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कामरेड जसपाल सिंह रंधावा, खैराबाद-धर्मान्धता की पराकाष्ठा के माहौल में आदमी जब इंसान बना

मुलाकात : कामरेड जसपाल सिंह रंधावा,
खैराबाद अमृतसर से कनाडा तक एक सफ़र 
(उत्तरी अमेरिका में पिछले २५ सालों से अधिक समय से भगत सिंह का शहीदी दिवस मानने वाली संस्था इंडो कनेडियन वर्कर्स एसोसिएशन की एक बैठक के बाद उसके एक बुजुर्ग सदस्य जसपाल सिंह रंधावा ने बस यूं ही पंजाब से जुड़े अपने अनुभवों को गैर रस्मी तौर पर सुनाना शुरू किया तो मेरे कान खड़े हुए, मैंने उसी वक्त यह फैसला किया कि कामरेड जसपाल सिंह रंधावा की कहानी सुनी जानी चाहिए और उसे लिखा भी जाए ताकि अतीत के उन स्वर्णिम लम्हों को पाठक पढ़ें और आने वाली पीढियां उससे सबक लें. एक दिन मैं उनके घर पहुंचा और उनसे की गई बातचीत रिकार्ड कर ली. पेशे खिदमत है उसी बातचीत पर आधारित यह आलेख- शमशाद इलाही शम्स)
टोरंटो (कनाडा) यह कोई परिकथा नहीं और न ही किसी विराट राजनीतिक व्यक्तित्व के जीवन का लेखा जोखा. एक साधारण किसान परिवार आज़ादी के आन्दोलन में किस तरह शिरकत करता है और आज़ादी के बाद भारत में मेहनतकश आवाम से जुडी समस्याओं के प्रति क्या रुख रखता है और स्थानीय स्तर पर हालात बदलने के लिए कैसे हस्तक्षेप करता है बस उसी का एक छोटा सा लेखा जोखा है, इस मुलाकात के जरिये पाठक भारत के सबसे ज़रखेज़ सूबे पंजाब के समाजी, सियासी और सांस्कृतिक परिवेश से न सिर्फ रु-ब-रु होंगे वरन इंसान के जद्दोजहद की कूव्वत को परखने और उससे इबरत लेने का अपना बुनियादी मंसूबा पूरा कर सकेंगे.
पंजाब भारत के क्रांतिकारी आन्दोलनों और कद्दावर नेताओं की कर्म भूमि वाला सूबा रहा है और विभिन्न सियासी तहरीकों का केंद्र भी. इन तहरीकों में एक साधारण किसान परिवार किस तरह हिस्सेदारी करता है और इतिहास की घुरी को गति देता है इसे आसानी से समझा जा सकता है.
जसपाल सिंह रंधावा का जन्म २५ मार्च १९२९ को अमृतसर से तीन मील दूर खैराबाद गाव में हुआ. उनके वालिद श्रंगारा सिंह और माता का नाम बलवंत कौर था. श्रंगारा सिंह को आजादी की लडाई में १९३९ में लाहौर किसान मोर्चा में शिरकत करते हुए अंग्रेज़ सरकार ने गिरफ्तार किया था. लाहौर और मियांवाली जेलों में उन्हें ९ महीने तक रखा गया. १९४६ में कामरेड हर्षा चिन्ना के नेतृत्व में मोगा में किसान मोर्चा लगा उसमें भी वे गिरफ्तार हुए। इस बार लाहौर जेल में पांच महीने की सजा काटी. ऐसा सियासी परिवेश अगर घर में हो तब बच्चों पर इसका स्वभाविक असर होता ही है.
जसपाल सिंह रंधावा चार भाई बहन थे. उन दिनों छोटी उम्र में शादियाँ हो जाती थी. खेती भी  करते, पढ़ते भी. कभी दाखिले की मजबूरी कभी सियासी दिक्कतें तो कभी भारत का विभाजन.
हुआ यूं कि इतनी पारिवारिक, सियासी बाधाओं के चलते उन्होंने २० वर्ष की उम्र में हाई स्कूल किया. पढ़ने लिखने में होशियार, लेकिन हालात ऐसे न बन सके कि खालसा कालिज में लिए दाखिले को कामयाबी की शक्ल देकर कोई डिग्री हासिल कर लेते.
घर और गाँव में सियासी माहौल का उन पर गहरा असर पड़ा. कामरेड पूर्ण सिंह काले, कामरेड ओंकारा सुरेन्द्र सिंह  से प्रभावित हुए और उनके सान्निध्य में सन १९५० से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता बन गए. गाँव की राजनीति में उनके ताया मंगल सिंह नम्बरदार का दखल था क्योंकि वह सरपंच थे, हालांकि वह अकाली राजनीति करते, लेकिन वैचारिक विभिन्नता पारिवारिक रिश्तों में कभी बाधा न बनी.
