Home » उतार-चढ़ाव भरा है लोकपाल बिल का इतिहास

उतार-चढ़ाव भरा है लोकपाल बिल का इतिहास

डॉ आशीष वशिष्ठ

 
आजकल जिस लोकपाल बिल की चर्चा आज देश  भर में हो रही है वो लोकपाल बिल आज से लगभग चार दशक पूर्व ही पैदा हो चुका था। लोकपाल बिल के प्रारूप और निर्माण को लेकर आ चाहे भले ही सरकार और सिविल सोसायटी के बीच घमासान मचा हो लेकिन असल में इस बिल की संकल्पना, प्रारूप और रूपरेखा हमारे नेताओं ने काफी पहले ही खींच दी थी। लेकिन सरकार की उदासीनता, नौकरशाहों  की काम टालू प्रवृत्ति और खुद को कानून से फंदे से बचाने के लिए नेताओं ने लोकपाल बिल को फुटबाल बना डाला। कई दफा राज्यसभा और लोकसभा में पेश होने के बावजूद भी ये बिल अभी तक सरकारी फाइलों में इधर-उधर धक्के और ठोकरें खाने को मजबूर है। आजादी के डेढ दशक के भीतर ही देश में बढ़ती भ्रष्टाचार की समस्या के प्रभावशाली  समाधान के लिए देश के प्रमुख व्यक्तियों और न्यायविदों ने ओम्बडसमैन जैसी किसी संस्था को भारत में भी विकसित करने की मांग शुरू  कर दी। प्रशासनिक सुधार आयोग ने इस मुद्दे पर गहन रूप् से विचार किया और 1966 में इसने अपने  विचार  इन शब्दों में व्यक्त किए ‘हम सोचते हैं कि देश की विषिष्ट परिस्थितियों के मद्देनजर देश की जनता की शिकायतों  को दूर करने लिए दो विशेष  संस्थाओं के प्रावधान काफी प्रभावशाली  और पर्याप्त साबित होंगे। एक ऐसी संस्था का गठन हो जो केन्द्र और राज्य के मंत्रियों और सचिवों के प्रशासनिक कार्यों की जांच करे। साथ ही, एक दूसरी संस्था का भी गठन हो जो केन्द्र और राज्यांे के अन्या अधिकारियों/कर्मचारियों के प्रषासनिक कार्यों की जांच करे। इन सभी संस्थााओं को कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका से स्वतंत्र होना चाहिए।’ पहली संस्था को लोकपाल के नाम से तथा दूसरी संस्था को लोकायुक्त के नमा से जाना जाए। दुर्भाग्य का विषय है कि भारत में लोकपाल की सृष्टि दीर्घकाल से टलती जा रही है, यद्यपि इस दिशा  में ठोस कदम उठाने का दिखावा अवष्य किया जाता रहा है। देश के लोक प्रशासन  में तेजी से फैलते भ्रष्टाचार के प्रति सरकार की बढ़ती उदासीनता के कारण ‘ओम्बड्समैन’ के प्रकार की किसी संस्था की स्थापना के लिए 1966 से ही हवा बह निकली थी। प्रशासनिक सुधार आयोग ने, जो 1966 में मोरारजी देसाई की और बाद में के. हनुमन्थैया की अध्यक्षता में गठित किया गया था, शिकायतों  के समाधान की आवष्यकता को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की थी। इस आयोग ने अपने प्रथम प्रतिवेदन में ही लोकपाल एवं लोकायुक्त के द्विस्तरीय तंत्र की स्थापना की संस्तुति की थी। इस विधेयक की मूल अवधारणा है ऊंचे पदों पर विराजमान व्यक्तियों को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाना और उनके विरूद्व लगे आरोपों की जांच रकने के लिए एक स्वतंत्र मशीनरी  का प्रावधान करना। भारत सरकार ने प्रशासनिक सुधार आयोग की इस सिफारिश को स्वीकार करते हुए पहली बार 9 मई, 1968 को संसद में लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक प्रस्तुत किया था ।

