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कश्मीर में भारत विरोधी माहौल को सघन बनाने में मोदी की नीतियों राजनीतिक कलाकारी की केन्द्रीय भूमिका

कश्मीर में भारत विरोधी माहौल -लोकतंत्र में ´भारतीय अवसरवाद´बनाम ´पाक अवसरवाद´का घिनौना खेल
जगदीश्वर चतुर्वेदी
कश्मीर  के राजनेताओं में ´भारतीय अवसरवाद´ और ´पाक अवसरवाद´ ये दो फिनोमिना पाए जाते हैं। इन दोनों का समय-समय पर सभी स्थानीय दल और बड़े नेता इस्तेमाल करते रहे हैं।
कश्मीर के पूर्व राजा से लेकर शेख अब्दुल्ला तक, फारूख अब्दुल्ला से लेकर महबूबा मुफ्ती तक इन दोनों फिनोमिना को वहां की जनता और इतिहास ने देखा है।
पूर्व मुख्यमंत्री मोहम्मद मुफ्ती सईद की मृत्यु के बाद महबूबा मुफ्ती को मुखयमंत्री बनाने में भाजपा ने जो देरी की उसका बड़ा कारण था उनके मन में छिपा ´पाक अवसरवाद´, जिसे भाजपा और स्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी नापसंद करते थे।

    महबूबा को मुख्यमंत्री बनाने के पहले उनसे भारत के प्रति निष्ठा के राजनीतिक वचन लिए गए, उसके बाद उनको मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी।
ये राजनीतिक वचन क्या थे, मीडिया उनके बारे में अनभिज्ञ है।
लेकिन भारत के प्रति निष्ठा की शपथ तो लेनी थी, परन्तु महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपना वास्तविक रंग दिखाना शुरू कर दिया।
     सच यह है कि हुर्रियत के विभिन्न संगठनों और विभिन्न नामों से सक्रिय पृथकतावादी संगठनों की गतिविधियों में विगत दो सालों में तेजी आई है। भारत विरोधी माहौल सघन हुआ है।

कश्मीर में भारत विरोधी माहौल को सघन बनाने में पीएम नरेन्द्र मोदी की नीतियों राजनीतिक कलाकारी की केन्द्रीय भूमिका रही है।
    आज से दो साल पहले का जो कश्मीर था और आज जो कश्मीर है, वह एकदम भिन्न है। नेताओं की भाषा और भंगिमा के साथ पाक समर्थित आंदोलनकारियों की भाषा और भंगिमा भी बदली हुई है। यहां तक कि आम जनता का रूख भी बदला हुआ है।
पहले की तुलना में पाक समर्थित संगठन आज आम जनता में ज्यादा सक्रिय हैं और उनका कश्मीर की जनता के एक वर्ग के अंदर के अंदर प्रभाव विस्तार नजर आ रहा है।

भाजपा-पीडीपी का संयुक्त मोर्चा जम्मू-कश्मीर में किस तरह चुनाव जीतकर आया है इसे कश्मीर का बच्चा-बच्चा जानता है। यदि अनभिज्ञ हैं तो इस राज्य के बाहर के लोग।
मैंने हाल ही  मई में कश्मीर में 15 दिनों तक कई जिलों का व्यापक दौरा किया और विभिन्न तबके के लोगों से मुलाकात की। इनमें विभिन्न रंगत के राजनीतिक दलों के जमीनी कार्यकर्ता भी थे। लेह से कश्मीर तक एक ही बात सबने कही कि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पानी की तरह पैसा बहाकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा।  इतना पैसा भाजपा ने पहले कभी नहीं बहाया। विभिन्न दलों के द्वारा बड़े पैमाने पर वोट खरीदे गए और स्थानीय स्तर पर सक्रिय पृथकतावादी नेताओं को लाखों रूपये खिलाकर वोट जुगाड़ किए गए। भाजपा-पीडीपी ने प्रति वोट 1500रूपये बांटा। जबकि कांग्रेस-नेशनल कॉफ्रेस ने प्रति वोट 1000रूपये बांटे।
जनता को भ्रष्ट करके वोट हासिल करने की इस प्रक्रिया को चुनाव आयोग भी रोक नहीं पाया, राष्ट्रीय मीडिया उद्घाटित नहीं कर पाया। हम मुगालते में रहे कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र जीत गया। पैसों के वितरण के खेल में एक मुश्त मोटी रकम पृथकतावादी नेताओं की जेब में भी गयी।