मंगल सिंह कर्मठ, ईमानदार और आसपास के क्षेत्र में एक  प्रभावशाली व्यक्तित्व थे लोगों के मसले कोर्ट कचहरी में नहीं उनके पास आते और वह न्याय करते. १९६० तक वह दस साल गाँव के सरपंच रहे. रोशन ख्याली का परिवार में यह आलम था कि १९३७ में उनके गाँव खैराबाद में जात पांत विरोधी तहरीक चली, जिसके तहत गाँव के गुरुद्वारे में पानी पीने की जो टोंटियाँ अलग-अलग थीं, मतलब जाटों की अलग, दलितों की अलग, मज़हबी सिखों की अलग. इस मानव विरोधी व्यवस्था को बदल कर सिर्फ एक टोंटी लगा दी गयी. खैराबाद के गुरुद्वारे की यह खबर आसपास के इलाके में जंगल की आग की तरह फ़ैल गयी. तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने की इस कोशिश का असर यह हुआ कि खैराबाद गाँव के सिखों का आसपास के गाँवों में नाम ‘चूढा’ पड़ गया लेकिन गाँव के लोगों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा. गाँव में सभी बिरादरी आपसी भाईचारे और सौहार्द की मिसाल बन गयी जिसकी सबसे कठिन परीक्षा १९४७ में हुई जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ और धर्म के नाम पर पंजाब सूबे सहित देशभर में दस लाख से अधिक लोगों की जब हत्याएं हो रही थी ठीक उसी अंधियारे माहौल में खैराबाद गाँव के मुसलमानों ने जब पकिस्तान जाने का निश्चय किया, तब वे अपनी संपत्ति बाकायदा बेच-बेच कर गए और गाँव वाले उन्हें सुरक्षित रेलवे स्टेशन पर जाकर नम आँखों के साथ रुखसत करते थे.
भारत के विभाजन के दौरान इंसान के हैवान बनने की कहानियां सुना-सुना कर बहुत से कथाकार मंटो, गुलज़ार, खुशवंत सिंह तो जरूर बने लेकिन धर्मान्धता की पराकाष्ठा के माहौल में आदमी जब इंसान बना उसका सन्देश अमृतसर जिले के खैराबाद गाँव ने दिया जहाँ साम्रदायिकता के नाम पर किसी का बाल तक बांका नहीं हुआ.
कामरेड जसपाल सिंह रंधावा भारतीय इतिहास के उस काले दौर को याद करते हुए आज भी सिहर उठते हैं। रेलवे स्टेशन पर बेशुमार कटी-फटी लाशें उन्हें आज भी याद हैं. वे कहते हैं कि अपराधी किस्म के लोगों ने उस वक्त का फायदा उठा कर बेगुनाह लोगों का कत्लेआम किया लूटमार, बलात्कार किया लेकिन अच्छे लोगों ने आदमी को इंसान बने रहने की तालीम भी दी.
परिवार में सियासी माहौल और सरपंची होने का असर यह हुआ कि कामरेड जसपाल रंधावा अपने ताए के कामो में हाथ बंटाने लगे और लोगों के मसले तहसील कचहरी और अन्य सरकारी इदारों से हल कराने में निपुण हो गए. ताया मंगल सिंह ने अपनी वृद्ध अवस्था के चलते गाँव की सरपंची के लिए १९६० में जसपाल सिंह का नाम तजवीज़ कर दिया और वह निर्विरोध सरपंच चुन लिये गए, १९६३, १९७३,१९७६,१९७८ तक वह इस पद पर लगातार जीत कर आते रहे. १९६८ में वह पंचायत सदस्य रहे. १९५८ में जसपाल सिंह कोऑपरेटिव सोसायटी के केशियर हुए और १९८६ तक इसके अध्यक्ष रहे. कोऑपरेटिव सोसाइटी को गाँव के स्तर पर उसे ग्राम विकास के एक उपकरण के रूप में विकसित करने में उनका बहुत योगदान रहा. १९६४, १९६९ सेन्ट्रल कोपरेटिव बैंक के बोर्ड मेंबर भी चुने गए जिसकी कार्यकारी परिषद के सदस्य वह १९८६ तक रहे १९७३ में वह सेन्ट्रल कोपरेटिव बैंक के उपाध्यक्ष भी रहे जिसका कार्यकाल तीन वर्षो का रहा. इफको डिस्ट्रिक्ट सोसाइटी के वह तीन बार डेलीगेट चुने गए. इन्ही पदों पर रहते हुए उन्होंने कोऑपरेटिव स्टडी टूर के अंतर्गत महाराष्ट्र, तमिलनाडु ,राजस्थान का दौरा किया. १९७८ में स्टेट कोऑपरेटिव बैंक के डाइरेक्टर, एडमिन कमेटी, ऑडिट कमेटी के सदस्य भी रहे. लैंड मोर्टगेज बैंक मेंबर की हैसियत से उन्होंने केरल जाकर अध्ययन शिविर में हिस्सेदारी की. १९७२-७३ में जसपाल सिंह रंधावा ब्लाक समिति और जिला परिषद में सदस्य भी चुने गए. कोऑपरेटिव बैंक के डायरेक्टर की हैसियत पर रह कर कामरेड जसपाल रंधावा ने १०० क्लर्क, ९० चपरासियों की नियुक्ति अपने कलम से की। अमृतसर जिले में कोऑपरेटिव बैंक की सात नयी ब्रांच खोलने के वक्त अन्य २५ नियुक्तियां भी कीं और मजाल है इन नियुक्तियों की एवज में किसी की एक कप चाय भी पी हो.
