कश्मीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पाकिस्तानी शासक वर्ग की खिसियाहट

कश्मीर के यह खासियत जिसे कश्मीरियत भी कहा जाता है, पिछले पांच हज़ार वर्षों की सांस्कृतिक प्रगति का नतीजा है। कश्मीर हमेशा से ही बहुत सारी संस्कृतियों का मिलन स्थल रहा है। इसीलिये कश्मीरियत में महात्मा बुद्ध की शख्सियत, वेदान्त की शिक्षा और इस्लाम का सूफी मत समाहित है।

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जम्मू-कश्मीर की राजनीति के चलते पाकिस्तान में हमेशा ही उबाल रहता है। आजकल सीमा पर पाकिस्तानी गोलीबारी चल रही है। नए प्रधानमंत्री ने यह कह कर कि नेताओं की जुबां नहीं, जवानों की बन्दूक से बात होगी, एक बार असली युद्ध की आशंका को संभावना की सीमा में ला दिया है। हालात युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं जिसे हर कीमत पर रोका जाना चाहिये। उधर पाकिस्तानी शासक वर्गों की तरह से हर पाकिस्तानी को बता दिया गया है कि कश्मीर उसका है और उसे कश्मीर पर राज करने का अधिकार है। पाकिस्तानी फौज जम्मू-कश्मीर के बार्डर पर कुछ न कुछ करती ही रहती है लेकिन नया मामला बहुत ही गंभीर है। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी गतिविधियों को समझने के लिए ज़रूरी है कि इस विवाद के पिछले 67 साल के इतिहास पर एक नज़र डाली जाए।

देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी।

बहुत ही पेचीदा मामला था। ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा। कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे। कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें। इस बीच महाराजा हरिसिंह के प्रधान मंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेंगे। 15 अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे। भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया।–

पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की जाए।”

नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फ्रेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा। अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पड़ेगा। अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता। इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया। पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपड़े, पेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी। संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी। उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी।

हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर 194 में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी।

महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा।

ऐसी हालत में राजा ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी। नतीजा यह हुआ कि उनके प्रधान मंत्री मेहर चंद महाजन को कराची बुलाया गया। जहां जाकर उन्होंने अपने ख्याली पुलाव पकाए।

महाजन ने कहा कि उनकी इच्छा है कि कश्मीर पूरब का स्विटज़रलैंड बन जाए, स्वतंत्र देश हो और भारत और पाकिस्तान दोनों से ही बहुत ही दोस्ताना सम्बन्ध रहे। लेकिन पाकिस्तान को कल्पना की इस उड़ान में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसने कहा कि पाकिस्तान में विलय के कागजात पर दस्तखत करो फिर देखा जाएगा। इधर 21 अक्टूबर 1947 के दिन राजा ने अगली चाल चल दी। उन्होंने रिटायर्ड जज बख्शी टेक चंद को नियुक्त कर दिया कि वे कश्मीर का नया संविधान बनाने का काम शुरू कर दें।

पाकिस्तान को यह स्वतंत्र देश बनाए रखने का महाराजा का आइडिया पसंद नहीं आया और पाकिस्तान सरकार ने कबायली हमले की शुरुआत कर दी। राजा मुगालते में था और पाकिस्तान की फौज़ कबायलियों को आगे करके श्रीनगर की तरफ बढ़ रही थी। लेकिन बात चीत का सिलसिला भी जारी था।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव मेजर ए एस बी शाह श्रीनगर में थे और प्रधान मंत्री समेत बाकी अधिकारियों से मिल जुल रहे थे। जिनाह की उस बात को सच करने की तैयारी थी कि जब उन्होंने फरमाया था कि, ”कश्मीर मेरी जेब में है।”

कश्मीर को उस अक्टूबर में गुलाम होने से बचाया इसलिए जा सका कि घाटी के नेताओं ने फ़ौरन रियासत के विलय के बारे में फैसला ले लिया। कश्मीरी नेताओं के एक राय से लिए गए फैसले के पीछे कुछ बात है जो कश्मीर को एक ख़ास इलाका बनाती है, जो बाकी राज्यों से भिन्न है।

कश्मीर के यह खासियत जिसे कश्मीरियत भी कहा जाता है, पिछले पांच हज़ार वर्षों की सांस्कृतिक प्रगति का नतीजा है।

कश्मीर हमेशा से ही बहुत सारी संस्कृतियों का मिलन स्थल रहा है। इसीलिये कश्मीरियत में महात्मा बुद्ध की शख्सियत, वेदान्त की शिक्षा और इस्लाम का सूफी मत समाहित है। बाकी दुनिया से जो भी आता रहा वह इसी कश्मीरियत में शामिल होता रहा।

