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कांग्रेस के बदले अब संघी भारत बेचो कारोबार के एकाधिकारी होंगे

कटते भी चलो बढ़ते भी चलो

बाज़ू भी बहुत हैं , सर भी बहुत

– फैज़

अब आनंद तेलतुंबड़े के लिखे और हमारे मंतव्य पर एक फतवा भी जारी किया गया है। यह फतवा हमारे सिर माथे। दागी होना बुरा भी नहीं है उतना, जितना कि आंखें होने के बावजूद अंधा हो जाना।

आइये इस पागलपंथी का मुकाबला करें। हर देश में, हर समय। 

पलाश विश्वास

दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जानेवाले जायेंगे

कुछ अपनी सज़ा का पहुँचेंगे कुछ अपनी जज़ा ले जायेंगे

 ऐ ख़ाकनशीनो, उठ बैठो, वह वक़्त क़रीब आ पहुँचा है

जब तख़्त गिराए जाएँगे, जब ताज उछाले जाएँगे

 अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िन्दानों की ख़ैर नहीं

जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएँगे

 कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं, सर भी बहुत

चलते भी चलो के अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे

 ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो, चुप रहनेवालो, चुप कब तक

कुछ हश्र तो उनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएँगे

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
गिरदा, शेखर और हमारी टीम नैनीताल समाचार के शुरुआती दिनों में जब रिपोर्ताज पर रात दिन हर आंखर के लिए लड़ते भिड़ते थे, गरियाते थे। हरुआ दाढ़ी, पवन, भगतदाज्यू, सखादाज्यू, उमा भाभी से लेकर राजीव दाज्यू तक टेंसन में होते थे कि आखिर कुछ लिखा जायेगा कि अंक लटक जायेगा फिर, तब गिरदा ही काव्यसरणी में टहलते हुये कुछ बेहतरीन पंक्तियां मत्थे पर टांग देते थे, फिर मजे मजे में हमारे कहे का लिखे में सुर ताल छंद सध जाते थे।

उन दिनों हम साहिर और फैज़ को खूब उद्धृत करते थे। पंतनगर गोली कांड की रपट हम लोगों ने फैज़ से ही शुरु की थी। तब हमारा लेखन रचने से ज्यादा अविराम संवाद का सिलसिला ही था,जिसमें कबीर से लेकर भारतेंदु और मुक्तिबोध कहीं भी आ खड़े हो जाते थे।शायद इस संक्रमण काल में हमें उन्हीं रोशनी के दियों की अब सबसे बेहद जरुरत है।

आज सुबह सवेरे अनगिनत सेल्फी से सजते खिलते, अरण्य में आरण्यक अपने नयन दाज्यू ने अलस्सुबह के घन अंधियारे में यह दिया अपने वाल पर जला दिया।उनका आभार कि फिर एकबार रोशनी के सैलाब में सरोबार हुये हम और हमारे आसपास यहीं कहीं फिर गिरदा भी आ खड़े हो गये।

मुझे बेहद खुशी है कि वैकल्पिक मीडिया का जो आंदोलन समकालीन तीसरी दुनिया के जरिये शुरु हुआ,उसकी धार बीस साल के आर्थिक सुधारों से कुंद नहीं हुई। अप्रैल अंक में संपादकीय अनिवार्य पाठ है तो मार्च अंक में मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के मद्देनजर अभिषेक श्रीवास्तव, विद्याभूषण रावत, सुभाष गाताडे और विष्णु खरे के आलेख हमारी दृष्टि परिष्कार करने के लिए काफी हैं।

इनमें विद्याभूषण रावत सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे न सिर्फ बेहतरीन लिखते हैं बल्कि जाति पहचान के हिसाब से विशुद्ध दलित हैं। वे अंबेडकरी आंदोलन पर व्यापक विचार विमर्श के खिलाफ नहीं है, हालांकि वे भी मानते हैं कि अंबेडकर के लिखे पर किसी नये प्रस्तावना की आवश्यकता नहीं है।

