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एक सफ़दर- अनेक सफ़दर- हरेक सफ़दर

सफ़दर हाशमी- शहादत के पच्चीस बरस; “मजदूर वर्ग और संस्कृति”
सांस्कृतिक वर्चस्व का हमला और तीखा और सर्वग्रासी हुआ है वैश्वीकरण के इस दौर में
बादल सरोज

एक जनवरी 1989 को साहिबाबाद की मजदूर बस्ती में सीटू की हड़ताल तैयारी मुहिम में मजदूरों को जगाने में जुटे जन नाट्य मंच के एक नुक्कड़ नाटक पर जघन्य कायराना हमले में सफदर हाशमी मारे गये थे।

1989 की एक जनवरी की सुबह ठंड में साहिबाबाद में परचम उठाये मारे गये सफदर हाशमी की हत्या सांस्कृतिक कर्मी की शहादत भर नहीं है। यह वर्ग संघर्ष के एक ऐसे अगुवा नायक की शहादत है जिसने लड़ाई को ऊँचाई देने के लिये अपनी काबलियत झोंक दी थी। उसे आगे बढ़ाने के लिये महज 35 साल की उम्र में अपनी जान की आहुति दे दी थी। सफदर की शहादत की 25 वीं बरसी उनके योगदान के स्मरण, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ ही उस काम को जारी रखने का संकल्प लेने का अवसर भी है जिसे करते हुये वे मारे गये थे। सांस्कृतिक कर्म और प्रत्यक्ष व सीधे वर्गसंघर्ष को अलग-अलग समझना, उसके आपसी परस्पर पूरक रिश्तों की अनदेखी करना होगा और इस तरह सफदर हाशमी की शहादत के महत्व को न समझना होगा।

उसी साल कल्याणी में हुयी सीटू की वर्किंग कमेटी में सीटू संस्थापक अध्यक्ष बी टी रणदिवे ने इस शहादत को इस तरह याद किया था-
“हम अपने समर्पित कामरेड सफदर हाशमी के साहस और कुर्बानी को याद करते है। उन्होंने अपनी कला को मजदूर वर्ग व जनता की सेवा में लगा दिया था। हाशमी को गुण्डा गिरोह ने गाजियाबाद में उस वक्त मार डाला जब वे अपने प्रेरणादायी नाटक के जरिये मजदूरों को लामबन्द कर रहे थे। काँग्रेस राज में हुयी इस वीभत्सता की समूचे प्रगतिशील साहित्य जगत ने भर्त्सना की है। सफदर हाशमी द्वारा अपना जीवन बलिदान कर दिया जाना, शोषितों के हितों के साथ खुद को पूरी तरह जोड़ देना मौजूदा समाज के अन्यायों के खिलाफ संघर्षों का उनका जनून हमें मायकोवस्की की “कला की सेना के नाम” लिखी गयी कविता की इन पंक्तियों की याद दिलाता है;

सड़कें होंगी हमारी कूंचियाँ

खुले चौराहे हमारी रंगपट्टिकाएँ

सड़कों पर भीड़ों के बीच

निनाद स्वर गुंजित करेंगे

फ्यूचरिस्ट ढोल वादक और काव्य कला के उस्ताद”
मजदूर आन्दोलन या कहें कि दुनिया को बेहतर बनाने की कामनाओं वाले शोषितों के आन्दोलन का संस्कृति के साथ रिश्ता उतना ही पुराना है जितना मानव समाज। दुनिया में जो भी सृजित निर्मित हुआ है वह श्रम से ही हुआ है,  सिर्फ भौतिक स्थूल वस्तुएं ही नहीं शब्द, भाषा, लिपि, गीत, कहानी, नाटक, संगीत, चित्रकला और अभिव्यक्ति के बाकी वे सब रूप जिन्हें संस्कृति के चौखटे में बाँधकर किसी अभिजात्य ड्राइंगरूम में लटकाने की कोशिश होती है। पहली धुन उत्पादन की क्रिया में किये गये श्रम से उपजी थी हर भाषा के आरम्भिक शब्द क्रियाओं से उपजे और सर्वनाम, विशेषण से होते हुये संज्ञा तक पहुँचे। आदिवासी व समूची ग्रामीण संस्कृति में बीसियों पर्व त्यौहार, नाच गाने हैं जिनमें धान रोपने, सूत कातने, जमीन खोदने-जोतने-बोने व फसल काटने तक की सारी भंगिमायें समाहित हैं, भाव निहित हैं। वे अपने दर्शनीय रूप में और कुछ नहीं भौतिक उत्पादन की क्रिया के कलात्मक संकेत हैं, रूपक हैं, बिम्ब हैं। ऐसा अनायास नहीं है कि किसी भी भारतीय भाषा में नाविकों, जुलाहों, मछुआरों, सैनिकों, कैदियों, दास और दासियों के, आटा पीसती, धान रोपती, चरखा कातती, जूझती स्त्रियों के ही गीत समाज को याद हैं, सेठियों-राजाओं, रानियों के नहीं।

