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इस देश को न हिंदुत्व का महागठबंधन तोड़ सकता है और न फासिज्म का मुक्तबाजारी नफरत और नरसंहार का एजेंडा।

भारतीय सिनेमा अब प्रतिरोध में है
वैज्ञानिक साथ हैं, युवाशक्ति भी साथ
पलाश विश्वास
HOKOLOROB as we stand Divided, Let us unite to save Humanity and Nature!

केसरिया सत्ता अब छात्रों को भी नहीं बख्शेगी!

जाग मेरे मन मछंदर jaag mere man machhandar

हमने अस्कार विजेता फिल्मकार गुलजार के बयान की नफरत की इस आंधी के खिलाफ विरोध का रास्ता एक ही है कि पुरस्कार लौटा दिये जाये, पर अंग्रेजी में हस्तक्षेप पर लिखते हुए उम्मीद जताई थी कि भारतीय सिनेमा के इतिहास और देश की एकता और अखंडता के प्रति उसकी अटूट प्रतिबद्धता के मद्देनजर उम्मीद है कि सारे फिल्मकार और कलाकार देश की बहुलता और विविधता और हमारे तमाम पुरखों की विरासत के मुताबिक अपने लबों की आजादी को देर सवेर अभिव्यक्ति देंगे।
सिर्फ गुलजार क्यों, जाने माने फिल्मकार महेश भट्ट ने भी पुरस्कार लौटाने का समर्थन कर दिया है।यही नहीं, मशहूर फिल्मकार महेश भट्ट ने शिवसेना की धमकी के बाद यहां पाकिस्तानी ग़ज़ल उस्ताद ग़ुलाम अली का संगीत कार्यक्रम रद्द किए जाने की निंदा की है। लबों पर पहरे के खिलाफ हैं वे।
हमें खुशी है कि दस फिल्मकारों ने पहल की है फिलहाल। ताजा खबरों के मुताबिक जाने माने फिल्मकारों दिबाकर बनर्जी Dibakar Banerjee , आनंद पटवर्धन और आठ अन्य लोगों ने बुधवार को एफटीआईआई के आंदोलनकारी छात्रों के साथ एकजुटता प्रकट करते हुए और देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटा दिए।
बनर्जी और अन्य फिल्मकारों ने कहा कि उन्होंने छात्रों के मुददों के निवारण और बहस के खिलाफ असहिष्णुता के माहौल को दूर करने में सरकार की ओर से दिखाई गई उदासीनता के मद्देनजर ये कदम उठाए हैं।
बनर्जी ने कहा,  ‘मैं गुस्से,  आक्रोश में यहां नहीं आया हूं। ये भावनाएं मेरे भीतर लंबे समय से हैं। मैं यहां आपका ध्यान खींचने के लिए हूं। ‘खोसला का घोसला’ के लिए मिला अपना पहला राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाना आसान नहीं है। यह मेरी पहली फिल्म थी और बहुत सारे लोगों के लिए मेरी सबसे पसंदीदा फिल्म थी।’
उन्होंने कहा,  अगर बहस,  सवाल पूछे जाने को लेकर असहिष्णुता और पढ़ाई के माहौल को बेहतर बनाने की चाहत रखने वाले छात्र समूह को लेकर असहिष्णुता होगी,  तो फिर यह असहिष्णुता उदासीनता में प्रकट होती है। इसी को लेकर हम विरोध जता रहे हैं।
जाने माने डाक्यूमेंट्री निर्माता आनंद पटवर्धन Anand Patwardhan ने कहा कि सरकार ने अति दक्षिणपंथी धड़ों को प्रोत्साहित किया है।
उन्होंने कहा,  मैंने इस तरह से एक समय पर बहुत सारी घटनाएं होती नहीं देखी हैं। क्या होने वाला है,  यह उसकी शुरूआत है और मुझे लगता है कि पूरे देश में लोग अलग अलग तरीकों से प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
एफटीआईआई के छात्रों ने बुधवार को अपनी 139 दिनों पुरानी हड़ताल खत्म कर दी,  हालांकि वे संस्थान के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति का विरोध और उनको हटाने की मांग जारी रखेंगे।