लोकपाल के लिए की गयी प्रथम संस्तुति को चार दशक से अधिक समय व्यतीत हो चुका है और फिर भी, काफी ढोल पीटने के बावजूद, लोकपाल का प्रादुर्भाव नहीं हो पाया है। लोकपाल विधेयक का काफी उतार-चढ़ाव वाला लम्बा इतिहास है। ‘जन शिकायतों के निवारण की समस्या’ पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट में प्रशासनिक सुधार आयोग ने 1966 में ‘लोकपाल और ‘लोकायुक्त’ के गठन की सिफारिश की। ‘लोकपाल’ और ‘लोकायुक्त’  ‘ओम्बडसमैन’ शब्द के हिन्दी नाम हैं। ‘ओम्बडसमैन’ एक स्कैन्डिनेवियन संस्था है जिसकी स्थापना पहली बार स्वीडेन में 1809 में अन्याय, भ्रष्टाचार और पक्षपात की जांच करने के लिए की गई थी। भारत में लोकपाल विधेयक पर संसद की स्वीकृति पाने के लिए अब तक नौ बार कोशिश  की गई है (1968, 1971, 1977, 1985, 1990, 1996, 2001, 2005 और 2008 ), लेकिन ऐसा नहीं हो सका। कभी लोकसभा भंग हो गई, तो कभ्ज्ञी विधेयक की समय सीमा समाप्त हो गई। 1985 में न तो लोकसभा भंग हो गई और न ही विधेयक को वापस ले लिया गया । विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने की पीछे नेताओं का सिर्फ एक उद्देष्य था-जनता में यह धारणा बनाना कि वे (राजनीतिक दल) अपने चुनावी वादों के प्रति निष्ठावान हैं। इस विधेयक के बार-बार निरस्त होने की वजह थी प्रशासनिक प्रवृत्त्यिा और राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव। लोकपाल की नियुक्ति के लिए आवश्यक  कानून बनाने का वर्तमान प्रयास दसवां होगा। अभी तक ग्यारह राज्यों ने लोकायुक्त की नियुक्ति की है, परन्तु उनके अधिकार तथा प्रभाव भिन्न-भिन्न हैं। इस विषय पर कर्नाटक का कानून आदर्ष प्रतीत होता है।

सत्ता में आने के तुरंत बाद जनता पार्टी की सरकार ने देश के सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लोकपाल नाम अधिकारी की स्थापना का वचन दिया था। प्रथम जनता सरकार (1977-79) ने जुलाई 1977 में लोकसभा में प्रस्तुत अपने लोकपाल बिल में भारत के प्रधानमंत्री को भी लोकपाल की जांच की परिधि में लाने का प्रस्ताव किया था। स्मरणीय है कि 1966 में प्रशासकीय सुधार आयोग ने प्रथम बार भारत में ‘ओम्बुड्समैन’ जैसी संस्था की स्थापना का सुझाव दिया था। तत्कालीन शासन  इस प्रकार की संस्था की स्थापना के संबंध में काफी समय तक उदासीन रहा लेकिन 1971 में उसने लोकसभा में ‘लोकपाल विधेयक’ प्रस्तुत किया, किंतु लोकसभा के विघटन के साथ ही यह विधेयक स्वतः ही समाप्त हो गया। इस विधेयक में प्रधानमंत्री के विरूद्व आरोपों की जांच के संबंध में कोई व्यवस्था नहीं थी। जनता सरकार ने जुलाई 1977 में लोकसभा में यह विधेयक प्रस्तुत किया। इस विधेयक की दो प्रमुख विषेषताएं थीं- प्रथम, प्रधानमंत्री भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं है अर्थात् प्रधानमंत्री के विरूद्व भ्रष्टाचार के आरोप की जांच करने का अधिकार लोकपाल को प्रदान किया गया था। यह व्यवस्था सर्वथा उचित है। आपातकाल के दौरान जो अनुचित कार्य हुए थे, उन्हें देखकर यह नितांत आवश्यक  था कि स्वच्छ प्रशासन की दृष्टि से प्रधानमंत्री के मामले में भी लोकपाल को जांच का अधिकार दिया जाय। दूसरा, जांच करने के लिए लोकपाल की अपनी स्वयं की प्रशासनिक व्यवस्था होगी। इसका अर्थ यह है कि लोकपाल को अपने कार्यों के लिए नियमित शासन -तंत्र पर निर्भर रहने की आवश्यकता  नहीं रहेगी। सरकार ने कुछ ढुलमुलपन के बाद इन सिफारिषों को मान लिया ओर लोक सभा में लोकपाल विधेयक पेश कर दिया। संसद भंग कर दिये जाने के साथ ही यह विधेयक समाप्त हो गया। प्रधन मंत्री का पद इस विधेयक के क्षेत्र से बाहर रखा गया था। विडम्बना यह है कि किसी भी सरकार ने लोकपाल संबंधी प्रस्ताव का सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं किया है, और फिर भी इसे आवष्यक कानून बनाने के लिए सक्रियता नहीं दिखायी है।