कश्मीर मामलों के बड़े इतिहासकार मुहम्मद दीन फौक का कहना है कि अरब, इरान, अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से जो लोग छ सात सौ साल पहले आये थे, वे सब कश्मीरी मुस्लिम बन चुके हैं। उन की एक ही पहचान है और वह है कश्मीरी। इसी तरह से कश्मीरी भाषा भी बिलकुल अलग है। और कश्मीरी अवाम किसी भी बाहरी शासन को बर्दाश्त नहीं करता।

कश्मीर को मुग़ल सम्राट अकबर ने 1586 में अपने राज्य में मिला लिया था। उसी दिन से कश्मीरी अपने को गुलाम मानता था। और जब 361 साल बाद कश्मीर का भारत में अक्टूबर 1947 में विलय हुआ तो मुसलमान और हिन्दू कश्मीरियों ने अपने आपको आज़ाद माना। इस बीच मुसलमानों, सिखों और हिन्दू राजाओं का कश्मीर में शासन रहा लेकिन कश्मीरी उन सबको विदेशी शासक मानता रहा। अंतिम हिन्दू राजा, हरी सिंह के खिलाफ आज़ादी की जो लड़ाई शुरू हुयी उसके नेता, शेख अब्दुल्ला थे। शेख ने आज़ादी के पहले कश्मीर छोड़ो का नारा दिया। इस आन्दोलन को जिनाह ने गुंडों का आन्दोलन कहा था क्योंकि वे राजा के बड़े खैरख्वाह थे जबकि जवाहरलाल नेहरू कश्मीर छोड़ो आन्दोलन में शामिल हुए और शेख अब्दुल्ला के कंधे से कंधे मिला कर खड़े हुए। इसलिए कश्मीर में हिन्दू या मुस्लिम का सवाल कभी नहीं था। वहां तो गैर कश्मीरी और कश्मीरी शासक का सवाल था और उस दौर में शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के इकलौते नेता थे। लेकिन राजा भी कम जिद्दी नहीं थे। उन्होंने शेख अब्दुल्ला के ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया। और शेख के वकील थे इलाहाबाद के बैरिस्टर जवाहर लाल नेहरू।

एक अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कश्मीर गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि जिस अमृतसर समझौते को आधार बनाकर हरि सिंह कश्मीर पर राज कर रहे हैं वह वास्तव में एक बैनामा है। और अंग्रेजों के चले जाने के बाद उस गैरकानूनी बैनामे का कोई महत्व नहीं है। गाँधी जी ने एक और बात कही जो सबको बहुत अच्छी लगी।

उन्होंने कहा कि सता का असली हक़दार कश्मीरी अवाम हैं जबकि जिन्नाह कहते रहते थे कि देशी राजाओं की सत्ता को उनसे छीना नहीं जा सकता। राजा के खिलाफ संघर्ष कर रहे कश्मीरी अवाम को यह बात बहुत अच्छी लगी। जबकि राजा सब कुछ लुट जाने के बाद भी अपने आप को सर्वोच्च्च मानते रहे। इसीलिये देशद्रोह के मुक़दमे में फंसाए गए शेख अद्बुल्ला को रिहा करने में देरी हुई क्योंकि राजा उनसे लिखवा लेना चाहता था कि वे आगे से उसके प्रति वफादार रहेंगे।

शेख कश्मीरी अवाम के हीरो थे।

शेख ने इन बातों की कोई परवाह नहीं की। कश्मीरी अवाम के हित के लिए उन्होंने भारत और पाकिस्तान से बात चीत का सिलसिला जारी रखा अपने दो साथियों, बख्शी गुलाम मुहम्मद और गुलाम मुहम्मद सादिक को तो कराची भेज दिया और खुद दिल्ली चले गए। वहां वे जवाहरलाल नेहरू के घर पर रुके। कराची गए शेख के नुमाइंदों से न तो जिन्ना मिले और न ही लियाक़त अली।

शेख ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि कश्मीरी अवाम के नेता वहां दूसरे दर्जे के पाकिस्तानी नेताओं से बात कर रहे थे और इधर कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के साथ बढ़ रहे कबायली कश्मीर की ज़मीन और कश्मीरी अधिकारों को अपने बूटों तले रौंद रहे थे।

तेज़ी से बढ़ रहे कबायलियों को रोकना डोगरा सेना के ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह के बस की बात नहीं थी। पाकिस्तान के इस हमले के कारण कश्मीरी अवाम पाकिस्तान के खिलाफ हो गया। क्योंकि महत्मा गांधी और नेहरू तो जनता की सत्ता की बात करते हैं जबकि पाकिस्तान उनकी आज़ादी पर ही हमला कर रहा था। इस के बाद कश्मीर के राजा के पास भारत से मदद माँगने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

