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ऐ मीडिया बाबू,किस खेत में है यह लहर ?

433 में से 170 पर जमानत नहीं बचा पाई थी भाजपा 2009 में
महेश राठी
मीडिया विशेषकर टीवी मीडिया पर भाजपा का लहर गान है कि रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। हरेक मिनट टीवी चैनलों पर भाजपाई विज्ञापनों की आमद के बढ़ने के साथ ही आम चुनावों के छह चरण के मतदान के बाद कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया ने भी अब लहर गान को सुनामी गान में बदल दिया है। लहर गान के सुनामी गान में बदल जाने की तर्ज पर ही भाजपाई नेताओं की जीत के दावों में भी अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है। मगर दोनों के सूचकांक में उछाल की यह समानता अब हास्यास्पदता की सीमाओं में प्रवेश कर चुकी है। अभूतपूर्व जीत के दावों की स्वयंभू दावेदारी का विश्लेषण यदि विगत चुनावों में भाजपा को प्राप्त मतों और सफलता के आधार पर करें तो यह लहर सुनियोजित और प्रायोजित हवाबाजी में बदलती दिखाई देती है।
यदि भाजपा को 2009 में प्राप्त मतों का विस्तार पूर्वक विश्लेषण किया जाए तो उसके जनाधार की वास्तविकता जाहिर हो जाती है। विगत आम चुनाव 2009 में भाजपा ने लोकसभा की कुल 433 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें 170 सीटों पर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा अपनी जमानत भी नहीं बचा सका था। अर्थात कुल 263 सीटों पर ही भाजपा की जमानत बच सकी थी और जमानत बचने का अर्थ यह भी नहीं है कि उसे प्राप्त मतों की संख्या जमानत बचने के आसपास अथवा काफी बड़ी थी। भाजपा को मिलने वाले मतों की संख्या कई सीटों पर आश्चर्यजनक ढंग से बेहद कम थी तो कही वोट बंट जाने के कारण 20-24 प्रतिशत मतों के आधार पर ही उसकी जीत संभव हुई थी। 433 में से 202 सीटें ऐसी थी जिस पर भाजपा बामुश्किल डेढ़ लाख के आंकड़ें तक ही पहुँच सकी थी जबकि इनमें से कई सीटों पर जीत हासिल करने वाले विरोधी उम्मीदवारों को 3 से 4 लाख तक मत हासिल हुए थे। इसके अलावा इन 202 सीटों में 50 सीटें ऐसी थी जिस पर भाजपा 1 लाख से भी कम वोटों में सिमट गई थी। इस 1 लाख के आंकड़ें में भी अधिसंख्य सीटें ऐसी हैं जहां प्रमुख विपक्षी दल की प्राप्त मत संख्या 70 हजार से कम थी। इसके बाद 50 हजार से भी कम वोट पाने वाली सीटों की संख्या भी 50 थी और जिन सीटों पर भाजपा को 30 हजार से भी कम वोट प्राप्त हुए वह संख्या भी 44 थी। साथ ही देश भर में 14 सीटें ऐसी भी थी जहां भाजपा 10 हजार के आंकड़ें को भी नही छू पाई थी। इसमें आंन्ध्र प्रदेश, जम्मू कश्मीर में कुछ ऐसी भी सीटें थी जहां भाजपा महज 2-3 हजार के आंकड़े में ही सिमट कर रह गई थी। वैसे भाजपा को सबसे कम 247 वोट लक्षद्वीप में प्राप्त हुए थे।
इन प्राप्त मतों के आंकड़े में एक दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि इस चुनाव में कम से कम बिहार और असम में उसके 2009 के वह सहयोगी जिनके जनाधार पर खड़े होकर बिहार और असम में उसने प्रभावी प्रदर्शन किया था वह अब उसका साथ छोड़ चुके हैं। बिहार में अति पिछड़े, महादलित और अल्पसंख्यक वोट मिलने का कारण नीतीश कुमार थे और अब गिरिराज सिंह सरीखे भूमिहारों के वर्चस्व वाली भाजपा वर्तमान चुनाव में उस वोट को प्राप्त करने की सिर्फ कल्पना ही कर सकती है। यदि बिहार में भाजपा की कोई लहर होती तो कांग्रेस-राजद गठबंधन में हाशिये पर धकेल दिये गए और 2009 में एक भी सीट हासिल नहीं कर पाने वाले रामविलास पासवान को भाजपा 10 सीटें तोहफे में नहीं देती।
