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कला है और खेल भी मछली पालन

किसी भी इलाके के विकास के लिये केवल सरकार की योजनाएं ही काफी नहीं है। यदि समुदाय चाहे तो सरकारी योजनाओं का इंतजार (Waiting for government schemes) किये बगैर मिसाल कायम कर सकता है। रांची से 35 किलोमीटर दूर जोन्हा पंचायत इसका उदाहरण है। जिसने विगत छह सालों से मछली पालन से समृद्धि (Prosperity from fisheries) तो की है साथ ही गाँव के विकास और पानी के स्रोत (Water sources) तथा मलेरिया जैसे बीमारियों पर भी काबू पा लिया।

आलोका, रांची

किसी भी इलाके के विकास के लिये केवल सरकार की योजनायें ही काफी नहीं है। यदि समुदाय चाहे तो सरकारी योजनाओं का इन्तजार किये बगैर मिसाल कायम कर सकता है। रांची से 35 किलोमीटर दूर जोन्हा पंचायत इसका उदाहरण है। जिसने विगत 6 सालों से मछली पालन से समृद्धि तो की है साथ ही गाँव के विकास और पानी के स्रोत तथा मलेरिया जैसे बीमारियों पर भी काबू पा लिया। अनगड़ा प्रखंड का डोकाद गाँव के विजय ठाकुर कभी अखबार से जुड़े हुये थे। लेकिन गाँव के विकास और सामाजिक काम करने के प्रति उनकी इच्छा शक्ति के आगे उन्होंने इस काम को छोड़ दिया और गाँव में ही रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के लिये प्रयास करने लगे।

आखिरकार वह समय आ ही गया जब 2008 में झारखण्ड सरकार के मत्स्य विभाग से प्रशिक्षण (Training from Fisheries Department of Government of Jharkhand) लेकर उन्होंने गाँव में ही मछली पालन का काम का काम शुरू किया। आरम्भ में उन्होंने एक तालाब और चार किलो मछली का चारा (Fish bait) से व्यवसाय का श्रीगणेश किया। धीरे-धीरे यह काम इतना फल-फूल गया कि आज छह साल में उनके पास छह तालाब है।

विजय ठाकुर बताते हैं कि मछली पालन की इच्छा उन्हें बचपन से थी। किसान परिवार के होने के बावजूद खेती करना सम्भव नहीं था। शरीर उस लायक नहीं था कि किसान की तरह कड़ी मेहनत कर परिवार का लालन पालन कर सकें। विजय कहते हैं कि मत्स्य विभाग से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद हमने निश्चय किया कि तालाब लीज़ पर लेकर मछली पालन किया जाये। इसमें हमें कई प्रकार के फायदे भी थे।

मछली एक ओर जहाँ गाँव में पानी के स्रोत को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है वहीं पानी में मौजूद जहरीले कीड़ा मकोड़ा का भी खात्मा करता है।

From a scientific point of view, fish farming is very useful for Jharkhand.

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो मछली पालन झारखंड के लिये बहुत उपयोगी है। इससे खेती ही नहीं, वातावरण और पर्यावरण पर भी अनुकूल असर होता है साथ ही मानव जाति के लिये यह अति प्रोटीनयुक्त खाद्य सामग्री भी है।

विजय बताते हैं कि शुरू में मछली के लिये चार किलो चारा से चार क्विंटल मछली और 40 हजार रूपये की आमदनी ने गाँव वालों के लिये नई राह खोल दिया। इस काम ने कई छोटे और मझौले किसानों को रोजगार के नये अवसर से जोड़ दिया। इसका एक सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि जिन तालाब में मछली पालन का काम होता था। वहाँ के आस-पास के खेतों में उर्वरक शक्ति बढ़ गयी। मछली पालन अब गाँव में रोजगार के एक बड़े साधन के रूप में जुड़ गया है।

