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Kailash Satyarthi

कहाँ हैं धर्म में बच्चे?

पिछले सोमवार को दो वाकयों से मेरा सामना हुआ। जयपुर से दिल्ली लौटते वक्त गुड़गांव के पास मुझे कांवड़ियों के कुछ झुंड मिले। इनमें किशोर तथा बच्चे भी थे। पुण्य कार्य की भावना के अलावा उनका कहना था कि ऐसी गतिविधियां हिन्दू धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए बड़ी महत्वपूर्ण हैं। उसी दिन दिल्ली में अपने घर के पास एक ऊबड़-खाबड़ मैदान में मैंने पहली बार सिर पर छोटी-छोटी टोपियां लगाये, सलवार कमीज पहने 10-12 साल के कई बच्चों को आरएसएस की तर्ज पर एक शाखा लगाते हुए देखा। ये बच्चे गहराई से मानते हैं कि दीनी-तालीम और जमात, इस्लाम की हिफ़ाजत के लिए स्कूली पढ़ाई से भी ज्यादा जरूरी है।

धर्म और बच्चों का रिश्ता भी बड़ा अजीब है।

दुनिया का कोई भी बच्चा सिर्फ एक इन्सानी बच्चे की तरह ही जन्म लेता है। वह तो वयस्क समाज है जो उन्हें वेप्टाईज्ड करके, कलमा और खतना की रस्में पूरी करके, मुण्डन और जनेऊ कराके अथवा कड़ा, केश और कृपाण; पंचकगार, आदि कर्मकाण्डों के जरिये एक साम्प्रदायिक पहचान देता है। जिस दिन उन पर हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि का ठप्पा लगता है, मेरे विचार से उसी दिन मानवता को एक बार फिर विखण्डित किया जाता है तथा ईश्वर के प्रति एक और अपराध किया जाता है।

दुनिया भर में एक अरब से ज्यादा बच्चे घोर गरीबी के शिकार हैं। 21 करोड़ से ज्यादा अपने नाजुक बदन से दूसरों की मजदूरी करते हैं। दुनिया में प्रत्येक मिनट में कुपोषण के शिकार 10 बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। 7 करोड़ बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा और अन्य 15 करोड़ 5वीं कक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ चुके हैं।

लाखों बच्चे तस्करी के शिकार हैं, खुले आम उनके जिस्म की मण्डियां लगती हैं। कईयों को अगवा करके उनकी किडनियां, खाल और दूसरे नाजुक अंग निकालकर बेचे जाते हैं। मां-बाप से हजारों किलोमीटर दूर तस्करी कर ले जाए गये बच्चे खेत-खलिहानों, कारखानों, भठ्ठों और वेश्यालयों में गुलाम बना दिये जाते हैं। 5 लाख से ज्यादा बच्चों को आतंकवादी, निजी व अवैध सेनाओं में जबर्दस्ती बाल सैनिक बनाकर रखा गया है। जिनके हाथों में खिलौने और किताबें होनी चाहिए उनमें आज एके-47 व एके-56 जैसे खतरनाक हथियार हैं। गिरिजाघरों, मस्जिदों, मन्दिरों, गुरुद्वारों व अन्य धर्मस्थलों के प्रभाव, सम्पन्नता और भरमार के बावजूद विश्व के बच्चों की यह दुर्गति हो रही है। बाल कल्याण के लिए कभी-कभार ये धार्मिक संस्थान महत्वपूर्ण व प्रसंशनीय कार्य करते हैं परन्तु वह नक्कारखाने में तूती की आवाज मात्र होता है।

हिन्दू धर्म बच्चों को ईश्वर का रूप मानता है। राम तथा कृष्ण की बाल-लीलाएं हिन्दू संस्कृति के अविभाज्य अंग हैं।

भारत में नवरात्रि और दूसरे पारिवारिक, धार्मिक अनुष्ठानों में कुमारियों और कन्याओं की पूजन व भोजन की परम्पंरा है। बच्चों की अनिवार्य, समान और अच्छी शिक्षा तथा रुचि व कार्यों के आधार पर किशोर-किशोरियों द्वारा अपने व्यवसाय का चुनाव वर्णाश्रम व्यवस्था का आधार रहा है।