संस्कृति आकाश से टपकी कोई दैवीय वाणी या प्रणाली नहीं है। यह आचरण व लोकव्यवहार की समन्वित प्रणाली है। यह ऐसी मानवीय क्षमता है जो अपने अनुभवों से रचनात्मकता व कल्पना शक्ति, विचार करने की योग्यता हासिल करती है और उन्हें संकेतो के जरिये अभिव्यक्त करना जानती है। संस्कृति; ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जो लोगों को अर्थ देती है। दुनिया को समझने में उनकी मदद करती है। उनकी पहचान बनती है और उनके विश्वास व जीवन मूल्यों को परिभाषित करती है। यह लोगों की आपसी बोलचाल, बर्ताव, समझने-समझाने का पूरा अन्दाज है, तरीका है। संस्कृति बहुत व्यापक है। उसकी व्यापकता में जाने की बजाय संस्कृति के सिर्फ एक रूप, आम बोलचाल के शब्दों में प्रस्तुति कला-परफार्मिंग आर्ट- और मजदूर आन्दोलन के साथ उसके रिश्तों पर चर्चा सीमित रखते हैं। मगर ध्यान में रखना होगा कि संस्कृति सिर्फ प्रस्तुति कला-परफॉरमिंग प्रजेंटेशन नहीं है। यह समूचा लोकव्यवहार है। संस्कृति सिर्फ सायास या जानबूझकर की गयी अभिव्यक्तियाँ नहीं है, यह अनायास व सहज रूप से किया गया आचरण है।

जीवन की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ यदि जीवन की भौतिक उत्पादक क्रियाओं की प्रतिछाया हैं तो वे इस जीवन को भौतिक व सांस्कृतिक रूप से बेहतर बनाने की जद्दोजहद का औजार भी है। यदि रोने, विलाप करने व पछतावे के रागस्वर है तो आक्रोश, गुस्से और छटपटाहट की गूँज-अनुगूँज भी है। यही वजह है कि ये दोनों एक दूसरे को उर्जा देती हैं। एक दूसरे की पूरक और अविभाज्य हैं। ग्रीक, मिश्र, भारत और चीन सहित सभी प्राचीन सभ्यतायें इस तरह की गौरवशाली पारस्परिक पूरकता की गौरवगाथाओं से भी भरी पड़ी हैं। इस हिसाब से भी सांस्कृतिक कर्म सिर्फ सहायक कार्यवाही नहीं हैं, सप्लीमेंट्री नहीं है। मुख्य काम का ही एक अन्य रूप है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बिना सांस्कृतिक रूचि या सक्रियता वाला समाज, जनता व मजदूर आन्दोलन विकलाँग, अँधा, गूँगा और बहरा है।

