कहा कि तीसरी दुनिया के देशों ने विश्वबैंक के इस दस्तावेज को बाइबिल की तरह हाथों हाथ लिया था।

आनन्द स्वरूप वर्मा ने कहा कि उदारीकरण के बाद 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस दिशा पर तेजी से काम करना शुरू किया। उन्होंने पुंजीपतियों को विभाग तक बांट दिए थे। तब की सरकार में मुकेश अंबानी शिक्षा संबंधी नीतियां देखते थे। तब से लगातार यही सब चल रहा है। राज्य के काम अब देश के बड़े पूंजीपति करने लगे हैं। आज इसी क्रम में देश की खनिज संपदा की लूट जारी है। इस लूट से होने वाले विरोध से निपटने के लिए राज्य का सैन्यीकरण जरूरी था। फिर आतंकवाद और माओवाद का हौव्वा प्रायोजित करके राज्य ने आम जनता के खिलाफ काले कानून बनाने शुरू किए।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक हम पाते हैं कि सामाजिक और राजनैतिक बदलाव के लिए चिंतित नौजवानों को हिंदू होने पर माओवादी और मुस्लिम होने पर आतंकवादी कहकर जेलों में बंद कर दिया जाता है। यह हौव्वा राज्य के पूर्ण सैन्यीकरण की तैयारी भर है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद और माओवाद के हौव्वे के पीछे पैकेज खाने की राजनीति भी है। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी ने 208 करोड़ का पैकेज उत्तराखंड से माओवाद के खात्मे के नाम पर केन्द्र सरकार से लिया था, जबकि उत्तराखंड में कोई माओवादी आंदोलन का नामोनिशान तक नहीं है। बाद में स्टेट्सटमैन अखबार के पत्रकार प्रशान्त राही को उत्तराखंड सरकार द्वारा माओवादी बता कर गिरफ्तार किया गया। यह सब उस फंड को जस्टीफाई करने के लिए था जिसे खंडूरी ने केन्द्र से लिया था। यह पूरा केस ही फर्जी था लेकिन झूठा फंसाने वालों के खिलाफ अदालत ने भी कोई कारवाई नहीं की। आनन्द स्वरूप वर्मा ने कहा कि बेगुनाहों को जेल भेजने के मामले में आतंकवाद और माओवाद का आधार लिया जाता है। लेकिन ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कारवाई नही होती जबकि जज सब जानते हैं। उन्होंने कहा कि आज के ही दिन मकबूल बट् को फांसी दी गई थी जो कि न्याय की हत्या थी। इसलिए यह दिन और भी महत्वपूर्ण है।

वरिष्ठ पत्रकार और तीसरी दुनिया के देशों की राजंनीति के विश्लेशक श्री वर्मा ने कहा कि आज भारतीय स्टेट आतंकवाद का खुद पोषण करता है। इस्लामिक आतंकवाद का पूरा संचालक ही अमरीका है। ऐसा सितंबर 2001 से नही बल्कि 1960 के दशक से यह पोषण जारी है। अमरीका की सीआईए ने इंडोनेशिया की कम्यूनिस्ट पार्टी का खात्मा करवाया। आज वैश्विक आतंकवाद की पूरी कहानी तेल के मुनाफे पर टिकी है। अपने हित के लिए अमरीका ने पूरी दुनिया में तानाशाही को बढ़ावा दिया। आईएआईएस इनकी ही पैदावार है।

आनन्द स्वरूप वर्मा ने कहा कि देश के सात राज्यों में जहां अफस्पा लागू है वहीं 16 से ज्यादा नक्सल प्रभावित हैं। इस तरह इनके बाद केवल 5 राज्य ही शांत बचते हैं। क्या यही हमारा लोकतंत्र है? लेकिन इसके प्रचार की राजनीति को हमें समझना होगा । दरअसल यह केवल हौव्वा है और राज्य के सैन्यीकरण की कोशिश हैं। ऐसी बातें आम जनता को टेरराइज करने की राजनीति के तहत की जातीं हैं। वास्तव में यह सब उस समाज में बाजार के घुसाने की एक कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं है जो कि अभी भी अपनी गौरवशील परंपरा बचाए हुए हैं।

सेमिनार को संबोधित करते हुए वीरेन्द्र यादव ने कहा कि रिहाई मंच के इस अभियान को अधिक व्यापक होना चाहिए। राज्य आज आतंककारी भूमिका में खुलकर आ चुका है। लेकिन हमें लड़ना ही हागा क्योंकि आज समय क्रोनी कैपिलटिज्म से आगे जा चुका है। आज अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है और यह वक्त लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।

बलिया से आए सामाजिक कार्यकर्ता बलवंत यादव ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि लूट के खिलाफ पुतला फूंकने पर ही हमारे खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दिया गया। सड़क खोदकर फेंक दी गई थी लेकिन आज तक उसे बनाया नही गया। इसी मांग पर हमने आंदोलन किया और हमारे ऊपर मुकदमा दर्ज कर दिया गया। यह समय के संकट को गंभीरता से दर्शाता है।

वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश ने कहा कि बिहार के शंकरबिगहा में चैबीस लोगों के हत्याकांड के आरोपियों को जिस तरह से रिहा किया गया है वह साफ कर देता है कि आखिर यह किसका लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र आज फासिज्म के मुखौटे को लेकर चल रहा है। आज सहिस्णुता को किसी खास धर्म की सहिस्णुता के रूप में बदला जा रहा है। अयोध्या आंदोलन के दौर में हम सामान्य प्रतीकों को हिंसक प्रतीकों में बदलत देखतें हैं। यही फासीवाद का प्रभाव है। इस चुनौती से प्रभावी तरीके से निपटना होगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने की और संचालन अनिल यादव ने किया।

कार्यक्रम के अंत में मोहम्म्द शुऐब ने आगन्तुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम में नसीम इक्तेदार अली, अखलाक चिश्ती, वीरेन्द्र यादव, डा. रमेश दीक्षित, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, ताहिरा हसन, अजय सिंह, तारिक शफीक, जुबैर जौनपुरी, सैयद मोईद अहमद, मो0 सुलेमान, शाहआलम संजरी, अवसाफ आलम, मो0 प्यारे राही, आदियोग, रामकृष्ण, अखिलेश खालिद कुरैशी, जैद अहमद फारूकी, इसहाक नदवी, पीसी कुरील, गुफरान सिद्दीकी, अनिल यादव, दिनेश चैधरी, हरे राम मिश्र, हाजी फहीम सिद्दीकी, एहसानुल हक मलिक आदि शामिल रहे।

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