गुरुकुल की परम्परा में राजकुमार कृष्ण और गरीब सुदामा एक साथ एक ही तरह रहते और पढ़ते थे। लड़कियों की शिक्षा लड़कों की तरह समान और अनिवार्य थी।

अब ईसाइयत को भी देखें।

बाइबिल में प्रभु यीशु ने यह कहकर कि ”बच्चे मेरे पास सबसे पहले आएंगें“, एक स्पष्ट संदेश दे दिया कि सिद्धान्त और व्यवहार में सर्वोच्च प्राथमिकता बच्चे और उनका सरोकार होना चाहिए। ईसाइयत, बच्चों के प्रति करुणा की भावना के संदेशों से भरी पड़ी है।

इसी तरह इस्लाम में भी ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जहां बच्चों के प्रति स्नेह और सहानुभूति के संदेश दिए गए हैं। यहां तक कि जो मजहब अल्लाह को निराकार मानता है वह उस खुदा के नूर को किसी मां की गोद में खेल रहे मासूम बच्चे के मुसकुराते चेहेरे में अहसास करने की बात कहता है।

कुरान-ए-मज़ीद व हदीसों में बच्चों की ढंग से परवरिश का हुक्म है। पैगम्बर हजरत मोहम्मद की एक ही संतान थी वह भी बेटी। उन्होंने बेटियों को खुदा की सबसे बड़ी रहमत कहा तथा बिना बेटी के परिवार को अभागा माना।

अब जरा असलियत को देखिए।

कन्याओं की पूजन करने वाली कौम एक-एक, दो-दो साल तक की मासूम बच्चियों के साथ मुंह काला करने में भी शर्म नहीं करती। देश की 53 फीसदी बच्चियां किसी न किसी रूप में यौन शोषण की शिकार हैं। धर्म के वही ठेकेदार और राष्ट्र रक्षा के नाम पर खून तक बहा देने वाले लोग हैं जो मां की कोख में ही सीता, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती की हत्याएं भी कर डालने में नहीं हिचकते। खुदा की खूबसूरत रहमत व नेअमत को मांओं की गोद से छीनकर जानवरों से भी कम कीमत पर खरीदने व बेचने वाले लोग मजहब और मस्जिद के नाम पर अपना वजूद बनाए रखते हैं। ईसा मसीह सिर्फ ईसाइयों के बच्चे को सबसे पहले गले लगाने की बात नहीं करते, बल्कि सभी बच्चों को बराबर प्यार करते हैं। परन्तु मिशन और सेवा की आड़ में आदिवासी और पिछड़े इलाकों के बच्चों को ईसाई बनाने की दुकानें भी खूब फल-फूल रही हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सूडान आदि देशों में बच्चों और किशोरों के हाथ से किताब, कापियां, यहां तक कि पवित्र कुरान छीनकर उनके हाथों में बंदूकें और बम थमाने वाले खुद को इस्लाम का रखवाला कहते नहीं थकते।

कुछ साल पहले फिरोजाबाद में कांच की चूड़ियां बनाने के कारखाने से हमने एक बच्चे को मुक्त कराया। 7-8 साल का यह बच्चा भट्ठियों में कांच पिघलाने का काम करता था। यह करते हुए बच्चे का पूरा शरीर काला पड़ गया था। मां-बाप से दूर फैक्ट्री मालिक ने इसे अपने यहां बंधुआ बनाकर रखा हुआ था। मां को याद करने पर मालिक बुरी तरह पीटता था। अचानक मेरी नजर बच्चे की हथेली पर पड़ी जिसमें एक बड़ा सा छेद था। पूछताछ पर मालूम हुआ कि गलती से पिघलता हुआ शीशा हाथ पर गिर गया था जो गोली की तरह हथेली को छेद करता हुआ निकल गया था। मालिक ने इलाज कराने की बजाय बच्चे को उसकी गलती के लिए बुरी तरह से पीटा। मेरा सिर उस वक्त शर्म से झुक गया जब पता चला कि उस मासूम का नाम हजरत मोहम्मद साहब के ही नाम पर मोहम्मद था जबकि कारखाना मालिक बाबरी मस्जिद कमेटी का एक स्थानीय सम्मानित नेता था।

