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कम्युनिस्ट तथा जाति : कांति विश्वास की जीवनी के बहाने

कम्युनिस्ट तथा जाति 
कांति विश्वास की जीवनी की समीक्षा पर टिप्पणी
ईश मिश्र
 26 दिसंबर 2016 की अंग्रेजी की साप्ताहिक मेनस्ट्रीम के 26 दिसंबर 2016 अंक में एके विश्वास द्वारा कांति विश्वास की जीवनी आमार जीवनः किछु कथा  के समीक्षात्मक लेख पढ़ना खत्म करते-करते आंखें नम हो गयीं, बहुत. मन अवसादित हो गया था. कम्युनिस्ट पार्टी में भी ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति चिंता की बात है. वह भी इतिहास के इस दौर में जब सामाजिक चेतना पर दक्षिणपंथी कट्टरवादी शक्तियों की मुखरता आक्रामक हो. मैंने 1985 में एक लेख में यह तो लिखा कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी जाति-धर्म के समीकरणों का चुनावी इस्तेमाल अन्य पार्टियों की ही तरह करती हैं, लेकिन किसी कम्युनिस्ट चेतन-अवचेतन सोच में ब्राह्मणवादी पूर्वाग्रहों की कल्पना भी नहीं किया था. यह लेख, एक कम्युनिस्ट की बातः एक नामसूद्र के संस्मरण (“A Communist Speaks: Memoirs of a Namasudra”)   लेख का शीर्षक ही बहुत कुछ कह देता है. ब्राह्मण कम्युनिस्ट तथा दलित कम्युनिस्ट. वाह भाई ऐसे भी मार्क्सवादी हैं जो ज्ञानार्जन की प्रतिभा को जन्मना मानते हैं. कम्युनिस्ट पार्टी अन्य पार्टियों से इस मायने में अलग होती है कि वह सिद्धांत पर जोर देती है तथा सिद्धांत तथा व्यवहार की द्वंद्वात्तमक एकता यानि सिद्धांत को व्यवहार में लागू करने को ही सुविचारित क्रांतिकारी कर्म मानती है. लेकिन जैसा कि अरुण माहेश्वरी  की हाल में प्रकाशित पुस्तक समाजवाद की समस्याएं में सीपीएम के अनुभवजन्य विश्लेषण से स्पष्ट है कि सिद्धांत तथा व्यवहार का अंतर्विरोध तथा अधिनायकवादी सांगठनिक कार्यपद्धति पर शासकवर्ग की पार्टियों का एकाधिकार नहीं है, कम्युनिस्ट पार्टियां भी उनसे उन्नीस नहीं है. यह कोई सीपीएम की ही नहीं बल्कि दुनिया की सभी पारंपरिक पार्टियों की विशिष्टता है. हमारे छात्र जीवन में एक चुटकुला प्रचलित था. 1956 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में (1953 में स्टालिन के मृत्यु के बाद पहली) जब ख्रुश्चेव ने स्टालिन पर हमला बोला तो प्रतिनिधियों में से किसी ने फुसफुसा कर कहा कि सेंट्रल कमेटी में वे क्या कर रहे थे. ख्रुश्चेव ने कड़क कर पूछने वाले का नाम जानना चाहा. सब चुप. ख्रुश्चेव ने कहा कि वह भी यही कर रहे थे.
मुझसे जब सामाजिक न्यायवादी दलित साथी पूछते थे कि ज्यादातर कम्युनिस्ट नेता ब्राह्मण क्यों हैं? मुझे ईमानदारी से लगता था कि

इतिहास की वैज्ञानिक समझ के लिए आवश्यक बौद्धिक संसाधनों की सुलभता ही इसका प्रमुख कारण है तथा जैसे-जैसे यह सुलभता सार्वभौमिक होगी, यह सवाल अप्रासंगिक हो जायेगा. लेकिन इस समीक्षात्मक लेख ने मुझे गलत साबित कर दिया.  मुझे लगता है कि मार्क्स की तरह कम्युनिस्ट नास्तिक तो होगा ही तथा उसके पहले जन्म के जीववैज्ञानिक संयोग के परिणामस्वरूप जातीय पूर्वाग्रह-दुराग्रहों से मुक्त. यह कैसी शिक्षा तथा कम्युनिस्ट प्रशिक्षण है, जो जन्म की जीववैज्ञानिक संयोग की अस्मिता से मुक्ति नहीं देती? मार्क्सवाद कम-से-कम इतनी बुनियादी समझ तो पैदा करता ही है कि चेतना का स्तर तथा विद्वता या अज्ञानता जीववैज्ञानिक प्रवृत्ति न होकर भौतिक परिस्थितियों (समाजीकरण) तथा सचेतन निजी प्रयास का परिणाम है.
1977 में कांति विश्वास सीपीमीएम के टिकट से बंगाल में एमएलए चुने गये. ज्योति बसु की सरकार में किसी भी अनुसूचित जाति के मंत्री की अनुपस्थिति कॉ. विश्वास को असहज लगी. उन्होंने ज्योति बसु का इस तरफ ध्यानाकर्षण किया तो सर्वहारा के अधिनायक का हास्यास्पद जवाब था, “मानता हूं कि अनुसूचित जाति के लोग सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े हैं लेकिन उनमें से किसी को मंत्रिमंडल में शामिल करने का क्या औचित्य है.”  जातीय पूर्वाग्रह-दुराग्रह में यह बयान किसी भी ब्राह्मणवादी दकियानूसी से कम नहीं है.
इसका निहितार्थ यह है कि प्लेटो के दार्शनिक राजा की ही तरह भद्रलोक बंगाली “क्रांतिकारी” सभी तपकों – दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक – की समस्याओं को समझने तथा उनकी भागीदारी के बिना उन्हें सुलझाने में सक्षम हैं. मार्क्स ने कहा है कि जनता के मुद्दे के अलावा कम्युनिस्ट का कोई अपना मुद्दा नहीं होता. कॉ. विश्वास को बिना मंत्रालय के मंत्री बना दिया गया. छीछालेदर होने पर उन्हें युवा मामलों तथा गृह (पारपत्र) विभाग दिये गये. उनके काम की सभी हलकों में प्रशंसा हुई. 1982 में वाम मोर्चे की सरकार की वापसी हुई. वे शिक्षामंत्री (स्कूल) बने. भद्रलोक का ब्रहमांड ऐसा डामाडोल हुआ जैसा रामायण में शंबूक की तपस्या से वर्णाश्रमी ब्रह्मांड हुआ था.
लेख में उद्धृत किया गया है कि सीपीएम के स्टेट सेक्रेटरी, प्रमोद दासगुप्त ने उन्हें उनके बारे में मिले लगभग 400 पत्र थमाया. 24-परगना के किसी भट्टाचार्य के पत्र में लिखा था, “इससे क्या हुआ कि कांति विश्वास युवा मामलों के सफल मंत्री रहे हैं, हैं तो वे चांडाल ही. चांडाल के हाथों शिक्षा पाकर बंगाल नापाक हो जायेगा……. . . एक चांडाल को चाहे तो इससे महत्वपूर्ण कोई और जिम्मेदारी भले दे दी जाय, लेकिन भगवान के लिए एक चांडाल मंत्री को शिक्षा की बागडोर सौंपने से बंगाल को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी.”
चलिए ये भट्टाचार्य जी तो जो हैं सो हैं. 1985 में जब उन्हें म़ॉस्को की पौट्रिस लुमाम्बा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के क्षात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों को लेक्चर देने के लिय़े आमंत्रण मिला. उनकी विद्वता तथा वाक्पटुता की प्रशंसा से प्रभावित होकर सोवियत संघ सरकार ने उनका आमंत्रण 10 दिन बढ़ा दिया. लेकिन पार्टी में कुछ लोगों ने ‘क्रांति की काशी’ के एक प्रमुख विश्वविद्यालय में छात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों को संबोधित करने की उनकी योग्यता पर प्रश्न-चिन्ह लगाया था.