खुद सफदर हाशमी ने लिखा था कि जब कोई मजदूर नुक्कड़ नाटक देख रहा होता है तब वह सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं होता। उसे देखते हुये जब वह हॅंसता है या तालियाँ बजाता है तो दरअसल वह एक तरह से प्रतिरोध की कार्यवाही में हिस्सा ले रहा होता है। निस्संदेह सांस्कृतिक कार्यवाही एक विशेषज्ञता है। यह अलग तरह का कौशल है जो अलग तरह के प्रशिक्षण की दरकार रखता है। उनके काम को आम काम मानना अतिसरलीकरण होगा। ऐसी विशेष योग्यता वाले दस्ते, समूह, संस्थान विकसित व तैयार किये जाने चाहिये। मगर ऐसा होने तक न तो इस काम को टाला जा सकता है ना ही सिर्फ विशेषज्ञों के लिये छोड़ा जा सकता है। हम सभी अपनी संघर्ष क्रिया के दौरान अनजाने में ही सही, किन्तु कलात्मक रूपों को चुन रहे होते हैं। श्रमिक आन्दोलन में हजारों या शायद लाखों ऐसे साथी मिल जायेंगे जिनसे गाना गाने या नाटक करने के लिये कहा जाये तो वे झेंप जायेंगे। मगर इन्हीं को नारे लगाते हुऐ देखिये, आपको वे आवाज को नीचा ऊॅंचा करते, गाते हुये- मुट्ठी उठाकर झूमते हुये एक सांगीतिक लय के साथ नारा लगाते-लगवाते दिखेंगे। वे सुर और अभिनय दोनों करते मिलेंगे। क्योंकि खुद संघर्ष कोई एकरस काम नहीं है। यह एक तरह की ड्रिल की दरकार रखता है। जाने अनजाने में वही ड्रिल सभी करते हैं, सभी को करनी होती है, क्योंकि संघर्ष न बोझ है न मजबूरी : संघर्ष जीवन है, और जीवन यदि सरस है, रोचक है दिलचस्प है, काव्यात्मक है तो संघर्षों को भी वैसा ही होना होता है। संघर्षों की रोचकता और विविधता से इसकी आकर्षकता व व्यापकता में वृद्धि होती है। व्यापक अर्थ में कहा जाये तो संस्कृति जिस तरह वर्ग संघर्ष है उसी तरह संघर्ष भी एक सांस्कृतिक कर्म है। प्राचीन से लेकर ताजे इतिहास तक के ऐसे अनेक अनुभव हैं जो इस पारस्परिकता को रेखांकित करते हैं।

मजदूर आन्दोलन के ताजे इतिहास में ऐसे न जाने कितने उदाहरण है। बंगाल में एक पुराने, नामी मजदूर नेता थे, जो गेट मींटिग में जो ढपली बजाकर गाते थे, ओढ़नी पहनकर नाचते थे और फिर भीड़ जुट जाने पर भाषण देते थे। सुकांत, नजरूल इस्लाम से लेकर उत्पल दत्त तक अनगिनत सांस्कृतिक कर्मी मजदूर आन्दोलन के भी योद्धा के रूप में दिखते हैं। हिन्दी पट्टी के ही कुछ शहरों के मजदूर आन्दोलनों को सरसरी निगाहों से देखने में ही कानपुर में शील जी से लेकर रामकुमार कृषक, दिल्ली में कांतिमोहन से लेकर रमेश रंजक, उज्जैन में मानसिंह राही से लेकर मोहम्मद इब्राहिम, मो0 हुसैन, ग्वालियर में उद्धव कुमार कौशल से जाँ निसार अख्तर, निदा फाजली, शमीम फरहत होते हुये वकार सिद्धीकी व रऊफ जावेद, मुम्बई में शैलेन्द्र से लेकर इप्टा की भरी पूरी युगांतरकारी मंडली तक, भोपाल में ताज भोपाली – कैफ भोपाली से गुजरे ताजे वक्त में शलभ श्रीरामसिंह तक, कोटा में जमुनाप्रसाद ठाड़ा राही, हरीश भादानी, बृजेन्द्र कौशिक, शिवराम तक, हर मजदूर आन्दोलन को शब्द, छंद, भाव, रूप देने वाले मिल जायेंगे।

कबीर से लेकर मखदूम मोहियुद्दीन होते हुये बाबा नागार्जुन तक हर युग में प्रतिरोध के संघर्षों को सांस्कृतिक कर्मियों ने ऊर्जा दी है, शब्द दिये हैं, तो संघर्षों ने भी ऐसे हजारों हजार रचनाकार दिये हैं। सकारात्मक संघर्षों की कोख से साहित्य, गीत, नाटक व रचनाएँ प्रसूत हुयी हैं। संघर्षों की बड़ी उथल-पुथल ने बड़ी-बड़ी रचनाएँ दी हैं। चालीस से सत्तर तक का दशक साहित्य और यहाँ तक कि फिल्म माध्यम का सर्वश्रैष्ठ दौर ऐसे ही नहीं था। फैज अहमद फैज, मंटो, मजाज, ख्वाजा अहमद अब्बास आदि की जन्म शताब्दियों के वर्ष में इस पारस्परिकता की याद दिलाना जरूरी नहीं है।

