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इतिहास के पन्नों पर कोयले की कालिख लगी है मनमोहन सिंह जी

अविनाश कुमार चंचल

कुछ ही दिनों में इतिहास का हिस्सा बनने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने करीब एक दशक के अपने कार्यकाल में तीसरी बार प्रेस को संबोधित करते हुये कहा था कि इतिहास उनके प्रति दयालु होगा। पूरे प्रेस सम्मेलन के दौरान वो अपने कार्यकाल के बारे में इतिहास पर फैसला छोड़ते दिखे। प्रधानमंत्री को निश्चित तौर पर इतिहास के पन्नों पर जगह मिलेगा लेकिन उन पन्नों की इबारत 2जी, राष्ट्रमंडल खेल और कोयला घोटाले की कालिख से पुती होगी।

  कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम आने के बाद तो मनमोहन सिंह इतिहास के पन्नों पर अपनी ईमानदार छवि को भी बचाने में नकाम रहेंगे। प्रधानमंत्री के शासनकाल को इतिहास इसलिये भी याद रखेगा कि उनकी सरकार ने कॉरपोरेट हित को लोगों के हित से ऊपर रखा। कोयला घोटाले में सीबीआई जाँच का सामना कर रहे हिंडाल्को को तलबिरा आवंटन के अलावा महान कोल ब्लॉक भी आवंटित किया गया था। इस कोल ब्लॉक को पर्यावरण के लिये खतरा बताते हुये तत्कालीन पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश ने गम्भीर सवाल उठाये थे। खुद पर्यावरण व वन मंत्रालय के वेबसाइट पर जयराम रमेश द्वारा हस्ताक्षरित कागजात में स्पष्ट लिखा है कि जैव विविधता से भरे महान क्षेत्र में कोयला खदान से यहाँ के उम्दा प्राकृतिक जंगल क्षेत्र और जंगली जीवन नष्ट हो जायेंगे। इसी में उन्होंने हिंडाल्को और एस्सार द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे पत्र का भी जिक्र किया है। स्पष्ट है कि किस तरह कोयला आवंटन के लिये बार-बार कॉरपोरेट घरानों द्वारा सरकार पर दबाब बनाया जाता रहा। इसी दबाब का नतीजा रहा कि हजारों लोगों और पर्यावरण की सारी चिन्ताओं को दरकिनार कर कोयला खदान आवंटित कर दिया गया।

इस एक मामले ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व क्षमता पर भी गंभीर सवाल खड़े किये हैं, जिसका हिसाब निश्चित ही इतिहास में लिखा जायेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा मंत्रालय ने अगस्त 2004 में महान कोल ब्लॉक के लिये हिंडाल्को के आवेदन को अस्वीकार कर दिया था लेकिन नवंबर में कोयला मंत्रालय ने हिंडाल्को को महान के लिये आमंत्रित किया।  स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विभिन्न मंत्रालयों में बेहतर तालमेल का सर्वथा अभाव ही दिखा।

सुप्रीम कोर्ट में भी कोयला घोटाले की सुनवाई के दौरान एक तरफ जहां मनमोहन सरकार अपनी गलती को मानती नजर आ रही है वहीं कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि जब कोयला घोटाले की अवधि में जारी 40 कोल आवंटन को रद्द किया गया तो बाकी 29 को क्यों नहीं। कोर्ट ने कॉरपोरेट कंपनियों की उन चिंताओं को दरकिनार कर दिया है जिसमें वे एक भारी-भरकम निवेश इन कोल ब्लॉकों में कर चुकने का तर्क दे रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि कानून से उपर ये निवेश नहीं हो सकते। कोर्ट का यह बयान उस तथ्य पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं जिसके तहत महान कोल ब्लॉक को पर्यावरण क्लियरेंस देने से पहले वहाँ पहले से एस्सार द्वारा पॉवर प्लांट में निवेश कर चुकने को भी प्राथमिकता दी गयी थी। फिलहाल उम्मीद की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद मनमोहन सरकार कुछ और कोयला ब्लॉक का आवंटन रद्द कर सकती है। भले ही कोयला ब्लॉक का आवंटन रद्द कर दिया जाय लेकिन इतना तो तय है कि इससे मनमोहन सरकार पर लगी कालिख ना तो वर्तमान में मिटने जा रही है और न ही इतिहास में इसकी कोई सम्भावना है।

मनमोहन सरकार ने एक दशक में लगातार कॉरपोरेट दबाव में आकर फैसले लिये हैं। चाहे वो खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का मामला हो, न्यूक्लियर डील या फिर कोयला घोटाले का। यूपीए वन के समय मनरेगा और किसानों को सब्सिडी जैसे लोक कल्याणकारी योजनाओं ने भले ही मनमोहन सरकार को दुबारा सत्ता में ला खड़ा किया हो लेकिन यूपीए टू के घोटालों ने कांग्रेस सरकार के वर्तमान को भी खराब किया है और निश्चित ही इतिहास भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वर्तमान कार्यकाल के आधार पर ही लिखा जायेगा।

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