उन विद्याभूषण रावत ने अपने आलेख में साफ साफ लिखा हैः
दलित आंदोलन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि बाबा साहेब आंबेडकर के बाद वैचारिक तौर पर सशक्त और निष्ठावान नेतृत्व उनको नहीं मिल पायाहांलांकि आम दलित कार्यकर्ता अपने नेताओं के ऊपर जान तक कुर्बान करने को तैयार हैं।आज यदि ये सभी नेता मजबूत दिकायी देते हैं तोइसके पीछे मजबूर कार्यक्रता भी हैं जो अपने नेता के नाम पर लड़ने मरने को तैयार हैं।सत्ता से जुड़ना राजनैतिक मजबूरी बन गयी है और इसमें सारा नेतृत्व आपस में लड़ रहा है। अगर हम शुरु से देखें तो राजनैतिक आंदोलन के चरित्र का पता चल जायेगा।बाबासाहेब ने समाज के लिे सब कुच कुर्बान किया। उन्होंने वक्त के अनुसार अपनी नीतियां निर्धारित कीं लेकिन कभी अपने मूल्य से समझौता नहीं किया। लेकिन बाबासाहेब के वक्त भी बाबू जगजीवन राम थे। हालांकि उनके समर्थक यह कहते हैं कि बाबूजी ने सरकार में दलित प्रतिनिधित्व को मजबूत किया लेकिन अंबेडकरवादी जानते हैं कि उनका इस्तेमाल आंबेडकर आंदोलन की धार कुंद करने के लिए किया गया।
रावत भाई ने बड़े मार्के की बात की है कि एक साथ तीन तीन दलित राम के संघी हनुमान बन जाने के विश्वरिकार्ड का महिमामंडन सत्तापरिवर्तन परिदृश्य में सामाजिक न्याय और समता के लक्ष्य हासिल करने के लिए सत्तापक्ष में दलितों की भागेदारी बतौर ककांग्रेस जगजीवन काल को दोहराने की तर्ज पर किया जा रहा है।

जबकि भाजपा के देर से आये चुनाव घोषणापत्र में राममंदिर का एजंडा अपनी जगह है। हिंदू राष्ट्र के हिसाब से सारी मांगे जस की तस है। अब बाकी बहुजनों से अगर दलित नेतृत्व सीधे कट जाने की कीमत अदा करते हुये सत्ता की चाबी हासिल करने के लिे यह सब कर रहे हैं और मजबूर कार्यकर्ता उसे सही नीति रणनीति बतौर कबूल कर रहे हैं, तो बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं है।

जबकि दूसरों का मानना कुछ और हैः, मसलन
 ”आज की तारीख में गैर-भाजपावाद, गैर-कांग्रेसवाद के मुकाबले ज्‍यादा ज़रूरी है”: यूआर अनंतमूर्ति, प्रेस क्‍लब की एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में एक सवाल का जवाब”
(बुद्धिजीवियों के राजनैतिक हस्‍तक्षेप की बॉटमलाइन)

अब दलितों को यह तय करना है कि सत्ता की चाबी के लिए केसरिया चादर ओढ़कर बाकी जनता से उसे अलहदा होना है या नहीं। गैरभाजपावाद के मुकाबले उसे भाजपावाद का समर्थन करना है या नहीं।

गौरतलब है कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण, जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को शामिल करते हुये लोगों से इन्हें पूरा करने का वायदा किया है ।

क्या यह घोषणापत्र बहुजनहिताय या सर्वजनहिताय जैसे सिद्धांतों के माफिक हैं, क्या जाति व्यवस्था बहाल रखने वाले हिंदुत्व को तिलांजलि देकर गौतम बुद्ध के धम्म का अंगाकार करने वाले बाबासाहेब के अंबेडकरी आंदोलन का रंग नीले के बदल अब केसरिया हो जाना चाहिए, क्यों कारपोरेट फासिस्ट सत्ता की चाबी संघ परिवार में समाहित हुये बिना मिल नहीं सकती। ऐसा मूर्धन्य दलित नेता, दलितों के तमाम राम ऐसा मानते हैं?

