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उत्तर प्रदेश में पहली बार तीन सौ से ज्यादा आदिवासी बने पंचायत प्रमुख

(1) उत्तर प्रदेश की गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया जैसी आदिवासी जातियां गणतंत्र भारत के पैंसठ सालों में पहली बार मूल पहचान और आबादी के अनुपात में लड़ीं त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव।

(2) उत्तर प्रदेश में दस लाख से ज्यादा आबादी वाली ये जातियां देश की आजादी के बाद से ही अपनी पहचान और संवैधानिक अधिकारियों के लिए कर रही थीं संघर्ष।

(3) उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र में पिछले डेढ़ दशक से करीब आधा दर्जन ग्राम पंचायतों का नहीं हो पा रहा था गठन।

शिव दास

देश की आजादी के करीब 68 सालों में पहली बार उत्तर प्रदेश की गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया जैसी आदिवासी जातियों के तीन सौ से ज्यादा लोग अपनी मूल पहचान पर त्रिस्तरीय पंचायतों के प्रमुख बने। जबकि कोल, कोरबा, मझवार, उरांव, मलार, बादी, कंवर, कंवराई, वनवासी सरीखी आदिम जातियों को अपनी मूल पहचान पर यह अधिकार हासिल करने के लिए अभी और संघर्ष करना होगा।

सूबे में गौतमबुद्धनगर जिले को छोड़कर सभी 74 जिलों में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के परिणाम आ चुके हैं। अगर सूबे की 59,163 ग्राम पंचायतों की बात करें तो इनमें से अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित 336 ग्राम प्रधान पदों पर गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया जैसी आदिवासी जातियों के हजारों लोग आजाद भारत में पहली बार अपनी मूल पहचान के साथ आरक्षित सीटों पर ताल ठोंके। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव-2010 में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए ग्राम प्रधान की केवल 76 सीटें आरक्षित थीं जो भोटिया, भुक्सा, जन्नसारी, रांजी और थारू आदिवासी जातियों की आबादी (0.03 प्रतिशत) के आधार पर तय की गई थीं।

त्रिस्तरीय पंचायत-2015 में पहली बार उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल सभी जातियों की आबादी के आधार पर ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष (ब्लॉक प्रमुख) और क्षेत्र पंचायत सदस्य का पद आरक्षित किया गया है। इस बार अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए ब्लॉक प्रमुख के पांच पद आरक्षित किये गये हैं जो पहले एक था। इसी तरह ग्राम पंचायत सदस्य के 7,45,475 पदों पर हजारों की संख्या में आदिवासी अपने गांव के विकास की रूपरेखा तय करेंगे।

सूबे के 821 विकास खंडों की बात करें तो इनमें से पांच ब्लॉक प्रमुखों के पदों पर उक्त आदिवासी जातियों के लोग दांव खेल रहे हैं। करीब 77,576 क्षेत्र पंचायत सदस्यों (बीडीसी) में से हजारों की संख्या में उक्त आदिवासी जातियों के लोग ब्लॉक प्रमुखों के चयन में प्रमुख भूमिका निभाएंगे और क्षेत्र के विकास की रूपरेखा तय करेंगे। इनमें से 191 तो केवल सोनभद्र से हैं। यहां दो विकास खण्डों दुद्धी और बभनी के प्रमुखों का ताज उक्त जातियों में किन्ही दो व्यक्तियों के सिर सजेगा। हालांकि सूबे की आबादी में करीब 0.568 प्रतिशत (जनगणना-2011 के अनुसार 11,34,273) हिस्सेदारी रखने वाला अनुसूचित जनजाति वर्ग के सिर पर अपनी मूल पहचान के साथ जिला पंचायत अध्यक्ष पद का ताज नहीं सज सकेगा क्योंकि सूबे के 75 जिला पंचायत अध्यक्ष पदों में से उनके लिए एक पद भी आरक्षित नहीं है। इसके बावजूद जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव और क्षेत्र के विकास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी क्योंकि सूबे के 3,112 जिला पंचायत सदस्य पदों में से दर्जनों पर इसी जाति वर्ग के लोग चुने गए हैं जिनमें सात अकेले सोनभद्र से हैं।

आगामी 13 और 14 दिसंबर को ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत सदस्य चुनाव के परिणामों की घोषणा के साथ जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों के चयन की कवायद शुरू हो जाएगी। इसी के साथ त्रिस्तरीय पंचायतों में सूबे की उक्त आदिवासी जातियों का प्रतिनिधित्व अपनी मूल पहचान के साथ सुनिश्चित हो जाएगा क्योंकि इसके अभाव में सोनभद्र के आदिवासी बहुल करीब आधा दर्जन ग्राम पंचायतों का गठन पिछले डेढ़ दशक से नहीं हो पा रहा था। इन ग्राम पंचायतो में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या नगण्य हो गई थीं।

दुद्धी विकास खंड का जाबर, नगवां विकास खंड का रामपुर, बैजनाथ, दरेव एवं पल्हारी ग्राम सभाएं इसका उदाहरण हैं। वहां 2001 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हुई ग्राम प्रधान एवं ग्राम पंचायत सदस्य के पदों पर योग्य उम्मीदवारों की प्रर्याप्त दावेदारी नहीं होने के कारण ग्राम पंचायत सदस्यों की दो तिहाई सीटें खाली रह जाती थीं। इन ग्राम सभाओं का गठन नहीं हो पाता था क्योंकि ग्राम सभा के गठन के लिए ग्राम पंचायत सदस्यों की संख्या दो तिहाई होना जरूरी होता है। इन ग्राम सभाओं में जिला प्रशासन द्वारा तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर विकास कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है। अब ये समस्याएं दूर हो जाएंगी।

