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कायदा, कानून, लोकतंत्र, संविधान, संसद की कोई परवाह नहीं फासिज्म के राजकाज को इसीलिए मंकी बातें

कायदा, कानून, लोकतंत्र, संविधान, संसद की कोई परवाह नहीं फासिज्म के राजकाज को इसीलिए मंकी बातें
कायदा, कानून, लोकतंत्र, संविधान, संसद की कोई परवाह नहीं है फासिज्म के राजकाज को, इसीलिए मन मर्जी माफिक जब तब फतवे और फरमान
पलाश विश्वास
आयकर विभाग ने साढ़े तीन लाख करोड़ के कालाधन निकलने का ब्यौरा पेश कर दिया है। अब कालाधन कहां है, यह फिजूल सवाल सवाल कृपया न करें। बल्कि अपने अपने खातों में लाखों करोड़ों का कैश जमा होने का इंतजार करें। आगे छप्पर फाड़ सुनहले दिन हैं।
गौरतलब है कि सबसे ज्यादा कालाधन बंगाल में ममता दीदी के राजकाज में बताया जा रहा है।
बंगाल में किसी राजनेता के यहां छापा नहीं पड़ा है। बहरहाल मध्यप्रदेश में किसी वासवानी पर छापा पड़ा है। गुजरात में चायवाले अरबपति के यहां या छापे पड़े हैं। कितने और कौन चायवाले गुजरात में अबहुं अरबपति खरबपति हैं, उ सब आगे छापा पड़ने पर जगजाहिर हुआ करै हैं।
बंगाल के राजनेताओं को पहले की तरह सीबीआई का नोटिस ही मिला है।
छापा तमिलनाडु के मुख्यसचिव के यहां जरूर पड़ा है।
कालाधन जरुर पकड़ा जायेगा या फिर सारा कालाधन सफेद धन बन जायेगा और हिंदू राष्ट्र भारतवर्ष मुकम्मल रामराज्य बन जायेगा। सतजुग वापस हो रहा है।

हम तेजी से अमेरिका बनते हुए उससे भी तेजी से इजराइल बनने लगे हैं।
इसलिए रिजर्व बैंक के नियम बदलने के लिए रोज-रोज फतवा और फरमान जारी करने से पहले हमने इसकी खबर नहीं ली कि अमेरिकी फेडरल बैंक के कामकाज में अमेरिकी सरकार के राजकाज का कितना दखल और किस हद तक का दखल होता है। कुल कितनी बार फेडरल बैंक के नियम अमेरिकी सरकार ने बदले हैं।
हम विद्वतजनों में शामिल नहीं हैं, कोई महामहिम विद्वत जन हमारी इस शंका का समाधान करें तो आभारी रहेंगे।
अमेरिका या इजाराइल न सही, दुनिया के किसी और बड़ी आत्मनिर्भर देश की अर्थव्यवस्था में नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक के पचास बार नियम बदलने की कोई नजीर दिखायें तो नोटबंदी के बारे में हमारी गलतफहमी दूर हो।
मसलन नोटबंदी के बाद लगातार बदले जा रहे नियमों के बीच एक बार फिर आरबीआई ने नया नोटिफिकेशन जारी किया है। आरबीआई ने सफाई दी है कि 5000 रुपये से ज्यादा के नोट जमा कराते वक्त लोगों से अब बैंक अधिकारी कोई सवाल जवाब नहीं करेंगे।
भक्तजन चाहें तो गिनीज बुक आफ रिकार्ड में यह कारनामा दर्ज करवाने की पहल करें, तो बेहतर।
उत्तराखंड से खबर आयी है कि आधार नहीं तो राशन नहीं।
नया फतवा है कि वेतन भुगतान भी कैशलैस अनिवार्य है। विधेयक तैयार है।
कारोबारी और उद्योगपति अब चाहें तो अपने छोटे कर्मचारियों को भी ऑनलाइन या चेक से सैलरी दे सकते हैं। केंद्र सरकार ने इसके लिए अध्यादेश के जरिए पेमेंट और वेजेज एक्ट, 1936 में सुधार का रास्ता साफ कर दिया है। शिगूफों की पूलझड़ी अनारो अनार है।