सबसे बड़ी बात है कि बंगाल में मंदाक्राता के बाद युवा फिल्मकार दिवाकर बनर्जी ने भी पुरस्कार लौटा दिये हैं।
हम उम्मीद करते हैं कि सत्यजीत राय और ऋत्विक घटक नहीं रहे तो क्या मृणाल सेन, गौतम घोष, बुद्धदेव गुह, अपर्णा सेन, व दूसरे लोग बाकी देश के साथ खड़े होंगे।
बंगाल के कवियों और लेखकों की तरह शुतुरमुर्ग की तरह आंधी के गुजर जाने का इंतजार नहीं करेंगे।
हमें उम्मीद है कि एंग्री यंगमैन की भूमिकाओं में सत्तर दशक के छात्रों और युवाओं के गुस्से और मोहभंग को अभिव्यक्ति देने वाले अमिताभ बच्चन,  सिनेमा की नई लहर के दिग्गज श्या बेनेगल, शबाना आजमी और लोकप्रिय सिनेमा के आमिर खान, शाहरुख खान, महेश भट्ट, सलमान खान, जावेद अख्तर, रजनीकांत, चिरंजीवी के साथ साथ अदूर गोपालकृष्णन, मोहनलाल जैसे हस्ती जब बोलेंगे तो केसरिया सुनामी बीच समुंदर दफन हो जायेगी।
हमें खुशी है कि जय भीम कामरेड और राम के नाम जैसी रचनाओं के जरिये लाल नील एकता के लिए लगातार अभियान चला रहे हमारे प्रिय फिल्मकार पुरस्कार लौटाने वाले निर्देशकों में खास चेहरा हैं।
हमारे मित्र जोशी जोसेफ के वे खास दोस्त हैं और इस नाते उनसे हमारा भी कुछ नाता है, जो आनंद भी मानते हैं।
वे डा.आनंद तेलतुंबड़े के भी अखंड मित्र हैं।
हम सारे लोग सर्वहारा बहुजन निनान्ब्वे फीसद भारतीय आम जनता की मोर्चाबंदी की कोशिश में है।
देश दुनिया को जोड़ने में अमनचैन और मुहब्बत का संदेश देने में भारतीय सिनेमा का अखंड योगदान है।
भारतीय सिनेमा ने हमेशा देश दुनिया को जोड़ा है और मजहबी सियासत ने देश दुनिया को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
मजहबी सियासत बंटवारे की साजिशों, सौदेबाजियों, मुक्तबाजार की बेशर्म दलाली और नरसंहार संस्कृति की बुनियाद पर ही केसरिया सुनामी में तब्दील है और नवउदारवादी हिंदुत्व का यह फर्जी पुनरुत्थान दरअसल देश को अमेरिकी उपनिवेश बनाने का अबाध पूंजी, संपूर्ण निजीकरण का बेलगाम उपक्रम है और इसीलिए शिक्षा, उच्च शिक्षा और शोध को क्रयशक्ति के साथ नत्थी करके युवाशक्ति की हत्या का यह चाकचौबंद इंतजाम हैं। यह राष्ट्र के विवेक का संहार, महिषासुर वध है।
देवि सर्वत्र पुज्यंते अब संपूर्ण पितृसत्ता है और महिलाएं अभूतपूर्व सशक्तीकरण औरअंतरिक्ष में उड़ान के बावजूद घर बाहर उत्पीड़न औरबलात्कार की शिकार हैं तो बच्चे बंधुआ मजदूर हैं।
यह धर्म नहीं है। सिरे से अंत तक अधर्म है। अनैतिकता है।
तमसो मा ज्योतिर्गमय और उतिष्ठित जाग्रत और सत्वमेव जयते के सनातन हिंदुत्व का दसदिगंत सर्वनाश है और हर हिंदू को इस आत्मध्वंस के हिंदुत्व एजेंडे के खिलाफ खड़ा होना चाहिए क्योंकि सनातन धर्म का कोई संकट नहीं है और न सात सौ साल के इस्लामी शासन और दो सौ साल के ब्रिटिश राज के बावजूद सनातन हिंदुत्व का कभी अवसान हुआ है।
वैदिकी हिंसा जारी है, मनुस्मति शासन जारी है, नस्ली रंगभेद जारी है, अश्वमेध और राजसूय जारी है लेकिन लोक और जनता में हिंदुत्व मरा नहीं है।
यह केसरिया सुनामी फर्जी पुनररुत्थान के जरिये देश में युद्ध और गृहयुद्ध के मार्फत एक फीसद अरबपति करोड़ पति सत्तावर्ग के वर्चस्व और बेलगाम मुनाफावसूली, सांढ़ों को छुट्टा खोलकर हर कहीं चक्रव्यूह रचकर एकांतवासी नागरिकों को अलग-अलग अभिमन्यु की तरह मारने की जहरीली साजिश है।