इसी तरह उत्तर प्रदेश में ही मिर्जापुर की एक अन्य घटना का जिक्र करना चाहूंगा। जब हमने मध्य प्रदेश के रीवा जिले से अगवा करके बंधुआ बनाई गई कुछ बच्चियों को रिहा कराने के लिए कालीन कारखाने में छापा मारा तो 11 बच्चियां हमारे धावा दल के साथ बड़ी खुशी-खुशी बाहर निकल आईं। किन्तु मैंने देखा कि 14-15 साल की एक बच्ची उस दड़बेनुमा कोठरी में दीवार से मुंह सटाए सुबक रही थी। मैं एक स्थानीय महिला मजिस्ट्रेट को साथ लेकर फिर से अन्दर घुसा और बच्ची को बताया कि अब वह आजाद है व अब हम उसे उसके माता-पिता के पास पहुंचा देंगे। इस पर वह और भी जोर-जोर से चीख-चीखकर रो पड़ी। बोली कि वह वापस नहीं जाना चाहती। बाद में हमें पता चला कि लगातार बलात्कार की शिकार हुई उस मासूम बच्ची के पेट में भी एक बच्चा था। मजिस्ट्रेट सहित हम सभी शर्म से डूब गए जब पता चला कि उसका नाम सीता (बदला हुआ पर्यायवाची शब्द) है। आप हमारी जगह होते तो क्या महसूस करते, जब उस मालिक के दरवाजे पर एक बड़ा सा झण्डा लगा हुआ देखते जिस पर लिखा था कि “राम लला हम आएंगे, मन्दिर वहीं बनाएंगे“।

यूं तो यह तय है कि इस तरह के अपराधों और धर्म में कहीं कोई रिश्ता नहीं है, किन्तु साम्प्रदायिक और धार्मिक उन्माद के जरिये अपनी दुकानदारी और नेतागिरी चलाने वाले लोगों के निजी और सार्वजनिक चरित्र को भला कैसे नजरन्दाज किया जा सकता है ? सेवा और परोपकार के नाम पर चलाये जा रहे मठों, मदरसों, मिशन-स्कूलों या धर्म शिक्षा केन्द्रों की जांच-पड़ताल की जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि चरित्र और सदाचार की आड़ में बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क में जहर घोलने का काम ज्यादा होता है। ऐसे संस्थानों को चलाने वाले ज्यादातर लोग बाल अधिकारों और बचपन की स्वतन्त्रता का सम्मान करने के बजाय अनुशासन के नाम पर मानसिक गुलामी कराने में ही ज्यादा सिद्धहस्त हैं। इन स्थानों में समलैंगिकता या बच्चियों से छेड़खानी व बलात्कार जैसी घटनाएं कोई अजूबा नहीं हैं।

धर्म की आड़ में ही तो बाल-विवाह, लड़कियों के प्रति भेदभाव व स्कूलों तक में छुआछूत तथा कई देशों में छोटी बच्चियों और बच्चों के कोमल अंगों में नश्तर लगाने व संयम तथा ब्रह्मचर्य के नाम पर अप्राकृतिक जोर जबर्दस्ती जैसी विकृतियां धड़ल्ले से चलती हैं।

धर्म, मान्यताएं तथा परम्पराएं अलग-अलग चीजें हैं, किन्तु जिन परम्पराओं पर धर्म का ठप्पा लगा हो उनका विरोध कितने धर्माचार्य करते हैं ? ये धर्मगुरू टेलीवीजन चैनलों पर चैबीसों घंटे अपने मत-मजहब के प्रचार-प्रसार, बड़बोलेपन, आत्म प्रशंसा, दवाइयां व गंडे ताबीज जैसा सामान बेचने, चंदा जमा करने, कुरीतियों और पाखंड फैलाने, राशिफल, भविष्य, ग्रहदशा आदि का हौवा खड़ा करके अन्धविश्वासों, भ्रान्तियां और झूठे चमत्कारों को बढ़ावा देने आदि का ही काम करते हैं। उनमें से कितने हैं जो धर्म और आध्यात्म के मूलतत्व, मानवीय करुणा और संवेदना को अपने जीवन और व्यवहार में उतारते हुए एक नैतिक साहस के साथ अन्याय और विषमता के खिलाफ आवाज उठाते हों ?

