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इस्लाम आने के पहले भी भारत कोई ‘हिन्दू मुल्क’ नहीं था- अप्पो दीपो भव !

स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द एवम् महात्मा ज्योतिबा फुले के बहाने चन्द बातें

वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ता और सांप्रदायिकता के विरुद्ध योद्धा सुभाष गाताडे बीती 21-22 जनवरी 2014 को मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर के दर्शन विभाग द्वारा ‘सामाजिक मुक्ति की ज्ञानमीमांसा : विवेकानन्द, ज्योतिबा फुले और दयानन्द सरस्वती के विचारों की आलोचनात्मक समीक्षा’ पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता थे। उनका उक्त संगोष्ठी में प्रस्तुत व्याख्यान हम अपने पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। व्याख्यान लम्बा है अतः इसे किस्तों में जारी कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है दूसरी किस्त.. -सं. हस्तक्षेप
सुभाष गाताडे
सामान्य अर्थों में देखें तो मुक्ति का अर्थ उन तमाम बन्धनों से मुक्ति जो किसी व्यक्ति या किसी व्यक्तियों के समूह पर लगे रहते हैं जो नस्ल, जेण्डर, धर्म, समुदाय, जाति, राष्ट्रीयता, अर्थतन्त्र की प्रणाली, यौनिक ओरिएंटेशन आदि तमाम कारकों से निर्धारित होते हैं। मुक्ति का अर्थ ऐसे तमाम  बन्धनों से मुक्ति, धार्मिक ग्रन्थों के प्राधिकार से मुक्ति, वे तमाम बन्धन/बन्दिशें जो व्यापक जनता के दिलो-दिमाग-शरीर-भौतिक जीवन पर पड़े हैं उनसे मुक्ति, मनुष्य को उसकी अपनी प्रदत्त श्रेणियों (ascriptive category) से हटा कर खालिस मनुष्य की तरह देखने की शुरूआत।
राजनीतिक जीवन के आधुनिक विमर्श में देखें तो जो व्यक्ति की स्वायत्तता, आत्मनिर्णय और उसकी सम्प्रभुता आदि को सुनिश्चित करते हों। किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना अपने जीवन सम्बन्धी निर्णय करने का व्यक्तिगत अधिकार या किसी व्यक्तियों के समूह का अधिकार की गारंटी करते हों।
अगर सामाजिक मुक्ति के हमारे लिये यह मायने हैं तो क्या इन पैमानों के आधार पर हम इन तीनों शख्सियतों के जीवनपटल पर सरसरी निगाह डाल सकते हैं। तय बात है कि अगर हम ठोस तरीके से बात न कर सकें तो बातें अमूर्त धरातल पर रह सकती हैं। उदाहरण के तौर पर मैं अगर पूछूँ कि क्या इन तीनों शख्सियतों ने मनुष्य को मनुष्य की तरह देखा था या नहीं, तो उसके उत्तर एक ही किस्म के मिल सकते हैं। इसके बरअक्स हम अगर इस की पड़ताल कर सकें कि समाज के विभिन्न उत्पीड़ित तबके- फिर इसमें शूद्र/ अतिशूद्र से लेकर स्त्रियों तक या ‘अन्य’ की श्रेणी में शुमार किये जानेवाले समुदाय- सभी को शामिल किया जा सकता है, को लेकर उन्होंने क्या कहा, क्या उनके विचार इन तबकों की वास्तविक मुक्ति का जरिया बने या उन्हें नये मीठे बन्धनों में जकड़े जाने का औजार बने। क्या इन उत्पीड़ित तबकों की जमीनी हक़ीकत के प्रति अनभिज्ञ रह कर उन्होंने अपने कल्पनालोक से उनकी स्थिति को देखा और कुछ ऐसे नुस्खे सिखाये जो उन्हें अधिक बन्धन में डालनेवाले साबित हुये। युगों- युगों से मनुष्य के आत्मिक एवम् भौतिक जीवन की दशा दिशा को निर्धारित करने वाली धर्म नामक संस्था के बारे में या ईश्वर की अवधारणा के बारे में उन्होंने क्या कहा ! मेरे खयाल से अगर ऐसी पड़ताल हम कर सकें तो मुमकिन है कुछ बातें कही जा सकती है, इस जटिल मसले पर रौशनी डाली जा सकती है।
3.

