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इलाहाबाद तो नई दिल्ली और भोपाल से 70 के दशक में ही युद्ध हार गया, आलोचना बाकायदा मार्केटिंग हो गयी

राजनीति सत्ता दिला सकती है, लेकिन भाषा को जनभाषा नहीं बना सकती। हिन्दी वाले यह सबक सीख लें तो बेहतर।
अमरकांत जी के अवसान के बहाने बची हुयी पृथ्वी की शोकगाथा
पलाश विश्वास

 एक जरूरी नोटः
 आज स‌ुबह पुराने मित्र उर्मिलेश के फोन स‌े नींद खुली। मुझे स‌्मृतिभ्रंश की वजह स‌े इस आलेख में तथ्यात्मक गलतियों की आशंका ज्यादा थीं।

आज स‌ुबह दुबारा इसके टुकड़े मोबाइल पाठकों के लिये फेसबुक पर दर्ज कराते हुये छिटपुट गलतियां नजर भी आयीं। यथासम्भव दुरुस्त करके यह आलेख कुछ देर में रीपोस्ट करने वाला हूँ। आपकी नजर में कोई गलती नजर आयें या कोई जरूरी बात छूटती नजर आये तो तुरन्त मुझे 09903717833 पर फोन करके स‌ूचित कर दें। आपको महत्वपूर्ण लगे या नहीं, यह मसला बहुत अहम है। देश जोड़ने में बाधक जो स‌ाहित्यिक स‌ांस्कृतिक परिदृश्य है, हम उस पर स‌ंवाद स‌बसे पहले जरूरी ही नहीं, अनिवार्य मानते हैं। कोई जरूरी नहीं कि हम स‌ही हों। हम अगर गलत है तो आप हमें कृपया दुरुस्त कर दें।

उर्मिलेश ने लिंक पर टिप्पणी करते हुये लिखा है कि पलाश ने बहुत अच्छा लिखा है। हम अपनी स‌ीमाएं जानते हैं। हम जानते हैं कि इस मुद्दे पर मुझसे बहुत बेहतर उर्मिलेश लिख सकते हैं। मंगलेश दा और वीरेनदा से लेकर हिन्दी में अनेक लोग हैं जो यकीनन हमसे बेहतर लिख सकते हैं। तेभागा की वजह स‌े भूमिगत मेरे पिता किशोरवय में स‌न 1943 स‌े 45 के बीच कोलकाता भाग आये थे पूर्वी बंगाल के जैशोर की गृहभूमि स‌े। तब वे उत्तर 24 परगना के एक स‌िनेमाहाल में लोगों को स‌ीट पर बैठाने का काम करते थे। 1949 तक जब तक पूरा परिवार विभाजन के बाद इस पार नहीं आया, वे यही काम करते रहे। पूरा परिवार आ गया तो वे शरणार्थी आन्दोलन में कूद पड़े। अपने कामरेडों स‌े उनकी इसलिये ठन गयी कि कम्युनिस्ट पार्टी शरणार्थियों को बंगाल स‌े बाहर दंडकारण्य और अंडमान भेजने के खिलाफ आन्दोलन चला रहे थे, पर जोगेंद्र नाथ मंडल के स‌हयोगी पुलिनबाबू शरमार्थी नेता वीरेंद्र कृष्ण विश्वास की तरह शरणार्थियों के लिये होमलैंड चाहते थे और उनके नजरिये से  यह होम लैंड दंडकारण्य और अंडमान में बन स‌कता था, जिसे बनने स‌े कामरेडों ने रोक दिया।

पिता का स‌ाहित्य और फिल्म के प्रति अगाध प्रेम था। सिर्फ अपने और हमारे लिये स‌ाहित्य खरीदने के लिये वे हर स‌ाल नैनीताल स‌े कोलकाता आते जाते रहे थे। मैं कक्षा एक में था तब तराई के बाघबहुल जंगल पार रुद्रपुर में मुझे साईकिल पर बिठाकर सिब्बल सिनेमा हाल में इवनिंग शो में फूल और पत्थर दिखाने ले गये थे। नैनीताल में जब मैं पढ़ रहा था, तो जब भी वे आते हर दफा वे मुझे फिल्में जरुर दिखाते थे। दिल्ली में 1974 में जब वे इंदिरा गांधी से मिलने मुझे नैनीताल से बुलाया तब भी वे फुरसत में मुझे फिल्म दिखाते रहे। अपढ़ पिता की साहित्य और फिल्म के प्रति जो रुचि थी, उसने उन्हें जुनून के हद तक जनप्रतिबद्ध बना दिया था और जीवन दृष्टि दी थी। जनपदों की ताकत में उनकी घनघोर आस्था थी।