कमोबेश यही स्थिति असम में भी है। असम में पिछले आम चुनाव में भाजपा का असम गण परिषद के साथ गठजोड़ था जिसके कारण वह प्रदेश में कुछ सीटें हासिल कर पाई थी। परंतु इस चुनाव में अगप समझ चुकी है कि उसे पूर्व में किये गए गठजोड़ का कोई लाभ नही वरन् नुकसान ही हुआ है और भाजपा को इसका भरपूर लाभ मिला था। इसीलिए अबकी बार तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा को अकेले ही मैदान में उतरना पड़ा है। यदि असम के चुनाव विश्लेषकों की माने तो पिछले चुनाव के मुकाबले असम में भाजपा को नुकसान होना तय है और कोई भी लहर उसे यह नुकसान होनी से बचा नही सकती है।
अपने चिर परिचित बड़बोले अंदाज में भाजपा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और अन्य नेता इस नुकसान पर पर्दा डालने के लिए कह रहे हैं कि उनके गठबंधन में 28 सहयोगी हैं। परंतु इस गठजोड़ का दिलचस्प पहलू यह है कि अकाली दल, पासवान, शिवसेना को छोड़कर देश में कोई इनका नाम भी नहीं जानता है। इन नए सहयोगियों का प्रभाव कुछ राज्यों के अलग अलग कुछेक जिलों को छोड़कर कहीं नहीं है। वास्तव में यह भाजपा की अपने सांप्रदायिक अछूतपन को ढंकने की एक राजनीतिक कोशिश भर है जो कभी किसी व्यापक गठबंधन की शक्ल प्राप्त नही कर सकता है।
भाजपा की कोशिश बिहार और उत्तर प्रदेश को केन्द्रित कर 2014 के इस महासमर को जीतने की थी। बिहार में बेशक वह कितने ही बड़े दावे करें मगर नितिन गड़करी के इस बयान से कि बिहार के डीएनए में जातिवाद है, से भाजपा की हार की स्वीकारोक्ति और अनुगूंज स्पष्ट सुनाई देती है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष का यह बयान उनकी और उनकी पार्टी की हताशा को स्पष्टतया अनुवादित करता है।
अब भाजपा में मोदी के हमराज सेनापति अमित शाह और भाजपाई नेताओं की निगाह उत्तर प्रदेश पर आकर टिक गईं हैं। मगर उत्तर प्रदेश की कहानी भी कम रोचक नहीं है। इसे चाहे हम आंकड़ों की जुबानी सुने अथवा दल बदल के आईने से देखें भाजपा के दावों की वास्तविकता उजागर हो ही जाती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने चुनावी गठजोड़ के तहत 2 सीटें अपना दल को दी है अर्थात भाजपा कुल मिलाकर 78 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इन 78 सीटों में 28 सीटें ऐसी हैं जिसमें हिन्दी भाषी प्रदेशों को अपना मजबूत आधार अथवा गढ़ कहने वाली भाजपा एक लाख के आंकड़े तक भी नही पहुँच सकी थी और इनमें भी 7 सीटें ऐसी हैं जहां भाजपा के लिए 50 हजार का आंकड़ा भी छूना मुश्किल हो गया था। इसके अलावा प्रदेश की 4 सीटें ऐसी भी हैं जहां विकास की चासनी में हिन्दुत्व परोसने वाली पार्टी को 30 हजार का आंकड़ा छूना भी दूभर हो गया था।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के मजबूत जनाधार की हवाबाजी की कहानी यहीं नही ठहर जाती है। प्रदेश की 10 सीटें ऐसी थी जहां भाजपा जीत से दूर 1.30 के आंकड़ें के नीचे ही सिमट गई थी और लगभग 10 सीटों में यह पार्टी 1.30 से 1.55 हजार के आंकड़े पर ही आकर ठहर गई थी। अब हिन्दी प्रदेश में अपने मजबूत आधार के दम पर लहर के दावे करने वाली पार्टी 2009 के आम चुनावों में 48 सीटों पर दौड़ से बाहर रहने के बावजूद भी किसी लहर के दावे करे तो इसे हास्यास्पद दावा नही कहेंगे तो क्या कहेंगे? इसके अलावा इस लहर की हवाबाजी का एक और दिलचस्प पहलू यह भी है कि प्रदेश की 78 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा के 40 के लगभग उम्मीदवार आयतित हैं। वैसे यह बड़बोली भाजपाई राजनीति और ऐड-नीति के बिल्कुल अनुकूल