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उद्भट विद्वान ही नहीं, चिंतक, विचारक और लेखक भी थे महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

डॉ. शुभ्रा शर्मा
यह बड़ा विचित्र संयोग है कि व्यक्ति का जन्म और मृत्यु एक ही सप्ताह में हो – जैसाकि महापंडित राहुल सांकृत्यायन के प्रसंग में हुआ। 9 अप्रैल 1893 को आजमगढ़ के कनैला गाँव में जन्मे राहुल जी ने 70 वर्ष की आयु पायी और 14 अप्रैल 1963 को दार्जिलिंग में उनका देहावसान हुआ। अपने इन सत्तर वर्षों में उन्होंने जितना भरपूर जिया, जितना ज्ञान अर्जित किया, जितनी देश-विदेश की यात्रायें कीं, उतना आम तौर पर सात जन्मों में भी संभव नहीं हो पाता है।
 राहुल जी की शिक्षा परिवार की परंपरा के अनुसार संस्कृत व्याकरण और साहित्य से प्रारम्भ हुई। माता-पिता की असमय मृत्यु के बाद उनकी दादी ने उन्हें पाला। नौ साल की उम्र से ही उन्हें घुमक्कड़ी का रोग लग गया और वे दुनिया देखने की चाह में घर से निकल भागे। कभी साधु संगति में तीर्थाटन कर आये तो कभी श्रीलंका और तिब्बत के बौद्ध विहार घूम आये। इन सभी देश-प्रांतों की भाषाओँ-बोलियों को भी आत्मसात करते गए। नतीजा यह कि हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और भोजपुरी के अलावा न जाने और भी कितनी भाषाएँ धाराप्रवाह बोल सकते थे।
धुन के ऐसे पक्के कि जब बौद्ध मठों में केवल भिक्खुओं के लिए उपलब्ध ग्रन्थ पढ़ने का अवसर नहीं मिला तो बाक़ायदा दीक्षा लेकर स्वयं बौद्ध भिक्खु बन गए। उन ग्रंथों को पढ़ने के लिए पाली, प्राकृत और तिब्बती भाषाएँ सीखीं। ग्रंथों को पढ़कर जब पता लगा कि कभी वे नालंदा और विक्रमशिला के ग्रंथागारों में रखे थे और बाद में बाहरी हमलों से बचाव के लिए चोरी-छिपे तिब्बत के दुर्गम मठों में पहुंचा दिए गए थे, तब उन्होंने ठान लिया कि जैसे भी हो भारत की इस अमूल्य थाती को वापस लाकर रहेंगे। मैंने पटना संग्रहालय में राहुल कला दीर्घा देखी है, जहाँ उनके जतन से लाये अनुपम थंका चित्र और दुर्लभ पांडुलिपियाँ सहेज कर रखी गयी हैं। संग्रहालय के तत्कालीन क्यूरेटर डॉ० परमेश्वरी लाल गुप्त इतिहास के विद्यार्थियों को बड़े चाव से वह दीर्घा दिखाते और राहुल जी के साहसिक कारनामों की कथाएं सुनाया करते थे। उन्हीं से सुना था कि राहुल जी किस तरह रातों-रात बाइस याकों पर ये पुस्तकें,पट-चित्र और अन्य बहुमूल्य सामग्री लादकर बचते-बचाते भारत पहुंचे थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर राहुल जी ने उन्हें ढूंढ न निकाला होता तो मुट्ठी भर बौद्ध भिक्खुओं के अलावा कोई, कभी उन्हें देख नहीं पाता।
राहुल जी केवल उद्भट विद्वान ही नहीं थे, चिंतक, विचारक और लेखक भी थे। उनकी लिखी सौ से अधिक पुस्तकों में इतिहास, भूगोल, नृ-शास्त्र, दर्शन और राजनीति की पुस्तकें उनके विविध और विस्तृत ज्ञान की परिचायक हैं। हिंदी में यात्रा-वृत्तांत के तो वे जनक ही माने जाते हैं। उनकी चालीस साल से अधिक यायावरी का ब्यौरा उनकी अलग-अलग पुस्तकों से प्राप्त होता है। अपने जैसे घुमन्तुओं को यायावरी के लिए उकसाती और तैयार करती है उनकी पुस्तक-घुमक्कड़ शास्त्र। राहुल जी ने अपने व्यापक अनुभवों के आधार पर कुछ नितांत व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। जैसे कि एक जगह उन्होंने लिखा है कि अगर ठण्ड ज़्यादा हो और आपके पास केवल एक कम्बल या लोई हो तो घबड़ाने की कोई बात नहीं है। सूती धोती या चादर तो होगी ही। चादर और कम्बल के बीच अख़बार की एक परत बिछा लीजिये और आराम से ओढ़कर सो जाइये। खुद मैंने इस नुस्खे को आज़माया और बहुत कारगर पाया है।