उर्मिलेश ने मुझसे फोन पर कहा कि जनपद साहित्य से तुम क्या कहना चाहते हो। दुर्भाग्य से हिन्दी में ही जनपद साहित्य और बोलियों में लिखे साहित्य को आंचलिक बताकर अंडररेट करने का रिवाज है। विश्व साहित्य में अन्यत्र ऐसा नहीं है। थामस हार्डी मूलतः जनपदों के लिये ही लिख रहे थे। शोलोखव की कुछ भी लिखा दोन नदी के प्रवाह के बिना पूरा नहीं होता। विक्टर ह्यूगो की क्लासिक रचनाओं में आंचलिकता भरपूर है।
अँग्रेजी साहित्य ने तो विश्व भर के जनपदों को आत्मसात किया हुआ है, स्काटिश, आईरिश बोलियों के अलावा। बांग्ला में ताराशंकर बंद्योपाध्याय का समूचा लेखन लाल माटी इलाके का है तो विभूति भूषण विशुद्ध आरण्यक हैं। इलियस और दूसरे बांग्लादेशी साहित्यकार हाल फिलहाल की सेलिना हुसैन जनपदों की बोलियों में ठाठ से लिख रही हैं।
लेकिन हमारे यहां फणीश्वर नाथ रेणु और शैलेश मटियानी जैसे साहित्यकार आंचलिक साहित्यकार कहलाते हैं। भाषा में कोई भी अपनी बोलियां डालें या अपनी माटी की सुगंध से सराबोर कर दें रचनाकर्म.स्त्री, आदिवासी, दलित, पिछड़ों की बात कहें तो महानगरीय वर्चस्व उसे कोई न कोई लेबेल लगाकर मुख्यधारा से बाहर हाशिये पर धकेल देती है।
अमृत लाल नागर जैसे कथाकार हिन्दी दुनिया के लिये महज किस्सागो हैं। जबकि अन्य भाषाओं के कमतर लेखन को हम क्लासिक कालजयी तमगा देने से अघाते नहीं हैं।
अपढ़ पिता से बेहतर साहित्य दृष्टि मेरी है नहीं। लेकिन जीवन दृष्टि के लिये सटीक इतिहास बोध, अर्थ व्यवस्था की समझ, साहित्य और दृश्य माध्यम में गहरी पैठ हम अनिवार्य मानते हैं।
हम मानते हैं कि साहित्य, कला और सिनेमा का मौलिक सौंदर्यबोध की जमीन दरअसल जनपद है, महानगर नहीं। हिन्दी के पतन का कारण अगर दिल्ली है तो पश्चिम बंगीय बांग्ला का पतन कोलकाता वर्चस्व से हुआ। बांग्लादेश में ढाका एक मात्र साहित्य संस्कृति केन्द्र नहीं है। मराठी का केन्द्र मुंबई नहीं है और न तमिल चेन्नै में केन्द्रीकृत है। मदुरै, तिरुचि और तंजावुर वहाँ साहित्य के विकेन्द्रित केन्द्र हैं।
जहाँ केन्द्रीयवर्चस्व का शिकार नहीं है भाषा और साहित्य, वही भाषा जनभाषा है और साहित्य आम जनता का साहित्य, जिसके लिये किसी मेले ठेले की जरूरत होती नहीं है।
राजनीति सत्ता दिला सकती है, लेकिन भाषा को जनभाषा नहीं बना सकती। हिन्दी वाले यह सबक सीख लें तो बेहतर।
हमने धर्मवीर भारती से लेकर विभूति नारायण राय तक हिन्दी में  गिरोहबंदी को सिलसिलेवार देखा है और हम तमाम लोगों का उसका शिकार होते हुये भी देखते रहे हैं। देख रहे हैं। लेकिन हमने उसकी विशद चर्चा इसलिये नहीं की है क्योंकि इससे बहस गिरोहबंदी पर केन्द्रित हो जायेगी जो बहुत से हिन्दी के ग्लोबल धुरंधरों की अपार विशेषज्ञता हैं और वे तमाम माध्यमों में एक दूसरे के खिलाफ हर दिन तलवारे भांजते पाये जाते हैं।
हम अपने आकाओं के खिलाफ खुलकार लिखते रहे हैं। दंश से हम नीले नहीं होते कभी चूँकि हमारी जमीन ही नीली है। भीतर से हम लाल हैं तो लहू के रंग से डर भी नहीं लगता।