विजय कहते हैं कि अभी झारखण्ड में पाँच करोड़ रूपये का मछली आयात किया जाता है। यदि किसान और सरकार चाहे तो इस रोजगार को अपनाकर झारखंड से पाँच करोड़ रूपया बाहर जाने से रोक सकते हैं। उसी पैसे से यहाँ किसानों की समृद्धि के लिये मत्स्य पालन प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना कर सकते हैं।

विजय ठाकुर और उनके परिवार द्वारा शुरू किया गया मछली पालन और उनसे होने वाले लाभ की चर्चा तेजी से आसपास के गाँव में फैलती जा रही है। दूर-दूर से लोग उत्सुकतावश उनसे मछली पालन से होने वाले लाभ के बारे में जानने आते हैं।

विजय बताते हैं कि वह रोज़ाना रात दो बजे से मछली पकड़ने का काम शुरू कर देते हैं और सुबह 4 बजे इन्हें रांची के बाजार में पहुँचाते हैं।

उन्होंने बताया कि इसे बाजार तक पहुँचाने में पुलिस वालों से काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। विजय अब अपने इस काम से दूसरों को भी जोड़ने का सराहनीय प्रयास कर रहे हैं। इसके लिये 5 लाख मछली बीज का उत्पादन करेंगे जिसे गाँव के सभी तालाबों में डाला जायेगा।

Fish consumption is very high in Jharkhand

झारखंड में मछली की खपत काफी अधिक है। यहां समाज के सभी वर्गों में खुशी के अवसर पर मछली परोसना शुभ माना जाता है।

विजय द्वारा उत्पादित मछली से जोन्हा के स्थानीय बाज़ार के साथ साथ रांची का बाजार भी गुलजार हो रहा है। अब वे मद्रासी तरीके से मछली का उत्पादन करने के लिये तैयार हो रहे है। अभी झारखण्ड के किसान इस तरीके से मछली का उत्पादन करना नहीं जानते है।

जोन्हा पंचायत में आज विजय ठाकुर प्ररेणा बन चुके हैं। इस समय पूरे पंचायत में 25 से 30 तालाब हैं। जिसमें मछली पालन का काम होता है।

हालाँकि इन तालाबों केवल मछली पालन का ही काम नहीं होता है बल्कि सिंचाई, और मवेषी के लिये पानी के साथ छोटी बड़ी जरूरतों की पूर्ति भी होती है।

डोकाद गाँव में अब खेती और जंगल के अलावा मछली पालन भी अहम रोजगार का रूप धारण कर चुका है। जिसके कारण गाँव में लोगों की न सिर्फ आमदनी बढ़ी है बल्कि रोजगार के नाम पर होने वाला पलायन भी रूक गया है। अब नौजवान परदेस जाकर कमाने की बजाय विजय ठाकुर की तरह गाँव में ही मछली पालन में रोजगार ढ़ूँढ़ने लगे हैं। यहाँ किसान कर्ज लेने के एक साल में ब्याज समेत चुका देता है। परिवार में किसी बड़ी बीमारी हो या शादी विवाह के खर्चे की बात हो मछली पालन व्यवसाय से जुड़े किसानों के लिये अब कोई चिंता की बात नहीं रही है। अपने बच्चों को अच्छे संस्थान में पढ़ाने के लिये खर्च मछली पालन से भी निकाल लेते हैं। एक तालाब कई लोगों को रोजगार देने लगा है। विजय कहते हैं कि उनकी दृष्टि में अंग्रेजी के Fish का अर्थ केवल मछली ही नहीं है। बल्कि F-Food, I-Income, S-Sport और H-Health है।

वह मानते हैं कि गाँव में मछली पालन एक कला है और एक खेल भी। इसे ग्रामीण रोमांचित और आनन्दमय होकर उत्पादन करते हैं। वह कहते हैं कि यदि मछली उत्पादन को ग्रामीण उद्योग का रूप दिया जाये तो झारखंड पूरे भारत को रोजगार प्रदान कर सकता है। जोन्हा के किसान वास्तव में इसी संकल्प के साथ मछली के उत्पादन में जुटे हुये हैं। (चरखा फीचर्स)

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