Home » इमरान मसूद के लिये तो जेल है मगर उद्धव ठाकरे के लिये क्या ?

इमरान मसूद के लिये तो जेल है मगर उद्धव ठाकरे के लिये क्या ?

वसीम अकरम त्यागी
धर्मनिरपेक्षता इस शब्द का जैसे ही जिक्र आता है मुस्लिम समुदाय एक पार्टी विशेष की कतार में खड़ा नजर आता है, इस देश में मुस्लिम समुदाय ही एक मात्र ऐसा समुदाय है जिसने आज तक सैक्यूलर देश बनाने में सिर्फ योगदान दिया बल्कि हर छमाही कोई न कोई कुर्बानी वह भारत के सैक्यूलरिज्म को बचाने के लिये देता रहा है। ये अलग बात है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियां ही उसके पिछड़ेपन का शिकार बनीं।
बहरहाल हम बात करने जा रहे हैं पिछले दो दिनों से चल रहे सियासी ड्रामे पर जो अब एक किसी शहर विशेष का मुद्दा न होकर राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। सहारनपुर से कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद का वह वीडियो आग की तरह पूरे देश में फैल गया जिसमें उन्होंने मोदी को काट डालने को कहा था। उसी की बदौलत वे जेल में हैं, लेकिन उनके जेल चले जाने से यह मुद्दा शान्त नहीं हुआ। उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप शिवसेना के उद्धव ठाकरे का साक्षात्कार मुंबई से प्रकाशित होने वाले उनके मुख पत्र सामना में प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने साफ इशारा करते हुये जंग का लगभग ऐलान कर दिया। ‘तुम मोदी को मारोगे तो क्या हम मूकदर्शक बने रहेंगे’ किस ओर इशारा करता है इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। यानी वे फिर से ऐसा उत्पात मचा देंगे जैसा मुंबई में 1993 में मचाया था। लेकिन सवाल यहां पर वही है जो अकबरउद्दीन औवेसी के भड़काऊ भाषण के बाद उठा था। औवेसी ने भाषण दिया मुकदमा दर्ज हुआ, जेल हुई, लेकिन तोगड़िया? उसे तो गिरफ्तार तक नहीं किया गया, उल्टे शिवसेना ने कहा कि अगर तोगड़िया की गिरफ्तारी हुयी तो पूरे देश में कोहराम मचा दिया जायेगा। तोगड़िया का भाषण औवेसी के भाषण की प्रतिक्रिया है, ऐसे मौके पर भूल क्यों जाते हैं ? गुजरात दंगों को भी नरेंद्र मोदी और भाजपा ने न्यूटन लॉ करार दिया था जिसका नतीजा वह आज तक भुगत रही है।
सवाल वही हैं कि इमरान मसूद के लिये तो जेल है मगर उद्धव ठाकरे के लिये क्या उसके लिये कानून कोई मायने नहीं रखता ? क्या प्रतिक्रिया में किया गया अपराध कानून की नजर में अपराध नहीं है ? क्या उद्धव की गिरफ्तारी के लिये महाराष्ट्र सरकार कोई कदम उठायेगी जबकि शिवसेना समय-समय पर मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलती रही है, जिसका परिणाम देश ने कई बड़े सांप्रदायिक दंगों का सामना करके भुगते हैं। उसके बाद भी मीडिया में कहीं इस तरह की प्रतिक्रया नहीं दिख रही है जैसी इमरान मसूद के मामले में देखने को मिली है। इतना भी याद रहे इमरान मसूद ने अपनी सफाई में कहा था कि यह कथित वीडियो फर्जी है, और इसमें उनकी आवाज के साथ छेड़ छाड़ की गयी है। लेकिन उद्धव ने जो कहा है वह सबसे सामने है, जिसमें उसने तुम शब्द जोड़कर मानो संप्रदाय विशेष से अघोषित युद्ध का ऐलान कर दिया है। आखिर यह न्याय का दोहरा पैमाना किस लिये ? अपराध तो अपराध होता है, मगर पैंसठ साल के लोकतंत्र में यह होता आया है कि अगर अपराधी बहुसंख्यक समुदाय से है और राजनीतिक पृष्ठभूमि से आता है तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला तो दर्ज जरूर हुआ मगर उसे गिरफ्तार करने की हिम्मत भारतीय पुलिस नहीं दिखा पाई। उस पर तुर्रा दिया गया कि गिरफ्तारी से माहौल खराब हो जायेगा, भला यह कोई तर्क हो सकता है अपराध को खत्म करने का ? अगर ऐसा ही है तो फिर ये कोर्ट कचहरी, अदालत, गाऊन, कानून की मोटी-मोटी किताबें किसलिये ? न्यायाधीश, वकील, दलील, अपील, गवाह, किसलिये ? फिर तो एक नये विभाग का गठन कर लिया जाये जो जनमत संग्रह करके बताये कि फलां अभियुक्त को गिरफ्तार करने से क्या प्रतिक्रिया आयेगी ? क्या माहौल खराब होगा अथवा नहीं, अगर लगे कि माहौल बचा लिया जायेगा तो फिर गिरफ्तार कर लीजियेगा, और अगर कहीं भी यह संदेह हो कि माहौल खराब हो जायेगा तो फिर कानून, को अदालत को, हाईकोर्ट के न्यायाधीश से लेकर देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को उसके समक्ष जाकर हाथ जोड़कर कहना चाहिये कि महाराज हम गलत फहमी का शिकर हो गये थे, जो हम आपको गिरफ्तार करने, आप पर मुकदमा चलाने के बारे में सोच रहे थे।
हैरानी होती है इक्कीसवीं सदी में ऐसे बगैर सर पैर के बेहूदा तर्कों पर।
मेरे लिये तो जेल है मगर उनके लिये ? यह सवाल आज मेरा है कल को अगर उद्धव के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो यह सवाल इमरान मसूद का भी हो सकता है, इस देश में रहने वाले हर दबे कुचले शोषित, पीड़ित, वर्ग का भी हो सकता है, इसलिये माननीय न्यायालय से अपील की जाती है कि वह इन सवालों को उठने से पहले ही अंकुश लगा दे।

About the author

वसीम अकरम त्यागी, लेखक साहसी युवा पत्रकार हैं।
 वसीम अकरम त्यागी की फेसबुक वॉल से

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: