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इस कॉरपोरेट लोकतंत्र में न बच्चे सुरक्षित हैं और न ग्लेशियर! मासूम बच्चों की लाशें अब हमारी जम्हूरियत है

गनीमत है कि कंस मामा का अवतार हुआ नही है अभी और गोकुल के हर बच्चे को मारने का फतवा फिलहाल जारी नहीं है
একের পর এক হামলা শাসক দলের, রেহাই নেই দুধের শিশুরও
‘सुना है पड़ोस के जंगल में आग लगी है!’
कानाफूसी करते घबराए पेड़

अपू और दुर्गा नख से सिर तक लहूलुहान उसी आग में जिंदा जल रहे हैं। सियासती मजहब और मजहबी सियासत बदलते मौसम की कयामत पर भारी है।

कुरुक्षेत्र में ब्रह्मास्त्र से द्रोपदी के पांच पुत्रों की हत्या के पाप से अश्वत्थामा आज भी हमारे बीच अमर है और जख्मी लहूलुहान जिंदगी जी रहा है तो अपने शिशुओं के वध कार्यक्रम के मूक दर्शक भारत के नागरिकों के इस महापाप का हश्र क्या है, इसके बारे में धर्माधिकारी ही कोई वक्तव्यआधिकारिक जारी करें तो बेहतर।

सबिता विश्वास

आदरणीय कमल जोशी के कैमरे में हिमालयका हाल है, लेकिन बंगाल में भुखमरी की रिपोर्टिंग करने वाले महान चित्रकार सोमनाथ होड़ अब रहे नहीं और पथेर पांचाली के रचनाकार विभूति भूषण बंद्योपाध्याय भी नहीं रहे कि आरण्यक की तस्वीरें लाइव हों।

पथेर पांचाली में अपू और दुर्गा को शाश्वत मानवीय प्रतीक बना देने वाले महान फिल्मकार अब यह देखने के लिए जिंदा नहीं बचे हैं कि यकीन करें या न करें, बंगाल में अब जंगल का राज है और इस जंगल में भी लगी है भयंकर आग और अपू और दुर्गा नख से सिर तक लहूलुहान उसी आग में जिंदा जल रहे हैं।

सियासती मजहब और मजहबी सियासत बदलते मौसम की कयामत पर भारी है।

‘सुना है पड़ोस के जंगल में आग लगी है!’

कानाफूसी करते घबराए पेड़

(कलाढुंगी-नैनी रोड)

बंगाल के लोग इस महादेश में सबसे ज्यादा बेमतलब घूमने वाले हैं।

कश्मीर से कन्याकुमारी, हिमालय से कन्याकुमारी और जैसलमेर, दुनिया के कोने-कोने में आपको पर्यटक बंगाली मिल जायेंगे और बहुत सारे पर्यटक ऐसे होंगे बंगाल में जो या तो हिमाचल और उत्तराखंड अभी-अभी घूम कर आये होंगे, या अब भी वहीं होंगे या वहां जल्द ही जाने का मन बना रहे होंगे।

उनके लिए बहुत बुरी खबर है कि दावानल से जिम कार्बेच पार्क समेत तमाम अभयारण्य मानवीय माफिया आपदा की भेंट महाश्मशान हैं और वहां भी नगर उपनगर बसाने की तैयारी जोरों पर हैं।

केदार जलआपदा और नेपाल के भूंकप के बाद यह सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है कि हिमालय की गगन घटा गहरानी हरियाली अब सिरे से जलकर खाक है और उत्तराखंड में अब जंगल कोई बचा नहीं है।

फिर भी भारत राष्ट्र और उसके राष्ट्रभक्त बजरंगी धर्मोन्मादी नागरिकों के मुक्तबाजारी कार्निवाल तक मनुष्यता की कोई चीख पहुंच नहीं रही है। सारी इंद्रियां बेदखल हैं।

माफियाराज बंगाल में है तो जंगल राज भी कम नहीं है तो बंगाल में भी सीमेंट के जंगलात जल रहे हैं कि हम लोकतंत्र का महोत्सव मना रहे हैं। भूत बिरादरी के लिए सारे नागरिक विदेशी हैं और उनके खिलाफ चांदमारी से ही भारतमाता की जय जयकार है।

ऐसी चांदमारी तमाम आदिवासी इलाकों में, कश्मीर और मणिपुर में लोकतंतर है और अब उसी लोकतंत्र के दा.रे में बंगाल है।

उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग ने पर्यावरण को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। 4 से 5 महानगर एक साल में जितना पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं, उसकी तुलना में एक से दो घंटे में ही उत्तराखंड की आग ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है।

मौसम वैज्ञानिकों ने कहा कि सूखे पत्तों में लगी आग भीषण तरीके से फैल चुकी है। यह पर्यावरण पर काफी बड़ा खतरा है।

इससे ओजोन परत पर सीधे तौर पर असर पड़ता है।

स्काइमेट के मौसम वैज्ञानिक महेश पलावत ने कहा, ‘उत्तराखंड जैसी घटनाएं ग्लोबल वॉर्मिंग पर और भी ज्यादा असर डालेंगी। इससे ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ेगा और ग्लेशियर पर भी असर पड़ेगा।

बंगाल में जंगलराज में लगी यह आग ग्लेशयरों पर कितना असर करेगी, कह नहीं सकते। लेकिन इसका गहरा असर भारत में लोकतंत्र के भविष्य पर होना है कि कुरुक्षेत्र में ब्रह्मास्त्र से द्रोपदी के पांच पुत्रों की हत्या के पाप से अश्वत्थामा आज भी हमारे बीच अमर है और जख्मी लहूलुहान जिंदगी जी रहा है तो अपने शिशुओं के वध कार्यक्रम के मूक दर्शक भारत के नगरिकों के इस महापाप का हश्र क्या है, इसके बारे में धर्माधिकारी ही कोई वक्तव्य आधिकारिक जारी करें तो बेहतर।