वर्तमान में विष्व के 70 से अधिक देशों  मे ओम्बड्समैन (लोकपाल) नामक व्यवस्था भ्रष्टाचार के विरूद्व सफल प्रयोग मानी गई है। कुछ देशों में तो लोकपाल संस्था ने भ्रष्टाचार उन्मूलन में आगे जाकर मानवधिकारों की रक्षा और आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र की विसंगतियों से जूझने की भी पहल की है। भारत में भ्रष्टाचार के खात्मे के सुझाव देने के लिए बनी संथानम समिति की यह एक प्रमुख सिफारिश थी कि लोकपाल एवं लोकायुक्त का गठन किया जाए ताकि आर्थिक अनियमिताओं विषेषकर राजनीतिक भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सके। लेकिन यहां लोकपाल बिल पिछले चालीस वर्षों संसद में पास होने की बाट जो रहा है। वास्तविकता यह है कि दिनों-दिन भ्रष्टाचार सिर चढ़ कर बोलने लगा है। आजादी के बाद अगर घोटालों, कांड़ांे और घपलों का इतिहास खंगाला जाए तो कदम-कदम पर विधायिका  ही गुनाहगारों के साथ खड़ी दिखाई देती है। विधायिका को भली-भांति मालूम है कि अगर देश में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए लोकपाल की व्यवस्था होगी तो उसकी गर्दन नपना तय ही है। ऐसा भी नहीं है कि कोई एक ही दल लोकपाल पर टालमटोल कर रहा है पिछले चालीस सालों में कई दलों की सरकारें आई और गई लेकिन मजबूत और कड़े लोकपाल की पहल किसी भी राजनीतिक दल ने नहीं की। समाजसेवी अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल बिल की मसौदा समिति में सिविल सोसायटी को शामिल  करवा कर एक सख्त कानून और लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने की जो मुहिम चलाई है वो सिफारिशे  किसी भी दल को मंजूर नहीं हैं।

