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उप्र में तीसरा मोर्चा- स्वप्न या हकीकत

अरविन्द विद्रोही 
 गैर कांग्रेस – गैर भाजपा दलों के गठबंधन से अलग तीसरे गठबंधन यानि कि तीसरे मोर्चा का स्वरूप राष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस आकार नहीं ले सका है। उत्तर-प्रदेश में तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े ध्वजवाहक मुलायम सिंह यादव की राजनैतिक प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है। उत्तर-प्रदेश में कांग्रेस -भाजपा से इतर अन्य तमाम दल सपा, बसपा, रालोद, भाकपा, माकपा, अपना दल, पीस पार्टी, एकता मंच आदि चुनावी मैदान में जोर-आजमाइश करेंगे। यह एक विडम्बना ही है कि तीसरे मोर्चे के पैरोकार सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव अपने गृह प्रदेश में ही चुनाव पूर्व तीसरे मोर्चे को आकार नहीं दे सके हैं। चुनाव पूर्व कोई नीति या कार्यक्रम आधारित नया गठबंधन ना बन पाने के कारण ही प्रबुद्ध मतदाता तीसरे मोर्चे को अनावश्यक करार देता है।
केंद्र की वर्तमान कांग्रेस सरकार को सपा-बसपा दोनों समर्थन देते रहे हैं और सदन में समर्थन सड़क पर संघर्ष जैसा दोहरा रवैया बखूबी अपनाये रहे। सपा-बसपा दोनों दलों के नेता पानी पी पी कर कांग्रेस को कोसते भी रहते हैं और उसी कांग्रेस से गलबहियाँ भी करते रहते हैं। दोनों दलों के नेता अपने अलग-अलग बयानों में इस मुद्दे पर एक ही राग अलापते हैं कि हम साम्प्रदायिक भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं।
दरअसल तीसरे मोर्चे के आकार का स्वरूप लोकसभा चुनावों के पश्चात् बनने वाले सीटों के अंकगणित पर ही निर्भर है। चुनाव पूर्व सिर्फ चर्चा और पेशबंदी की कवायत के तहत विभिन्न दलों का जुटान मौके बे मौके हुआ है। वामपंथी दलों के नेतृत्व के भीतर सत्ता से दूर रहने की कसक और सत्ता हासिल करने की छटपटाहट उन्हें तीसरे मोर्चे के संयोजन के लिए प्रेरित करती है। वामपंथी दलों को गैर कांग्रेसी- गैर भाजपाई गठबंधन से इतर तीसरा मोर्चा बनाने के लिए सबसे बड़ा जनाधार वाला नाम अगर साथ खड़ा मिलता है तो वो नाम सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ही होता है। उत्तर-प्रदेश की ही एक अन्य बड़ी राजनैतिक हस्ती बसपा प्रमुख सुश्री मायावती तीसरे मोर्चे की कवायत से दूर ही नजर आती हैं। यही नहीं पश्चिम बंगाल में वामपंथी ताकतों को शिकस्त देकर मुख्यमंत्री बनी तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा ममता बनर्जी भी वामपंथी ताकतों के साथ बन रहे तीसरे मोर्चे को अनावश्यक व अनुपयोगी मानती हैं। पश्चिम बंगाल के बाद ममता बनर्जी ने अब उत्तर-प्रदेश समेत देश के कई अन्य राज्यों में भी अपना संगठन खड़ा कर लिया है और बाकायदा दमदारी के साथ लोकसभा चुनावों में अपने प्रत्याशी उतार रहीं हैं। बिहार में उपेन्द्र कुशवाहा और रामविलास पासवान भाजपा के साथ जा चुके हैं, लालू यादव का रुझान कांग्रेस के प्रति बरक़रार है और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सिर्फ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व पर मुँह बिचकाते हैं बाकि भाजपा से उन्हें भी कोई बैर नहीं है। लालू व नीतीश की पार्टियाँ भी उत्तर-प्रदेश के राजनैतिक समर में अपनी जोर आजमाइश की कोशिश में लगी हैं जिसमे सिर्फ नीतीश कुमार के दल जनता दल यू की ही कुछ राजनैतिक गतिविधि संज्ञान में आती है।
उत्तर-प्रदेश में तीसरे मोर्चे के पक्षधर वामपंथी दल व सपा, जनता दल यू भी आपस में चुनाव पूर्व कोई सीटों का समझौता नहीं कर सकें हैं। सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी हों या वामपंथी नेता अतुल अंजान दोनों वरिष्ठ जन चुनाव पश्चात् ही तीसरे मोर्चे के स्वरुप लेने की बात कहते हैं और प्रधानमंत्री पद के सवाल पर तो संभावित तीसरे मोर्चे में जबरदस्त मतभेद दिखता है।