मित्रों, इन दिनों लघु पत्रिकाओं में भी मैं नहीं छपता। सोशल मीडिया में भी हस्तक्षेप के अलावा मेरी कोई जगह नहीं है। छपने और लगने की आकांक्षा से ऐसा जाहिर है कि नहीं लिख रहा हूँ। अपने सरोकारों को जनकवायद बनाने का अभ्यास मेरा लेखन है। मुझे न पुस्तकें छपवानी है, न पुस्तक मेले की आत्ममुग्ध सेल्फी कहीं पोस्ट करनी है और न इतिहास में दर्ज होने की कोई मेरी औकात है। मुझे जैसा लगता है, बहुपक्षीय संवाद के जरिये उसकी जाँच पड़ताल के लिये रोजनामचा जरूर ब्लॉगों में दर्ज करता हूँ और उसे व्यापक जनसंवाद बनाने की गरज से फेसबुक में डालता हूँ। वहाँ भी अघाते हुये मित्रों की लम्बी कतार हैं, जो बिना बताये मुझे डीफ्रेंड करते रहते हैं। जो नये मित्र मिलते हैं, उन्ही की नींद हराम करता हूँ रातदिन।
पृथ्वी अगर मुक्त बाजार संस्कृति से कहीं बची है तो इलाहाबाद में। पिछले दिनों हमारे फिल्मकार मित्र राजीव कुमार ने ऐसा कहा था। दूसरे फिल्मकार मित्र और उससे ज्यादा हमारे भाई संजय जोशी से जब उनकी पुश्तैनी सोमेश्वर घाटी पर फिल्म बनाने की बात कही हमने तो दिल्ली में बस गये संजू ने भी कहा कि उसका वजूद तो इलाहाबाद में ही रचा बसा है।
मैं इलाहाबाद में 1979 में तीन महीने के लिये रहा और 1980 में दिल्ली चला गया। लेकिन इन तीन महीनों में ही इलाहाबाद के सांस्कृतिक साहित्यिक परिवार से शैलेश मटियानी जी, शेखर जोशी जी, अमरकांत जी, नरेश मेहता जी, नीलाभ, मंगलेश, वीरेनदा, रामजी राय, भैरव प्रसाद गुप्त और मार्कंडेय जी की अंतरंग आत्मीयता से जुड़ गया था।
अमरकांत जी और भैरव प्रसाद गुप्त जी की वजह से माया प्रकाशन के लिये अनुवाद और मंगलेश के सौजन्य से अमृत प्रभात में लेखन मेरे इलाहाबाद ठहरने का एकमात्र जरिया था। मैं शेखर जोशी जी के 100 लूकर गंज स्थित आवास में रहा तो इलाहाबाद के तमाम साहित्यकारों से गाहे-बगाहे मुलाकात हो जाती थी। भैरव जी, अमरकांत जी और मार्कंडेय जी के अलावा शैलेश जी के घर आना जाना लगा रहता था। यह आत्मीयता हमें छात्र जीवन में ही आदरणीय अमृत लाल नागर और विष्णु प्रभाकर जी से नसीब हुयी तो बाद में बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन जी से।
ये तमाम लोग और उनका साहित्य जनपद साहित्य की धरोहर हैं, जिसका नामोनिशान तक अब कहीं नहीं है। त्रिलोचन जी के निधन पर हमने लिखा था कि जनपद के आखिरी महायोद्धा का निधन हो गया। तब भी अमरकांत जी थे। दूधनाथ सिंह की भी इस दुनिया में खास भूमिका रही है। इनके अलावा उपेंद्र नाथ अश्क और उनके सुपुत्र नीलाभ, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल और डा. स‌ुनील श्रीवास्तव भी लूकरगंज में ही बसते थे। इलाहाबाद विश्विद्यालय में हिन्दी में डॉ. रघुवंश और अँग्रेजी में डॉ. विजयदेव नारायण साही और डॉ. मानस मुकुल दास थे। अमृत प्रभात में मंगलेश केन्द्रित एक युवा साहित्यिक पत्रकार दुनिया अलग थी। अमृत राय की पत्रिका कहानी और महादेवी वर्मा की हिंदुस्तानी तब भी छप रही थीं। शैलेश जी विकल्प निकाल रहे थे तो मार्कंडेय जी कथा।