गौरतलब है कि मुक्तबाजार के जनसंहारी अश्वमेध और दूसरे चरण के सुधारों के साथ अमेरिकी वैश्विक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता जताने में गुजरात माडल को फोकस करने में भी इस घोषणापत्र में कोई कोताही नहीं बरती गयी है।

जैसा हम लगातार लिखते रहे हैं, जिस पर हमारे बहुजन मित्र तिलमिला रहे हैं, जैसा कि अरुंधति ने लिखा है, जैसा रावत भाई, आनंद तेलतुंबड़े और आनंद स्वरुप वर्मा समेत तमाम सचेत लोग लिखते रहे हैं, कारपोरेट धर्मोन्मादी इस जायनी सुनामी का मुक्य प्रकल्प हिंदूराष्ट्र का इंडिया ब्रांड है। यानी कांग्रेस के बदले अब संघी भारत बेचो कारोबार के एकाधिकारी होंगे।

इस पर अशोक दुसाध जी ने मंतव्य किया है। सब का लिखा एक ही जैसा है ?! अरूंधती राय जैसा ! अरूंधती एक सफल मार्केटींग एक्जक्यूटिव है जो अम्बेडकर को अंतराष्ट्रीय स्तर पर बेचना चाहती हैं।

इसी सिलसिले में गौर करे कि तीसरी दुनिया के अपने आलेख में विद्याभूषण रावत ने साफ साफ लिख दिया है कि दलित आंदोलन को केवल सरकारी नौकरियों और चुनावों की राजनीति तक सीमित कर देना उसकी विद्रोहातमक धार को कुंद कर देना जैसा है।आंबेडकर को केवल भारत का कानून मंत्री और भारत का संविधान निर्माता तक सीमित करके हम उनके क्रांतिकारी सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन के वाहक की भूमिकाको नगण्य कर देते हैं।

रावत भाई ने साफ साफ बता दिया है कि हमें किस अंबेडकर की जरुरत है। मौजूदा बहस का प्रस्थानबिंदू यही है। साफ- साफ लिखने के लिए आभार रावत भाई।

अब आनंद तेलतुंबड़े के लिखे और हमारे मंतव्य पर एक फतवा भी जारी किया गया है। यह फतवा हमारे सिर माथे। दागी होना बुरा भी नहीं है उतना,जितना कि आंखें होने के बावजूद अंधा हो जाना।

प्रचंड नाग का धन्यवाद कि उनकी त्वरित प्रतिक्रिया सबसे पहले मिली-
लेफ्ट हो या राइट चाहे फ्रंट हो या साइड एवरीव्हेयर ऑन ब्राह्मण इट केन बी एप्लाइड । व्हाट !
नाग जी लंबे अरसे से अंबेडकर आंदोलन से जुड़े हैं। जाहिर सी बात यह है कि वे हमसे बेहतर ही जानते होंगे कि अंबेडकर क्या हैं, अंबेडकरी आंदोलन क्या है और संपूर्ण अंबेडकर क्या हैं।

गनीमत है कि हमारे लोगों का गाली खजाना तो कुछ कमतर है जबकि मोदी के खिलाफ लिखनेवालों को मादर..,बहन… के अलावा चमचा, गुलाम, कमीने, मुसल…के कुत्ते, कांग्रेस के पिल्ले, मुलायम के पट्ठे आदि का बेधड़क इस्तेमाल बताता है कि मोदी की साइबरसेना संस्कृतिहीन है। यदि आप लोगों को कुछ गालियां मिली हों तो यहां पर जोड़ सकते हैं।

मुश्किल तो यह है कि जब हम चाहते हैं कि उनके जैसे लोग हमारी बंद आंखे खोल दें कि असल में हम अंबेडकरी राह से भटक कहां रहे हैं और हमारे उस संपूर्ण अंबेडकर का क्या हुआ,तब वे बाकी लोगों की तरह ब्राह्मणों को कोसने लगे।

विडंबना तो यह है कि जिस ब्राह्मणवाद को वे कोस रहे हैं, उसी ब्राह्मणवाद के कब्जे में हैं अंबेडकर और उनके अनुयायी। बहुजन पुरखों के जनांदोलन की समूची विरासत।

