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ईश्वर या राष्ट्र के लिए युद्ध जरूरी हो भी सकते हैं, लेकिन युद्धोन्माद जरूरी नहीं

ईश्वर या राष्ट्र के लिए युद्ध जरूरी हो भी सकते हैं, लेकिन युद्धोन्माद जरूरी नहीं
ईश्वर और राष्ट्र की सुरक्षा की चिंता सबको है,मनुष्यों और प्रकृति के लिए सरदर्द किसे है?
बुनियादी सवाल यह है कि दरअसल क्या हम कोई राष्ट्र हैं?
सबिता बिश्वास
मिथकों की बात ही करें तो मर्यादा पुरुषत्तम श्रीराम सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ ईश्वर हैं।
श्रीकृष्ण ही इस ब्रह्मांड का सबकुछ नियंत्रित करते हैं और जब भी धर्म संकट में हो तो वे भिन्न भिन्न अवतार में प्रगट होकर संकट से मनुष्यों को मुक्ति देते हैं और मनुष्य निमित्त मात्र हैं।
चंडी के तमाम रtप दुर्गा और काली जिनमें प्रमुख हैं, वे अकेले दम युद्ध जीतने में सक्षम हैं। तो शिव सृष्टि और ध्वंस दोनों में समर्थ हैं।

मिथकों पर यकीन करें तो वे इतने असुरक्षित हो ही नहीं सकते कि उनकी रक्षा के लिए किसी वानरसेना की जरुरत आन पड़ी हो।
फिर राष्ट्र भी ईश्वर से कम शक्तिशाली नहीं होता। वह सार्वभौम है।
सामाजिक यथार्थ और वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक दृष्टि के बिना ये मिथक ही हमारे धर्म कर्म और राष्ट्रवाद हैं।
हम निरपेक्ष किसी विमर्स के लोकतंत्र के खिलाफ फासिज्म के राजकाज में वानरसेना हैं।
ईश्वर के  दर्शन के लिए तो दिव्यदृष्टि अनिवार्य है लेकिन आधुनिक मनुष्यता राष्ट्र से ही नियंत्रित है।
हम रोजमर्रे की जिंदगी में कदम-कदम पर उस राष्ट्रशक्ति का दर्शन करते रहते हैं।
राष्ट्र का सैन्यबल किसी ईश्वर या उनके अवतार से कम नहीं है। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए उसकी सैन्यशक्ति पर्याप्त है।
सीमा पर इस सैन्यशक्ति और ताबूत में तिरंगे में लिपटी शहादत के राष्ट्रवाद के अलावा आदिवासी भूगोल, बहुजन जीवन यापन, स्त्री संसार के विरुद्ध जो दमन उत्पीड़न का अबाध सिलसिला है, मनुष्यता और लहबलुहान प्रकृति की जो चीखें और उनके जो जख्म हैं, उन्हें न हम देखते हैं और न कानों में मोबाइल ठूसंने से बेकल हमारी इंद्रियों को वे आवाजें कहीं स्पर्श करती हैं।
ईश्वर या राष्ट्र के लिए युद्ध जरूरी हो भी सकते हैं, लेकिन युद्धोन्माद जरूरी नहीं है।
कुल मिलाकर युद्ध भी एक विज्ञान है,तकनीक है और युद्धतंत्र की गोपनीयता सार्वजनिक नहीं होती। होती है तो उस युद्धतंत्र के ध्वस्त हो जाने का खतरा है।
राष्ट्र और ईश्वर की सुरक्षा के लिए किसी राजनीति की जरुरत नहीं होती बल्कि राजनीति ही ईश्वर और राष्ट्र का इस्तेमाल सत्तावर्ग के हितों के मुताबिक करता है। जिसके बलि होते हैं नागरिक स्त्री पुरुष, युवाजन और बच्चे, मनुष्यता और प्रकृति।
फिर युद्ध की राजनीति ही राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सबसे खतरनाक होती है। पूर दुनिया युद्ध की राजनीति से पैदा हुए आतंकवाद से पल दर पल लहूलुहान है और दुनिया की आधी आबादी इस वक्त शरणार्थी हैं।
हम सारी दुनिया में अपनी मुट्ठी में रखने वालो लोगों को इसकी खबर है। परवाह लेकिन हमें नहीं है। इसलिए हम युद्ध के इस तरह दीवाने हैं।
युद्ध के न हो तो हम जैसे जी ही नहीं सकते। इसलिए हमें हर कीमत पर युद्ध चाहिए। हम बच्चों को भी युद्धक बना रहे हैं।
दरअसल हम ईश्वर और राष्ट्र को लेकर जरुरत से ज्यादा राजनीति कर रहे हैं और यह कयामती फिजां की असल वजह यह है कि मुक्तबाजार में ईश्वर और राष्ट्र की भक्ति के कारोबार में मुनाफा बहुत ज्यादा है और सूचना महाविस्फोट के बाद सोशल मीडिया के सौजन्य से कारपोरेट मीडिया की युगलबंदी से राष्ट्र और ईश्वर की मार्केटिंग विशुद्ध उपभोक्ता वस्तु और स्त्री देह की गोरी त्वचा से ज्यादा संक्रामक है।यह वाइरल है।
राष्ट्र का मतलब कंटीली सीमाओं में कैद कोई भूगोल नहीं है या धर्म ग्रंथ, धर्म स्थ्ल या इतिहास भी राष्ट्र नहीं है।
राष्ट्र का मतलब है राष्ट्र की विविधता और बहुलता के बावजूद उसकी एकता और अखंडता में अभिव्यक्त होने वाली एकात्मकता।
राष्ट्र को सीमा पार से मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए हमारे पास सर्वश्रेष्ठ सैन्यशक्ति है और शत्रुओं के मुकाबले के लिए हमारे पास परमाणु शक्ति और उसे दुश्मन के भूगोल पर बरसाने वाले प्रक्षेपास्त्र भी हमारे पास हैं।

