Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » एक कुटिल चाल है भारत के सभी निवासियों को हिंदू बताने के खेल के पीछे
Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)
Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

एक कुटिल चाल है भारत के सभी निवासियों को हिंदू बताने के खेल के पीछे

क्या ‘हिंदू’ हमारी राष्ट्रीय पहचान है?

 आरएसएस का न तो स्वाधीनता संग्राम से कोई लेनादेना रहा है और ना ही भारतीय संविधान में उसे कोई विशेष श्रद्धा है

-राम पुनियानी

सन् 1980 के दशक से पहचान-आधारित राजनीति ने हमारे देश में जड़ें जमानी शुरू कीं। शाहबानो मामले, राममंदिर की समस्या और रथयात्राओं ने पहचान पर आधारित मुद्दों को देश के सामाजिक-राजनीतिक रंगमंच के केन्द्र में ला दिया। इस राजनीति का सबसे पहला बड़ा शिकार बनी बाबरी मस्जिद। कुछ लोग गंभीरतापूर्वक यह विश्वास करने लगे कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और ‘हम सब हिंदू हैं’ के नारे की गूँज जगह-जगह सुनाई देने लगी। हाल में, मोदी-भाजपा को लोकसभा में बहुमत मिलने के बाद से यह मुद्दा और जोर-शोर से उठाया जा रहा है। सन् 1990 में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि हम सब हिंदू हैं-मुसलमान, अहमदिया हिंदू हैं, ईसाई क्रीस्टी हिंदू हैं और जैन, सिक्ख और बौद्ध तो हिंदू हैं ही।

आरएसएस यह मानता है कि बौद्ध, सिक्ख और जैन धर्म, हिंदू धर्म के पंथ हैं। यह अलग बात है कि कुछ समय पूर्व, जब तत्कालीन सरसंघचालक के. सुदर्शन ने यह कहा था कि सिक्ख, अलग धर्म नहीं वरन् हिंदू धर्म का पंथ मात्र है तो इसके खिलाफ पंजाब में जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए थे। मोदी के सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद से, आरएसएस बार-बार, लगातार यह दोहरा रहा है कि सभी भारतीयों को स्वयं को हिंदू कहना चाहिए।

अंग्रेजी की कहावत है कि कुछ लोगों को जब झुकने को कहा जाता है तो वे दंडवत करने लगते हैं। इसी तर्ज पर, गोवा के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता फ्रांसिस डिसूजा ने कहा कि सभी ईसाई, हिंदू हैं।

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि ‘‘सारी दुनिया भारतीयों को हिंदू मानती है इसलिए भारत, हिंदू राष्ट्र है। यह बहुत साधारण सी बात है। जिस तरह ब्रिटेन में रहने वाले ब्रिटिश हैं, जर्मनी के सभी निवासी जर्मन हैं और अमेरिका के सभी नागरिक अमरीकी हैं उसी तरह हिन्दुस्तान के सभी रहवासी हिंदू हैं।’’

हिन्दुत्व और हिंदू धर्म जैसी दो नितांत अलग-अलग चीजों का मिश्रण करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘सारे भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिन्दुत्व है और इस वर्तमान में इस देश में रहने वाले सभी लोग एक ही महान संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं।’’

इस तरह के दावों के पीछे असली राजनीतिक एजेण्डा क्या है, इसकी पोल खोलते हुए गोवा के सहकारिता मंत्री दीपक धावलीकर ने विधानसभा में कहा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत, हिंदू राष्ट्र बनने की ओर उद्यत है।

सच यह है कि हिंदू, हिन्दुत्व और हिंदू राष्ट्र ये तीनों अलग-अलग चीजें हैं और इनका राजनैतिक निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए दुरूपयोग किया जा रहा है। इन तीनों अवधारणाओं को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। हिंदू धर्म के बारे में जो दावे किये जा रहे हैं, उनकी वर्तमान संदर्भों में पड़ताल अपेक्षित है।

हिंदू शब्द के उदय की कहानी लंबी है। समय के साथ इस शब्द के अर्थ और संदर्भ बदलते रहे हैं। हिंदू धर्म का राजनैतिक संस्करण हिन्दुत्व है और हिन्दुत्व का राजनैतिक लक्ष्य, हिंदू राष्ट्र है। इन तीनों शब्दों को संघ परिवार ने अपने राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा बना लिया है।

यह दिलचस्प है कि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्मग्रंथ कहा जाता है, उनमें भी 8वीं सदी ईस्वी तक, हिंदू शब्द का जिक्र नहीं मिलता। दरअसल, हिंदू शब्द अस्तित्व में तब आया जब अरब और मध्यपूर्व से मुसलमान यहाँ पहुँचे। उन्होंने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू कहना शुरू कर दिया। इस प्रकार, हिंदू मूलतः एक भौगोलिक अवधारणा है। यही कारण है कि दुनिया के कुछ हिस्सों, विशेषकर पश्चिम एशिया में आज भी भारत को हिन्दुस्तान कहा जाता है।