विडंबना तो यह है कि जिस ब्राह्मणवाद को वे कोस रहे हैं, मुक्त बाजार का कारपोरेट राज वे ही चला रहे हैं, राष्ट्र और व्यवस्था भी उन्हीं के हाथों में,धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के सिपाहसालार भी वे, मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था ब्राह्मणवादी वर्णवर्चस्वी एकाधिकारवादी नस्ली आधिपात्य का उत्तरआधुनिक तिलिस्म है, अंबेडकरी आंदोलन के ठेकेदारों ने अंबेडकर को अगवाकर वहीं कैद कर दिया है अपने ही चौतरपा सत्यानाश के लिए जनादेश फिरौती वास्ते।
अंबेडकर को आजाद कराये बिना जाहिर सी बात है कि बहुजनों की खैर है ही नहीं।
इतिहास को देखे तो जाति व्यवस्था में बंटा है सिर्फ भारतीय कृषिजीवी समाज। जल जंगल जमीन और पूरे कायनात में है जिनकी नैसर्गिक आजीविका।

अब उस कृषि के खात्मे के बाद जाति व्यवस्था के शिकार लोगों का कोई वजूद भी है या नहीं और उस मूक जनता की आवाज अंबेडकर की कोई प्रासंगिकता इन बेदखल कत्लगाह में इंतजारी वध्यों को बचाने के सिलसिले में है या नहीं, शहरीकरण और औद्योगीकरण के दायरे से बाहर देहात देश में यह सबसे बड़ा सवाल है, जहां अंबेडकरी संविधान का कोई राज है ही नहीं।

अंबेडकरी आंदोलन से बाहर है बहुजनों की यह अछूत दुनिया। जो भारतीय लोकतंत्र का ऐसा अखंड गलियारा है, जो वोटकाल में खुलता है और अगले चुनाव तक फिर बंद हो जाता है।

अंबेडकरी आंदोलन की दस्तक भी इसी अवधि में सबसे तेज सुनायी देती है जब तमाम मृतात्माओं का आवाहन तमाम किस्म की साजिशों को अंजाम देने के लिए नापाक इरादों के पेंचकश पेशकश हैं। जिनके बहाने ब्राह्मणी वंशवादी नवब्राह्मणों के सत्ता सिंहासन के वारिसान की खूनी जंग में जाने अनजाने शामिल होने को मजबूर हैं अचानक वोटर सर्वशक्तिमान।
इस दुनिया में सजावटी अंबेडकर मूर्तियां भी आरक्षित डब्बों की तरह नजर नहीं आतीं।
फिर मुक्त बाजार में संरक्षण आरक्षण तो सिर्फ क्रयशक्ति को मिल सकता है, बहुजनों, वंचितों, दलितों को नहीं, इस सच का सामना हमने किया ही नहीं है।

विडंबना तो यह है कि जिस सत्ता की चाबी से हकहकूक के ताला खुलने थे, वह चाबी भी उस सोशल इंजीनियरिंग की वोटबैंकीय समीकरण की फसल है, जिसके मालिक मनुव्यवस्था के धारक वाहक पुरोहिती कर्मकांडी ब्राह्मण ही हैं। बाकी बहुजन आंदोलन और राजनीति उसके हुक्मपाबंद यजमान।
विडंबना तो यह है कि जिस अंबेडकर की बात वे कर रहे हैं,उन्हें फासिस्ट ब्राह्मणधर्म के हिंदू राष्ट्र का सबसे बड़ा हथियार बना चुके हैं अंबेडकरी मिशन और राजनीति के लोग।
विडंबना तो यह है कि हम तो इस काबिल भी नहीं कि दो चार लोग हमारी सुन लें, लेकिन वे अंबेडकरी मसीहा जिनके कहे पर लाखों करोड़ों लोग मर मिटने को तैयार हैं, वे सारे के सारे ब्राह्मणी संघ परिवार के कारिंदे और लठैत बन चुके हैं।

हमारी तो औकात ही क्या है, बेहतर हो कि सामाजिक बहिष्कार और प्रतिबंध का फतवा उनपर लगायें जो दलाली और भड़वागिरि में अव्वल होते हुये दूसरों को दलालों और भड़वों को पहचानने की ट्रेनिंग दे रहे हैं।

बेहतर हो कि सामाजिक बहिष्कार और प्रतिबंध का फतवा उनपर लगायें जो सरे बाजार अंबेडकर बेचकर अंबेडकरी जनता को कहीं का नहीं छोड़ रहे हैं।