राहुल जी ने दो ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे हैं- सिंह सेनापति और जय यौधेय। दोनों भारतीय इतिहास के दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण कालखंडों से हमारा परिचय कराते हैं। सिंह सेनापति ईसा पूर्व छठीं शताब्दी में लिच्छवि गण का सेनापति था। उसकी कहानी में हम लिच्छवि गणराज्य की परम्पराओं के साथ-साथ तथागत बुद्ध, तीर्थंकर महावीर, मगधराज बिम्बिसार और कोसल नरेश प्रसेनजित को चलते-फिरते बोलते-हँसते देखते हैं।
दूसरा उपन्यास है- जय यौधेय। भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहे जाने वाले गुप्तकाल के पहले दिग्विजयी सम्राट समुद्रगुप्त का एक विवाह यौधेय कुल की कन्या दत्ता से हुआ था। यही दत्ता भावी सम्राट चन्द्रगुप्त की माँ थी और उपन्यास के नायक जय की बड़ी बहन भी। इस उपन्यास में राहुल जी ने ऐतिहासिक तथा काल्पनिक चरित्रों का ताना-बाना कुछ ऐसी कुशलता से बुना है कि हम जान ही नहीं पाते कि कहाँ तक तथ्य हैं और कहाँ से कल्पना। दत्ता की गोद में एकसाथ पले-बढ़े जय और चन्द्र बचपन से ही एक-दूसरे से छाया की भाँति अभिन्न थे। समुद्रगुप्त की कई रानियों में से एक का पुत्र होने पर भी चन्द्र सिंहासन की दौड़ में बहुत पीछे था, लेकिन वही चन्द्र जब युवराज रामगुप्त की पत्नी ध्रुवदेवी को अपमानित होने से बचाता है तब वह ध्रुवदेवी के साथ-साथ सिंहासन का भी स्वामी बन जाता है। राजा बनने पर उसकी साम्राज्यवादी सोच और जय की गणतांत्रिक विचारधारा के टकराव को दत्ता की ममता भी रोक नहीं पाती। इस उपन्यास के बेहद संवेदनशीलता के साथ उकेरे गए चरित्रों के बीच राहुल जी की अपनी गणतांत्रिक और कुछ हद तक साम्यवादी सोच भी उभरकर सामने आती है।
दोनों उपन्यासों के नायक गणतांत्रिक पृष्ठभूमि से आते हैं। दोनों व्यक्ति की गरिमा और सम्मान के पक्षधर हैं। दोनों का मानना है कि पृथ्वी जिस उदार भाव से अपनी सम्पदा को मानव के उपयोग के लिए प्रस्तुत करती है, उसी तरह हमें भी मिल-जुलकर उसका उपभोग करना चाहिए। किसी एक व्यक्ति को अकेले उसका स्वामी बनने और उपभोग करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
राहुल जी के इन उपन्यासों के नायक भले ही शरद बाबू के ‘देवदास’ या मुंशी प्रेमचंद के ‘होरी’ सरीखे सुपरिचित न हों, लेकिन बेहद सशक्त चरित्र हैं। उनके पीछे एक महापंडित का तमाम ज्ञान, अनुभव और चिंतन जुड़ा हुआ है इसीलिए वे पाठक के स्मृति-पटल पर सदा के लिए अंकित हो जाते हैं।

About the author

डॉ. शुभ्रा शर्मा ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की. पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के लेक्चरर के रूप में जीवन की शुरुआत की और आजकल आकाशवाणी में कार्यरत हैं. साहित्य, संगीत और पत्रकारिता के क्षेत्र में इनका नाम है. बनारस में इनके बचपन का घर, हरि पदम, काशी की संस्कृति के जानकारों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था. काशी, शंकर और बनारसी तहजीब के शायर, नजीर बनारसी, की गोद में पलीं बढीं, शुभ्रा शर्मा के पिता कृष्ण चन्द्र शर्मा “भिक्खु” एक बड़े साहित्यकार थे. डॉ शुभ्रा शर्मा खुद भी एक लेखिका हैं लेकिन इनका अधिकतर लेखन अभी पांडुलिपि के रूप में इनकी डायरियों में छुपा हुआ है.

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