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कश्मीरी पंडितों से क्यों नहीं मिले राजनाथ सिंह ?

कश्मीरी पंडितों के प्रति आरएसएस के पाखंड की पोल खुली
जगदीश्वर चतुर्वेदी
हाल ही में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर की दो दिवसीय यात्रा खत्म करके लौटे हैं।
इस यात्रा की शुरूआत के साथ ही उन्होंने यह घोषणा की थी उनसे जो भी मिलना चाहे मिल सकता है। वे निजी तौर पर भी कश्मीर के विभिन्न समुदायों, संगठनों, राजनीतिक दलों आदि से मिलने का मन बनाकर श्रीनगर पहुँचे थे।
वे किस तरह के लोगों से मिले और उनकी क्या बातें हुईं इसका कोई विवरण अभी तक अखबारों में नहीं आया है। लेकिन जो खबरें अखबारों में आई हैं उनसे साफ पता चलता है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ तनाव बना हुआ है।

महबूबा स्वयं राजनाथ सिंह से मिलने गेस्ट हाउस नहीं गयीं अंत में मजबूरन राजनाथ सिंह उनके घर जाकर उनसे मिले।
प्रेस कॉंफ्रेंस के दौरान में भी दोनों नेताओं की भाव-भंगिमा तनावपूर्ण थी।
महबूबा मुफ्ती तो एस कदर परेशान थीं कि प्रेस काँफ्रेस बीच में ही अचानक खत्म करके उठ खड़ी हुईं, जबकि राजनाथ सिंह बैठे हुए थे। इससे इन दोनों नेताओं के बीच का तनाव सामने आ गया।

     गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अब तक दो कश्मीर यात्राएं हुई हैं और दोनों असफल रही हैं।
यहां तक कि व्यापारिक संगठनों ने दोनों बार उनसे मुलाकात करने से साफ मना कर दिया।
वहीं दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों के सरकारी कर्मचारियों के संगठन के प्रतिनिधि राजनाथ सिंह से मिलने के लिए समय मांगते रहे, मिलने के लिए चक्कर काटते रहे, लेकिन कश्मीरी पंडितों के संगठन को मिलने का समय नहीं दिया गया। जबकि मौजूदा अशांति की अवस्था में कश्मीरी पंडित बहुत परेशान हैं।

इन परेशान पंडितों के बारे में किसी भी भाजपानेता या अनुपम खेर टाइप फिल्म अभिनेता तक ने अभी तक बयान नहीं दिया।
   उल्लेखनीय है सन् 2010 के प्रधानमंत्री पुनर्रोजगार कार्यक्रम के तहत दो हजार कश्मीरी युवा कश्मीर घाटी में अपने घर वापस लौटे और काम-धंधा कर रहे हैं।
ये वे लोग हैं जिनको 1990 में कश्मीर छोड़ना पड़ा था, लेकिन बुरहान वानी कांड के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के कारण इन लोगों को फिर से अपना घर-द्वार छोड़ना पड़ा, और वे जम्मू में शरण लेकर रह रहे हैं।

ये लोग राजनाथ सिंह से मिलना चाहते थे लेकिन राजनाथ सिंह ने इन लोगों से मिलने से मना कर दिया।
इन लोगों के घर अनंतनाग और पुलवामा में हैं, वहां पर वे ट्रांजिट कैंपों में छह साल से रह रहे थे। हाल के घटनाक्रम के दौरान उपद्रवियों की भीड़ ने उनके कैंपों पर हमले किए, जिसके कारण ये लोग जान बचाकर भागने को मजबूर हुए।
ये लोग 2010 से इन इलाकों में शांति से रह रहे थे।
उल्लेखनीय है कश्मीरी पंडितों के सवाल पर सभी टीवी चैनल फिलहाल चुप हैं, जबकि एक साल पहले कश्मीरी पंडितों के लिए ये ही चैनल घड़ियाली आँसू बहा रहे थे।
स्थिति यह है कि स्थानीय कश्मीरी अखबारों को छोड़कर इन पीड़ितों की खबर कहीं पर नज़र नहीं आएगी, यहां तक कि फेसबुक आदि पर सक्रिय मोदीभक्तों ने भी इन कश्मीरी पंडितों के बारे में कुछ भी नहीं लिखा।
इससे कश्मीरी पंडितों के प्रति आरएसएस के पाखंड की पोल खुलती है।

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