आम जनता की इस घिनौनी साजिश के हम सब मूक-दर्शक बने रहे।
खरीद-फरोख्त के आधार पर जुटायी गयी इस जनता के बल पर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बचाने की कोशिश की कल्पना करना दिवा-स्वप्न देखने के बराबर है।
आम जनता को पैसों के बल पर गोलबंद करके लोकतंत्र को बचाने का यह काम भाजपा-पीडीपी-कांग्रेस-नेशनल कॉफ्रेंस आदि ने मिलकर किया। यह बड़े पैमाने पर जनता को भ्रष्ट बनाने, उसकी गरीबी और राजनीतिकचेतना के अभाव के दुरूपयोग की ऐसी खतरनाक कहानी है जिसकी स्क्रिप्ट और किसी ने नहीं बल्कि प्रमुख चारों राजनीतिक दलों ने लिखी, लेकिन इसके असल सूत्रधार हैं पीएम नरेन्द्र मोदी।

पैसों के बल पर चुनाव जीतने की कला में मोदी अव्वल हैं।
घाटी में उन्होंने जो खतरनाक खेल शुरू किया उसने आम जनता में उनकी लोकतांत्रिक निष्ठाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आज घाटी में पीएम नरेन्द्र मोदी की साख सबसे निचले स्तर पर है।
यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से भारत की राजनीति के शिखर पुरूष और कश्मीरी जनता के बीच के मौजूदा अलगाव को सहज ही देख सकते हैं।
यही वह प्रस्थान बिंदु है जिसे आधार बनाकर कश्मीर की जनता में भारत के नेतृत्व की मूल्यहीन राजनीति का पृथकतावादियों ने जमकर प्रचार किया और अपनी साख बढ़ाने में कामयाबी हासिल की।
बुरहान वानी की सैन्यबलों के हाथों हत्या के बाद पैदा हुए आक्रोश की यही वह पृष्ठभूमि भी है।
जम्मू-कश्मीर के चुनावों में पैसों के खेल को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया। यही पैसों का खेल आज देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा संकट है।
एक बार जब वहां की आम जनता को पैसे खिलाकर भ्रष्टाचार का चस्का लगा दिया गया तो फिर इसका पाक समर्थित संगठनों ने अपने तरीकों से इस्तेमाल किया है। बड़े पैमाने पर पाक से पैसा वहां पहुँचा है।

अब वहां पैसा प्रमुख है, देश गौण है।
इस काम में पृथकतावादियों के द्वारा संचालित मसजिदों,स्कूलों-कॉलेजों आदि के संचालन में लगे विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के नेटवर्क ने भी सक्रिय भूमिका निभायी है।
दिलचस्प बात यह है कि मोदी सरकार आने के बाद कश्मीर में सक्रिय किसी भी स्वयंसेवी संगठन को भाजपा-आरएसएस ने निशाने पर नहीं लिया है। इनमें ऐसे भी संगठन हैं जिनको लाखों-करोड़ों रूपयों की विभिन्न तरीकों से मदद देश-विदेश से मिल रही है और जिनका संचालन प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से पृथकतावादी नेताओं के हाथ में है।
सवाल यह है कश्मीर में सक्रिय स्वयंसेवी संगठनों और पूंजी के खिलाड़ियों की भूमिका पर मोदी सरकार एकदम निष्क्रिय क्यों है ॽ
यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसके तहत पाक अधिकृत कश्मीरी शरणार्थियों की मदद के नाम पर मोदी सरकार ने हाल ही में दो हजार करोड़ रूपये का फंड आवंटित किया है। यह फंड आवंटित नहीं किया जाता तो बेहतर होता। यह तो पैसे से खरीदने की घटिया योजना है, जो अंततःमुसीबतों को लेकर आएगी।

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