१९५८ तक खैराबाद गाँव में सिंचाई परम्परागत तरीके से होती थी, ताया मंगल सिंह तब सरपंच थे, कामरेड जसपाल रंधावा ने भागदौड़ कर गाँव में दो ट्यूबवेल लगवा दी, बिजली विभाग से भागदौड़ कर गाँव में बिजली लाइन लगवा दी, जिससे २४ घंटे आपूर्ति होती थी.
१९६० में कामरेड जसपाल सिंह के सरपंच बनने के बाद इसी साल गाँव की मुरब्बाबंदी हो गयी और अगले साल १९६१ में उन्होंने भागदौड़ कर, गाँव वालों की मान मुनव्वल कर चार ट्यूबवेल और लगवा दी. जाहिर है इसका असर खेती पर पड़ना था. छः ट्यूबवेल के पानी से गाँव की जमीनें लहलहा उठीं, किसानों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, लोग खुशहाल हुए. वही गाँव जिसे आसपास के गाँव वाले चूढ़े कहते थे, अब उन्हें सिख कहने लगे. देखते देखते आसपास के गावों ने खैराबाद के कदमों पर चलना शुरू किया और खुशहाली बढ़ने लगी.
१९६२ में जसपाल सिंह के नेतृत्व में ग्राम पंचायत ने पांच हजार रुपए इकट्ठे कर सड़क विभाग में जमा कराये और खैराबाद को अमृतसर से जोड़ने वाली पक्की सड़क का निर्माण हुआ.
सार्वजनिक पदों पर जनसेवा करते हुए कामरेड जसपाल को असल प्राणवायु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से मिलती थी, जिसके वह १९४८ से समर्थक और १९५० से सदस्य रहे. पार्टी का जमीनी स्तर पर संचालन और उसके संगठन को मजबूत करते हुए पार्टी के कार्यक्रमों को लागू करने में उनकी महति भूमिका रही. खेती करने के साथ साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी एक सजग नेता की तरह उन्होंने किया. चार लड़कियों और दो लडकों के पिता कामरेड जसपाल सिंह रंधावा ने शिक्षा के महत्त्व को भलिभांति समझा था और खुद से यह वचन लिया कि अपने बच्चो की शिक्षा दीक्षा में वह अपनी तरह आयी दिक्कतों को दोहराने नहीं देंगे. उन्होंने अपनी लड़कियों की शिक्षा पर विशेष तव्वजो दी और उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों में उनकी बेटियां पहली महिलायें बनी.
आज़ादी के समय के आसपास जसपाल सिंह और उनके पिता के बीच एक समझौता था कि जेल जाने वाले आन्दोलनों में पिता शिरकत करेंगे ताकि खेती की जिम्मेदारी जसपाल सिंह पूरी करते रहे. पार्टी की गतिविधियों में शिरकत करते हुए १९७३ में महंगाई मोर्चा के दौरान कामरेड जसपाल रंधावा अमृतसर जेल में १६ दिन का कारावास भी काट चुके हैं. उनकी सांगठनिक क्षमता को आंकते हुए पार्टी ने उन्हें १९५३ में ही ब्लाक स्तर का सचिव चुन लिया था,१९५४ में उन्हें अमृतसर जिला समिति और राज्य सम्मलेन के लिए प्रतिनिधि चुना गया. अमृतसर जिला काउन्सिल के सदस्य के रूप में उन्हें १९५५ में चुना गया १९६८ में वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अमृतसर जिला इकाई के सह सचिव रहे इस पद पर वह १९८६ तक बने रहे, इसी सन में वह जिला सचिव पद पर पांच महीने तक रहे.
