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कहां है असम जातीय हिंसा की जड़

जाहिद खान
असम के कोकराझार और बक्सा जिले में फैली जातीय हिंसा ने अब तक 34 बेगुनाह और मासूम लोगों की जान ले ली है। ये संख्या और भी बढ़ सकती है, क्योंकि लाशें मिलने का सिलसिला अभी रुका नहीं है। हालात इतने बेकाबू हो गए हैं कि उसे संभालने के लिए स्थानीय प्रशासन को कफ्र्यू व दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश जारी करना पड़ा। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के संगबिजीत गुट (एनडीएफबी-एस) के सशस्त्र आंतकियों ने पिछले दिनों बोडोलैंड क्षेत्रीय प्रशासनिक जिले (बीटीएडी) के तहत आने वाले तीन जिलों में यकायक हमले शुरू कर दिए। एके-47 राइफलों से लैस इन उग्रवादियों ने अपने इस हमले में महिलाओं और बच्चों तक को भी नहीं बख्शा। जब देश भर में सोलहवीं लोकसभा के लिए आम चुनाव हो रहे हों, सभी जगह सुरक्षा व शांति व्यवस्था के कड़े इंतजाम हों और असामाजिक तत्वों पर सूक्ष्मता से निगरानी रखी जा रही हो, ऐसे हालात में हिंसा की घटनाएं सचमुच चिंता का विषय हैं।
असम के जिन जिलों कोकराझार और बक्सा में यह जातीय हिंसा भड़की, वहां 24 अप्रैल को ही मतदान हुआ है। हिंसा से प्रभावित ये जिले बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) इलाके में आते हैं और इस इलाके में हाल-फिलहाल बीपीएफ नेता और पूर्व उग्रवादी हाग्राम मोहिलारी की अगुआई वाला प्रशासन है। भूटान सीमा के पास स्थित इस इलाके में बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थी बड़ी तादाद में बसे हुए हैं। प्रारंभिक रूप से जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक जातीय हिंसा के पीछे हालिया चुनाव है। कहा जा रहा है कि बोडो उम्मीदवार को अल्पसंख्यक मुस्लिमों का वोट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अनुमान है कि अधिकतर वोट निर्दलीय प्रत्याशी हीरा सारानिया को गए, जो कि गैरबोडो और उल्फा के पूर्व कमांडर हैं। मतदान के बाद बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) की नेता और पूर्व मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्मा ने अल्पसंख्यकों की इस जुर्रत पर एक भड़काऊ बयान दिया। बयान के कुछ दिन बाद ही यहां हिंसा भड़क उठी। स्थानीय प्रशासन यदि कानून व्यवस्था को सही तरह से नियंत्रण करता, तो हिंसा इतनी व्यापक नहीं होती। इलाके में इतनी बड़ी घटना हो, और बीटीसी पर काबिज बोडो नेताओं को इसकी खबर ना हो ? ऐसा हो ही नहीं सकता। सच बात तो यह है कि बीटीसी प्रशासन, इलाके में कानून व्यवस्था बनाए रख पाने में पूरी तरह से नाकाम रहा। जब हालात ज्यादा बिगड़ गए, तब जाकर राज्य सरकार ने इलाके को सेना के सुपुर्द किया।
असम के इस इलाके में बोडो जनजाति और बांग्लाभाषी मुस्लिम समुदायों के बीच खूनी संघर्ष कोई पहली बार नहीं है, बल्कि बोडो उग्रवादियों द्वारा इस तरह की हिंसक गतिविधियां लंबे अरसे से की जा रही हैं। एक बार इन समुदायों में टकराव शुरू होता है, तो यह लंबे समय तक चलता है। जून, 2012 में भी राज्य में बड़े पैमाने पर जातीय संघर्ष हुआ था, जिसमें सौ से अधिक लोग मारे गए थे और लगभग चार लाख लोगों को राहत शिविरों में आसरा लेना पड़ा था। इस बार भी स्थिति काफी गंभीर है। हिंसा के डर से सैंकड़ों लोगों ने अपने गांवों से पलायन कर दिया है। राहत शिविरों में रह रहे ये लोग अपने घर जाने के लिए तैयार नहीं।