तत्कालीन भारत नामक भौगोलिक भूभाग के हिसाब से देखें तो 19 वीं सदी happening century है।
दयानन्द, विवेकानन्द और फुले के चिन्तन एवम् कार्य की मुख्यतः यही सदी है।
वह औपनिवेशिक हुकूमत का दौर है, जब पूरा मुल्क राजनीतिक-सामाजिक तथा बौद्धिक जगत में मची हलचलों का मंच बना हुआ है।
यही वह दौर है जब एक तरफ जहाँ औपनिवेशिक शासन के खात्मे के लिये राजे रजवाड़ों, आदिवासी समूहों या किसान कारीगर समुदाय की तरफ से व्यापक हलचलें चलीं वहीं साथ ही साथ सात समुन्दर पार से आये अँग्रेजों की जीत से अचम्भित समाज के अग्रणियों के बीच उनकी जीत के कारणों को जानने के लिये गहन विचारमन्थन भी निरन्तर जारी रहा। प्रतिरोध और प्रतिक्रिया के इस सिलसिले में किसी किस्म की चीनी दीवार नहीं थी। एक ‘स्पेक्ट्रम’ जैसी स्थिति उपस्थित थी जहाँ अगर एक छोर महज प्रतिरोध में लगी ताकतें खड़ी थीं तो दूसरे छोर पर वे विचारक थे जो भारतीय समाज को सड़ाँध से निकालने के लिये रास्ते की तलाश में थे जिसने उसे इस दारूण हालत में पहुँचाया था। इनमें वे समाजसुधारक भी शामिल थे जो भारतीय समाज की अपनी कमियों को दूर करने के लिये प्रयासरत थे।
यह सही है कि राजनीतिक विद्रोहियों, नेताओं की अगुआई में चले व्यापक जनान्दोलनों के समानान्तर या कहीं साथ साथ चलीं समाज सुधारकों/ सामाजिक विद्रोहियों की दखल ने ही भारतीय समाज को उस मुका़म तक पहुँचाया जहाँ वह आज खड़ा है। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि समाजसुधारकों का काम निश्चित ही उतना आसान नहीं था। राजनीतिक-आर्थिक आन्दोलनों के निशाने पर जहाँ मुख्यतः बाहरी ताकतें थीं लिहाजा विदेशी बनाम देशी के द्वंद्व के आधार पर व्यापक जनसमुदाय को गोलबन्द करना उनके लिये सापेक्षतः आसान साबित हुआ। इसके बरअक्स समाज सुधार के कामों की जटिलता यह थी वहाँ उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में संलग्न अपने ही समाज में व्याप्त मध्ययुगीन, तर्कविरोधी, गैरजनतान्त्रिक मूल्यों, संस्थाओं के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करनी थी जिस समूचे काम को भारत के वर्णाश्रम पर टिके विशिष्ट इतिहास ने बेहद जटिल बना दिया था।
लेकिन समाज सुधारकों के विभिन्न प्रयासों की भी अपनी अपनी विशिष्टताएं-भिन्नताएं थीं तथा सभी के लिये रास्ता उतना दुश्कर नहीं था। कुछ कोशिशों में जहाँ धार्मिक सम्प्रदायों के गठन के जरिये इसे अंजाम दिया जा रहा था तो कहीं उन्हें महज परिवार तक सीमित रखा गया था। लेकिन इन सबमें सबसे रैडिकल हस्तक्षेप उन सामाजिक- सांस्कृतिक विद्रोहियों का था जिन्होंने भारतीय समाजसंरचना में निर्णायक पुरोहितवादी/ मनुवादी/ मुल्ला केन्द्रित व्यवस्था को अपना निशाना बनाया अर्थात् यहाँ के व्यापक समाज की पुनःरचना और पुनःसंगठन के रूप में इस काम को अपने हाथों में लिया।-जातिभेद का उन्मूलन’ नामक अपनी ऐतिहासिक रचना में डॉ. अम्बेडकर ‘परिवार केन्द्रित’ सुधार एवम्-समाज केन्द्रित’ सुधारों में मौजूद इसी फर्क की बात करते हैं। कुल मिला कर जहाँ पहली तथा दूसरी धारा में यहाँ के समाज में विशेषकर उच्च जातिय तबकों में व्याप्त बुराईयों को दूर करने का लक्ष्य रखा गया मसलन बाल विवाह, विधवा विवाह पर रोक आदि प्रथाएं उसके एजेण्डे पर रहीं वहीं तीसरी रैडिकल धारा ने जाति प्रथा की समाप्ति का बीड़ा उठाया, स्त्री मुक्ति के प्रश्न को जुबाँ दी।