भवभूति से लेकर बेख्त तक हावर्ड फास्ट, राल्फ फॉक्स से लेकर सफदर तक संघर्ष की अविस्मरणीय पहचान इसलिये है क्योंकि एक कच्चे से कच्चा नाटक भी पक्के से पक्के भाषण की तुलना में ज्यादा संप्रेषणीय होता है। वह एक साथ उसकी तात्कालिक स्थिति की सहज समझ में आने वाली शैली में प्रस्तुति कर रहा होता है, वहीं उसकी रूचि का परिष्कार करते हुये उसे ऊॅंचा आयाम देने की कोशिश भी कर रहा होता है। एक कमतर शिल्प और शब्द सौन्दर्य वाली कविता बीसियों’-पचासों यहाँ तक कि सैंकड़ों वर्ष तक संघर्षों का झण्डा बनी रहती है। किसी मेहनत से लिखे गये, सारगर्भित सटीक दस्तावेज की तुलना में ज्यादा याद रहती है। क्योंकि सबसे ज्यादा कारगर होता है सहज व सरल होना। क्योंकि सबसे ज्यादा मुश्किल होता है आसान होना। क्योंकि सबसे ज्यादा दमदार, शक्तिशाली और ऊर्जामय होते हैं अनुभवों के गीत। ट्रेड यूनियन आन्दोलन के हर जत्थे के पास इस तरह के अपने खुद के अनेक उदाहरण हैं, इसलिये उनके जिक्र की जरूरत है न जगह।

सांस्कृतिक अभिव्यक्ति वर्ग संघर्ष में एक क्षमतावान, कारगर व मारक जरिया है। यह अगर शासक वर्गों के लिये खतरनाक नहीं होता तो वे सफदर हाशमी को नहीं मारते। एम.एफ.हुसैन की गैलरी पर तोड़-फोड़ नहीं करते, वली दकनी की मजार को जमीदोंज नहीं करते, ईराक में बगदाद की हजारों साल पुरानी लाइब्रेरी से लेकर मुम्बई की भण्डारकर लाइब्रेरी तक को आग नहीं लगाते, बुद्ध के स्तूपों और ग्रन्थों के पीछे लाठी फावड़े लेकर नहीं दौड़ते। मनु, गौतम और शुक्र महाराजों को स्मृतियाँ और संहिताएँ नहीं लिखनी पड़ती ! अगर इस माध्यम की इतनी प्रामाणिकता व मारकता है तो इसकी हिफाजत व विस्तार मजदूर आन्दोलन के लिये उतना ही जरूरी कार्यभार भी है।

सबसे अहम बात यह है कि इस सबका मजदूर आन्दोलन के लक्ष्य, उद्देश्य व तरीके से सीधा सम्बंध है। वर्गीय समाज में अन्य सभी की तरह संस्कृति की भी वर्गीय भूमिका है। यह चेतना का हिस्सा है, जो उसी के समाज के ऊपरी ढाँचे का एक रूप है तो कहा जा सकता है कि आधार (बेस) से मुक्ति पहले जरूरी है। मगर यह मशीनी समझदारी सिर्फ मशीनों के कलपुर्जों के बारे में ही सच हो सकती है, जीते जागते सोचते विचारते मनुष्य समाज के सन्दर्भ में नहीं। बेस और सुपर स्ट्रक्चर की नींव, और बिल्डिंग की बात कहने वाले ने भी इस बारे में सजग किया था। लगातार पानी की बौछारें व सूरज की तपिश बरसेगी तो नींव भी कमजोर होगी। वहीं छत अगर वाटरप्रूफ होगी तो नींव का जीवन भी बढ़ेगा। गरज ये कि व्यवस्था बदलाव के हामी मजदूर आन्दोलन को सिर्फ नींव से नहीं छतों-दीवारों, खिड़कियों-रौशनदानों सभी से लड़ऩा होता है।

ग्राम्शी के शब्दों में शासक वर्ग अपना वर्चस्व दमन के जरिये ही कायम नहीं रखते। वे आम राय, आम सहमति भी थोपते हैं- रचते हैं। झूठी चेतना रचते हैं जो दमनकारियों के दमन और लूट को जायज तथा अपरिवर्तनीय ठहराती है। वे अपना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करते हैं। लिहाजा लड़ाई सिर्फ आर्थिक शोषण व दमन वाली सत्ता के वर्चस्व के विरूद्ध ही नहीं, उसके सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ भी करनी होगी। नियतिवाद, शोषण की अपरिहार्यता व शाश्वतता के रचे गये उसके झूठे तिलिस्म को तोड़ऩे के लिये भी लड़ऩी होगी।

