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ऐसा दूसरा सरदार फिर कब मिलेगा ?

चंचल
खुशवंत सिंह से जितनी बार मिला उतनी बार नया रंग मिला। पहली मुलाक़ात 1972 के आसपास की है। हम फाइन आर्ट्स के विद्यार्थी थे। हमने कार्टून और कैरीकेचर को पसंद किया और उसी के तहत हमें आर के लक्षमन से कुछ सीखने के लिए बंबई जाना पड़ा।

टाइम्स बिल्डिंग पहुंचा। कई लोग पूर्व परचित रहे उनमे से धर्मवीर भारती जी , गणेश मंत्री जी प्रमुख थे। हमने भारती जी कहा कि हमें आर के लक्ष्मण से मिलना है। भारती जी हँसने लगे। बोले असंभव है। वह संपादकों तक से नहीं मिलते। तुम्हे ट्रेनिंग लेना ही है तो एक और प्रसिद्ध आर्टिस्ट हैं- मारियो मिरांडा। उनसे मिलो शायद वह कुछ मदद कर दें। और इसके लिए तुम सरदार खुशवंत से पहले मिलो। उन दिनों खुशवंत जी वीकली के संपादक थे। भारती जी ने ही खुशवंत के बारे में बताया कि उनका दरवाजा खुला ही रहता है।बेहिचक मिलो।

हम डरते -डरते खुशवंत जी के कमरे में गए। खुशवंत जी कुछ पढ़ रहे थे। उनकी निगाह हम पर पड़ी तो तो बोले बैठिये। हम बैठ गए। जब अपना काम निपटा चुके तो बोले-हाँ बताइये।हमने अपना परिचय दिया। फिर आने का कारण बताया। एक मिनट सोचने के बाद बोले- हम तुम्हारी मदद तो कर सकते हैं, लेकिन वह मानेगा कि नहीं यह नहीं कह सकता। और तुम इतनी दूर आये हो तो चलो मारियो से मिलवा देता हूँ। कह कर खुशवंत सिंह उठे और वह पेपर हाथ में लिए बाहर निकले जिसे पढ़ रहे थे। पहले अपने सब एडिटर की मेज पर गए और उस कागद को देकर कुछ हिदायतें दीं और फिर हमें लेकर आगे बढ़े। खिड़की के पास एक किनारे मारियो बैठे कुछ रेखाचित्र बना रहे थे। खुशवंत जी ने हमारा परिचय ऐसे कराया जैसे वे हमें बहुत पहले से जानते हों। मारियो सुनते रहे। और अपनी सहमति दे दी। तीन महीने रहा। और अक्सर खुशवंत जी से मुलाक़ात हो जाती। बाद में मिलना बंद हो गया। हम बनारस लौट आये।

लंबे अंतराल के बाद जब नयी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से राजेश खाना चुनाव चुनाव मैदान में उतरे तो एक दिन रात में हमने कहा कि काका चलिए खुशवंत जी से मिला जाय। उन दिनों खुशवंत जी की अड्डेबाजी ली मेरेडियन में होती थी। बार में बैठे खुशवंत जी पी रहे थे। वहाँ पहली बैठक जमी। और अकसर जमती रही। खुशवंत जी हँसने और हंसाने के उस्ताद थे। हमें फक्र है कि हम खुशवंत जी के साथ खुल कर ठहाके लगाए हैं।
एक दिन राजेश खन्ना ने किसी सन्दर्भ में यह बता दिया कि हम जार्ज के बहुत नजदीक हैं। खुशवंत जी संजीदा हो गए। चुप रहे। अचानक जोर का ठहाका लगाए। बोले सुनो काका ! इस होटल में जहां हम मुफ्त में पी रहे हैं अगर उसे यह मालूम हो जाय कि इसमें एक जार्ज का भी आदमी है तो हम सब को बाहर का रास्ता दिखा दिया जायगा। फिर जार्ज पर खुशवंत ने जम कर बोला। बहुत तारीफ़ की। और जो सुनाया उसे उन्होंने लिखा भी। उसे फिर कभी।
हम जानते हैं खुशवंत जी आप जाते हुए भी हंस रहे होंगे, लेकिन हमारी आँखे नम हैं। ऐसा दूसरा सरदार फिर कब मिलेगा ? गुड बाय।.. श्रधांजलि नहीं नहीं दे रहा हूँ। अभी नहीं मरोगे।

About the author

चंचल। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चित्रकार व समाजवादी आंदोलन के कर्णधार हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे चंचल जी रेल मंत्रालय के सलाहकार भी रहे हैं।

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