दरअसल इलाहाबाद के साहित्यकारों को हमने नैनीताल में विकल्प के माध्यम से ही जाना था। अमरकांत जी की कहानी, शायद जिन्दगी और जोंक पहली बार वहीं पढ़ा था। शायद कहानी दूसरी हो। मैं अँग्रेजी साहित्य का छात्र था, हिन्दी का नहीं। हमने जो पढ़ा लिखा छात्र जीवन में, वह या तो नैनीताल समाचार की टीम की वजह से, मोहन के कारण या अपने गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी के अनुशासनबद्ध दिग्दर्शन के तहत।
आज जो लिख रहा हूँ अमरकांत जी के बारे में, यह भी अरसे से स्थगित लेखन है। मैं न साहित्यकार हूँ और न आलोचक। साहित्य के क्षेत्र में दुस्साहसिक हस्तक्षेप हमारी औकात से बाहर है।
लेकिन इलाहाबादी साहित्य केन्द्र के नयी दिल्ली और भोपाल स्थानांतरित हो जाने के बावजूद जो लोग रच रहे थे, जिनमें हमारे इलाहाबाद प्रवास के दौरान तब भी जीवित महादेवी वर्मा भी शामिल हैं, उनके बारे में मैं कायदे से अब तक लिख ही नहीं पाया। शैलेश मटियानी के रचना संसार पर लिखा जाना था, नही हो सका। शेखर जी के परिवार में होने के बावजूद उनके रचनाक्रम पर अब तक लिखा नहीं गया। हम अमृतलाल नागर और विष्णु प्रभाकर जी के साहित्य पर भी लिखना चाहते थे, जो हो न सका।
दरअसल इलाहाबाद छोड़कर दिल्ली जाने के फैसले ने ही हमें साहित्य की दुनिया से हमेशा के लिये बेदखल कर गया। हम पत्रकारिता के हो गये। फौरी मुद्दे हमारे लिये ज्यादा अहम है और साहित्य के लिये अब हमारी कोई प्राथमिकता बची ही नहीं है। अंतरिम बजट से लेकर तेलांगना संकट ने इलाहाबादी साहित्यिक दुनिया के भूले बसरे जनपद को याद करने के लायक न छोड़ा हमें। वरना हम तो नैनीताल में इंटरमीडिएड के जीआईसी जमाने से कुछ और सोचते रहे हैं। मोहन कपिलेश भोज का कहना था कि नये सिरे से लिखना और रचना ज्यादा जरूरी नहीं है, बल्कि जो कचरा जमा हो गया है, उसे साफ करने के लिये हमें सफाई कर्मी बनना चाहिए।
इस महासंकल्प को हम लोग अमली जामा नहीं पहुँचा सकें। न मैं और न कपिलेश। फर्क यह है कि नौकरी से निजात पाने के बाद वह कविताएं रच रहा है और साहित्यिक दुनिया से अब हमारा कोई नाता नहीं है। आज जो भी कुछ बहुचर्चित पुरस्कृत लिखा रचा जा रहा है, उनमें से प्रतिष्ठित ज्यादातर चमकदार हिस्सा मुक्त बाजार के हक में ही है। साठ के दशक में स्वतंत्रता के नतीजों से हुये मोहभंग की वजह से जितने बहुआयामी साहित्यिक सांस्कृतिक आन्दोलन साठ के दशक में हुये, अन्यत्र शायद ही हुये होंगे। लेकिन धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, ज्ञानरंजन से लेकर नामवर सिंह, विभूति नारायण राय और केदारनाथ सिंह की बेजोड़ गिरोहबंदी की वजह से उस साहित्य का सिलसिलेवार मूल्याँकन हुआ ही नहीं। वह गिरोहबंदी आज संक्रामक है और पार्टीबद्ध भी। अमरकांत अब तक जी रहे थे, वह वैसे ही नहीं मालूम पड़ा जैसे नियमित काफी हाउस में बैठने वाले विष्णु प्रभाकर जी के जीने मरने से हिन्दी दुनिया में कोई बड़ी हलचल नहीं हुयी। वह तो लखनऊ में धुनि जमाये बैठे,भारतीय साहित्य के शायद सबसे बड़े किस्सागो अमृतलाल नागर जी थे, जो नये पुराने से बिना भेदभाव संपर्क रखते थे और इलाहाबाद से उपेंद्रनाथ अश्क भी यही करते थे। उनके बाद बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन शास्त्री के बाद विष्णु चंद्र शर्मा ने दिल्ली की सादतपुर टीम के जरिये संवाद का कोना बचाये रखा। शलभ ने मध्य प्रदेश के विदिशा जैसे शहर से दिल्ली और भोपाल के विरुद्ध जंग जारी रखा।