असल में सरकार ने प्रस्तावित बिल का जो ड्राफ्ट तैयार किया है उसके अनुसार प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है। इसके अलावा लोकपाल की चयन समिति में पांच सत्ताधारी पक्ष के होंगे और सात राजनीतिक नुमाइंदे होंगे। लोकपाल को हटाने का भी अधिकार सरकार के पास रहेगा। जबकि सीबीआई सरकार के नियंत्रण में रहेगी। प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच सीबीआई के पास रहेगी। सांसद भी लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे। निचली अदालत भी लोकपाल के दायरे से बाहर रहेगी। सिविल सोसाइटी की तरफ से पेश जन लोकपाल विधेयक के मसौदे में फोन टेप, रोगेटरी लेटर जारी करने और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम करने के लिए कामकाज के तौर तरीकों में बदलाव को लेकर सिफारिशें की गई हैं। लेकिन सरकार की तरफ से पेश लोकपाल बिल के मसौदे में इन मुद्दों का जिक्र तक नहीं है। हजारे की टीम की तरफ से पेश मसौदे में सभी सांसदों द्वारा घोषित संपत्ति के ब्योरे की जांच करने के लिए प्रस्तावित लोकपाल को आधुनिक साज-ओ-सामान उपलब्ध कराने की पेशकश की गई है। जन लोकपाल बिल में इस बात का भी जिक्र है कि लोकपाल की एक बेंच भारतीय टेलीग्राफ एक्ट के सेक्शन पांच के तहत एक मान्यता प्राप्त संस्था होगी जिसे टेलीफोन और इंटरनेट जैसे माध्यमों के जरिए भेजे जा रहे संदेशों और डेटा की निगरानी करने और उसे इंटरसेप्ट करने का अधिकार हासिल होगा। प्रस्तावित लोकपाल और उसके अफसरों की शक्तियों और उसके कामकाज को लेकर सिविल सोसाइटी के ड्राफ्ट में कहा गया है कि जिन मामलों में जांच रुकी हुई है, उनमें लोकपाल किसी बेंच को रोगेटरी लेटर जारी करने के लिए अधिकृत कर सकता है। गौरतलब है कि लेटर रोगेटरी भारतीय अदालत द्वारा किसी विदेशी अदालत को लिखी जाने वाली चिट्ठी है, जिसमें न्यायिक सहायता मांगी जाती है। कुल मिलाकर छह महत्वपूर्ण बिंदुओं जिनमें लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज, निचली न्यायपालिका को लाए जाने को लेकर तीखे मतभेद सिविल सोसायटी और सरकार के बीच गहरे मतभेद हैं सरकार का पक्ष है कि वो ऐसा नहीं चाहती है कि संविधान की मूल भावना को ठेस पहंुचे। सिविल सोसायटी पर गंभीर आरोप लगाते हुए सरकार ने कहा कि वह ऐसी किसी समानांतर सरकार बनने नहीं दे सकती जो किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं हो।

देश में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायापालिका में दिनों दिन बढ़ता भ्रष्टाचार अत्यधिक चिंता का विषय है। हमारे देश में नेताओं के लिए अब तक कोई आचार संहिता नहीं बनायी गयी है। भारत में अभी तक भ्रष्ट राजनीतिज्ञ पर अभियोग लगाने के लिए नियमित तंत्र नहीं है। ऐसे में बिगडैल, भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों पर नकेल कसने के लिए लोकपाल रूपी संस्था की शीघ्र आतिशीघ्र   स्थापना होनी चाहिए। सरकार आगामी मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक को संसद में पेश करने पर अडिग है लेकिन सरकार, सिविल सोसायटी और अन्य राजनीतिक दलों के बीच विचार विमर्ष का जो लबोलुआब है वो ये है कि लोकपाल बिल संसद में पेश तो हो सकता है लेकिन वो कानून का रूप ले पाएगा इसकी संभावना बहुत क्षीण है। सरकार ये तो चाहती है कि लोकपाल बिल का निर्माण हो लेकिन सरकार ने लोकपाल बिल का जो प्रारूप् तैयार किया है वो लूला, लंगड़ा, अधूरा और निकम्मा है। लोकपाल बिल पर जो ग्रहण आज से चार दशक पूर्व लगा था वो ग्रहण छूटने की शुभ घड़ी अभी आती हुयी दिखाई नहीं दे रही है। और जो विचार और सिफारिशे  आज से लगभग चालीस साल पहले की गई थी वो पूर्व की भांति फाइलों में धूल खाने को मजबूर रहेंगे।

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: