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कवि और पत्रकार नीलाभ अश्क नहीं रहे

माध्यमों की समग्र सोच और समझ वाले नीलाभ का जाना निजी और सामाजिक अपूरणीय क्षति है।
पलाश विश्वास
मशहूर कवि और वरिष्ठ पत्रकार नीलाभ अश्क का 70 साल की उम्र में निधन हो गया है। नीलाभ अश्क प्रसिद्ध लेखक उपेंद्र नाथ अश्क के पुत्र थे। वे दिवंगत कवि वीरेन डंगवाल के गहरे मित्र थे और कवि मंगलेश डबराल के भी। 1979 में नैनीताल से एमए पास करके मैं जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध के लिए गया तो वीरेनदा वहीं से शोध कर रहे थे। रामजी राय भी तब इलाहाबाद थे। मंगलेश डबराल उस वक्त अमृत प्रभात के साहित्य संपादक थे। अभी हाल में दिवंगत कथाकार सतीश जमाली भी कहानी में थे।
मैं नीलाभ के खुसरोबाग के घर के बेहद नजदीक 100,लूकरगंज में मशहूर कथाकार शेखर जोशी के घर रहता था और खुसरोबाग में ही वीरेनदा और मंगलेश डबराल का घर था। नीलाभ के मार्फत ही हमारा परिचय उनके पिता उपेंद्र नाथ अश्क से हुआ। हालांकि तराई में पत्रकारिता के वक्त से अश्क जी और अमृतलाल नागर के साथ हमारे पत्र व्यवहार जारी थे।

नीलाभ हमसे बड़े थे और तब नीलाभ प्रकाशन देखते थे। जहां हम शैलेश मटियानी और शेखर जी के अलावा वीरेनदा और मंगलेश दा के साथ आते जाते रहे हैं।
सभी जानते हैं कि कवि, साहित्यकार और पत्रकार नीलाभ अपनी लेखनी के जरिए शब्दों को कुछ इस तरह से गढ़ते थे, कि वो कविता बन जाती थी।

मुंबई में जन्मे नीलाभ की शिक्षा इलाहाबाद से हुई थी। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एमए किया था।
यह भी सबको मालूम है कि पढ़ाई के बाद सबसे पहले नीलाभ अश्क प्रकाशन के पेशे से जुड़े और बाद में उन्होंने पत्रकारिता को अपनाया। पत्रकारिता से जुड़ने के बाद उन्होंने चार साल तक लंदन में बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग सर्विस) की प्रसारण सेवा में बतौर प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दीं।

जो सबसे खास बात है, वह यह है कि विभिन्न कला माध्यमों चित्रकला, संगीत और फिल्मों के बारे में उनकी समझ बेमिसाल थी।
अस्सी के दशक में बीबीसी कूच करने से पहले दूरदर्शन के लिए चार एपिसोड का एक सीरियल उन्होंने कला माध्यमों पर बनाया था और भारतीय सिनेमा के इतिहास को खंगाला था।
फिर बीबीसी से लौटने के बाद जब पुराने मित्रों और परिजनों से भी वे अलग-थलग हो गये, तब उन्होंने अश्वेत संगीत परंपरा पर बेहतरीन लेख शृंखला अपने ब्लाग नीलाभ का मोर्च के जरिये लिखा था, जिसके कुछ अंश हमने हस्तक्षेप पर हम लोगों ने धारावाहिक प्रकाशित किया था। उसमें अश्वेत जीवन और संघर्ष का सिलसिलेवार ब्यौरा है।
हमें इसका संतोष है कि बेहद अकेले हो गये नीलाभ से हमारा लगातार संपर्क बना रहा और हम उनकी खूबियों के प्रशंसक बने रहे।
यह सामूहिक और निजी शोक का समय है। वीरेदा गिरदा की पीढ़ी, नवारुण दा की पीढ़ी आहिस्ते-आहिस्ते परिदृश्य से ओझल होती जा रही है और हमारी पीढ़ी के अनेक साथी भी अब दिवंगत हैं।
माध्यमों की समग्र सोच और समझ वाले नीलाभ का जाना निजी और सामाजिक अपूरणीय क्षति है।
कला समीक्षक अजित राय ने लिखा हैः

नीलाभ नहीं रहे।
नीलाभ से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी जब मैं 1989 मे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान मे एम ए का छात्र था। सिविल लाइंस मे नीलाभ प्रकाशन के दफ्तर में सार्त्र और कामू के अस्तित्ववाद पर चर्चा करने जाता था। तब वे बीबीसी लंदन से लौटे ही थे। इन 27 सालों में अनगिनत मुलाकातें हैं। अभी पिछले साल हम अशोक अग्रवाल के निमंत्रण पर कुछ दिन शिमला में थे। उनके साथ की तीखी धारदार बहसों से हमे बहुत कुछ मिलता था।वे हमारी यादों मे हमेशा अमर रहेंगे।

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