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उप्र में दलित वोटों में हो रहा है बड़े पैमाने पर बिखराव

शेष नारायण सिंह
  लोकसभा चुनाव 2014 में उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़े वर्गों की राजनीति में परम्परागत वफादारियों में बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहा है। उत्तर प्रदेश से जो खबरें आ रही हैं उससे पता चल रहा है कि मायावती के वोट बैंक का कुछ हिस्सा भाजपा की तरफ शिफ्ट हो गया है। कुछ इलाकों से यह भी खबरें आ रही हैं कि गैर यादव पिछड़ी जातियों ने भी भाजपा को वोट देने का मन बना लिया है। अब तक के जो चुनाव हुए हैं उनमें भी मायावती के वोट बैंक के बिखरने की खबरें पक्की हैं। मुजफ्फरनगर और अलीगढ़ से पक्की सूचना है कि इन दोनों ही सीटों पर दलितों ने बड़ी संख्या में भाजपा उम्मीदवारों को वोट दिया है।
पहले दौर की दस सीटों पर इसी भरोसे के तहत भाजपा के यूपी इंचार्ज अमित शाह को भरोसा है कि सभी सीटें भाजपा को मिलने जा रही हैं। दूसरे दौर में भी अति दलितों और अति पिछड़ों की खासी संख्या ने भाजपा को समर्थन दिया है। हालांकि यह भी बिलकुल सही है कि मायावती के वोट बैंक में बिखराव के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को मजबूती मिल रही है क्योंकि मुजफ्फरनगर के दंगों के बावजूद भी मुसलमानों की प्रिय पार्टी अभी भी समाजवादी पार्टी ही है। 2009 में समाजवादी पार्टी को सहारनपुर से आगरा के बीच में केवल दो सीटें मिलीं थीं। जानकार बता रहे हैं कि इस बार उस से बेहतर प्रदर्शन होगा। यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। पार्टी ने नब्बे के दशक से ही पिछड़ी और दलित जातियों को खंडित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया था। राजनाथ सिंह के मुख्य मंत्री बनने के बाद पार्टी ने सरकारी तौर पर अति दलित और अति पिछड़ों के नाम पर एससी और ओबीसी कोटे के अंदर कोटे की व्यवस्था करके सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था कर दी थी। इस तरह का कानून भी बना दिया था। कुछ भर्तियां भी हो गईं थीं लेकिन जब भाजपा के बाद मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने उस आदेश को रद्द कर दिया था। राजनाथ सिंह की सरकार ने अपनी सरकार के एक मंत्री हुकुम सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाकर दलित और पिछड़ी जातियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का आकलन करवाया था। उन्होंने दलित और पिछड़ी जातियों में अति दलितऔर अति पिछड़ों को चिन्हित किया था। उस समिति की रिपोर्ट से कुछ दिलचस्प आंकड़े सामने आए। देखा गया कि 79 पिछड़ी जातियों में कुछ जातियां लगभग सारा लाभ ले रही हैं। ऐसी जातियों में यादव, कुर्मी, जाट आदि शामिल हैं जबकि, मल्लाह, कुम्हार,कहार, राजभर आदि जातियां नौकरियों में अपना सही हिस्सा नहीं पा रही थीं।
राजनाथ सिंह की सरकार ने पिछड़ी जातियों को तीन श्रेणियों में बांट दिया। पिछड़ी जाति में केवल एक जाति यादव रखा और 28 प्रतिशत के कोटे में उनके लिए 5 प्रतिशत का रिजर्वेशन दे दिया। अति पिछड़ी जातियों में आठ जातियों को रखा और उन्हें 9 प्रतिशत का रिजर्वेशन दे दिया। बाकी सत्तर जातियों को अत्यधिक पिछड़ी जातियों की श्रेणी में रख दिया और उन्हें 14 प्रतिशत का रिजर्वेशन दे दिया। अगर यह व्यवस्था लागू हो जाती तो उत्तर प्रदेश में मूलरूप से यादवों के कल्याण में लगी हुई समाजवादी पार्टी को भारी नुकसान होता लेकिन मुलायम सिंह यादव का सौभाग्य ही था कि राजनाथ सिंह के बाद मायवाती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और उन्होंने राजनाथ सिंह के मंसूबों पर पानी फेर दिया। चुनावों के मद्देनजर राजनाथ सिंह ने एक बार इस प्रस्ताव को जिन्दा करने की कोशिश शुरू की और जानकार बताते हैं कि उनकी इसी रणनीति का फायदा भाजपा को उत्तर प्रदेश में मिल रहा है। इसके कारण उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वालों के सामने खासी मुश्किलें पेश आ रही हैं। यह उत्तर प्रदेश की मुख्य पार्टियों के लिए बहुत खुशी की बात नहीं है। हालांकि लोकसभा चुनाव 2014 में इस नीति के कारण ही भाजपा 2009 के अपने चौथे नंबर से नंबर एक बनने के सपने दख रही है लेकिन अभी इसके आधार पर राजनीतिक आकलन करना ठीक नहीं होगा।

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