डिग्री से कोई ज्ञानी हो जाता तो अब मोदीयुग में भाजपा में अप्रासंगिक हो चुके, तत्कालीन एनडीए सरकार में मानव संसाधन मंत्री, मुरली मनोहर जोशी तो महाज्ञानी होते. सन् 2000 में राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन में कांति विश्वास के ज्ञान, विद्वता तथा शिक्षा की समझ की भूरि-भूरि प्रशंसा के बाद उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने बंगाली ब्राह्मण होकर राजनैतिक फायदे के लिए अनुसूचित जाति की फर्जी सर्टिफिकेट बनवा लिया. वर्णाश्रमी सामंती संस्कृति में पले-बढ़े, शाखा में प्रशिक्षित इस ब्राह्मण की कूपमंडूकता मान ही नहीं सकती कि अकथनीय सामाजिक भेद-भाव, अवमानना तथा प्रवंचना के बावजूद कोई दलितों-में-भी-दलित शिक्षाविद बन सकता है. जोशीजी भौतिकशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं तथा आजीवन शाखा-भक्त. भौतिकी एक ऐसा विषय है जो प्रमाणिक भौतिक को ही सत्य मानता है. जैसा इस लेख में है कि सीपीएम के बड़े नेताओं(मंत्री-विधायक-पार्टी पदाधिकारी) में अल्पसंख्यक भद्रलोक का ही वर्चस्व रहा है. जन्म के आधार पर व्यक्तित्व का मूल्यांकन ब्राह्मणवाद का मूलमंत्र है. फर्जी सर्टिफिकेट ही बनवाना होता तो ब्राह्मण का बनवाते.. जब कम्युनिस्ट पार्टी के ही सवर्णों में इस तरह के पूर्वाग्रह हों तो मनु को इतिहास का महानतम कानूनविद मानने वाले संघ के स्यंसेवक को क्या कहें.
कॉम. कांति विश्वास का जवाब कि विद्वता ब्राह्मणों की बपौती नहीं है, ब्राह्मणवाद के मुंह पर तगड़ा तमाचा है. “आपको ऐसा क्यों लगता है कि किसी छोटी जाति का आदमी ज्ञान प्राप्त कर शिक्षाविद नहीं बन सकता? यह मानना कि शिक्षा ब्राह्मणों की बपौती है, आपकी भयानक भूल है. मैं अनुसूचित जाति का हूं तथा पूर्वाग्रहो तथा पोंगापंथी से भरपूर आपकी इस बचकाने बयान की स्पष्ट शब्दों में निंदा करता हूं.”
मार्क्स ने कहा अर्थ ही मूल है. आर्थिक बेस स्ट्रक्चर से ही कानूनी, सांस्कृतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक सुपरस्ट्रक्चर निर्धारित होते हैं, लेकिन निर्धारित होने के बाद ये सापेक्ष स्वायत्तता हासिल कर लेते हैं तथा आर्थिक बेस स्ट्रक्चर को प्रभावित करता है. मार्क्स यूरोप में पूंजीवाद के उदय तथा विकास के नियमों की व्याख्या कर रहे थे जहां जन्मना सामाजिक विभाजन नवजागरण से शुरू होकर प्रबोधन काल तक खत्म हो चुका था. 19वीं सदी तक यूरोप के समाजविभाजन का आधार विशुद्ध आर्थिक बन चुका था. लेकिन भारत जैसे देश में जहां समाजविभाजन में प्रभुत्व का प्रमुख आधार मध्यकालीन जातीय हो वहां कम्युनिस्ट पार्टियों का जाति के मुद्दे को समता के सार्वभौमिक संघर्ष में समाहित माऩ लेऩा एक ऐतिहासिक भूल थी. उसी तरह जिस तरह जातिवाद विरोधी पार्टियों द्वारा इस तथ्य को नज़र-अंदाज करना कि शासक जातियां ही शासक वर्ग रही हैं. सामाजिक वर्ग-विभाजन तथा जातीय दमन को नजर-अंदाज कर बॉलसेविज्म को मिशाल की बजाय मॉडल मानकर नीति-निर्धारण से कम्युनिस्ट पार्टियों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों को लागू करने में देश-काल की ठोस, वस्तुगत परिस्थितियों के विश्लेषण की जहमत नहीं उठाया. यह किसी पार्टी की निंदा नहीं, आत्मालोचना है. मैं भी यही मानता था कि जब हम हर तरह की असमानता तथा शोषण-दमन के विरुद्ध हैं तो जातीय या लिंग आधारित भेद-भाव का मुद्दा अलग से उठाने की क्या जरूरत? जबकि मेरा बचपन आर्थिक कारकों से स्वतंत्र वर्णाश्रमी सामाजिक अन्याय का गवाह रहा है.

आत्मालोचना मार्क्सवाद की एक प्रमुख अवधारणा है, जिसे हममें से ज्यादा लोग भूल चुके हैं.
मार्क्स को फिर से पढ़ने की जरूरत है तथा मार्क्स के उदारवादी पूंजीवाद की समीक्षा के उपादान को नवउदारवादी पूंजीवाद की समीक्षा के उपादान में अनूदित करने की. सामाजिक संघर्ष के निर्वात को भरने का अवसर सामाजिक-न्याय के नेताओं को मिला. सामाजिक न्याय की पार्टियां आर्थिक वर्ग-विभाजन को नज़रअंदाज कर शासकवर्ग की अन्य पार्टियों के क्लब में शामिल हो गयीं.
पश्चिम बंगाल में सीपीएम नेतृत्व की सरकार के 3 दशक पूरा होते होते, क्रांतिकारी विचारों के व्यापक प्रसार की जगह वाम दलों तथा शासकवर्ग की पार्टियों में गुणात्मक फर्क़ खत्म हो गया. कांग्रेस तथा भाजपा की ही तरह, कम्युनिस्ट पार्टियों में हाईकमान बन गया. जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद के सिद्धांत के तहत विचारित सामूहिक नेतृत्व की अवधारणा की जगह “केंद्रीकृत जनतंत्र” के तहत व्यक्तिवादी नेतृत्व ने ले लिया. सीपीएम के पास सशस्त्र दस्ता तो नहीं था, लेकिन सलवाजुडूम या बजरंग दल की तर्ज पर हरमद नाम की प्रशिक्षित बाहुबलियों की निजी, अवैध सेना थी, जिसके उत्पात रोंगटे खड़े कर देती है.
आज जब जनतांत्रिक संस्थाओं पर फासीवादी हमले संवैधीनिक अधिकारों को अप्रासंगिक बना दिया है और वामपंथ की फौरी जिम्मेदारी संवैधानिक जनतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा तथा जनवादी चेतना का प्रसार है. रोहित वेमुला की शहादत ने सभी वामपंथी तथा अंबेडकरवादी संगठनों को एक साथ ला दिया है. जयभीम लाल सलाम नारों की एकता संघर्षों के इतिहास को नया मोड़ देगी. संघ परिवार तथा सरकार के जेएनयू पर साझे हमले ने इस इस एकजुटता को पुख्ता कर दिया है. उम्मीद की जानी चाहिए संघर्षों की एकता सैद्धांतिक एकता में तब्दील हो, जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद के सिद्धांत को सही सही लागू करते हुए, समाज में जनवादी ताकतों के नये समीकरण का दबाव ऊपर से नीचे की बजाय  नीचे से ऊपर जाये तथा हाईकमान की अवधारणा को अप्रासंगिक बना दे. सभी वामपंथी व्यक्तियों तथा संगठनों का नैतिक दायित्व बनता है कि छात्रों पर लादे गये इस सांस्कृतिक-बौद्धिक आंदोलन को व्यापक जनांदोलन में तब्दील करें. कम्युनिस्टों को मार्क्स के पुनर्पाठ की इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम की सलाह उपयोगी होगी. भारत जैसे अर्धसामंती, नवउपनिवेशवादी समाज में क्रांति का पथ प्रशस्त करने के लिए सामाजिक न्याय तथा आर्थिक न्याय के संश्लेषण की आवश्यकता है, अंबेडकर तथा मार्क्स के विचारों के समन्यव तथा जयभीम-लालसलाम नारों की एकता की निरंतरता की जरूरत है.

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