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कन्हैया प्रकरण : न्यायपालिका अब भी संभावना है – ओम थानवी

नई दिल्ली। राजद्रोह के आरोपी जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत पर वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी ने कहा है कि न्यायपालिका अब भी संभावना है।

श्री ओम थानवी की पूरी टिप्पणी निम्नवत् है –
दिल्ली उच्च न्यायालय की माननीय न्यायाधीश ने कन्हैया कुमार को जमानत दी, स्वातंत्र्यचेता लोगों में हर्ष की लहर फैल गई। मैं गांधी शांति प्रतिष्ठान में “राजद्रोह” पर एक संगोष्ठी से निकला था, जब यह खबर मिली। मैंने भी न्यायपालिका की प्रशंसा में ट्वीट किया, फेसबुक पर टिप्पणी लिखी। थोड़ी ही देर में पूरा फैसला भी मेल पर मिल गया – ऐसा पहले कब हुआ था, याद नहीं पड़ता।
न्यायाधीश ने जमानत पर पुलिस (केंद्र सरकार) के एतराज को नहीं माना, दरियादिली दिखाते हुए कम राशि के मुचलके पर कन्हैया को रिहा करने का फैसला सुनाया। जज महोदय इसके लिए निश्चय ही धन्यवाद की हकदार हैं।
लेकिन जमानत देने के उनके 23 पृष्ठों के फैसले को पढ़कर लगा कि हेराफेरी (अब प्रमाणित) वाले कतिपय वीडियो के चलते जैसे देश के बहुत-से आम नागरिकों में देशप्रेम का जो ज्वार उमड़ा, उसकी छाया बहुत दूर तक पहुंची होगी। जमानत के फैसले के अंत में हालाँकि साफ कहा गया है कि उसमें व्यक्त विचार महज जमानत के सिलसिले में व्यक्त किए गए हैं और मुकदमे के गुणावगुण से उनका कोई संबंध नहीं है।
जमानत के सिलसिले में सही, पर इंदीवर के लिखे मनोज कुमार की देशभक्ति भुनाने वाली फिल्म ‘उपकार’ के गाने (मेरे देश की धरती सोना उगले) से ‘मातृभूमि’ के प्रति प्रेम को परिभाषित करता फैसला कन्हैया कुमार के देशभक्तिपूर्ण भाषण पर भरोसा करने में हिचकिचाता है (‘सेफ्टीगियर’ शब्द संदेह का संकेत भी खड़ा करता है); ‘सिडीशन’ पर हार्दिक पटेल के मामले में सुदूर गुजरात हाइकोर्ट का हवाला देता है; जेएनयू परिसर में छात्रों के किसी भी “राष्ट्र-विरोधी” आयोजन के लिए छात्रसंघ अध्यक्ष के नाते कन्हैया को जिम्मेदार और जवाबदेह समझता है (भले ही अध्यक्ष के दायित्व के दायरे के अलावा इसका निर्धारण भी अभी अपुष्ट हो कि आयोजन वाकई राष्ट्र-विरोधी गतिविधि था या नहीं); परिसर की स्वंत्रता को सरहद पर सैनिकों की कुरबानी से जोड़ता है (‘जिस किस्म के नारे लगाए गए हैं, वे उन शहीदों के परिजनों पर हताशाजनक प्रभाव डाल सकते हैं जिनके शव तिरंगे लिपटे घर पहुंचे हों’)।
इतना ही नहीं, जमानत का निर्णय छात्रों की विवादग्रस्त गतिविधि को “गैंग्रीन” जैसे भयावह संक्रामक रोग की आशंका तक से जोड़ कर देखता है – कि जहाँ ऐसा संक्रमित रोग वाला अंग दवाओं से ठीक न होता तो “इलाज में उस अंग को ही काट फेंकना होता है”। हालाँकि यहाँ माननीय न्यायाधीश कन्हैया के प्रति सहिष्णुता जाहिर करती हैं:

“वह मुख्य धारा में रह सके, इसलिए फिलहाल मैं पहले वाला (दवा वाला) उपचार ही करना चाहूंगी”।
गैर-जमानती मुकदमे में जमानत देने के फैसले ने न्यायपालिका में हमारी आस्था को बढ़ाया है, लेकिन कुछ टिप्पणियों ने देशभक्ति के अतिउत्साह की छाया का पसारा भी दिखाया है।
काश, आगे कन्हैया कुमार (और अन्य ‘राजद्रोहियों’ को) समुचित न्याय मिल सके। टीवी चैनलों की बेईमानी, पुलिस और राजनीति के कुचक्र, पुलिस की ‘सुरक्षा’ में कन्हैया और अन्य लोगों पर काले कोट वालों की हिंसा – सबसे ऊपर देशभक्ति और देशद्रोह बनाम राजद्रोह की परिभाषा को देश का सर्वोच्च न्यायालय सुस्पष्ट कर सकता है, जिसे माननीय उच्च न्यायालय छू न सका।

न्यायपालिका अब भी संभावना है।
– ओम थानवी

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