सीटू के संस्थापक अध्यक्ष और इस देश के मजदूर आन्दोलन के पुरोधा बीटी रणदिवे कहा करते थे कि कारखाने में मालिक के शोषण के खिलाफ जुझारू संघर्ष में शामिल मजदूर घर में पत्नी, बेटी, बहिन सहित अन्य मामलों में सामन्त होता है। फैक्ट्री के गेट पर दुनिया के मजदूर की एकता की दुहाई लगाता है मगर गाँव, बस्ती, मोहल्ले में जातिगत अहंकार का शिकार होता है। मार्क्स के शब्दों में हमें न केवल जीवित, बल्कि मरी हुयी चीजें भी सता रहीं हैं। मर चुकी, गुजर चुकी पीढ़िय़ों की परम्परा, जीवित मनुष्यों के दिमागों पर दु:स्वप्न की तरह लदी रहती हैं।

यह पुराने से लेकर नवीनतम तजुर्बों से भी हमें पता है कि यह सारे विकार हमारी प्राकृतिक व स्वाभाविक वर्गीय एकता को भुलाने के लिये शासक वर्गों के हथियार बने हुये हैं। मजदूर आन्दोलन का काम इस प्राकृतिक व स्वाभाविक वर्गीय एकता को उभारना है। देखा जाये तो हमारा काम ज्यादा सहज और आसान है मगर यदि इसे नहीं किया, प्राथमिकता पर नहीं लिया तो इस सहित बाकी के इसके पहले वाले काम भी ज्यादा कठिन और कभी-कभी तो नामुमकिन भी हो सकते हैं।

सांस्कृतिक काम इस जाले को साफ करने का- एकमात्र सहज औजार है। सहज इसलिये कि मनुष्य की भूख सांस्कृतिक भी होती है। तमाम तीज त्यौहारों पर्वों में उसकी बढ़चढ़ कर भागीदारी का मुख्य आधार यही सांस्कृतिक भूख होती है। जरूरत इनमें शामिल होने की नहीं, बल्कि बेहतर स्वादिष्ट, पाचक, पौष्टिक व्यंजनों से इस भूख को बढ़ाने की है। इसे नहीं किया गया, खालीपन को सुगन्ध से नहीं भरा गया तो गटर की दुर्गन्ध उसे भरेगी। जीवन में उल्लास और विजय के विश्वास के गीत-गीतिकायें नाटक इसे नहीं भरेंगे तो बीड़ी जालइले, जलेबी बाई और लुंगी डाँस इस रिक्ति को पूरेंगे और तब जो होगा उसका ट्रेलर 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली की सड़क पर चलती बस में निर्भया-दामिनी के साथ हुये के रूप में देखा जा चुका है।

वैश्वीकरण के इस दौर में सांस्कृतिक वर्चस्व का हमला और तीखा और सर्वग्रासी हुआ है। इतिहासकार एरिक हॉब्सवॉम के शब्दों में पिछली तीस सालों में रहनसहन जीवनशैली सोच-व्यवहार और सांस्कृतिक क्षेत्र में जितना बदलाव हुआ है, उतना मानव सभ्यता में इतने कम समय में पहले कभी नहीं हुआ। हमारा दौर सूचना तकनीक के विस्फोट का दौर है। आमतौर से दिखाया बताया जाने वाला इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा गया मिथिहास होता है। खुद ऐसे इतिहास की भी मान्यता है कि तकनीक जिसके नियन्त्रण में होती है वह अपने लाभ मुनाफे के लिये ही इसका इस्तेमाल करता है, समाज की बेहतरी के लिये नहीं। लोगों के लिये माल ही नहीं, माल के लिये लोग भी पैदा किये जा रहे हैं। मशीनी, आत्मकेन्द्रित, आपराधिक व्यक्तित्व गढ़े जा रहे हैं।

अभिव्यक्ति के सारे माध्यम, सारे-स्पेस- उनके कब्जे में हैं। सभागार मैदान, बगीचे, मीडिया का सांस्कृतिक भूगोल वे हड़प चुके हैं। छपाऊ

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