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कविता कैसे लिखूं ?/ मेरी कविता होगी/ तुम्हारे क़ातिलों/ और उनके पीछे खड़े/ सफ़ेदपोश हैवानों पर

अखलाक़, मैं क्या लिखूं ?
अखलाक़,
तुम्हारा कोई इरादा नहीं था
खबरों की सुर्खियों में आने का.
तुम वीर नहीं थे,
नायक नहीं थे.
लगभग उसे बूढ़े जोशुआ की तरह
लाईन में खड़े होकर
गैस चेंबर में जाने का इंतज़ार करते हुए
जिसे पता भी नहीं चला
क्यों उसे मरना पड़ रहा है.
मेरा भी कोई इरादा नहीं था
तुम पर कविता लिखने का.
सच तो यह है –
मैं तुम्हें जानता ही नहीं हूं,
कविता कैसे लिखूं ?
मेरी कविता होगी
तुम्हारे क़ातिलों
और उनके पीछे खड़े
सफ़ेदपोश हैवानों पर –
मेरी कविता होगी
अपनी बेबसी पर.
उज्ज्वल भट्टाचार्या

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