इस तरह जहाँ पहली दो धाराओं ने जनसमुदाय को एक ‘अच्छे हिन्दू’ के तौर पर तराशने की कोशिश की और हिन्दू धर्म की स्थापित परम्पराओं या अन्य किसी सुधरी शाखा में उसके आत्मसातीकरण को बढ़ावा दिया वहीं तीसरी धारा ने अपने अतीत के गौरव की पुनरूत्थानवादी गल्प को खारिज करते हुये तर्कबुद्धि पर खड़े एक नये इन्सान को गढ़ने का प्रयास किया। इसके अन्तर्गत तमिलनाडु में खड़े हुये पेरियार रामस्वामी नायकर के नेतृत्व वाले आन्दोलन ने तो ईश्वर को भी नकारा तथा नास्तिकता की हिमायत की। अगर पीछे मुड़ कर देखें तो इस धारा में हमें उन तमाम आधुनिक आन्दोलनों के बीज मिल सकते हैं जो बाद के दिनों में पुष्पित पल्लवित हुये फिर वह चाहे नारी मुक्ति आन्दोलन हो, स्वायत्त दलित आन्दोलन हो या मजदूर आन्दोलन हो। यह अकारण ही नहीं कि सत्यशोधक समाज की कार्यकर्ती ताराबाई शिन्दे को पितृसत्ता को कटघरे में खड़ा करने वाली उसकी रचना ‘स्त्री पुरूष तुलना’ के चलते पहली नारीवादी सिद्धान्तकार के सम्मान से आज नवाज़ा जा रहा है।

दयानन्द सरस्वती- ‘अतीत का पुनर्जीवन’
इस पूरी पृष्ठभूमि में राजाराममोहन रॉय द्वारा स्थापित ‘ब्राहमो समाज’ जैसे संगठनों से या बंगाल एवम् अन्य हिस्सों में उभरे शुरूआती सुधारकों के साथ तुलना करें तो दयानन्द सरस्वती की विचारधारा गुणात्मक तौर पर अलग नहीं दिखती है। फरक महज इतना ही दिखता है कि उनकी बुनियादी दृष्टि अर्थात् विजन वैदिक स्वर्णयुग के मिथक पर आधारित थी। प्रचण्ड कल्पना शक्ति से लैस बुनियादी तौर पर धार्मिक व्यक्ति दयानन्द के मुताबिक आर्यावर्त दरअसल ‘सुपरह्यूमन’ आर्यों का निवास रहा है, जहाँ पहले सभ्यता का जन्म हुआ, उनके मुताबिक संस्कृत ‘सभी भाषाओं की जननी है और देवों की भी भाषा है‘‘। उनका यह भी कहना था कि ‘वेद न केवल सत्य हैं बल्कि उनमें सभी किस्म के सत्य छिपे हैं, यहाँ तक कि आधुनिक विज्ञान के विचार भी उसमें मिलते हैं।
1875 में उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश की रचना की थी, जिसमें हिन्दू धर्म एवम् समाज के पुनर्जीवन के बारे में दयानन्द के विचार शामिल हैं, इस ग्रंथ की अहमियत देखते हुये उसे ‘आर्य समाज आन्दोलन का घोषणापत्र’ भी कहा गया।
19 वीं सदी के तमाम समाजसुधारकों की तरह उन्हें भी जाति व्यवस्था की समस्या से रूबरू होना पड़ा, जिसमें उन्होंने एक तरफ हिन्दू धर्म में प्रविष्ट किये भ्रष्टाचरण एवम् गलत आचरण का विरोध किया, मगर वर्णव्यवस्था के आदर्शों को स्वीकारा। उनके मुताबिक सामाजिक संगठन के रूप में वर्ण मॉडल आदर्श है बशर्ते उसमें घुसी गन्दगियों का हटाया जाए। उनकी सामाजिक दृष्टि और जाति के प्रति उनका दृष्टिकोण ब्राहमणवादी विचारधारा में उनकी आस्था से ही तय हुआ था। यह सही बात है कि उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, समकालीन हिन्दू धर्म की अंधश्रद्धामूलक आचारों की मुखालिफत की, मगर सनातन धर्म के प्रति वह तमाम तरीकों से प्रतिबद्ध रहे- जिसका केन्द्रीय पहलू था वेदों की श्रेष्ठता पर उनका यकीन।
