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एक लोकतान्त्रिक परिघटना का समापन और दूसरी की शुरुआत

यदि मोदी अच्छे दिन नहीं ला पाये तो अगले चुनाव की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
सुन्दर लोहिया
    16 मई को अब इसलिए याद किया जायेगा  कि इस दिन एक का अंत हुआ और दूसरा भ्रूण में आ गया। कांग्रेस पार्टी को अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बडी हार का सामना करना पड़ा और इस अवसादपूर्ण अवसर पर सोनिया और राहुल के साथ वे चेहरे खड़े हुए नहीं दिखे जो कल तक चुनाव परिणाम के इंतज़ार की बात करके उन्हें ढाढस बन्धा रहे थे। जो परिणाम सामने आये हैं उनसे लगता है कि अब कांग्रेस का नेहरु गान्धी युग समाप्त हो चुका है। पार्टी का जो स्वरूप संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन के दूसरे और में उभर कर सामने आया उसमें कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना को त्याग कर मार्केट इकानाॅमी अपनाई। नई आर्थिक नीतियों के कारण उद्योगजगत की राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई और उन्होंने लाॅबिंग का सहारा लेकर सरकार पर अपना दबाव बनाना शुरु कर दिया। उद्योग स्थापित करके रोजगार के अवसर पैदा करने के नाम पर सस्ते दामों में ज़मीन हासिल करने के अलावा और कई प्रकार की रियायतें लेकर सरकार के खजा़ाने और किसानों की निजी सम्पत्ति पर कब्ज़ा कर लिया। रिलायंस कम्पनी को लाभ पंहुचाने और पूर्वनिर्धारित शर्तों को ताक पर रखकर उन्हें तेल और गैस की कीमतें बढ़ाने की खुली छूट दी गई। इस काम को करने के लिए कांग्रेस सरकार ने अपने बेदाग मन्त्री जयपाल रैड्डी को बदल कर मोइली को कार्यभार सौम्प दिया। मोइली ने न सिर्फ तेल औार गैस की कीमतें बढ़ाई बल्कि जो फाईल उनके पूर्व मन्त्री ने कम्पनी को समझौते की शर्तों की अवहेलना करते हुए कम उत्पादन करके सरकार के खज़ाने को प्राप्त होने वाले हिस्से में कमी लाने के लिए करोड़ों रुपये के जुर्माने की सिफारिश की थी उस फाइल को ही बन्द कर दिया। जब उन्चास दिनों की दिल्ली सरकार के नेता अरविन्द केजरीवाल ने मामला उठाया और सरकार पर चुनाव के दरम्यान तेल की कीमतें बढ़ाने से रोकने की कानूनी पहल की तो मामला थम गया था। इस बीच अम्बानी बन्धुओं को लगा कि उनकी चालाकी जगजाहिर हो गई है तो उन्होंने चुनाव में कांग्रेस से दूरी बना कर भाजपा को अपनाया। परिणाम जो मीडिया लोकतन्त्र का चौथा खम्भा बनकर जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का दावा करता है वह कारपोरेट पूंजीवाद का पांचवा दस्ता बन गया। यह तो गान्धी युग के खातमे की कहानी है और नेहरु युग को इस परिवार के दामाद ने समाप्त कर दिया। वैसे इस परिवार के दामाद देश की राजनीति में अखल देते आये हैं। फिरोज़ गान्धी ऐसे ही दामाद थे लेकिन वे ज़मीन की खरीद फरोक्त के बजाये अपने ससुर की ग़लत नीतियों की आलोचना किया करते थे। यह उस युग की समाप्ति का संकेत है। इसलिए अच्छा हो कि यह परिवार खुद अपने आपको पार्टी की नेतृत्वकारी भूमिका से अलग कर ले लेकिन इसके सक्रिय सदस्य बने रहें और पार्टी में छंटाई करते हुए उस नेतृत्व को आगे लाये जो नेहरु गान्धी की लोक हितकारी विरासत को विकसित कर सके।

दूसरे खेमे में फिलहाल जीत का खुमार है इसलिए वे आसन्न संकट को देखना पसंद नहीं करेंगे लेकिन जो प्रधानमन्त्री देश की दशा सुधारने के लिए साठ महीने मांग रहा है उसने अपने चुनाव अभियान में ऐसा कुछ नहीं बताया जिससे उसके सुशासन की दिशा का अनुमान लगाया जा सके। उनके बयानों का अधिकांश समय मां बेटे के राज की बुराइयां करने में लगाया। दामाद के बहाने गांधी परिवार पर भष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोप लगाते रहे। विदेशों में जमा कालाधन वापिस आना चाहिये लेकिन देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिये हुए ऋण को हड़प जाने वाली भारतीय कम्पनियों के विरुद्ध वे क्या करेंगे यह नहीं बताते। वे मंहगाई और बेराज़गारी दूर करने की बातें करते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि नई आर्थिक नीतियों के तहत इनसे कैसे छुटकारा पाया जा सकता है? न जाने कितने अर्द्धसत्य बोले गये लेकिन वह कहते रहे कि देश की सभी पार्टियां अकेले मोदी को हराने के लिए जुट गई हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि देश की धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली पार्टियां भी वाराणसी में उसके विरुद्ध अलग-अलग मोर्चा बनाये हुए थी। अफवाह फैलाने का काम तो वे बखूबी कर लेते हैं लेकिन इस बार उन्होंने अफवाहों के मुताबिक मीडिया माहौल बना कर यह करिश्मा कर दिखाया है। उन्होंने वायदा तो कोई किया नहीं है। घोषणापत्र को वे दूरगामी नीतियों का दस्तावेज़ बता चुके हैं। इस तरह तत्काल किसी तरह की कोई कारवाई करनी है यह ज़रुरी नहीं रह गया है। फिर भी वे अपना प्रभाव कायम करने के लिए गंगानदी की सफाई जैसा कोई कार्यक्रम शुरु कर दें तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन साठ दिनों के भीतर उन्हें अपनी सरकार का बजट पेश करना है उसी में आने वाले समय की आहट सुनी जा सकती है। उसके बाद जनता तय करेगी कि इन्हें बाकी के अठावन महीने देने हैं या नहीं। अब इनके पास पूर्ण बहुमत है जिसमें किसी घटक दल के दखल का सवाल ही पैदा नहीं होता।

यह बहाना नहीं बनाया जा सकता कि समुचित संख्या न होने के कारण वे काम अधूरे रह गये जिन्हें जनहित में तत्काल करने का आश्वासन चुनाव अभियान के दौरान दिये गये हैं। इनमें विदेशी बैंकों में छिपाये गये काले धन को वापस लाकर देश के विकास में निवेशित करने की घोषणा एक है। इस परिस्थिति में यदि मोदी अच्छे दिन नहीं ला पाये तो अगले चुनाव की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।

 

About the author

सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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