कोलकाता का हिन्दी केन्द्र और नागपुर का मध्य भारतीय हिन्दी केन्द्र हिन्दी दिवसों के आयोजन, राजभाषा अभियान और हिन्दी मेलों के मध्य कब विसर्जित हो गया, हिन्दी वालों को पता ही नहीं चला। कोलकाता से अब दर्जनों हिन्दी अखबार निकलते हैं जैसे दक्षिण भारत से भी विज्ञापनी संस्करण निकलते हैं जिनमें मुक्त बाजारी अश्लील फिल्म टीवी के अलावा साहित्य और कला के लिये कोई स्पेस ही नहीं है। लेकिन इलाहाबाद तो नई दिल्ली और भोपाल से सत्तर के दशक में ही युद्ध हार गया और एकाधिकारवादी तत्व हिन्दी में ही नहीं, पूरे भारतीय साहित्य में साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, रंग बिरंगे पुरस्कारों, बाजारू पत्रिकाओं और सरकारी खरीद से चलने वाले प्रकाशन संस्थानों के जरिये छा गये।
 आलोचना बाकायदा मार्केटिंग हो गयी। जयपुर साहित्य उत्सव के जरिये अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और राजनेता भाषाओं का श्राद्धकर्म कर्मकांडी स्थायीभाव के साथ करते हुये वसंत विलाप साध रहे हैं। साहित्य भी बाजार के माफिक प्रायोजित किया जाने लगा। हिन्दी, मराठी और बांग्ला में जनपद साहित्य सिरे से गायब हो गये और जनपदों की आवाज बुलंद करने वाले लोग भी खो गये। अब भी जनपद इतिहास पर गंभीर काम कर रहे सुधीर विद्यार्थी और अनवर सुहैल जैसे लोग बरेली और मिर्जापुर जैसे कस्बों से साठ के दशक के जनपदों की याद दिलाते हैं। दूसरे लोग भी हैं। खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और राजस्थान में उनकी संख्या कोई कम नहीं है। लेकिन साहित्य के दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक पहुँचती ही नहीं है।
बांग्ला में यह फर्क सीधे दिखता है जब साठ के दशक के सुनील गंगोपाध्याय मृत्यु के बाद अब भी बांग्ला साहित्य और संस्कृति पर राज कर रहे हैं। माणिक बंद्योपाध्याय, समरेश बसु और ताराशंकर बंदोपाध्याय के अलावा तमाम पीढ़ियां गायब हो गयी और बांग्ला साहित्य और संस्कृति में एकमेव कोलकाता वर्चस्व के अलावा कोई जनपद नहीं है। हिन्दी में डिटो वही हुआ। हो रहा है।
मराठी में थोड़ी बेहतर हालत है क्योंकि वहा मुंबई के अर्थ जागतिक वर्चस्व के बावजूद पुणे और नागपुर का वजूद बना हुआ है। शोलापुर कोल्हापुर की आवाजें सुनायी पड़ती हैं तो मराठी संसार में कर्नाटकी गुलबर्गा से लेकर मुक्तिबोध के राजनंद गांव समेत मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात,राजस्थान, गोवा तक की मराठी खुशबू है।
जनपदों के सिंहद्वार से ही कोई अचरज नहीं कि मराठी में ही दया पवार और नामदेव धसाल की अगुवाई में भारतीय दलित साहित्य का महाविस्फोट हो सका। हिन्दी में दलित साहित्य का विस्तार उस तरह भी नहीं हो सका जैसे पंजाबी में। बांग्ला में तो खैर जनपदीय साहित्यिक भूगोल के सिरे से गायब हो जाने के कारण सही मायने में दलà

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