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ओम थानवी का पत्रकारिता क्राइम

क्या धर्मवीर का प्रेमचंद पर जैसा लेख अज्ञेय पर भी छापेंगे ओम थानवी ?

थानवी जी आप धन्य हैं और हमें धिक्कार है !

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी इन दिनोँ अपने अखबार में प्रतिक्रियावादी संपादन कला का चरम प्रदर्शन कर रहे हैं। जनसत्ता मेँ धर्मवीर का लेख छपा है जिसमें घिनौने ढंग से प्रेमचंद पर हमला किया गया है। सवाल यह है कि ओम थानवी ऎसा क्योँ कर रहे हैं ? क्या वे अज्ञेय पर ऎसा लिखा लेख छापेंगे?

ओम थानवी को हिंदी के यशस्वी संपादक के रूप में जाना जाता है। इनके संपादन काल मेँ जनसत्ता ने निराला, प्रेमचंद, अमर्त्य सेन की प्रगतिशील परम्परा पर जमकर हमले किये और प्रगतिशीलोँ ने चुप रहकर तमाशा देखा। थानवीजी आप धन्य हैँ ! हम सब आपकी संपादन कला के कायल हैँ ! आपके ‘संपादकीय ज्ञान’ को तो देश में मानक बना दिया जाये!

थानवीजी सोचें कि आपको जो दिखता है वह अन्य संपादकों को क्यों नहीं दिखता ? आप धन्य हैं और हमें धिक्कार है !

जनसत्ता अखबार का हिन्दी लेखकों और बुद्धिजीवियों को बदनाम करने के लिये जिस तरह दुरूपयोग किया जा रहा है वैसा सम्भवतः अन्य किसी अखबार में ट्रेंड देखने में नहीं आया है। साहित्यकार का अपमान करना असल में साहित्यकार के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है और यह प्रवृत्ति स्वभावतः जनविरोधी है।

ओम थानवी का हिंदी गैंग नंगेपन और इरेशनल ढँग से जनसत्ता का हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखकों के खिलाफ सुनियोजित अभियान चला रहा है उसकी सभी ओर से फेसबुक आदि इंटरनेट माध्यमों में जमकर आलोचना होनी चाहिए।

यह गैंग हिंदी लेखन की श्रेष्ठ परंपराओं पर सुनियोजित हमले कर रहा है और यह सीधे अखबार के संसाधनों का दुरूपयोग है।

ओम थानवी और जनसत्ता का प्रिंट क्राइम यह है कि उन्होंने एक थर्ड ग्रेड लेखक के लिखे आधारहीन लेखों के जरिए प्रेमचंद का चरित्रहनन किया है। यह पीत पत्रकारिता है। ओम थानवी सुनियोजित ढँग से उदार विचारों के लेखकोँ पर हमले करवा रहे हैँ। इन हमलों से कंजरवेटिव संगठनों और विचारों को मदद मिल रही है। ओम थानवी ने जनसत्ता के पन्नों का प्रेमचद को कलंकित और अपमानित करने के लिये दुरुपयोग किया है। थानवी ने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर प्रेमचंद के खिलाफ अपशब्दों और गालियाँ तक छापी हैं। गालियोँ को पत्रकारिता का अंग बनाने के लिए थानवी को पद्मविभूषण दिया जाय।

ओम थानवी को प्रेमचंद से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। उनके लिए प्रेमचंद का पहला सबक, लेखक और नागरिक का सम्मान करो और सम्मानजनक भाषा में लिखो। दूसरा सबक, साहित्य खासकर फिक्शन में लेखक के जीवन का नहीं सामाजिक जीवन का सच सर्जनात्मक अभिव्यक्ति पाता है, उसे जीवन की जीरोक्स कॉपी न समझा जाय। तीसरा सबक, पत्रकारिता और खासकर साहित्यिक पत्रकारिता को गम्भीर, सोद्देश्य और जनोन्मुख होना चाहिए। अखबारों को कु-प्रचार, कु-विचार और कु-भाषा से बचना चाहिए।

Munshi Premchand

हम ओम थानवी को चुनौती देते हैं कि वे हमारे राष्ट्रपति के खिलाफ गाली-गलौज या चरित्रहनन की भाषा में बेसिर पैर की बातों वाला लेख किसी भी स्वनामधन्य धर्मवीर से लिखवाएं और जनसत्ता में छापें फिर देखते हैं कि प्रेस कौंसिल और भारत सरकार उनकी कैसी गति बनाती है। लेखक और संपादक जेल के सीखचों में रहते हैं या बाहर ?

प्रेमचंद साहित्य सम्राट हैं और उनके खिलाफ लिखे गये अपशब्द भी उसी प्रकार दण्डनीय अपराध की कोटि में आते हैं जिस तरह भारत के राष्ट्रपति- प्रधानमंत्री के खिलाफ लिखे गये अपशब्द या गाली-गलौज अपराध की कोटि में आते हैं।

साहित्यकार के खिलाफ कुछ भी अपमानजनक लिखना जनसत्ता में दैनंदिन घटना हो गयी है। उल्लेखनीय है कि विगत 10 साल से भी ज्यादा समय के दौरान प्रेमचंद पर जितने अपमानजनक लेख जनसत्ता ने एक ही लेखक धर्मवीर के छापे हैं, उस तरह के लेख अन्यत्र किसी बड़े अखबार ने नहीं छापे हैं। ओम थानवी का पत्रकारिता क्राइम यह है कि वे साहित्यकार का निरंतर अपमान करनेवाले लेख सुनियोजित ढँग से लिखवाकर छपवाते रहे हैं। हम माँग करते हैं जनसत्ता में प्रेमचंद पर प्रकाशित अपमानजनक लेख के लिए संपादक ओमथानवी माफी माँगे, और इस तरह के अनर्गल, आधारहीन और गालियों वाले लेखक जनसत्ता में छापना बंद करें।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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