कल रात लगातार आंदोलनकारी छात्रों की लाइव स्ट्रीम आज के प्रवचन के लिए सहेजते हुए, नवारुण दा को देखते सुनते हुए हमें सबसे अच्छा लगा मेरे भाई दिलीप मंडल और दूसरे नील साथियों का आंदोलनकारी छात्रों के हक में दीवार लेखन जारी करते हुए। वह लाइव स्ट्रीम हमने अपने प्रवचन के साथ जारी कर दिया है।
खुशी की बात है कि अब आरक्षण की लड़ाई में भंग हुई छात्र युवा एकता फिर सही रास्ते पर है और अब फासिज्म के चारों खाने चित्त हो जाने का सबसे पवित्र शुभमुहूर्त हैं। इसे बेकार न जाने दें।
हमें इंतजार है होक कलरवकी सिंह गर्जना की।
नवारुण भट्टाचार्य इस लाल नील जनता के प्रतिरोध और उनके गुरिल्ला युद्ध के समामाजिक यथार्थ के प्रवक्ता रहे हैं  तो आज हमने अपने प्रवचन के साथ ओकुपाई यूजूसी आंदोलनकारियों की ओर से जारी उनके साक्षात्कार का विडियो भी जारी किया है, जिसमें उनने ऋत्विक घटक की तमाम फिल्मों का विश्लेषण के साथ अंतरंग संस्मरण सुनाते हुए भारतीय सिनेमा और तमाम माध्यमों, विधाओं की रचना प्रक्रिया और उनमें सामाजिक यथार्थ और बदलाव की ताकतों के अटूट समर्थन और भारतीय जनता की गोलबंदी एई मृत्यु उपत्यका आमार देश नय, की आवृत्ति के साथ अभिव्यक्त की है।
कल देर रात तक हम नवारुण दा के मुखातिब थे और आज ही भारतीय सिनेमा ने दिखा दिया कि उसकी हैसियत फासिज्म से कहीं ज्यादा है।
मेरा प्रवचन भले आप न सुनें, लेकिन नवारुण दा को जरुर सुनें ताकि समझ सकें कि सत्तर दशक में छात्र युवाशक्ति किस हद तक राष्ट्र व्यवस्था में बदलाव के लिए सक्रिय रहा है जनता के बीचोंबीच, खेतों और खलिहानों में, जंगल में, पहाड़ों में और वह विडंबना भी समझ लें कि आरक्षण और आरक्षण विरोधी दो खेमों में बंटकर कैसे समूची छात्र युवाशक्ति केसरिया बजरंगी, सोशल नेटवर्किंग, विजेट, गेजेट, व्हाट्स अप,  ऐप्पस वगैरह वगैरह है और ज्ञान की खोज के बजाय तकनीकी चकाचौंध के आत्मध्वंस पर तुली है।
दिल्ली में फासिज्म के खिलाफ उमड़ती छात्रों युवाओं का हुजूम और प्रतिरोध में खड़े लेखक,  कवि,  कलाकार,  फिल्मकार,  समाजशास्त्री, वैज्ञानिक इस देश को तबाह होने से फिर बचा लेंगे, इसकी हमें पक्की उम्मीद है।
वरना केरल हाउस पर छापा मारने वाले बजरंगी किसी भी दिन अमेरिकी, ब्रिटिश, रूसी, जर्मन, फ्रेंच समेत विकसित देशों औरतमाम इस्लामी देशों में छापा मारते हुए गोरक्षा आंदोलन के अरब वसंत के तहत भारत को जलते हुए तेलकुंआ में तब्दील कर देंगे और हमें नदियों, झीलों, समुंदर के किनारे आईलान की लाश नसीब होगी या हम खुद जलते हुए तेल में छटफटाते हुए पंछी में तब्दील होंगे और इंसानियत, भाईचारे, मुहब्बत का यह बेमिसाल मुल्क, भारत तीर्थ अपनी अर्थव्यवस्था, उत्पादन प्रणाली और राजनीति की तरह तबाह हो जायेगा।इस कयामत के मंजर के खिलाफ खड़ा होना सियासती या मजहबी नहीं, इंसानियत का, कायनात का तकाजा है।
सिनेमा की वजह से ही हिंदी देश विदेश में दुनिया भर में इतनी लोकप्रिय है और उसी में हमारी बोलियां, हमारा लोक जिंदा हैं

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