कर्म सिद्धान्त के अनुगामी दयानन्द ने कभी जाति पर सीधा हमला नहीं किया, यहाँ तक कि शूद्रों के प्रति उनका दृष्टिकोण भी अन्तर्विरोधी था और उनका उद्धार करने का उनका सरोकार आधा अधुरा था। सत्यार्थ प्रकाश के पहले संस्करण में वह शूद्रों को स्कूली शिक्षा की हिमायत करते हैं, मगर वेदों को पढ़ने की उन्हें अनुमति नहीं देते। उनकी मृत्यु के बाद सत्यार्थ प्रकाश के दूसरे संस्करण में वह शास्त्रों को पढ़ने की इजाजत देते हैं, मगर मंत्र संहिता- वैदिक साहित्य का सबसे पवित्र हिस्सा पढ़ने से रोकते हैं। उसी तरह, वह शूद्रों को अध्ययन का अधिकार देते हैं, मगर यज्ञोपवीत- जिसके बाद कोई द्विज होता है या समाज की भाषा में कहें तो ‘शुद्ध आर्य’ होता है- का अधिकार नहीं देते हैं। एक दूसरे स्थान पर शूद्रों को सलाह देते हैं कि वह अहंकार, असहमति और ईर्ष्या को त्याग कर उच्च तीन वर्णों की सेवा कर अपनी जीविका का पालन करें। सबसे महत्वपूर्ण था कि चातुर्वर्ण्य के बाहर स्थित लाखों अंत्यजों और आदिवासियों के लिये उनके पास कोई विचार नहीं था।
दयानन्द के सामाजिक सांस्कृतिक हस्तक्षेप का एक और विवादास्पद हिस्सा था शुद्धि के लिये उन्होंने चलायी मुहिम जिसकी परिणति साम्प्रदायिक टकराव में हुयी। वेदों की श्रेष्ठता पर उनका जबरदस्त यकीन की परिणति थी ‘नकली’ और ‘हीन’ धर्मों जैसे ईसाइयत, इस्लाम, जैन धर्म और सिख धर्म के खिलाफ उनकी मोर्चाबन्दी। अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में वह इन तमाम धर्मों के खिलाफ ऐसी तमाम बातें कहते हैं जो निश्चित ही उनके प्रति बेहद असम्मान प्रगट करती हैं। शुद्धि के उनके कार्यक्रम ने हिन्दुओं में भी उच्च और निम्न जातियों में विवाद को पैदा किया क्योंकि शुद्धि के अन्तर्गत शुद्ध आर्यों की तुलना में सभी हीन थे। शुद्धि के बाद लोगों को उसी जाति और वर्ण का मान लिया जाता था। इस सन्दर्भ में हम गांधीजी को उद्धृत कर सकते हैं:
गांधी जी अपने अख़बार ‘यंग इंडिया‘ में लिखते हैं-

‘‘मेरे दिल में दयानन्द सरस्वती के लिये भारी सम्मान है। ..उनकी बहादुरी में सन्देह नहीं लेकिन उन्होंने अपने धर्म को तंग बना दिया है। मैंने आर्य समाजियों की सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ा है, जब मैं यर्वदा जेल में आराम कर रहा था। मेरे दोस्तों ने इसकी तीन कॉपियाँ मेरे पास भेजी थीं। मैंने इतने बड़े रिफ़ॉर्मर की लिखी इससे अधिक निराशाजनक किताब कोई नहीं पढ़ी। स्वामी दयानन्द ने सत्य और केवल सत्य पर खड़े होने का दावा किया है लेकिन उन्होंने न जानते हुये जैन धर्म, इस्लाम धर्म और ईसाई धर्म और स्वयं हिन्दू धर्म को ग़लत रूप से प्रस्तुत किया है। जिस व्यक्ति को इन धर्मों का थोड़ा सा भी ज्ञान है वह आसानी से इन ग़लतियों को मालूम कर सकता है, जिनमें इस उच्च रिफ़ॉर्मर को डाला गया है। उन्होंने इस धरती पर अत्यन्त उत्तम और स्वतन्त्र धर्मों में से एक को तंग बनाने की चेष्टा की है। यद्यपि मूर्तिपूजा के विरूद्ध थे लेकिन वे बड़ी बारीकी के साथ मूर्ति पूजा का बोलबाला करने में सफल हुये क्योंकि उन्होंने वेदों के शब्दों की मूर्ति बना दी है और वेदों में हरेक ज्ञान को विज्ञान से साबित करने की चेष्टा की है। ..