बोडो आदिवासी और बांग्लाभाषी मुस्लिम समुदायों के बीच इस क्षेत्र मंें टकराव की यदि वजह जानें तो यह सीधे-सीधे राजनीतिक है। क्षेत्र की तकरीबन तीस फीसद आबादी बोडो है, जो अपना अलग राज्य बनाना चाहती है। जबकि सŸार फीसद आबादी गैर-आदिवासी है, जिसमें बांग्लाभाषी मुसलमान बहुसंख्यक हैं और ये बोडो प्रभुत्व वाले राज्य के खिलाफ हैं। ऐसे में पंचायत से लेकर लोकसभा तक का हर चुनाव इलाके में नया तनाव लेकर आता है। चुनाव आते ही यहां राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो जाती हैं। सभी राजनीतिक पाटिर्यों का प्रयास होता है कि वे कैंसे बांग्लाभाषी मुस्लिम समुदाय को अपने पाले में करें ? लोकसभा चुनाव की तारीखों का एलान होते ही यहां एक बार फिर से राजनीतिक गोलबंदी शुरू हो गई थी। बांग्लादेश से आकर भारत में बसने वाले लोगों की समस्या इस बार चुनावों के अहम मुद्दों में से एक थी। बीजेपी ने राज्य में अपना राजनीतिक अभियान इस बात से शुरू किया कि सोलह मई को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद, अवैध मुस्लिम घुसपैठियों को वापस भेज दिया जाएगा। इसके अलावा बोडो चरमपंथी भी दवाब बना रहे थे कि बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद इलाके से बीपीएफ उम्मीदवार कैसे भी विजयी होकर संसद में पहुंचे। लेकिन फिर भी राज्य सरकार इन सब बातों से बेखबर रही। सरकार इस बात का अंदाजा लगाने में नाकाम रही कि चुनाव से पहले या फिर मतदान के बाद यहां हालात बिगड़ सकते हैं ? सरकार यदि पहले से ही सजग रहती, तो आज इस तरह के हालात ही नहीं बनते।
एक तरफ राज्य सरकार और सेना अब स्थिति पर नियंत्रण की कोशिशों में लगी हुई है, तो दूसरी ओर राजनीतिक पार्टियों ने इस दर्दनाक घटना को भी सियासत का मुद्दा बना लिया है। एक-दूसरे पर   आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। समस्या की जड़ कहां है और इस हिंसा का जिम्मेदार कौन है ? इसकी किसी को फिक्र नहीं। असम, लंबे समय से उग्रवाद से प्रभावित राज्य रहा है। जहां बोडो उग्रवादी अलग बोडोलैंड की मांग करते रहे हैं। एनडीए सरकार के दौर में एनडीएफबी यानी नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड से हुए समझौते के फलस्वरूप बीटीसी वजूद में आया। इस समझौते के पीछे मकसद यह था कि बोडो उग्रवाद से राज्य को हमेशा के लिए मुक्ति मिले। पर यह सद्इच्छा पूरी नहीं हुई। बीटीसी के रूप में क्षेत्रीय स्वायत्त प्रशासनिक इकाई बन जाने के बाद भी एनडीएफबी के सोंगबिजीत गुट ने इस इलाके में आतंककारी गतिविधियां जारी रखी हैं। आज भी उसकी दबी-छुपी इच्छा अलग बोडोलैंड निर्माण की है और अपने इस ख्वाब की ताबीर के लिए वह इस इलाके में हिंसक घटनाओं को अंजाम देता रहता है। ताजा जातीय हिंसा को भी एनडीएफबी के सोंगबिजीत गुट से जोड़ा जा रहा है।
