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कर दो सावधान एनजीओ गैंग के सरगना को!!

एच एल दुसाध
मित्रों, मैं लगभग दो घंटे पहले दिल्ली के वर्ल्ड बुक फेयर से घर तो नहीं, वहाँ पहुँचा जो वर्तमान में मेरी शरणस्थली है। आप जानते हैं कि मैं आदमी सड़क का हूँ। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, जोकि अपनी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है, में समाज परिवर्तनकामी मित्रों द्वारा सुलभ करायी गयी शरणस्थली ही अपना ठिकाना है। वर्तमान में अपना ठिकाना ‘पे बैक टू द सोसाइटी’से कुछ अतिरिक्त रूप से दीक्षित बृजपाल भारती का घर है। यहाँ मेरे लिये तमाम बेसिक सुविधाएं हैं जिनमें टीवी भी है। इसलिये यहाँ पहुँचते ही न्यूज चैनल लगवा दिया। ’लगवा दिया’ शब्द इसलिये इस्तेमाल कर रहा हूँ कि आज के अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी वाली टीवी चलाना भी मुझ जैसे तकनीकी रूप से पिछड़े आदमी के लिये आसान नहीं है। बहरहाल बुक फेयर से आकर जब टीवी न्यूज शुरू करवाया, एनजीओ गैंग के हीरो का घुमा-फिराकर महिमामंडन जारी पाया। आज उसके लिये मंच सुलभ किया था घोर सवर्णवादी संगठन सीआईआई ने। यहाँ उस चरम बहुजन ने अपनी परम्परागत शैली में ढेरों डायलॉग मारे, जैसे-कारोबार सरकार का काम नहीं; उद्योग-व्यापार जगत के खिलाफ नही आप; आप आम नहीं, सिर्फ कुछ खास उद्योग घरानों के खिलाफ; रिटेल में एफडीआई से ख़त्म होगी नौकरियाँ…
मित्रों, कुछ सप्ताह पहले मैने ऍफ़बी पर पोस्ट किया था कि एक व्यक्ति ने मुझे एनजीओ गैंग के वर्तमान सरगना से यह कहकर मिलवाया कि इन्होंने आरटीआई लागू करवाने ऐतिहासिक काम किया है। औपचारिकता के नाते उससे हाथ मिला लिया। पर ज्यादा बात न कर दूसरे कमरे में चला गया, क्योंकि उसके बॉडी लैंग्वेज का ख्याल करने के बाद मुझे लगा मैंने लिहाजवश एकनिहायत ही राष्ट्र विरोधी आदमी से हाथ मिला लिया है। उसके काइयांपन की वजह से मैं भी जातिवादी बन गया, क्योंकि मैंने उसके खिलाफ वैसी ही अस्पृश्यतामूलक टिप्पणी कर दी जैसा सवर्ण, दलितों के प्रति अक्सर करते हैं। आज भी लगता है मैंने कितने राष्ट्र विरोधी आदमी से हाथ मिला लिया। मित्रों, वह आदमी और कोई नहीं आज के सवर्णों का चैंपियन हीरो वह आम आदमी का शिरोमणि है जिसका नाम तो नहीं ले सकता क्योंकि मेरी जुबान गन्दी हो जायेगी, उसका नाम तभी लेता हूँ जब मेरी शब्द शक्ति जवाब दे देती है। बस उसकी तारीफ में यही कह सकता हूँ, ’एनजीओ गैंग का सरगना’! इतनी लम्बी भूमिका बाँधने के पीछे मुझे एक खास सन्देश आप विवेकवान लोगों के माध्यम से एनजीओ सरगना और उसके समर्थकों तक पहुँचाना है।
 मित्रों ,आप जानते हैं अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में तमाम तरह के लोग आते हैं, बदमाश से लेकर शरीफ, नेचुरल बुक लवर से लेकर दो नम्बरी नेता व समाजसेवी। दो नम्बरियों के आने का मकसद खुद को विद्वान् नहीं तो विद्वानों का कद्रदान प्रमाणित करना होता है। इस कारण प्रकृत पुस्तक प्रेमियों सहित तरह-तरह के पेशों से जुड़े लोग इस पुस्तक मेले में शिरकत करते हैं, ऐसा मेरे अतीत का अनुभव कहता है। मेरी यह अपील इस अनुभव से ही जुड़ी है।
 अतीत के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि एनजीओ गैंग का सरगना भी खुद को विद्वान् नहीं तो विद्वानों का कद्रदान साबित करने के लिये बुक फेयर में जरूर आयेगा। क्योंकि यह तरह-तरह के मंचों पर जाकर भ्रष्टाचार जैसे पिद्दी से मुद्दे को सबसे बड़ा मुद्दा बताने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ना चाहता। चूँकि उसे हर मंच पर सवर्णों के डोमिनेंस के कारण ही नायक जैसा सम्मान मिलता है, इसलिये वह अतिरिक्त रूप से सवर्ण डोमिनेटेड दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले को भी मंच बनाने का मोह संवरण नहीं कर पायेगा। हालाँकि उसका आना, यदि विद्वानों का कोई स्टेटस या चरित्र है तो, वर्जित होना चाहिए। पर डेमोक्रेटिक कंट्री का सदस्य होने के नाते पढ़ा लिखा अनपढ़ वह कथित आम आदमी का सरताज यहाँ आने के लिये स्वाधीन है। अतः मित्रों उसे आने के लिये हम तो चाह कर भी मना नहीं कर सकते।
लेकिन आप वालों! लाचार और बुड्ढ़े दुसाध पर करुणा करते हुये अपने सरगना को यह सन्देश दे दो कि वह पहले तो पुस्तक मेले में आये ही नहीं। आये भी तो हाल न.18 में न आये। अगर वह आपकी हिदायत के बावजूद हाल न.18 में आ भी जाता है, प्लीज उसे इस हाल के स्टैंड न.S1-29 पर न आने देना। क्योंकि वहाँ दुसाध खड़ा मिलेगा और वहाँ उसके पहुँचने पर मैं जन लोकपाल के खिलाफ अपने द्वारा लिखित व प्रकाशित 3 किताबें सीधे उस चरम बहुजन भारत विरोधी के मुँह पर दे मारूँगा। हाँ एक शर्त पर आप आने दे सकते हो, यदि आपको लगता है कि यह धूर्त मारवाड़ी सबको भरमाने के साथ ही 11 पास दुसाध को अपने तर्कों का कायल बना लेगा। पर मैं जनता हूँ क्लास आठ पास जैसा एक मारवाड़ी की बौद्धिक क्षमता रखनेवाला यह काइयां सरगना, चैनलों के एंकरों के सामने तो जायेगा (क्योंकि एंकर उसके चमचे बन चुके हैं) बहुजनवादियों से आँखे नहीं मिलायेगा।
ऍफ़बी पर जुड़े मेरे सवर्ण मित्रों, जो विवेकवान हैं, यह पंक्तियां लिखते हुये आपके मित्र दुसाध की आँखें गीली हो रही हैं। आप बतायें आपने लेखक दुसाध का जो चरित्र लेखन में पाया है ,क्या वह दुसाध एनजीओ गैंग के काइयां चरित्र वाले सरगना को झेल ले? मुझे यह सफाई स्वरूप कमेन्ट करने का हक़ इसलिये बनता है कि मैं 55 से अधिक किताबों का लेखक हूँ, जिनमें 45 किताबें ही उस डाइवर्सिटी के सिंगल मुद्दे पर हैं जिस डाइवर्सिटी के विषय ‘आप’ से जुड़े प्रोफेसरों, अरुण कुमार, आनंद कुमार जो मेरे कल के गुरु रहे पर आज.., की हैसियत दुसाध की नज़रों में प्राइमारी के टीचरों जैसी है। क्या मेरे जैसा लेखक एनजीओ गैंग को यूँ ही आगे जाने देगा? मित्रों दुःख है कि यह देश जातिवादी है जहाँ सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में पलीता लगाने वाले एनजीओ वालों को लोग देवता के रूप में पूज रहे हैं। लोगों की इस बौद्धिक अपंगता का ही लाभ उठाकर प्रो. अरुण कुमार, आनंद कुमार, योगेन्द्र यादव जैसे लोग अपनी दमित महत्वाकांक्षाएं शातिर मारवाड़ी के साथ जोड़ दिए हैं। यदि इनमे नैतिक बल हैं आयें इमानदारी से बहुजनवादियों से जन लोकपाल के मुद्दे पर बहस कर लें। दुसाध को भरोसा है कि आनंद कुमार, अरुण कुमार, योगेन्द्र यादव जैसे लोगों ने खुद को इतना गिरा दिया है मुझ जैसों बहुजन वादियों के सामने आँखे नहीं मिला सकते। बहरहाल मित्रों इस गैंग पर बहुत कुछ लिख चूका हूँ। एनजीओ गैंग के बड़े से बड़े समर्थकों सहित आप शुभेच्छुक मित्रों से अनुरोध है कि दुसाध पर करुणा करते हुये एनजीओ गैंग के सरगना को वर्ल्ड बुक फेयर में वहाँ आने से रोकें जहाँ मैं रहूँगा। उसके आने पर जो कुछ होगा न वह उसके लिये अच्छा होगा न बहुजनवादी दुसाध के लिये। चूँकि मैं मूलनिवासी समाज से जुड़ा दुसाध हूँ, और दुसाध जो कहते हैं पूरा करते हैं, इसलिये प्लीज उस मारवाड़ी को रोको जो डेमोक्रेसी को ध्वस्त करने जा रहा है। हाँ, वह एक ही शर्त पर मेरे स्टैंड के सामने आ सकता है यदि उसे अपनी हस्त रेखाओं तथा अपने भगवान् पर बहुत भरोसा हो। पर आप उसे बता देना दुसाध भयंकर ईश्वर विरोधी है।
दिनांक:17 फरवरी,2014

About the author

एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के संयोजक हैं।

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