भागवत का यह कहना गलत है कि पूरी दुनिया में भारत को हिन्दुस्तान नाम से पुकारा जाता है। केवल सऊदी अरब और पश्चिम एशिया में यह शब्द प्रचलन में है। सऊदी में आज भी भारत से जाने वाले हाजियों को हिन्दी कहा जाता है और सऊदी अरब की स्थानीय भाषा में गणित को हिन्दसा (हिन्द से आया हुआ) कहा जाता है।

समय के साथ हिंदू, भौगोलिक के स्थान पर धार्मिक अवधारणा बन गया और सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों की धार्मिक परंपराओं और कर्मकाण्डों को हिंदू कहा जाने लगा।

यह दावा कि प्राचीन भारत में हिंदू संस्कृति का बोलबाला था, बेबुनियाद है। सिंधू घाटी की सभ्यता, देश के दूसरे इलाकों की सभ्यता व संस्कृति से एकदम भिन्न थी। शुरूआत में आर्य पशुपालक थे परंतु बाद में उन्होंने एक जगह रहकर खेती करना और राज्यों व साम्राज्यों की स्थापना करना शुरू कर दिया। भारत में पहले से रहने वाले आदिवासियों की अपनी एक अलग संस्कृति थी। उसी तरह, ब्राह्मणवादी व बौद्ध परंपराएं एकदम अलग-अलग थीं। जहाँ ब्राह्मणवाद जन्म-आधारित जातिगत ऊँचनीच में विश्वास करता था वहीं बौद्ध धर्म इसका विरोधी था।

यह कहना कि पूरे प्राचीन भारत में एक सी संस्कृति थी, एकदम गलत है। हम सब जानते हैं कि संस्कृति, नए लोगों के किसी स्थान पर बसने और उस स्थान पर रहने वाले लोगों के दूसरी जगह जाने से परिवर्तित होती रहती है।

हिन्दुत्व शब्द का उदय 19वीं सदी में हुआ जब उभरते हुए राष्ट्रीय आंदोलन के विरूद्ध सांप्रदायिक राजनीति ने मोर्चा संभाला। जब सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई तब मुसलमान और हिंदू, दोनों धर्मों के सामंती तत्वों ने इसका विरोध किया और अपनी सांप्रदायिक सोच को हवा दी।

हिंदू संप्रदायवादियों की सोच को ही मोटे तौर पर हिन्दुत्व कहा जाता है। इस विचारधारा को आकार देने में सावरकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सावरकर ने ही सबसे पहले सन् 1924 में हिंदू शब्द की परिभाषा दी। उन्होंने कहा कि हिंदू वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों भारत हैं। इस तरह ईसाई और मुसलमान, अपने आप हिंदू धर्म की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं।

सावरकर के अनुसार हिंदू कौन है

सावरकर के अनुसार हिंदू वह है जो आर्य है, ब्राह्मणवादी संस्कृति में विश्वास रखता है और हिमालय से लेकर समुद्र तक फैले भूभाग में रहता है। सावरकर ने ही हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को आकार दिया। इस अवधारणा को 1925 में आरएसएस ने अपने लक्ष्य के रूप में अपना लिया। हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्य से एकदम भिन्न था। राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत का निर्माण करना था।

यह बार-बार कहा जा रहा है कि हम सब को अपने आप को इसलिए हिंदू कहना चाहिए क्योंकि हिंदू, दरअसल, कोई धर्म नहीं बल्कि जीने का तरीका है। और इस देश के सभी निवासी एक ही तरह से जीते हैं। यह लोगों को बेवकूफ बनाने की चाल है। कोई मुस्लिम भी यह कह सकता है कि इस्लाम, धर्म नहीं वरन् जीवन पद्धति है। यह स्पष्ट है कि केवल धर्म, जीवनपद्धति नहीं हो सकता। जीवनपद्धति धर्म से अधिक विस्तृत अवधारणा है और इसमें भाषा, स्थानीय संस्कृति आदि शामिल हैं, जो कि पूरे देश में कभी एक नहीं हो सकते। उसी तरह, धर्म भी एकसार नहीं है। दरअसल, धर्म, जीवनपद्धति का एक हिस्सा है। वह जीवनपद्धति नहीं है और न हो सकता है। नवस्वतंत्र देश का क्या नाम होना चाहिए, इस पर संविधान सभा में लंबी बहस हुई थी और अंत में यह तय किया गया कि देश का नाम ‘‘इंडिया देट इज भारत’’ होगा। यह नाम किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है।