बहरहाल उत्तराखंड के दावानल से ओजोन लेयर पर सीधे तौरपर असर पड़ता है और राज्य में मौजूद ग्लैशियरों पर भी असर पड़ेगा, जो उत्तर भारत की कई नदियों के जन्मदाता हैं। नैनीताल के आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर ऑब्जरवेशनल सायेंसेस (ARIES) और अल्मोड़ा स्थित गोविंद बल्लभ पंत इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन इन्वाइरनमेंट ऐंड डिवेलपमेंट (GBPIHED) ने कहा है कि धुएं और राख में मौजूद कार्बनग्लेशियरों को ढँक रहा है। इससे उन पर बुरा असर पढ़ेगा। ARIES के पर्यावरण विभाग में वरिष्ठ वैज्ञानिक महेश कुमार ने कहा कि आग का असर लंबे समय तक पड़ेगा।

अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की खबर के मुताबिक नैनीताल आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर ऑब्जर्वेशनल साइंसेज के विशेषज्ञों ने कहा है कि इससे नदियां भी प्रदूषित हो सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जंगलों के जलने से होने वाला धुएं की परत ग्लेशियरों पर जमनी शुरू हो गई है। इससे ग्लेशियर जल्दी पिघलना शुरू कर देंगे।

सुनील गंगोपाध्याय मरते दम बांग्लादेश युद्ध के दौरान पाकिस्तानी फौजों की रायफलों की संगीन से बिंधी बच्चे की तस्वीर भूल नहीं सके तो भारत बांगला देश सीमा पर कंटीली बाड़ पर अभी लटकी हुई है फैलानी की लाश। मासूम बच्चों की लाशें अब हमारी जम्हूरियत है।

गुजरात दंगों में गर्भवती मां का पेट चीरकर भ्रूण में ही शिशु की हत्या से जो हिंदू राष्ट्र का भव्य धर्मस्थल बना है, उसकी केसरिया सुनामी की चपेट में धू धू जल रहा है बंगाल और इस वैदिकी हिंसा में भारी पैमाने पर बच्चों की बलि चढ़ाने का लोकतंत्र महोत्सव चल रहा है।

आइसिस के अत्याचारों की तस्वीरों में बच्चे खूब हैं लेकिन भारतीय लोकतंत्र में इतने थोक दर पर बच्चों पर हमले की वारदात अभी तक हुई नहीं है।

दुनिया भर की तमाम सरकारों में एक मात्र काम कर रही मां माटी मानुष की सत्ता में वापसी के रास्ते में लगता हैं कि बंगाल के तमाम बच्चे सबसे बड़े अवरोध हैं।

हाली शहर में ती साल की बच्ची की खाल उतारने की कोशिस के बाद कैनिंग में पोस्टर का पंतग बना देने के खेल करने वाले दस साल के बच्चे को मार मारकर मुर्दा मानकर छोड़ गये सत्ता के पहरेदार तो किसानों ने खेत से उठाकर उसे अस्पताल पहुंचाकर जिंदा बचा लिया।

अब अमन चैन से सख्त नफरत है सत्ता को और बिगड़ैल पुलिस बी सत्ता की हुक्मउदुली पर उतारु है और खैरातखोर तमाम लोग और उनके तमाम कल्ब जनादेश बनाने में नाकाम रहे तो भूत बिरादरी के लिए जनता के प्रतिरोध का जवाब एक ही है कि नाफरमान बिगड़ैल जनता को सबक सिखाने के लिए घर घर धावा बोलकर बच्चों का खून बहाया जाये और बंगाल में फिलहाल यही लोकतंत्र महोत्सव है।

गनीमत है कि कंस मामा का अवतार हुआ नहीं है अभी और गोकुल के हर बच्चे को मारने का फतवा फिलहाल जारी नहीं है लेकिन बांग्लादेश मुक्तियुद्ध से पहले जितने बलात्कार हुए, उसी तर्ज पर सत्ता की बहाली के लिए बंगाल में हाल के वर्षों में बलात्कार कार्निवाल कम नहीं हुआ है तो अब लगता है कि संगीनों की नोंक पर फंसाकर बच्चों की चीखों से पैदा होने वाली दहशत का माहौल भी जरुरी है।

लियोन युरिस का मिला 18 में फासिज्म के राजकाज में मनुष्यता का वह लहूलुहान चेहरा सियासी जंग में बंगाल का असल चेहरा है।

आनंदबाजार पत्रिका में प्रकाशित इन दो खबरों को साथ साथ पढ़ें और अपनी अंतरात्मा से पूछें कि हम बच्चों के लिए इस पृथ्वी को कितना सुरक्षित, कितनी बेहतर छोड़ रहे हैं।

একের পর এক হামলা শাসক দলের, রেহাই নেই দুধের শিশুরও

ঈশানী পাত্র, প্রীতি বর, মণিতা মাইতি, সুমনা দিগার…ক্রমেই দীর্ঘ হচ্ছে শাসক দলের দুষ্কৃতীদের হাতে আক্রান্ত শিশুর সংখ্যা। ভোটের পরে বিরোধী সমর্থকদের বাড়িতে চড়াও হওয়া তৃণমূল কর্মীরা ছাড় দিচ্ছে না এমনকী দুধের শিশুকেও।

ফের গণতন্ত্রের অগ্নিপরীক্ষা

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