उदाहरण के तौर पर नगवां विकासखंड का पल्हारी ग्राम सभा। 13 ग्राम पंचायत सदस्यों वाले पल्हारी ग्रामसभा में पंचायत चुनाव-2005 के दौरान कुल 1006 वोटर थे। इस गांव में अनुसूचित जाति का एक परिवार था। शेष अनुसूचित जनजाति एवं अन्य वर्ग के थे। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 12 ग्राम पंचायत सदस्य के पद खाली थे क्योंकि इस पर अनुसूचित जाति का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ सका था। ग्राम पंचायत सदस्यों के दो-तिहाई से अधिक पद खाली होने के कारण पल्हारी ग्राम सभा का गठन नहीं हो पाया। जिला प्रशासन द्वारा गठित समिति विकास कार्यों को अंजाम दे रही थी। कुछ ऐसे ही हालात पंचायत चुनाव-2010 में भी वहां थे। इससे छुटकारा पाने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ गैर राजनीतिक पार्टियां भी आदिवासियों की आवाज को सत्ता के नुमाइंदों तक पहुंचाने के लिए विभिन्न हथकंडे अपना रहे हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव-2005 के दौरान भी आदिवासियों और कुछ राजनीतिक पार्टियों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाजें मुखर की थी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने उस समय आदिवासियों की इस आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए म्योरपुर विकासखंड के करहिया गांव में पंचायत चुनाव के दौरान समानान्तर बूथ लगाकर आदिवासियों से मतदान करवाया था। भाकपा(माले) के इस अभियान में 500 लोगों ने अपने मत का प्रयोग किया। वहीं, राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायत चुनाव के दौरान लगाए गए बूथ पर मात्र 13 वोट पड़े थे। अनुसूचित जाति के दो परिवारों (दयाद) के सदस्यों में से एक व्यक्ति नौ वोट पाकर ग्राम प्रधान चुना गया। शेष सदस्य निर्विरोध सदस्य चुन लिए गये थे। आदिवासियों और भाकपा(माले) के इस अभियान ने राजनीतिक हलके में हडकंप मचाकर रख दी। इसके बाद भी केंद्र एवं राज्य की सरकार की नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसके बाद भी सूबे की सरकार ने राज्य की त्रिस्तरीय पंचायतों, विधानमंडल और संसद में आदिवासियों की आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित कराने की पहल नहीं की।

आदिवासियों की गैर-सरकारी संस्था प्रदेशीय जनजाति विकास मंच और आदिवासी विकास समिति ने त्रिस्तरीय पंचायतों में उचित प्रतिनिधित्व के संवैधानिक अधिकार की मांग को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका संख्या-46821/2010 दाखिल की। इसपर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुनील अंबानी और काशी नाथ पांडे की पीठ ने 16 सितंबर, 2010 को दिए फैसले में साफ कहा है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल जाति समुदाय के लोगों का आबादी के अनुपात में विभिन्न संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार उनका संवैधानिक आधार है जो उन्हें मिलना चाहिए। पीठ ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी खारिज कर दिया था कि ’अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा(सुधार) अधिनियम-2002’ लागू होने के बाद राज्य में आदिवासियों की जनगणना नहीं हुई है। पीठ ने साफ कहा कि 2001 की जनगणना में अनुसूचित जाति वर्ग और अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल जातियों की जनगणना अलग-अलग कराई गई थी और इसका विवरण विकासखंड और जिला स्तर पर भी मौजूद है। इसकी सहायता से अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल हुई जातियों की आबादी को पता किया जा सकता है। पीठ ने आदिवासियों के हक में फैसला देते हुए त्रिस्तरीय पंचायतों में सीटें आरक्षित करने का आदेश दिया लेकिन चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाने के कारण पंचायत चुनाव-2010 में उच्च न्यायालय का आदेश लागू नहीं हो पाया था। राज्य निर्वाचन आयोग ने जनगणना-2011 के आंकड़ों के आधार पर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव-2015 में अनुसूचित जनजाति वर्ग की आबादी के आधार पर उनके लिए सीटें आरक्षित कर दी हैं।

वहीं आदिवासी पहचान के लिए जूझ रही सूबे की कोल, कोरबा, मझवार, उरांव, मलार, बादी, कंवर, कंवराई, वनवासी सरीखी जातियों को अपनी मूल पहचान पर यह अधिकार हासिल करने के लिए अभी और संघर्ष करना होगा क्योंकि राजनीतिक गुणा-भाग में जुटे सियासतदानों ने उन्हें अभी भी उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति में बनाए रखा है जबकि इन जातियों की सामाजिक स्थिति भी इन जिलों में अन्य जनजातियों के समान ही है। अगर हम इनके संवैधानिक अधिकारों पर गौर करें तो कोल मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, कोरबा बिहार, मध्य प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में, कंवर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, मझवार मध्य प्रदेश में, धांगड़ (उरांव)  मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र में, बादी (बर्दा) गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग में हैं। उत्तर प्रदेश में भी इन जातियों के लोगों की सामाजिक स्थिति अन्य प्रदेशों में निवास करने वाली आदिवासी जातियों के समान ही है जो समय-समय पर सर्वेक्षणों और मीडिया रिपोर्टों में सामने आता रहता है।

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