बीटीसी के प्रशासनिक क्षेत्र के तहत एक समुदाय के तौर पर बोडो लोगों की संख्या भले ही सबसे अधिक हो, पर कुल बाकी लोग करीब दो तिहाई हैं। जिनमें अल्पसंख्यकों के अलावा कई जनजातीय समुदाय भी आते हैं। ऐसे इक्कीस समूहों ने मोर्चा बना कर इस बार एक निर्दलीय उम्मीदवार का साथ दिया। निर्दलीय उम्मीदवार की यही हिमायत एनडीएफबी के उग्रवादियों को नागवार गुजरी और इन लोगों को सबक सिखाने के मकसद से उन्होंने इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया। लेकिन इस लोमहर्षक घटना को सिर्फ चुनावी हिंसा कह देना सही नहीं होगा। यदि ये चुनावी हिंसा थी, तो बीपीएफ उम्मीदवार का विरोध करने वाले तमाम समूहों में से अल्पसंख्यकों को ही क्यों निशाना बनाया ? जाहिर है इस हिंसा के पीछे और भी कुछ वजहें हो सकती हैं। और ये वजह निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आएंगी। केन्द्र सरकार, यदि ‘नरसंहार व संबंधित हिंसा’ की उच्चस्तरीय समिति से जांच करवाए, तो हकीकत सामने आ सकती है। सवाल, तरुण गोगोई सरकार की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे हैं। असम के इस इलाके में अवैध घुसपैठ, आंतरिक सुरक्षा और मुस्लिम एवं बोडो आदिवासी समुदायों के बीच वैमनस्य लंबे समय से है। इन समस्याओं को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने अपनी तरफ से क्या उपाय किए ? यदि उपाय किए, तो यह समस्याएं ज्यों की त्यों क्यों है ?
सवाल, बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर हमेशा हमलावर रहने वाली बीजेपी के रवैये पर भी उठाए जा सकते हैं, कि उसे यह समस्या हर बार चुनावों के वक्त ही क्यों याद आती है। बाकी समय वह क्यों खामोश रहती है ? सच बात तो यह है कि इस मामले में बीजेपी हमेशा दोहरे मापदंड अपनाती है। बांग्लादेशी घुसपैठियों का भी वह धर्म के आधार पर भेद करती है। उसकी नजर में बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिम जहां घुसपैठिए हैं, वहीं हिंदू शरणार्थी। असम की जातीय हिंसा से कुछ दिन पहले, पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा में एक चुनावी रैली के दौरान बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि वोटबैंक राजनीति के चलते देश में रहने दिए जा रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस जाना ही होगा। जबकि धार्मिक आधार पर बांग्लादेश से भगा दिए गए शरणार्थियों का गले लगाकर स्वागत किया जाएगा। यानी अवैध घुसपैठ की इस समस्या को भी बीजेपी, साम्प्रदायिक चश्मे से देखती है। अवैध घुसपैठ की इस गंभीर समस्या में भी उसे राजनीतिक फायदा नजर आता है। यही वजह है कि वह अपने राजनीतिक मंचों से इस समस्या को बार-बार उठाती जरूर है, लेकिन समस्या के प्रति जरा भी संजीदा नहीं। यदि बीजेपी वास्तव में इस समस्या के प्रति संजीदा होती, तो वह घुसपैठियों को धर्म के आधार पर नहीं बांटती। अवैध घुसपैठ एक गंभीर समस्या है और इस समस्या को ज्यादा दिनों तक नजरअंदाज करना देश हित में नहीं। अवैध घुसपैठ की समस्या से निपटने के लिए केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों को सख्त कदम उठाने की दरकार है। अब वक्त आ गया है कि सरकार इस मामले में एक सुविचारित नीति बनाए, जिससे देश में अवैध घुसपैठ पर काबू पाया जा सके।
   

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जाहिद खान, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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