दुनिया भर में सभी मत, मजहबों तथा न्याय व समता के लिये होने वाली क्रांतियों में एक बुनियादी समानता रही है। सभी धर्मों और क्रांतियों की जड़ें, एक गहरी मानवीय संवेदना से ही फूटती हैं। जुल्म और बुराई के खिलाफ इसी संवेदना से एक रास्ता, व्यक्तियों और समूहों में “परहित सरिस धरम नहि भाई” के गहरे मानवीय सरोकारों और सक्रियता से होकर गुजरता है। इसे आध्यात्म का रास्ता भी कह सकते हैं। दूसरा रास्ता जुल्म और बुराई पैदा करने वाले व इसे चलाये रखने वाले सामाजिक, आर्थिक या व्यवस्थागत कारणों को बदलने की जद्दोजहद का रास्ता है। यह दुनिया की सभी छोटी-बड़ी क्रंातियों का रास्ता है। इन दोनों रास्तों में से कई अन्य रास्ते भी निकलते हैं।

अध्यात्म के मुख्य मार्ग का रूपान्तरण जो संगठित धर्म या मजहब हैं, कालातंर में कर्मकांड, पांखड, साम्प्रदायिकता और आंतकवाद तक पनपा सकता है। दूसरी ओर धर्म का मूल रूप दूसरों की भलाई, शांति, समता और भाईचारा की स्थापना, समाज के उत्पीडि़त और दबे-कुचले वर्गों को सम्मान दिलाने जैसे कार्यों में परिलक्षित होता है। इसी तरह से सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, क्रांतियों का एक रास्ता तो मानवीय गरिमा, न्याय और समता के सतत संघर्ष को बरकरार रखता है, किन्तु दूसरा राजनैतिक ढोंग, शाब्दिक लफ्फाजी, पाखंड और सत्ताजनित भ्रष्टाचार की तरफ जाता है।

कुल मिलाकर धर्मों और क्रांतियों, दोनों  का जबर्दस्त पतन हुआ है। शायद इन्हीं कारणों के चलते दुनिया में बचपन की इतनी बर्बादी हो रही है।

भारत में लगभग 6 लाख गांव हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग साढे़ 6 लाख संख्या कथित साधु, सन्यासी, मौलवी, फकीर, भिक्षु, मिशनरी, बाबा तथा महन्तों आदि की है। यदि सारे मन्दिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरजाघरों आदि के पुजारियों की संख्या इसमें जोड़ दी जाय तो यह और भी ज्यादा हो जाएगी। जरा कल्पना कीजिये कि ईश्वर के नाम पर रोटी और इज्जत कमाने वाला इनमें से हर व्यक्ति यदि ईश्वर की सबसे खूबसूरत सन्तानें यानी बच्चों पर हो रहे अत्याचारों जैसे बाल मजदूरी, दासता, बाल तस्करी, उत्पीड़न, भ्रूणहत्या आदि के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करने लगे तो समाज में कितना जागरण होगा। काश, कि सभी धर्मों के गुरू तथा अनुयायी अपने उद्भव के कारणों को फिर से खंगाले। तब अवश्य ही वे पाएंगे कि बच्चों के प्रति संवेदना, सरोकार व सक्रियता के अभाव में वे धर्म का पालन न करके कुछ और ही कर रहे थे।

कैलाश सत्यार्थी

About the author

कैलाश सत्यार्थी’, लेखक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता एवं बचपन बचाओ आन्दोलन के प्रणेता हैं।

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