हमारे जवान दिन रात सीमाओं पर चाकचौबंद हैं कि कोई पंछी भी पर मार न सकें। सीमापार भी ऐसी ही तैयारी है।
बुनियादी सवाल यह है कि किसी राष्ट्र की सैन्यशक्ति क्या उसकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त है जबकि वह भीतर ही भीतर हजार लाखों टुकडों में बंटा हुआ है और खंड-खंड राष्ट्र और राष्ट्रीयता  एक दूसरे के खिलाफ एक दूसरे को खत्म करने के लिए अविराम कुरुक्षेत्र रचकर आत्मध्वंस पर आमादा हो?
बुनियादी सवाल यह है कि दरअसल क्या हम कोई राष्ट्र हैं?
राष्ट्र के सर्वशक्तिमान होने या सर्वश्रेष्ठ सैन्यबल होने के बावजूद महाबलि अमेरिका इतना असुरक्षित नहीं होता कि जब चाहे तब वहां सख्त से सख्त ऐहतियाती इंतजाम होने के बाद मनुष्यता लहूलुहान हो जाती है और किसी ट्विन टावर के ध्वस्त हो जाने पर उसे अपनी समूची युवापीढ़ी को तेल के कुंऔं की आग में झोंक देना पड़ता है।

अमेरिकी उस युद्धोन्माद का ताजा चेहरा डोनाल्ड ट्रंप है,जो हमारा आईना है।
इस देश में भी सीमाएं अक्षुण्ण हैं लेकिन मुंबई नई दिल्ली जैसे महानगर, राज्यों की राजधानियों या हमारे धर्मस्थलों पर जब तब हम मनुष्यता पर हमला होते देख रहे हैं।
बुनियादी सवाल यह है कि राष्ट्र को सुरक्षित रखने की राजनीति जो हम कर रहे हैं, उसमें राष्ट्रहित कितना है, राजनीतिक हित कितने हैं, वोटबैंक और चुनावी समीकरण कितने हैं, देशी विदेशी कारपोरेट हित कितने हैं। जन हित कितने हैं।