१९५४ से १९८६ (कनाडा प्रवास तक ) तक सभी जिला और राज्य पार्टी सम्मलेनों में उनकी शिरकत रही. १९६७ में ६४,००० रु इकठ्ठा कर अमृतसर में पार्टी का मुख्यालय बनाने वाले वही थे.
१९५५ के जालंधर पार्टी सम्मेलन की यादे शेयर करते हुए वह स्मृतियों में खो जाते हैं. यह वही ऐतिहासिक समय था जब पार्टी के भीतर  पी सी जोशी बनाम पी सुन्दरैय्या – सुरजीत लाइन का वैचारिक संघर्ष चल रहा था, लगभग सप्ताह भर चले इस अधिवेशन में केन्द्रीय समिति का प्रस्ताव भारी बहस मुबाहिसों के बाद मान लिया गया. मन मसोस कर कामरेड जसपाल बताते हैं कि अब आजकल ऐसे सम्मेलन नहीं होते न ही ऐसी स्तरीय बहसें हुआ करती हैं.
कामरेड जसपाल सिंह रंधावा की माता बलवंत कौर भी राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा करती थीं. १९७६-७७ में खुराक मोर्चा आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए खेराबाद गाँव से सभी जातियों की नौ महिलायें जेल जा चुकी हैं, महिलाओं की राजनीतिक गोलबंदी करने में खेराबाद ने अग्रणी भूमिका निभाई. कामरेड रंधावा के सांगठनिक कौशल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने संसदीय और विधान सभाओं के चुनाव में १९५२ के बाद से ही भारी मदद ली, १९७० में अकाली दल के सहयोग से एक विधायक को जीत भी मिली.
पार्टी में काम करते हुए उनका  ऐसा कोई राष्ट्रीय और राज्य स्तर का नेता नहीं जिनसे उनका संवाद न हुआ हो, पंजाब का लगभग हर बड़ा नेता खैराबाद, अमृतसर से वाकिफ था. जिन नेताओं के साथ काम करने का अवसर कामरेड जसपाल रंधावा को मिला उसकी फेहरिस्त मुकम्मिल करना मुश्किल काम है. राजेश्वर राव, हरकिशन सिंह सुरजीत, सोहन सिंह जोश, बाबा सोहन सिंह भकना, अर्जुन सिंह मस्ताना, तुलसी राम, तेजा सिंह स्वतंत्र, दर्शन सिंह कनेडियन, सतपाल डांग,डाक्टर भाग सिंह, पूरण सिंह काले,बीबी वीरा, फूजा सिंह भुल्लर. राज्य स्तर के भाकपा नेताओं में अवतार सिंह मल्होत्रा, चैन सिंह चैन, विमला डांग, जागीर सिंह जोगा, बंत सिंह बरार,जोगिन्द्र भसीन,अचार सिंह चीना, भूपिंदर सांबर, प्यारा सिंह दोसी, जगजीत आनंद उनमे प्रमुख है.
१९८६ में कनाडा प्रवास के बाद कामरेड जसपाल वामपंथी जत्थेबंदी से जुड़े रहे. हरकिशन सिंह सुरजीत के कनाडा दौरे के दौरान उसे सफल बनाने में उनका विशेष योगदान रहा. आज भी वह इंडो कनेडियन वर्कर्स एसोसिएशन के एक प्रभावशाली सदस्य हैं।
कामरेड जसपाल सिंह रंधावा के व्यक्तित्व की सबसे विशेष बात यह है कि आज तक वह स्टेज पर नहीं चढ़े, लेकिन स्टेज पर पहुँचने वाले नेता जिन असंख्य जसपाल रंधावों जैसे कंधों का सहारा लेते हैं उनके किरदार की कहानी को ब्यान करना और उन असंख्य पार्टी कार्यकर्ताओं के योगदान को सलाम करना ही इस आलेख का उद्देश्य है.
इस २५ मार्च को अपने जीवन के ८७ वसंत देख चुके कामरेड जसपाल सिंह रंधावा अपने छोटे बेटे कुलदीप और उसके परिवार के साथ यहाँ ब्राम्पटन में रहते हैं और सेहतमंद हैं. आज भी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों में पूरे उत्साह के साथ शिरकत करते हैं. पार्टी की टूट-फूट, सोवियत संघ के पतन आदि से गोल-मोल कम्युनिस्टो की तरह उनके मनोयोग को कोई क्षति नहीं पहुँची क्योकि उनका मानना है, जब तक दुनिया में गैर बराबरी और शोषण रहेगा, मार्क्सवाद अक्षुण रहेगा.

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