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…और उप्र को गुजरात बना दिया गया

आज़म शहाब

मुजफ्फरनगर दंगों में भाजपा की कथित भागीदारी और समाजवादी पार्टी की आपराधिक लापरवाही के तथ्य की अगर समीक्षा की जाये तो यह बात स्पस्ट रूप से महसूस की जा सकती है कि उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने के संघी फार्मूले को लागू करने की ये एक सफल प्रक्रिया थी, जिसका उद्देश्य राज्य में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को चौड़ा करते हुये 2014 के चुनाव की फसल काटनी है। इस संघी फार्मूले पर अमल की शुरुआत जून 2012 में मथुरा के कोसी कलां में हुये दंगों से हो गयी थी, जिसमें कलुवा और भूरा नामक दो जुड़वा भाइयों को बिल्कुल उसी अंदाज में जिंदा जला दिया गया था जिस तरह से गुजरात के दंगों में सैकड़ों मुसलमानों को जलाया गया था। कोसी कलां का दंगा, संघ परिवार के लिये शायद एक अनुभव के तौर पर था जिसमें भाजपा और वीएचपी उसी प्रकार से शामिल थी जिस प्रकार से मुजफ्फर नगर दंगों में इनकी भागीदारी उजागर हुयी है।

इस अनुभव की सफलता के बाद नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ अमित शाह प्रदेश को कमान दी गयी और उन्होंने 9 जुलाई 2013 को गोरखपुर में जो ज़हर उगला उसने उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने की प्रक्रिया पर मुहर लगादी थी। अमित शाह ने पार्टी के जिला कार्यकारणी की बैठक में कहा कि ‘जिस हिन्दू का खून न खोले , खून नहीं वह पानी है’ और आज यही नारा यूपी में भाजपा का सलोगन बना हुआ है। गौरतलब है कि खून खौलाने वाला यह भाषा नब्बे के दशक में बाबरी मस्जिद विध्वँस के दौरान सुनी गयी थी। इसके बाद से पूरे उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव की जो हवा चली वह आज मुजफ्फरनगर के रूप में हमारे सामने है ,जिस ने 45 से अधिक लोगों की जानें ले लीं और लगभग 40 हजार लोगों को अपना घर बार छोडकर राहत शिविरों में शरण लेने के लिये मजबूर कर दिया।

समाजवादी पार्टी भले ही मुजफ्फरपुर नगर दंगों की जिम्मेदारी भाजपा और बसपा पर डालने का प्रयास करे, लेकिन इस मामले में अगर किसी को सबसे बड़ा अपराधी घोषित जा सकता है तो वह राज्य के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव हैं, जिन्होंने मुज़फ़्फ़रनगर में हालात खराब होने के पहले से मिल रही सूचनाओं के बावजूद उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। और हद तो तब हो गयी जब दंगे शुरू होने के तीन दिनों तक जिला प्रशासन और पुलिस की ओर से दंगाइयों को खुली छूट दे दी गयी। इसी तरह की खुली छूट 2002 में गुजरात में नरेंद्र मोदी ने भी दी थी। इसलिये यह बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है कि अगर भाजपा ने दंगा फैलाया तो एसपी ने उसे हवा दी। दंगा न होने देने या दंगा रोकने में सपा सरकार की लापरवाही को कमजोरी नहीं कही जा सकता, क्योंकि एक या दो बार की विफलतायें कमजोरी हो सकती हैं, लेकिन यहाँ तो सपा सरकार के डेढ़ वर्षीय शासनकाल में सांप्रदायिक हिंसा की एक श्रृंखला है, और सभी में यही कमजोरी प्रकट हुयी है जो मुजफ्फरपुर नगर में सामने आई है। इसलिये यह कहा जाना कि सरकार प्रशासनिक कमजोरी के चलते समय पर हिंसा रोकने में विफल रही है? तथ्यों से आँख चुराने जैसा है। मुजफ्फरनगर व अन्य जगहों पर हुये दंगों सुनियोजित थे, जिस में भाजपा व बसपा के साथ किसी न किसी रूप से समाजवादी पार्टी भी शामिल रही है। अब इस मामले में चाहे जितनी ही लीपापोती की जाये सच्चाई तो बहरहाल यही है कि उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने में राज्य की समाजवादी सरकार की किसी न किसी रूप में स्वीकारोक्ति हासिल है।