भी है। इस आयतित माल के दम पर लहर का सबसे अनोखा उदाहरण मुजफ्फरनगर के भाजपा उम्मीदवार संगीत सोम हैं। जिस संगीत सोम को भाजपा हिन्दू हित रक्षक चैंपियन के बतौर पेश कर रही है वह पिछले आम चुनाव में मुजफ्फरनगर से ही सपा के उम्मीदवार थे और वही आजम खान उनके आदरणीय नेता थे जिनको सोम देशद्रोही कहकर खबरों में बने रहने की कोशिश करते हैं। सलेमपुर, कैसरगंज, सीतापुर, आंवला, हरदोई, धौरहरा, मिश्रिख, मोहनलाल गंज, इटावा, हमीरपुर, बलिया आदि 40 से भी अधिक ऐसी सीटें हैं जहां भाजपा को अपने पुराने और स्थापित नेताओं पर विश्वास नहीं है कि वह कोई लाभप्रद परिणाम पार्टी को दे पायेंगे। लहर से सुनामी बन चुकी तथाकथित मोदी लहर के बावजूद भी भाजपा की लाचारी देखिए कि वह अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं है और दल-बदल के इस खेल में ना उसे दागियों को शामिल कराने में गुरेज है ना ही दुर्दांत अपराधियों को अपना बनाने में शर्म आ रही है। दागियों और अपराधियों के लिए पलक पावड़े बिछाने वाली राजनीति के सुपरमैन मोदी पांखड के नए मानक स्थापित करते हुए कह रहे हैं कि चुनाव जीतने के बाद वह सारे दागियों को जले भेज देंगे। अब दागियों पर दांव खेलने वाली भाजपा ही बता सकती है कि उनकी निगाह में दागियों की यह नई परिभाषा क्या है? रअसल तमाम विरोधाभासों के बावजूद मोदी लहर के इस माहौल को गढ़ने की कोशिश कॉर्पोरेट मीडिया, प्रायोजित सर्वे और भाजपा की जुगलबंदी का नतीजा है। असल में देश के तमाम राष्ट्रीय और प्राकृतिक संसाधनों को जिस बेशर्मी के साथ कांग्रेस नीत यूपीए-2 के शासनकाल में कॉर्पोरेट द्वारा हथियाया गया उससे कॉर्पोरेट घराने की आकांक्षाओं को नए पंख लग गए हैं और अब देशी विदेशी कॉर्पोरेट विकास के नाम पर बाकी बचे संसाधनों पर काबिज होकर इस लूट को नई ऊँचाईयां देने की फिराक में है। इसी क्रम में देश के मीडिया ने यूपीए-2 की जन विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों और नव उदारवाद की विफलताओं के कारण के रूप में विकास की धीमी गति और नीतिगत अपंगता के रूप में पेश करने का काम किया है। साथ मीडिया ने लंबे समय से इस नीतिगत अपंगता से निकलने और विकास को गति देने के लिए मजबूत नेता और कड़े निर्णयों की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए प्रचार करने का काम किया जिससे एक देश के एक वर्ग विशेष में तथाकथित मजबूत नेता और उसके कड़े फैसलों के लिए जगह बनाई जा सके। जाहिर है मीडिया द्वारा तैयार मजबूत नेता का यह खाका भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को ही ध्यान में रख खींचा गया था और कड़े फैसलों का अर्थ होगा नव उदारीकरण की राह पर चलते हुए बचे हुए संसाधनों और राष्ट्रीय संपत्ति का निजीकरण। विकास के इस कार्पोरेट माॅडल को लागू करने की तैयारियों के क्रम में ही कुछ कॉर्पोरेट घरानों देश के विख्यात मीडिया घरानों पर कब्जे करने की मुहिम तेज की और उसके उपरांत वह पहले तैयार पटकथा के अनुसार ही मोदी लहर अर्थात् कॉर्पोरेटी विकास को सुर देने में लग गए।
परंतु बड़ा सवाल यह है कि तथाकथित विकास और सुशासन की चासनी में लिपटी हिन्दुत्व की यह लहर उन जातीय सवालों, विभाजन और प्रतिरोध को कैसे खत्म कर पायेगी जिसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण के दम पर ही उनकी यह शोषणकारी व्यवस्था जिंदा है?

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महेश राठी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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