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कम्युनिस्ट दुनिया के पहले नास्तिक नहीं- नास्तिक कठमुल्लापंथी न हो

कम्युनिस्ट और नास्तिकता – चंद सवाल”
माफ़ कीजिएगा ज़ोहरा आंटी, आपके बहाने से ही ’’ये’’ बातें की जा सकती थीं“ के बहाने
उज्ज्वल भट्टाचार्या
हस्तक्षेप डॉट कॉम में ज़ुलेखा जबीं का लेख “माफ़ कीजिएगा ज़ोहरा आंटी, आपके बहाने से ही ’’ये’’ बातें की जा सकती थीं“ पढ़ने का मौक़ा मिला। दिलचस्प और महत्वपूर्ण लेख। अगर नसीहत देने के बदले सिर्फ़ सवाल पेश किये जाते, तो शायद यह लेख और महत्वपूर्ण होता।

लेख पढ़कर सबसे पहले अपने बारे में सोचने लगा। मैं किसी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं हूं, लेकिन इस सवाल पर अपने-आपको कम्युनिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टी की नैतिकता से बंधा महसूस करता हूं। उम्र अभी बासठ से कम है, लगभग चालीस साल और जीना चाहता हूं। मेरी बेटी को पता है कि मौत के बाद मेरे बेजान जिस्म को बिजली के चूल्हे में जला देना है और कोई धार्मिक कृत्य नहीं करना है। खैर, मां अभी ज़िंदा हैं और इसलिये अपनी मौत के बारे में सोचना नहीं है। लेकिन अगर मां के रहते किसी दुर्घटना या आकस्मिक बीमारी से मेरी मौत हो जाती है, तो हिंदू रीति के अनुसार मेरा श्राद्ध भी होगा। मां के रहते मरना एक अक्षम्य अपराध होगा, उसके बाद अगर श्राद्ध न हो, तो यह बर्दाश्त करना उनके लिये बेहद मुश्किल होगा।

आठ साल पहले मेरे पिताजी की मृत्यु के बाद ये सवाल सामने आये थे। 18 साल की उम्र से कम्युनिस्ट मेरे पिताजी पूरी तरह से नास्तिक थे। उन्होंने कुछ कहा नहीं था, लेकिन अपनी मौत के बाद कोई धार्मिक क्रिया नहीं चाहते थे। इसी भावना में मेरे मंझले भाई ने श्राद्ध का विरोध किया। मां ज़्यादा कुछ कहने की हालत में नहीं थी, सिर्फ़ पूछ रही थी – श्राद्ध नहीं होगा ?
मेरा छोटा भाई भी धार्मिक नहीं है, लेकिन वह मां की तकलीफ़ समझ रहा था।
सबसे छोटी बहन कम्युनिस्ट पार्टी की चेतना के दायरे से बाहर है, ज़ाहिर है कि श्राद्ध उसकी राय में स्वाभाविक बात थी। मैं जर्मनी में था, घर जाना मुमकिन नहीं था, छोटे भाई ने मुझे फ़ोन करते हुए पूछा कि क्या किया जाय। मैंने मंझले भाई को फ़ोन किया और उससे कहा कि मां चाहती है कि श्राद्ध हो, और श्राद्ध होगा। कोई बहस नहीं चलेगी। और ऐसा ही हुआ। मां जब चली जाएगी, तो श्राद्ध होगा। यह उनकी स्मृति के प्रति श्रद्धांजलि होगी। शायद वह हमारे परिवार में आखिरी श्राद्ध होगा।

अब आता हूं इस सवाल पर कम्युनिस्ट की और कम्युनिस्ट पार्टी की नैतिकता के सवाल पर। मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक सिद्धांत, यानी नास्तिक सिद्धांत है। एक प्रतिबद्ध सचेत मार्क्सवादी की ऐसे धार्मिक कर्मकांडों में आस्था नहीं हो सकती। अगर उसमें ऐसी आस्था की झलक है, तो उसकी मार्क्सवादी चेतना संपूर्ण नहीं है।
मार्क्सवाद कम्युनिस्ट पार्टियों का सिद्धांत है।

इस आशय में पार्टी भी ऐसी आस्था में शरीक नहीं होती है, नहीं हो सकती है। लेकिन मैं नहीं समझता कि ऐसी आस्था का समाज से उन्मूलन किसी कम्युनिस्ट पार्टी का राजनीतिक लक्ष्य है या होना चाहिये। कम्युनिस्ट दुनिया के पहले नास्तिक नहीं हैं, और नास्तिक को कठमुल्लापंथी नहीं होना चाहिये।

समाज कम्युनिस्ट या किसी अन्य पार्टी के क़दमों से नहीं, बल्कि बौद्धिक-सांस्कृतिक-सामाजिक प्रक्रियाओं से नास्तिक होती गई है, होती जाएगी। इसके अलावा नास्तिकता कोई धर्म नहीं है, जो अन्य धर्मावलंबियों, मसलन आस्थावानों को स्वीकार न कर सके।

मार्क्सवाद कम्युनिस्ट पार्टियों का सिद्धांत है, लेकिन उसके समूचे विश्व दृष्टिकोण को समाज में लागू करना कम्युनिस्ट पार्टी का मिशन नहीं होता है। वह एक राजनीतिक पार्टी होती है, जिसके काम व क़दम राजनीति के दायरे में व उसके प्रभाव क्षेत्र तक सीमित रहते हैं। एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर उसे इस बात का ख़्याल रखना चाहिये कि वह नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप न करे। और धार्मिक कर्मकांड जब निजी जीवन तक सीमित रहते हैं, सार्वजनिक जीवन में दखलंदाज़ी नहीं करते हैं, तो पार्टी को उससे दूर रहना चाहिये। हां, ऐसे कर्मकांड के बारे में कम्युनिस्ट की एक राय हो सकती है, जिसे सार्वजनिक रूप से पेश किया जा सकता है. लेकिन यहां भी सामाजिक विमर्श के शिष्टाचार का पालन होना चाहिये। और फिर यह सवाल रह जाता है कि क्या कम्युनिस्ट होने के लिये, यानी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होने के लिये मार्क्सवादी आशय में नास्तिक होना ज़रूरी नहीं है ?
मेरे लिये कर्मकांडों में आस्था रखने वाला कोई कम्युनिस्ट नेता स्वीकारणीय नहीं है.
कम से कम सर्वोच्च स्तर पर। लेकिन मार्क्सवाद का सिद्धांत नहीं, बल्कि मार्क्सवाद के सिद्धांत पर आधारित राजनीति पार्टी के कामों, राजनीति सहित सार्वजनिक सवालों पर उसके विश्लेषणों और पार्टी की सदस्यता की कसौटी है। और निजी जीवन तक सीमित आस्था उसका अंग नहीं है।

इसलिये ऐसे सवालों पर निजी और पारिवारिक जीवन में पार्टी की दखलंदाज़ी या किसी भी प्रकार से पार्टी व उसके सदस्यों द्वारा दबाव डालना पूरी तरह से अनुचित है।

……और अंत में कहना चाहूंगा : अगर आप एक ओर मार्क्सवादी नेता या मार्क्सवादी बुद्धिजीवी बनने का दावा करते हैं, और उसी के साथ पूजापाठ या नमाज़ आदि जारी रखते हैं, तो आपकी वैचारिक विश्वसनीयता मेरी नज़रों में संदिग्ध है, लेकिन आपके इस अधिकार का मैं समर्थन करता रहूंगा।

जुलैखा जबीं का लेख यहां पढ़ें-
माफ़ कीजिएगा ज़ोहरा आंटी, आपके बहाने से ही ’’ये’’ बातें की जा सकती थीं

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