यूपी के गुजरात बन जाने में समाजवादी की मंजूरी का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि सरकार व प्रशासन पर पूरी पकड़ के बावजूद अखिलेश सिंह यादव सरकार ने दंगाइयों को खुली छूट दे रखी थी। लेकिन जरा रुकिए,  दंगों की प्रकृति और विधि पर भी ज़रा एक नज़र डालते चलें।

इस दंगे को भड़काने में सोशल मीडिया का जमकर उपयोग किया गया, जिस से मुजफ्फरनगर का प्रशासन भलीभाँति अवगत था। 9 सितम्बर 2013 से पूरे क्षेत्र में एक एसएमएस प्रसारित किया जारहा था, जिसने सांप्रदायिक तनाव को हवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह एसएमएस अभियान किसने शुरू की थी?  इसका अंदाज़ा एसएमएस के लेख से बखूबी लगाया जा सकता है। आप भी देखिए क्या था वह एसएमएस….

“1993 mein 27, 1996 mein 38, 2002 mein 45, 2007 mein 55, aur ab 2012 mein 68 Muslim MLAs chune gaye। Kya hoga UP ka 2050 mein – dusra Pakistan? Aaakhir Modi PM kyon nahi? Jago Hindu Jago। Is message ko aag ki tarah faila do-Vande Mataram,”

( 1993 में 27 , 1996 में 38 , 2002 में 45 , 2007 में 55 और अब 2012 में 68 मुस्लिम विधायक चुन गये, क्या होगा उत्तर परदेश का 2050 में, दूसरा पाकिस्तान? आखिर मोदी पीएम क्यों नहीं? जागो हिन्दू जागो, इस मैसेज को आग की तरह फैला दो, वंदे मातरम् )

इसके अलावा 2010 में पाकिस्तान के एक वीडियो को भी दंगा भड़काने के लिये इस्तेमाल किया गया। इस वीडियो को ‘यूट्यूब’ और ‘वाट्स अप’ के माध्यम से पूरे क्षेत्र में फैलाया गया। इस वीडियो में पाकिस्तान के सियालकोट में एक भीड़ ने डाकू समझ कर दो भाइयों को बेरहमी से मार दिया था। इस वीडियो को कवाल में दो हिन्दू भाइयों की हत्या का वीडियो बताया गया। इतना ही नहीं, बल्कि इस वीडियो की सीडी बनाकर भाजपा विधायक संगीत सोम की अध्यक्षता में घर-घर बाँटा गया। इसी बीच समाचार पत्रों में प्रकाशित दंगे सम्बंधित समाचारों को कंप्यूटर द्वारा एडिट करके फेसबुक पर अपलोड किया गया जिसमें मुसलमानों के अत्याचार का वर्णन करते हुये बताया गया कि मुसलमान हिंदुओं का नरसंहार कर रहे हैं।

सोशल मीडिया और समाचार पत्रों के माध्यम से दंगों का कारण एक लड़की से छेड़छाड़ का मामला बताया गया, लेकिन यह पूरा मामला एक झूठ के सिवा कुछ नहीं है। वास्तव में मामला रास्ता देने के विवाद से शुरू हुआ था। गौरव और सचिन जो मुजफ्फरनगर के पास मलकापुर गाँव के रहने वाले थे, उनका कवाल गाँव के शहजाद से रास्ता न देने के मामले को लेकर विवाद हुआ, सचिन और गौरव ने शहजाद को यह धमकी देते हुये कि हम तुम्हें बहुत जल्द सबक सिखाएँ, चले गये। लगभग आधे घंटे बाद वह तीन अन्य लोगों के साथ आये और शहजाद को चाकू से गोद कर मार डाला। जिसके बाद कवाल के लोगों ने सचिन और गौरव को पकड़ कर मार डाला, उन के अन्य तीन साथी भाग गये। यहीं से दंगे की आग सुलगनी शुरू हुयी जिसमें भारतीय किसान यूनियन के नरेश टिकैत, राष्ट्रीय लोकदल के अजीत राठी, कांग्रेस के पूर्व सांसद हरेंदर मालिक, भाजपा विधायक संगीत सोम, हुकुम सिंह और  सुरेश राणा अदि ने कथित रूप से दंगों की आग पर तेल डालने का काम किया। यह घटना दंगा शुरू होने से दस दिन पहले घटित हुयी थी। इस घटना को लड़की से छेड़-छाड़ की घटना बना कर पेश किया गया और उसे पेश करने में समाचार पत्रों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी बीच जाटों की महा पंचायत हुयी, उस में क्या क्या हुआ? सरकार इस से पूरी तरह अवगत थी, लेकिन समय रहते उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की गयी।

अब आइए यूपी को गुजरात बनाने के परिदृश्य की ओर। इस मामले में भाजपा के साथ कांग्रेस भी शामिल रही है। इसकी पुष्टि इस घटना से होता है कि डीजी वंजारा के इस्तीफे और उसमें मोदी और अमित शाह पर लगाए गये आरोपों के बाद संसद में कांग्रेस ने जमकर हंगामा मचाया था। यह स्थिति भाजपा के परेशान करने वाली थी और भाजपा जो सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के मामले में चुप थी, कांग्रेस का रवैया देखकर वह फिर वाड्रा का नाम अलापना शुरू कर दिया था। उधर समाजवादी पार्टी भी हाँ में हाँ मिलाने लगी। इंग्लैंड से प्रकाशित होने वाले एक प्रसिद्ध अखबार ‘डेली मेल’ में 9 सितम्बर 2013 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस आरोप दर आरोप में जब कांग्रेस व भाजपा दोनों की पोल खुलने लगी तो इन दोनों के बीच एक समझौता हुआ जिसके में यह तय पाया कि कांग्रेस वंजारा के इस्तीफे पर चुप रहे और भाजपा रॉबर्ट वाड्रा के मामले में। इसके अलावा संसद सत्र के अन्त में जब केवल दो दिन ही बाकी बचे थे और संसद में वंजारा और वाड्रा का मामले छाया रहा, और कई विधेयक पास होने बाकि थे तो वंजारा और वाड्रा का मामला दबा दिया गया, अगर इस मामले को दबाया न जाता तो आरटीआई, खाद्य सुरक्षा बिल, आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं के संरक्षण का कानून, भूमि अधिग्रहण बिल और पेंशन कानून आदि पास होना सम्भव नहीं होता। इसलिये जरूरी था कि संसद से वाड्रा और बंजारा के मामले को बाहर निकाला जाये। इसलिये चिदंबरम और कमलनाथ ने भाजपा के कुछ बड़े नेताओं से मुलाकात की और एक समझौता किया ताकि सभी विधेयक पारित किए जा सकें। चूँकि यह मामला जनता के बीच आ चुका था और जनता का ध्यान किसी और तरफ भटकना ज़रूरी था, इसलिये भाजपा, कांग्रेस समाज वादी ने योजनाबद्ध तरीके से मुजफ्फरपुर नगर में आग और रक्त का बाजार गर्म करने की योजना बनाई। इसका लाभ अगर भाजपा को हुआ तो वहीं कांग्रेस की भी हिस्सेदारी तय हुयी और समाजवादी पार्टी के तो दोनों हाथों में लड्डू हैं ही।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आईबी ने मुजफ़्फ़र नगर व दूसरे क्षेत्रों में दंगे की खबर पहले से दी थी। यहाँ प्रश्न यह भी उठता है कि आईबी को इस घटना की खबर पहले से कैसे हो गयी थी। उसे यह कैसे पता था कि दो तीन लोगों के बीच हुये विवाद को भाजपा नेता पूरे जाट समुदाय का मामला बना देंगे। ‘डेली मेल ‘ ने अपनी 9 सितम्बर 2013 के प्रकाशन में आईबी के उन इनपुटस का ज़िक्र किया है जिनके आधार पर दंगे हुये हैं। प्रश्न यह भी पैदा होता है कि जब आईबी को पहले से ही दंगों की जानकारी थी तो राज्य सरकार या केन्द्र सरकार ने इसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? जाहिर है कि जब सभी ही पार्टियाँ उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने के दरपे हों तो भला दंगों को रोके कौन। दंगों में जब सबका हित हो और जब सब को अपना वोट बैंक प्रिय हो तो कौन पहल करता? वैसे भी राजनीतिक बाजार में दंगों का खेल इतना लाभदायक होता है कि इसमें ‘शह’ और ‘मात’ दोनों ही जीत में बदल जाते हैं। दंगे कराने वालों का अगर वोट बैंक बढ़ता है तो जिन लोगों को मारा जाता है वह किसी ऐसी पार्टी पर जो मौखिक ही सही उनकी हमदरदरी की बात करे, उन का उस ओर झुकाव हो जाता है। भले ही अपरोक्ष वह पार्टी उनकी कितनी ही दुश्मन क्यों न हो। आईबी के पास तो यह भी सूचना है कि यह सांप्रदायिक दंगे 2014 तक और अधिक बढ़ेंगे।

सवाल यह भी है कि 84 कोसी परिक्रमा अभियान के दौरान दो-ढाई सौ साधु संतों को रोकने के लिये यही अखिलेश सिंह यादव सरकार है जिसने परिक्रमा को रोकने के लिये लाखों की फ़ौज लगा दी थी, और मुजफ्फर नगर में 70 हजार से अधिक लोगों की महामंचायत को रोकने के लिये कोई कार्रवाई नहीं की जिसके बारे में पहले से रिपोर्ट थी की यह महापंचायत साम्प्रदायिक दंगों का रूप ले सकती है। यही अखिलेश सिंह यादव हैं, जिन्हों ने अशोक सिंघल और प्रवीण तोगाड़िया को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन मुजफ्फर नगर महापंचायत में भाजपा विधायकों को सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की खुली छूट दे दी थी। दंगों की शुरुआत में डी एम्, एस पी को हटा दिया गया, लेकिन दंगों की आग में तेल डालने वाले किसी नेता पर कोई कार्रवाई नहीं की? इससे यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि अखिलेश सिंह यादव सरकार चाहती थी कि मुजफ्फर नगर में सांप्रदायिक दंगे हों।

इस सन्दर्भ में मुजफ्फर नगर दंगों का उद्देश्य इस के अलावा और क्या हो सकता है कि जितने हिन्दू मरेंगे, इतने हिन्दू डरेंगे और जितने हिन्दू डरेंगे इतने ही वह भाजपा के पक्ष में लामबंद होंगे। इसी तरह जितने मुसलमान मरेंगे, उतना ही उनके अन्दर डर पैदा होगा और जितना मुसलमानों के अन्दर डर पैदा होगा उतनी ही वह समाजवादी पार्टी के वोट प्रतिशत में वृद्धि का कारण बनेंगे। गुजरात में भी यही मॉडल और फार्मूला अपनाया गया था, और अब उत्तर प्रदेश में यही उपयोग हो रहा है।

लेकिन हम में इतनी राजनीतिक जागरूकता कहाँ कि हम कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा के उन महत्वाकांक्षाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश करें और वैसे भी हमारे पास बड़े से बड़े दुर्घटनाओं का महत्व सुबह के समाचार पत्र से अधिक नहीं होता। लेकिन इसका क्या किया जाये इन्हीं घटनाओं से भारतीय राजनीति का रुख निर्धारित हो रहा है। पुलिस ने दंगे फैलाने के आरोप में एक हजार से अधिक प्यादों को गिरफ्तार किया है, मगर जिन लोगों ने दंगा कराया उनके खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज हुयी है और वह बड़े मजे से अपने घरों पर बैठकर मीडिया को साक्षात्कार दे रहे हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा गुजरात में हुआ था कि मोदी को दंगों का जिम्मेदार तो समझा गया, लेकिन गिरफ्तारी आज तक नहीं हुयी।

इन बातों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि एक साल पहले आरएसएस ने भाजपा को यूपी में हिन्दुत्व का कार्ड खेलने की जो हिदायत दी थी और जिस खेल के लिये अमित शाह को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गयी थी, उसकी न केवल बिसात जम चुकी है बल्कि ‘शह’ और ‘मात’ दोनों को जीत में बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है।

 

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