बेहतर हो कि सामाजिक बहिष्कार और प्रतिबंध का फतवा उनपर लगायें जो मुक्त बाजार में कारपोरेट हिंदुत्व के औजार में तब्दील हैं, ऐसे औजार जो बहुजनों का गला रेंतने में रोबोट से भी ज्यादा माहिर हैं।

मुंह पर अंबेडकरनाम जाप, गले में पुरखों की नामावली और हाथों में तेज छुरी,ऐसे सुपारी किलर के बाड़े में कैद हैं अंबेडकरी जनता। पवित्र गोमाता गोधर्म की रक्षा के लिए जिनकी बलि चढ़ायी जानी है।

हालत कितनी खतरनाक है, इसे हमारे अग्रज आनंद स्वरुप वर्मा ने समकालीन तीसरी दुनिया के संपादकीय में सिलसिलेवार बताया है और हस्तक्षेप पर भी वह संपादकीय लगा है।

सबसे खतरनाक बात तो यह है कि इस हिंदुत्व एजंडे को पूरा करने में लगा है अंबेडकरी आंदोलन और जब हम इस आंदोलन की चीड़फाड़ के जरिये फासिस्ट ब्राह्मणवादी नस्ली कारपोरेटराज के मुक्तबाजार के खिलाफ बाबासाहेब और उनके जाति उन्मूलन के एजंडे पर खुली बहस चाहते हैं तो हमीं को ब्राह्मण बताया जा रहा है।

पहले हमारे अग्रज आनंद स्वरुप वर्मा ने जो लिखा है उस पर भी गौर करें और ख्याल करें कि जाति से वे भी सवर्ण नहीं हैं लेकिन उनकी सोच जाति अस्मिता में कैद कभी रही नहीं है और इसीलिए उनकी दृष्टि इतनी साफ हैः
मोदी के आने से चिंता इस बात की है कि वह किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के रूप में नहीं बल्कि राजनीतिक दल का लबादा ओढ़कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे फासीवादी संगठन के प्रतिनिधि के रूप में चुनाव मैदान में है। 1947 के बाद से यह पहला मौका है जब आर।एस।एस। पूरी ताकत के साथ अपने उस लक्ष्य तक पहुँचने के एजेंडा को लागू करने में लग गया है जिसके लिये 1925 में उसका गठन हुआ था। …। इस चुनाव में बड़ी चालाकी से राम मंदिर के मुद्दे को भाजपा ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। अपनी किसी चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी ने यह नहीं कहा कि वह राम मंदिर बनाएंगे। अगर वह ऐसा कहते तो एक बार फिर उन पार्टियों को इस बात का मौका मिलता जिनका विरोध बहुत सतही ढंग की धर्मनिरपेक्षता की वजह है और जो यह समझते हैं कि राम मंदिर बनाने या न बनाने से ही इस पार्टी का चरित्र तय होने जा रहा है। वे यह भूल जा रही हैं कि आरएसएस की विचारधारा की बुनियाद ही फासीवाद पर टिकी हुयी
पूरा आलेख यहां देखेंः

चुनावी बिसात पर सजी मोहरें और हिन्दू राष्ट्र का सपना

http://www।hastakshep।com/intervention-hastakshep/views/2014/04/06/%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A4-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87

इसी बीच भाजपा से आरक्षण आधारित संसाधनों और अवसरों के न्यायपूर्ण डायवर्सिटी मांगने वालों के लिए बुरी खबर है। अंबरीश कुमार ने लिखा हैः

अब आरक्षण के सवाल पर भाजपा कांग्रेस को घेरने की कवायद शुरू हो गई है। यह पहलसर्वजन हिताय संरक्षण समिति उप्र के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे ने की जो प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ उत्तर प्रदेश में बड़ा आन्दोलन कर चुके हैं और उस दौर में भाजपा के नेताओं का पुतला भी फूंका गया था। इस बारे में संविधान संशोधन बिल का भाजपा ने समर्थन किया था। इस वजह से अगड़ी जातियां भाजपा के विरोध में खड़ी गई थीं। अब यह जिन्न अगर बोतल से बà¤

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