महाराजा के प्रधानमंत्री, मेहर चंद महाजन 26 अक्टूबर को दिल्ली भागे। उन्होंने नेहरू से कहा कि महाराजा भारत के साथ विलय करना चाहते हैं। लेकिन एक शर्त भी थी। वह यह कि भारत की सेना आज ही कश्मीर पहुंच जाए और पाकिस्तानी हमले से उनकी रक्षा करे वरना वे पाकिस्तान से बातचीत शुरू कर देंगे।

नेहरू आग बबूला हो गए और महाजन से कहा “गेट आउट”।

बगल के कमरे में शेख अब्दुल्ला आराम कर रहे थे। बाहर आये और नेहरू का गुस्सा शांत कराया।

इसके बाद महाराजा ने विलय के कागज़ात पर दस्तखत किया और उसे 27 अक्टूबर को भारत सरकार ने मंज़ूर कर लिया। भारत की फौज़ को तुरंत रवाना किया गया और कश्मीर से पाकिस्तानी शह पर आये कबायलियों को हटा दिया गया।

कश्मीरी अवाम ने कहा कि भारत हमारी आज़ादी की रक्षा के लिए आया है जबकि पाकिस्तान ने फौजी हमला करके हमारी आजादी को रौंदने की कोशिश की थी।

उस दौर में आज़ादी का मतलब भारत से दोस्ती हुआ करती थी लेकिन अब वह बात नहीं है।

कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर 1947 वाली बात नहीं रही। संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं। भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे।

शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता। लेकिन 1953 के बाद यह हालात भी बदल गए। बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुड़ाने लगा। इन हालात के पैदा होने में बहुत सारे कारण हैं।

बात यहाँ तक बिगड़ गयी कि शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त की गयी, और शेख अब्दुल्ला को 9 अगस्त 1953 के दिन गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद तो फिर वह बात कभी नहीं रही। बीच में राजा के वफादार नेताओं की टोली ने हालात को बहुत बिगाड़ा।

अपने अंतिम दिनों में जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला से बात करके स्थिति को दुरुस्त करने की कोशिश फिर से शुरू कर दिया था। 6 अप्रैल 1964 को शेख अब्दुल्ला को जम्मू जेल से रिहा किया गया और नेहरू से उनकी मुलाक़ात हुई। शेख अब्दुल्ला ने एक बयान दिया। इस बयान का ड्राफ्ट कश्मीरी मामलों के जानकार बलराज पुरी ने बनाया था।

शेख ने कहा कि उनके नेतृत्व में ही जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ था। वे हर उस बात को अपनी बात मानते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के पहले 8 अगस्त 1953 तक कहा था। नेहरू भी पाकिस्तान से बात करना चाहते थे और किसी तरह से समस्या को हल करना चाहते थे। नेहरू ने इसी सिलसिले में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान जाकर संभावना तलाशने का काम सौंपा। शेख गए और 27 मई 1964 के दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी, जवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई। बताते हैं कि खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट-फूट कर रोये थे।

प. नेहरू के मरने के बाद तो हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ने लगे।

कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी। वहां संविधान की धारा 356 और 357 लागू कर दी गयी। इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकंद में जाकर सुलह हुई।

कश्मीर की समस्या में इंदिरा गाँधी ने एक बार फिर हस्तक्षेप किया लेकिन उसके बाद से तो हालात बिगड़ते ही गए। जब 1977 का चुनाव हुआ तो शेख अब्दुला फिर मुख्यमंत्री बने। उनकी मौत के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला को मुख्य मंत्री बनाया गया। लेकिन अब तक इंदिरा गाँधी बहुत कमज़ोर हो गयी थीं, एक बेटा खो चुकी थीं और उनके फैसलों को प्रभावित किया जा सकता था। अपने परिवार के करीबी, अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं।

अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीरी मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो। उन्होंने डॉ फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्य मंत्री बनवा दिया। यह कश्मीर में केंद्रीय दखल का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। आज कश्मीर के हालात इतना बिगड़ चुके हैं कि आतंकवादियों के हावी होने के खतरे लगातार बने हुए हैं। ज़ाहिर है नई सरकार की ज़िम्मेदारी अपनी अखण्डता को बनाए रखने के साथ साथ युद्ध के खतरे को रोकना भी है।

शेष नारायण सिंह

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

(13 अक्टूबर 2014)

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