आप जहाँ कहीं भी आर्य समाजियों को पायेंगे वहाँ ही जीवन की सरगर्मी मौजूद होगी। तंग और लड़ाई की आदत के कारण वे या तो धर्मों के लोगों से लड़ते रहते हैं और यदि ऐसा न कर सकें तो एक दूसरे से लड़ते- झगड़ते रहते हैं।
(अख़बार प्रताप 4 जून 1924, अख़बार यंग इंडिया, अहमदाबाद 29 मई 1920)
अपनी चर्चित किताब ‘डिब्राहमनाइजिंग हिस्ट्री’ में ब्रजरंजन मणि बताते हैं कि सत्यार्थ प्रकाश में दयानन्द मनु के विचारों का- उनकी बर्बरताओं के साथ- समर्थन करते हैं। किसी व्यक्ति को जिसे वह शैताननुमा समझता है उसे मार डालने को वह प्रोत्साहित करते हैं। एक व्यभिचारी को गर्म लोहे से बने पलंग पर जिन्दा जला देने और व्यभिचारिणी को तमाम लोगों की उपस्थिति में कुत्ते को खिला देने की बात वह करते हैं। मगर बकौल उमा चक्रवर्ती स्त्रियों की यौनिकता के नियन्त्रण की चिन्ता में दयानन्द सौम्यता का समूचा आवरण हटा देते हैं। उनके मुताबिक स्त्रीत्व की दयानन्द की कल्पना इस बात से अभिन्न रूप से जुड़ी हुयी है कि वह महिलाओं की यौनिकता से किस तरह डील करते हैं।
‘दयानन्द के चिन्तन के केन्द्र में उनकी यह समझदारी थी नस्ल का जारी रहना और उसी से सम्बधित उनकी यौनिकता। दयानन्द के लिये मातृत्व ही स्त्री के वजूद का सबसे जरूरी काम है। यहाँ तक कि आदर्श गर्भधारण के लिये वह कई नियमों का उल्लेख भी करते हैं।’ आर्यों की स्वस्थ और शुद्ध नस्ल तैयार हो इसलिये वह आर्य माता के जल्दी स्वस्थ होकर फिर एक बार गर्भधारण के लिये अनुकूल होने के लिये शिशु के लिये (शूद्र) दाई रखने की भी बात करते हैं। उमा पूछती हैं-

‘ मगर उस दाई का क्या ? वह कौन थी ? प्रजनन की प्रणाली में उसकी स्थिति क्या है ? क्या उसे भी मजबूत सन्तानें नहीं पैदा करनी थी ? स्पष्ट था कि दयानन्द के निर्देश एक तबके की कीमत पर दूसरे तबके के लिये थे। उन्नीसवीं सदी के राष्ट्रवादियों की निगाह में महिलाओं के विशाल हिस्से का अस्तित्व नहीं था। किसी ने भी प्राचीन ग्रंथों को पलट कर यह देखने की कोशिश नहीं की कि वैदिक दासी और उसके जैसों को वेदों के स्वर्णिम युग में क्या अधिकार थे ?’
मणि के मुताबिक –
‘आर्यों की पुनर्नवीन नस्ल के लिये स्त्रियों की यौनिकता के प्रबन्धन के विचार के चलते विधवा पुनर्विवाह के प्रति उनकी समझदारी अस्पष्ट रही। मातृत्व पर जोर देते हुये वह स्त्रियों और पुरूष दोनों के पुनर्विवाह का समर्थन करते हैं बशर्ते पहली शादी से उन्हें कोई सन्तान नहीं हो। पुनर्विवाह के और यौनिकता के प्रश्न के समाधान के तौर पर वह नियोग का प्रस्ताव भी रखते हैं, जिसके अनà

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