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कांग्रेस और अधिनायकवाद

विपिन किशोर सिन्हा

 

कांग्रेस बहुत प्रयास करती है कि जनता के बीच अपने को लोकतांत्रिक सिद्ध कर सके, लेकिन समय-समय पर ऐसी घटनाएं घट जाती हैं जो उसके अधिनायकवाद के चेहरे से लोकतंत्र का झीना आवरण हटा देती है. इस पार्टी में लोकतंत्र कभी नहीं रहा. एकबार नेताजी सुभाषचन्द्र बोस लोकतांत्रिक पद्धति से महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. गांधीजी इस हार को पचा नहीं पाए. हारे हुए प्रत्याशी सीतारमैया की हार को उन्होंने अपनी हार घोषित कर दी. इतना इशारा पर्याप्त था. उनके शिष्यों ने नेताजी के साथ खुला असहयोग प्रारंभ कर दिया. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को परेशान होकर अन्ततः इस्तीफ़ा देना पड़ा. १९४६-४७ में कांग्रेस कार्य समिति के अधिकांश सदस्यों (लगभग ९०%) की स्पष्ट राय थी कि सरदार पटेल आज़ाद भारत के प्रधानमंत्री बनें लेकिन गांधीजी ने अपनी पसंद थोपते हुए नेहरुजी को प्रधानमंत्री बना दिया. अधिनायकवाद की इस परंपरा को नेहरु-इन्दिरा के बाद सोनियाजी ने सफलतापूर्वक आज भी कायम रखा है. जब कांग्रेस की निरंकुश सत्ता केन्द्र में थी, तो किसी दूसरे प्रान्त में कोई भी गैरकांग्रेसी सरकार उसे कभी बर्दाश्त नहीं होती थी. केरल से लेकर कश्मीर, पंजाब से लेकर बंगाल — कितनी बार गैरकांग्रेसी राज्य सरकारें कांग्रेस ने बर्खाश्त कराई, इसका लेखा-जोखा रखना भी मुश्किल है. इसके अतिरिक्त कांग्रेस कुशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब भी जन आन्दोलन हुआ तो उसे कुचलने के लिए कांग्रेस ब्रिटिश प्रशासन से भी दो हाथ आगे चली गई. १९७४ में जे.पी. आन्दोलन के दौरान पटना में लोकनायक जय प्रकाश नारायण पर किए गए बर्बर लाठी चार्ज को कौन भूल सकता है? अगर नानाजी देशमुख जेपी के उपर लेट नहीं गए होते, तो जय प्रकाशजी का उस दिन बचना मुश्किल था. नानाजी का हाथ टूट गया लेकिन उन्होंने जेपी को बचा लिया. भ्रष्टाचार और निरंकुशता की प्रतीक बनी कांग्रेसी सरकार की मुसीबतें तब और बढ़ गईं जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन्दिरा गांधी के लोक सभा सदस्य के लिए हुए चुनाव को ही भ्रष्ट तरीके अपनाने के कारण अवैध घोषित कर दिया. कोर्ट ने उन्हें छः साल तक चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. जेपी के महा जन आन्दोलन में कोर्ट के इस फ़ैसले ने आग में घी का काम किया. इन्दिरा गांधी की सत्ता डगमगाने लगी. अब उनका असली चेहरा सामने आया. दिनांक २५ जून १९७५ को उन्होंने इमर्जेन्सी की घोषणा कर दी. जय प्रकाश नारायण समेत संपूर्ण विपक्ष (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर) के सारे छोटे-बड़े नेता २४ घंटे के अंदर गिरफ़्तार कर लिए गए. लाखों बेकसूर छात्रों और जनता को दमनकारी मीसा और डी.आई.आर के तहत जेलों में डालकर यातनाएं दी गईं. विपक्ष विहीन संसद से मनमाफ़िक संविधान संशोधन पास कराकर सारी कार्यवाही को वैध कराया गया. इस तरह इन्दिरा गांधी अगले चुनाव तक अपनी गद्दी बचाने में कामयाब रहीं लेकिन इमरजेन्सी के बाद संपन्न चुनाव में जनता ने उन्हें धूल चटा दी. राय बरेली से वे अपनी सीट भी नहीं बचा सकीं.
इतिहास अपने को पुनः दुहरा रहा है. महीना भी वही जून का ही है. पहले ही अन्ना हजारे के सत्याग्रह से घबराई सरकार बाबा रामदेव को बर्दाश्त नहीं कर सकी. अन्ना का सत्याग्रह भी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ था लेकिन उनके साथ इंडिया (कुछ संभ्रान्त समाजसेवी और कारपोरेट इंगलिश मीडिया) के लोग जुड़े थे लेकिन बाबा रामदेव का आन्दोलन दूसरा जेपी आन्दोलन बनता जा रहा है. इसके साथ भारत (आम जनता) जुड़ा है. इंडिया को तो मनाना आसान था, अन्ना के कुछ खास लोगों को लोकपाल बिल की मसौदा समिति में सिर्फ़ शामिल कर लेने मात्र से काम बन गया लेकिन बाबा के भारत से निपटना टेढ़ी खीर साबित हो रही है और आगे होगी भी. कांग्रेसी सरकार के लिए क्या यह संभव है कि वह विदेशी खाताधारकों और कालाधन रखने वालों के नाम सार्वजनिक करे? जिस दिन यह काम होगा, उसी दिन यह पार्टी दफ़न हो जाएगी. कांग्रेस के किस पूर्व या वर्तमान अध्यक्ष/प्रधानमंत्री का नाम उस सूची में नहीं होगा. हजारों छोटे-बड़े नेता उसकी चपेट में आयेंगे. पार्टी फंड में चंदा देनेवाले असंख्य चहेते उद्योग पतियों के चेहरों से नकाब हट जाएगी. कांग्रेस बाबा की यह मांग मानकर आत्महत्या नहीं कर सकती. इसलिए ५ जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव और सत्य साधकों पर जो जुर्म हुआ वह कही से भी अनपेक्षित या अस्वाभाविक नहीं था. ध्यान देने की बात है कि सोनिया-मनमोहन ने इस बर्बर कार्यवाही के लिए रात का वही प्रहर चुना जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए चुना था — रात डेढ़ बजे. सत्ता बचाने के लिए २५ जून १९७५ को इन्दिरा गांधी ने भी यही किया था. तब भी लोकतंत्र कलंकित हुआ था और आज भी हो रहा है. लेकिन न तब जन आन्दोलन को कुचला जा सका था और न अब कुचला जा सकता है.
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