बुनियादी सवाल यह है कि राष्ट्र को सुरक्षित रखने की राजनीति और कारोबार में मनुष्यता और प्रकृति कितनी सुरक्षित है।
बुनियादी सवाल यह है कि हम राष्ट्र को विखंडित होने से बचाने के लिए अपनी विविधता बहुलता की सांस्कृतिक विरासत की एकात्मता कितनी बचा पा रहे हैं। हमारी अभ्यंतरीन सुरक्षा की सेहत कैसी है।
विडंबना है कि ऐसी किसी विमर्श की गुंजाइश इस धर्मोन्मादी युद्धोन्माद में नहीं है जिसमें हम सिर्फ ईश्वर या राष्ट्र की सुरक्षा की सोच रहे हैं, नागरिक मनुष्यों और प्राकृतिक संसाधनों, जलवायु, मौसम और पर्यावरण की हमें कोई चिंता सिरे से नहीं है।
जैसे अमेरिका युद्ध और गृहयुद्ध लगातार जीत रहा है और सबसे शक्तिशाली राष्ट्र वही है, बल्कि दुनिया भर के राष्ट्र उसके उपनिवेश हैं, लेकिन अमेरिका के पचास गणराज्यों में आबादी रंगभेदी गृहयुद्ध से अभी तक उबरा नहीं है और अमेरिकी राष्ट्रवाद के तहत अमेरिकी उपनिवेश बनकर अपनी जाति व्यवस्था के चिरस्थाई मनुस्मृति बंदोबस्त के तहत हम उसी रंगभेद को स्त्रियों, बच्चों, दलितों, युवाजनों, पिछड़ों, आदिवासियों, शरणार्थियों, बहुजनों, मेहनतकशों, किसानों, अल्पसंख्यकों और आम जनता के खिलाफ सैन्यबल और उसके दमनात्मक तंत्र के तहत सत्तावर्ग के रंगभेदी वर्चस्व के लिए लागू करते जा रहे हैं।

विडंबना यही है कि इस युद्धतंत्र को बहुमत का समर्थन भी है।
देश के भीतर पल दर पल हम एक दूसरे के खिलाफ गृहयुद्ध लड़ रहे हैं और अपनों के ही दमन के लिए अपने राष्ट्र की सैन्यशक्ति का दूसरे जनसमूहों के खिलाफ उनके नागरिक और मानवाधिकार के हनन के लिए, प्राकृतिक संसाधनों की अबाध लूट खसोट के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
प्रकृति, मौसम और जलवायु को जख्मी कर रहे हैं। जंल जंगल जमीन और आजीविका छीन रहे हैं।
देश के कोने कोने में रोज स्त्री का उत्पीड़न हो रहा है। स्त्री देह का कारोबार फल फूल रहा है और बलात्कार का उत्सव हम मना रहे हैं।

संविधान कहीं लागू नहीं है। कानून का राज कहीं नहीं लागू है।
उत्पीड़ितों की सुनवाई कहीं नहीं है।
हम भ्रूण हत्या और बंधुआ बाल मजदूरी ,बाल विवाह का सिलसिला जारी रखे हुए हैं।
लाखों किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हैं और देश में भुखमरी के भूगोल का विस्तार लगातार हो रहा है।
मानव तस्करी सबसे बड़ा कुटीर उद्योग है।
बेरोजगार युवाजनों को नशा के फंदे में मरने के लिए हमने छोड़ा है।
हमारे बच्चे रोबोट में तब्दील हैं।
इन बुनियादी मुद्दों से निबटने के बजाय हम परमाणु युद्ध के लिए बेसब्र हैं और हमें होश नहीं है कि युद्ध या गृहयुद्ध हमेशा शासक के हित में होते रहे हैं और सर्वनाश सिर्फ मनुष्यों और प्रकृति का होता है।
हमें राष्ट्र की चिंता है,नागरिकों की कोई चिंता नहीं है।
सीमा पर तनाव की वजह से पंजाब समेत सीमावर्ती राज्यों के गांव खाली कराये जा रहे हैं और अपने ही देश में लाखों परिवार हमारे युद्धोन्माद की वजह से घरबार खेतीबाड़ी संपत्ति छोड़कर रातोंरात शरणार्थी बन गये हैं।
सचमुच युद्ध टल नहीं सका और वह युद्ध परमाणु युद्ध हुआ तो परमाणु विश्वंस के रेडियोएक्टिव चुल्हों की आग कहां-कहां धधकने वाली है और कितने करोड़ लोग मारे जायेंगे, हमें इसकी कोई चिंता नहीं है।

शांति की बात जो कर रहे हैं, सीमाओं के आर-पार वे राष्ट्रद्रोही करार दिये जा रहे हैं।
चीन ने ब्रह्मपुत्र को हथियार के तौर पर हमारे खिलाफ इस्तेमाल करने की पूरी तैयारी कर ली है और यह जलयुद्ध देश के भीतर कृष्णा कावेरी जलविवाद हैं तो विध्वंसक बड़े बड़े बांध हिमालय से लेकर समुंदर के मुहाने तक बनाकर हमने तबाही के सारे सामान जुटा लिये हैं।
अब इसी युद्धोन्माद के तहत हम प्राकृतिक संसाधनों और जलसंसाधनों को हथियार बनाने की धमकी दे रहे हैं तो ब्रह्मपुत्र को रोकने की चीन की विध्वंसक कार्रवाई का विरोध हम कैसे करेंगे।

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