गैर कांग्रेस- गैर भाजपा दलों में सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, जनता दल यू, अन्नाद्रमुक सभी के नेता प्रधानमंत्री पद पर काबिज होने का सुखद स्वप्न अपने-अपने नयनों में संजोयें अपना जनाधार बढ़ाने व अधिकतम सीटों को हासिल करने की जद्दोजहद में लगे हैं। अभी दिल्ली दूर है परन्तु सफ़र शुरू हो चुका है और समर का शंखनाद भी हो गया है। 80 सीटों वाले उत्तर-प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार अपने विधायकों-मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों के कृत्यों से हलकान है और मुलायम सिंह बहुत परेशान। मुलायम सिंह यादव यह जानते हैं कि उनके पुत्र अखिलेश यादव के नेतृत्व में मात्र दो वर्षों में ही उत्तर-प्रदेश की समाजवादी सरकार ने समाजवादी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र के तमाम वायदों को पूरा किया है लेकिन उत्तर-प्रदेश में बिगड़ी कानून व्यवस्था और आम कार्यकर्ताओं का गिरा मनोबल सारे किये कराये पर पानी फेरने को पर्याप्त है। पार्टी के मुखिया एवं अभिभावक, समाजवादी दार्शनिक चिंतक की भाँति सपा प्रमुख मुलायम सिंह पार्टी के कार्यकर्ताओं से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक को कार्य करने की शैली भी बताते हैं, उत्साहवर्धन भी करते हैं, नसीहत भी देते हैं और फटकारते भी हैं परन्तु आश्चर्यजनक- अफसोसजनक तरीके से सपा के विधायक, मंत्री, सरकारी अमला चिकने घड़े सरीखा आचरण करते ही चले जा रहे हैं। इन तमाम विरोधाभासों के बावजूद चूँकि इस लोकसभा चुनाव में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव एक बार पुनः चुनावी रणनीति बनाने, क्रियान्वयन करवाने की कमान खुद संभाल चुके हैं इसलिए सपा को आसानी से 30 से 35 सीटों पर विजय मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है।
सपा की विजय की राह में सबसे बड़े रोड़े खुद सपा के विधायक-मंत्री ही हैं जिन पर नियंत्रण हेतु संगठन के लोगों को लगाकर स्थिति अनुकूल करने के प्रयास में सपा नेतृत्व लग चुका है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि नरेंद्र मोदी के प्रभाव के चलते भाजपा का मत प्रतिशत और सीटें दोनों उत्तर-प्रदेश में बढ़ेंगी लेकिन भाजपा में जारी सिर फुट्टौवल उसके लक्ष्य को नुकसान पहुँचा सकता है।  भाजपा के खिलाफ ही मत देने का मन बना चुके अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकांश मतों का रुझान भाजपा को शिकस्त देने वाले दल या प्रत्याशी के ही पक्ष में होगा यह निश्चित तथ्य है।
उत्तर-प्रदेश में तीसरे मोर्चे के स्वप्न दृष्टा सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव की राह में अगर उनके अपने दल के लोग और सरकारी अमला काँटे बिछाने से बाज नहीं आ रहे हैं तो आश्चर्यजनक तरीके से कांग्रेस पार्टी और भाजपा दोनों ने जाने अनजाने उत्तर-प्रदेश में सपा को संजीवनी प्रदान की है। कांग्रेस पार्टी ने जनाधारविहीन उत्तर-प्रदेश नेतृत्व को बरक़रार रखकर व पुराने समाजवादी जनाधार वाले बेबाक नेता केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा की संगठन व चुनावी रणनीति में उपेक्षा करके अपने पैरों में खुद कुल्हाड़ी तो मारी ही है, मुलायम सिंह यादव को भी भारी राहत देने का कार्य किया है। तमाम पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक समुदाय, समाजवादी विचारधारा के लोग जिनका जुटान बेनी प्रसाद वर्मा के माध्यम से कांग्रेस के ध्वज तले हो रहा था अब वह ठहर चुका है और चुनाव की तिथि आते-आते यह तबका पुनः सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ ही खड़ा-जुटा नजर आयेगा।
तीसरे मोर्चे के माध्यम से दिल्ली पर समाजवादियों का कब्ज़ा करने की बात कहने वाले सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पूरे दम ख़म से चुनावी मैदान में उतरे हैं। वे जानते हैं कि अगर वामपंथी दलों के साथ मिलकर उन्होंने 70 सीटों का भी आँकड़ा पार कर लिया तो इस बार दिल्ली दूर नहीं।

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अरविन्द विद्रोही। लेखक स्वतंत्र पत्रकार व सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता हैं।

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