हिंदू शब्द के राष्ट्रीय-सांस्कृतिक अर्थ नहीं है। यह एक विशुद्ध धार्मिक शब्द है। भारत के सभी निवासियों को हिंदू बताने के खेल के पीछे एक कुटिल चाल है। पहले भौगोलिक पहचान की बात करो, फिर कहो कि चूंकि हम सब के पूर्वज एक ही हैं और चूंकि हम सब हिंदू हैं इसलिए गीता और मनुस्मृति हमारी राष्ट्रीय पुस्तकें हैं और गाय हमारा राष्ट्रीय पशु हैं और हम सबको राम आदि की पूजा करनी चाहिए।

आरएसएस जो कुछ कर रहा है वह कोई सीधा-साधा या सामान्य सा प्रयास नहीं है। उसका अंतिम तर्क यह होगा कि ‘‘हम सब हिंदू हैं अतः भारत हिंदू राष्ट्र है, अतः हमें हिंदू धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों और हिंदू साधु-संतों के निर्देष मानने हैं।’’

इस मुद्दे पर हमारा संविधान बहुत साफ है: हिंदू एक धार्मिक पहचान है जबकि भारत, राष्ट्रीय पहचान है। आरएसएस का न तो स्वाधीनता संग्राम से कोई लेनादेना रहा है और ना ही भारतीय संविधान में उसे कोई विशेष श्रद्धा है। आश्चर्य नहीं कि उसका एजेण्डा भारतीय संविधान की आत्मा और उसके प्रावधानों के ठीक उलट है। आरएसएस दरअसल देश पर हिंदू पहचान लादना चाहता है। संघ का अगला कदम क्या होगा, यह आरएसएस के एक अभ्यास वर्ग में हुए प्रश्नोत्तर से जाहिर है। आरएसएस के एक नेता यादवराव जोशी का कुछ दशक पहले का निम्नांकित कथन महत्वपूर्ण है और आरएसएस के असली एजेण्डे की झलक दिखलाता है। ‘‘प्रश्नोत्तर के दौरान एक स्वयंसेवक ने जोशी, जो कि उस समय आरएसएस के दक्षिण भारत प्रमुख थे, से जानना चाहा ‘हम कहते हैं कि आरएसएस एक हिंदू संगठन है। हम कहते हैं कि भारत हिन्दुओं का देश है। उसी सांस में हम यह भी कहते हैं कि ईसाई और मुसलमान अपने-अपने धर्मों का पालन करते रह सकते हैं बशर्ते वे भारत के प्रति वफादार रहें और देश से प्रेम करें। हमें यह छूट देने की क्या आवश्यकता है? हम यह क्यों साफ नहीं कहते कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और उसमें मुसलमानों और ईसाईयों के लिए कोई स्थान नहीं है।’ जोशी ने उत्तर देते हुए कहा, ‘वर्तमान में हिंदू समाज और आरएसएस इतने शक्तिशाली नहीं है कि हम ईसाईयों और मुसलमानों से यह कह सकें कि यदि उन्हें भारत में रहना है तो उन्हें हिंदू धर्म को स्वीकार करना होगा। या तो वे हिंदू बनें या मारे जायें। परंतु जब हिंदू समाज और आरएसएस पर्याप्त शक्तिशाली हो जायेंगे तब हम उनसे कहेंगे कि यदि वे भारत में रहना चाहते हैं और यदि वे भारत से प्रेम करते हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि कुछ पीढि़यों पहले तक वे हिंदू थे और उन्हें हिंदू धर्म में वापस आना होगा।’’

(http://www.caravanmagazine.in/reportage/rss-30#sthash.GmBGCZLQ.dpuf )

जो बात आरएसएस वर्षों से कहता आ रहा है, केन्द्र में मोदी के सत्ता में आने के बाद उसके सदस्य अब वही बात और जोर-जोर से साफ शब्दों में कह रहे हैं।

आरएसएस के मुखिया भागवत के बयान और आरएसएस के सदस्यों द्वारा टीवी पर आयोजित बहसों में जो भी कहा जा रहा है, वह भारतीय संविधान के मूल्यों के स्पष्टतः खिलाफ है। अतः आवश्यक है कि भारत के हम सभी नागरिक इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करें कि हम आखिर किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम उन मूल्यों और सिद्धांतों को पूरी तरह त्याग देना चाहते हैं जो हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और संविधान की रीढ़ हैं? इन सिद्धांतों और मूल्यों को हमें बचाए रखना है और देश को संकीर्ण ताकतों के हाथों का खिलौना नहीं बनने देना है। यही समय की मांग है।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

About राम पुनियानी

Ram Puniyani was a professor in biomedical engineering at the Indian Institute of Technology Bombay, and took voluntary retirement in December 2004 to work full time for communal harmony in India. He is involved with human rights activities from last two decades.He is associated with various secular and democratic initiatives like All India Secular Forum, Center for Study of Society and Secularism and ANHAD. He is Our esteemed columnist

Check Also

Ajit Pawar after oath as Deputy CM

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित किया

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: