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कटघरे में खड़े मनमोहन सिंह की त्रासदी

पुण्य प्रसून बाजपेयी

यह पहला मौका है जब सरकार की की जांच -एंजेसियो के सबसे बड़े नौकरशाहो की फौज से बनी हाई-प्रोफाइल टीम पर भी सुप्रीम कोर्ट ने भरोसा नहीं किया। वहीं पहली बार प्रधानमंत्री की बात को भी उनके अपने कैबिनेट मंत्री यह कहते हुये खारिज कर रहे हैं कि मामला संस्थान बनाने का है, ऐसे में प्रधानमंत्री की अपनी सोच मायने नहीं रखती। पहला मामला कालेधन का है और दूसरा भ्र्रष्टाचार का। पहले मामले में देश की सभी बड़ी नौ बड़ी एंजेसिया यानी सीबीआई, आईबी, ईडी, सीबीडीटी, रेवेन्यू इन्टेलिजेन्स, फॉरेन इन्टेलिजेन्स ऑफिस, फारेन ट्रेड, नारकोटिक्स कन्ट्रोल और आरबीआई के डायरेक्टर और चैयरमैन पद पर बैठे नौकरशाहो की टीम बनाकर कालेधन पर नकेल कसने की सरकारी कवायद को भी अगर असरकारक सुप्रीमकोर्ट ने नहीं माना और इन सभी को दो रिटार्यड जजो के अधीन कर विशेष जांच टीम बना दी, तो पहला संकेत अगर देश के तमाम संस्थानो पर सरकारी शिंकंजे का उठा तो दूसरा संकेत सरकार की नियत को लेकर उठे।

वहीं लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री पद को लाने पर सहमति देने वाले मनमोहन सिंह के उलट उनके अपने कैबिनेट मंत्री कपिल सिब्बल का यह कहना कि जब मनमोहन सिंह पीएम नहीं रहेगे तो फिर दूसरी पार्टियो की सोच क्या है, उसपर सहमति भी जरुरी है। यानी पहली बार मुद्दो से लेकर देश चलाने के तरीकों को लेकर सरकार की बिसात में ही प्यादो के जरीये शह-मात हो रहा है या फिर हर कद को प्यादे में तब्दीलकर उस राजा को छुपाया जा रहा है, जिसकी घेरा-बंदी ना हो जाये। लेकिन इस सियासी बिसात ने आर्थिक सुधार की उस लकीर को ही शह दे दी है जिसके आसरे अभी-तक देश को यही पाठ पढ़ाया गया कि उत्पादन से महत्वपूर्ण है सेवा [ सर्विस सेक्टर ] और सेवा का मतलब है जेब भरी हो तो सुविधाओ का भंडार सामने होगा। यानी बाजार व्यवस्था का ऐसा खाका, जिसमें कॉरपोरेट की पहल ही देश में उर्जा लायेगी, वही हवाई क्षेत्र में बदलाव करेगी, उसी की पहल एसआईजेड या माल संसकृति को बिखेरेगी , बंदरगाहो की सूरत भी कारपरेट बदलेगा , घर-गाडी-शिक्षा-स्वास्थय के क्षेत्र में तरक्की भी कारपोरेट लायेगा। और देश की तरक्की का मीटर यानी शेयर बाजार में हर सोमवार या शुक्रवार सेंसक्स उपर जायेगा या नीचे यह भी विदेशी निवेशक तय करेंगे जिनके पास खूब पैसा है।

यानी देश को आगे बढ़ाने के नियम ही ऐसे तय कर दिये हैं, जहां भरी जेब ही किसी को भी देश में मान्यता दिलाये और सुविधाभोगी समाज का निर्माण करें। और इस पहल में जनता की चुनी सरकार की पहली प्राथमिकता उन्ही कारपोरेट या निजी सेक्टर के सामने आने वाली रुकावटो को दूर कर उनके मुनाफे में कही भी सेंध ना लगने देने के काम में जुटना हो जो अपने बढते टर्न-ओवर का मापकर ही देश के हर सेक्टर में घुस रही है। और लगातार अपनी पूंजी में इजाफा कर दुनिया में अपनी पहचान बनाने में जुटी हो। अगर बीते दस बरस में देश के टाप दस निजी कंपनियो के फैलते कारोबार और टर्न-ओवर को देखे तो टर्न-ओवर में तीन सौ फीसदी का औसत इजाफा भी नजर आता है और दुनिया के चालीस देश की अलग अलग कंपनियो को खरीदकर बहुराष्ट्रीय कंपनियो की कतार में कद बढ़ाना भी है। वहीं, इस दौर में खुद सोनिया गांधी की अगुवाई वाली एनएसी यानी राष्ट्रीय सलाहकार समिति का भी मानना है देश की सत्तर फीसदी जनसंख्या को दो जून की रोटी मुफ्त में बांटे बिना फूड सिक्यूरटी बिल का कोई मतलब नहीं होगा। इसके लिये अगर सरकार पर 1.1 ट्रिलियन रुपये का भार पड़ता है तो भी उसे इसे लागू करना होगा। यानी देश विकास की राह पर है और बहुसंख्य जनता भूख मिटाने के लिये मुफ्त सरकारी पैकेज पर टिकी है तो समझना यह भी होगा इतने बडे देश की वह कौन सी इक्नामी है जो दुनिया के बाजारो में भारत का झंडा भी बुंदल किये हुये है और अफ्रीकी देशो से कही बदतर स्थिति को भी ढो रही है। सिर्फ बीते पांच बरस में देश की एक हजार से ज्यादा छोटी-बडी कंपनियो के हवाला रैकेट में करीब 80 लाख करोड से ज्यादा की रकम पकड़ में आयी।

रियल इस्टेट की 200 कंपनियो पर फर्जी तरीके से जमीन हथियाने का मामला अदलत तक पहुंचा। सौ से ज्यादा चिट-फंड की कंपनियो ने आम आदमी को करीब दो हजार करोड का चूना सीधे साधे लगाया। और इसी लकीर पर 2जी स्पेक्ट्रम में फंसे कारपोरेट या निजी कंपनियो के जो तर्क अदालत के सामने आये उसमें कहा यही गया कि संचार मंत्रालय ने ही बकायदा लाभ के नियम बनाये। फिर कैग की रिपोर्ट में मंत्री फंसा तो उसने उन्ही कंपनियो को चेताया कि इसपर लीपा-पोती करने की पहल करें। और जब वह भी नहीं हुआ तो वहीं कंपनियों अब अपनी साख और पैसे को लगाकर अदालत में अपने खिलाफ मुकदमे को सलटाने में लगी है। और इस फेर में देश के टाप-मोस्ट कारपोरेट के छह नामचीन तिहाड़ जेल में बंद है। यही धारा संचार मंत्रालय में सचिव के पद पर रहे बेहुरा ने भी उठाये। जब विकास के नियम सरकार बना रही है और मंत्री बकायदा पीएमओ को पत्र से जानकारी देते हुये निजी कंपनियो को स्पेक्ट्रम बेच रहा है तो फिर नौकरशाह की भूमिका क्या होगी। इन परिस्थितियो में अगर कारपोरेट सेक्टर की तमाम निजी कंपनिया ही नहीं बल्कि शेयर बाजार और सरकारी योजनाओ को खरीदने वाली कंपनियो का रास्ता भी मलोशिया,मॉरीशस या यूएई की तरफ गया तो आर्थिक सुधार के दौर में सरकारी नीतियो ने ही इस रास्ते को मंजूरी दी। क्योंकि सिर्फ शोयर बाजार में लगी पूंजी का पचास फीसदी इन्हीं रास्तो से आया है और देश में आयात-निर्यात के खेल में जुड़ी दो सौ से ज्यादा कंपनियो की चालीस फीसदी पूंजी का रास्ता भी उसी मारिशस, मलेशिया से निकला है जिसे अब हवाला का रास्ता बताया जा रहा है। यानी आर्थिक सुधार की जिस लकीर को खिंच कर विकास दर से लेकर मंदी के दौर में कृषि उत्पादन को खारिज कर अपनी हवाला नीति को ही प्रोत्साहित किया गया , अब उन्हीं नीतियों पर जब यह सोच कर मठ्टा डाला जा रहा है कि इससे कालेधन और भ्र्रष्टाचार पर पैदा हुई राजनीतिक लड़ाई जीती जा सकती है।

दरअसल, नया संकट यही है कि जिस कालेधन के रास्ते नीतियों में बदले हुये थे और उसकी निगरानी भी सरकार ही करती रही, पहली बार वह सुप्रीमकोर्ट की निगरानी में चला गया। यानी देश की वह नौ एंजेसियां या संस्थान जो आरबीआई से लेकर सीबीआई तक हैं, अब उनकी कालेधन पर पहल क्या होगी इसपर ना सिर्फ सुप्रिमकोर्ट की निगरानी होगी बल्कि डबल टैक्ससेशन सरीखे समझोते दूसरे देशो से क्या नहीं हुये और स्विस सरकार से भी नया समझौता यह क्यो हुआ कि समझौते के बाद के स्विस बैंक के खातो की वह जानकारी देगा पहले के नहीं। एसआईटी इसको भी परखेगी और दुनिया के 38 देशो के बैकों में जमा कालाधन किनके नाम पर है, उस पर भी नयी पहल सरकार की तरफ से ना होकर जस्टिस रेड्डी और जस्टिस शाह करेंगे।

जाहिर है इसके पहले असर का मतलब कारपोरेट और सरकारी तंत्र के गठबंधन का खत्म होना भी है और आर्थिक सुधार की उस लकीर का रुकना भी है जो कारपोरेट की जरुरत के मुताबिक अलग अलग मंत्रालय नियम बनाते रहे और नौकरशाह मंत्रियो की उस सोच को ही आगे बढाते रहे जहा विकास की धारा एक तबके में सिमटे और उससे पैदा होने वाला बाजार दुनिया के तरक्कीपसंद देशो में मानने लगे । मगर अब अगर कारपोरेट की कमाई पर ब्रेक लग सकती है तो नौकरशाहों का मंत्रियो के कहे मुताबिक काम करना भी रुक सकता है। जो नौकरशाह बेहुरा के जेल में जाने के बाद कई मंत्रालयों में रुका चुका है , क्योंकि सचिव स्तर के अधिकारी भी यह सोचने लगे हैं कि राजनीतिक भ्र्रष्टाचार का खामियाजा अगर उन्हें भुगतना पडेगा तो किसी भी योजना को आगे बढाने पर हस्ताक्षर कर वह निर्णय क्यो लें। संयोग से सरकार के अलग अलग मंत्रालयों में इस वक्त 200 से ज्यादा निर्णय[फाईलें] रुके हुये है, क्योंकि नौकरशाह हरी झंडी के लिये फाइले मंत्री के पास भेज रहे हैं और मंत्री कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री खुले तौर पर कारपोरेट के साथ मंत्रियो के ताल्लुकात देखना नहीं चाहते है जो क्रोनी कैपटिलिज्म को बढावा देता नजर आये।

इसकी एक बड़ी वजह भ्र्रष्टाचार पर जनलोकपाल के मुद्दे को उठाकर सिविल सोसायटी के आंदोलन का सरकार पर दवाब होना भी है। और बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आंदोलन के सामने अपनी छवि साफ रखने की भी है। लेकिन ऐसे मे वह सरकार कैसे चलेगी जिसे विकास का ककहरा ही कारपोरेट मुनाफा तंत्र में पढ़ाया गया। वजह भी यही है कि सिब्बल लोकपाल के दायेर में पीएम को लाने के खिलाफ तर्को में संस्थानिक संकट देख रहे हैं और मनमोहन सिंह सरकार बचाने के लिये अपनी छवि देख रहे हैं। इसलिये पहली बार सरकार का संकट रणनीति का हिस्सा ना लगकर उन नीतियों का संकट दिखा रहा है जिसके आसरे 2004 की सफलता 2009 में दोहरायी गयी और यूपीए-2 मजबूत दिखी । मगर यह मजबूती 2014 तक कायम रहेगी यह सवाल अब कांग्रेसी भी प्रधानमंत्री से पूछने लगे हैं।

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