अच्छे सुनहले दिनों का फीलगुड महामारी है।
राजनेताओं और राजनीतिक दलों के कालाधन को सफेद करने के करिश्मे के बाद अब नया शिगूफा है कि सियासी पार्टियों की ब्लैकमनी की हेराफेरी पर चुनाव आयोग शिकंजा कसने वाला है। नोटंबदी के बाद चुनाव आयोग करीब 200 दलों की मान्यता खत्म कर सकता है। ये वो दल हैं जो सिर्फ कागजों पर हैं। इन दलों ने साल 2005 से कोई चुनाव नहीं लड़ा है। चुनाव आयोग को अंदेशा है कि ये दल सिर्फ काले धन को सफेद करने का खेल करती हैं।
भरोसा करने की वजह भी है क्योंकि आयकर विभाग ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव राम मोहन राव के घर और दफ्तर में छापा मारा है।
सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी बुनियादी सेवा में आधार को अभी तक अनिवार्य नहीं माना। नोटबंदी के आलम में रोजाना हर बैंक में न जाने कितनी बार सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हुई है कि नोट बदल में आधार दस्तावेज का ही इस्तेमाल हुआ है।

विद्वतजनों में अब रंग-बिरंगे बगुला भगत अग्रिम पंक्ति में क्या, तानाशाह के दीवाने खास के न जाने कितने चित्र विचित्र रत्न हैं। वे तमाम झोला छाप लोग लखटकिया सूट के नौलखा हार हैं।
संसद नहीं, निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं, विशेषज्ञ नहीं, अर्थशास्त्री नहीं, लोकतांत्रिक स्वयत्त संस्थाओं के प्रतिनिधि नहीं, सार्वजनिक या सरकारी क्षेत्र के प्रतिनिधि नहीं, यहां तक कि राजघराना स्वयंसेवक परिवार के दिग्गज भी नहीं, कारपोरेट निजी क्षेत्र के ऐरा गैरा नत्थू खैरा, सर से पांव तक केसरिया रंगा सियारवृंद देश के बीते हुए अतीत को वर्तमान तो बना ही चुके हैं, अब घनघोर अमावस्या की काली रात हमारा भविष्य है।
कटकटेला अंधियारा गगन घटी घहरानी, अब सभी जिंदा हों या मुर्दा, याद कर लो अपनी-अपनी नानी, कयामत भारी है सयानी कि बेड़ा गर्क हुआ है।
सेल्युकस, अति विचित्र यह भारतवर्ष है।
बाबाओं, बाबियों का यह देश है मृत्यु उपत्यका, सेल्युकस।
राजनीति, राजकाज, राजनय करोड़पति, अरबपति, खरबपति घरानों और कुनबों की जागीर है सेल्युकस।
अगवाड़ा पिछवाड़ा खोलकर खुलेआम देश बेचने वाले लोग मसीहा है, सेल्युकस।
न शर्म है, न हया है, न गैरत है, न जमीर है, सिर्फ कमीशनखोरी है, सेल्युकस।

राजनीतिक चंदा अब इकलौता सफेद धन है और जनता की सारी जमा पूंजी कालाधन है, सेल्युकस।
सपेरों, मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था है, सेल्युकस।
सब कुछ ससुरो बेच दियो है, बाकी अमेरिका इजराइल हवाले हैं, बचा अंध राष्ट्रवाद का दंगा फसाद, जनता का कत्लेआम, मिथ्याधर्म कर्म का पाखंड और मुक्त बाजार है, सेल्युकस।
शिक्षा चिकित्सा शोध ज्ञन विज्ञान अनुसंधान सब हराय गयो, बाकी बचा पेटीएमपीएमएफएममंकीबातेंजिओजिओ है सेल्युकस।
यह अंधेर नगरी चौपट राजा है, भागो रे भागो सेल्युकस, जानबचा लाखों पावैं।
नोटबंदी के कैसलैस डिजिटल इंडिया में खेत खलिहान कल कारखाने हाट बाजार मरघट हैं और दिशा दिशा में मृत्युजुलूस का जलवा है।
हाट बाजार चौपट हैं। दुकानें खुली खुली बंद हैं। शापिंग माल की बहार है। ईटेलिंग है। खुदरा बाजार से बेदखल हैं। बाजार में फिर लौटने की गुंजाइश भी नहीं है। अब बनिया पार्टी की सरकार छोटे मंझौले बनियों का ढांढस बंधा रही है, जिंदा रहोगे, मरोगे नहीं कि डिजिटल हो जाओ, पेटीएम करो कि छिःचालीस फीसद टैक्स माफ है।
कारोबार छिन लियो है। छीना है बाजार। गाहक भी छीन लियो है। नकदी छीन लियो। पाई पाईको सफेद साबित करने में कतार में खड़े हैं। मक्खियां भी शर्मिंदा हैं। मच्छर भी पास नहीं भटक रहे हैं। छापे दनादन पड़ रहे हैं। चंदा, वसूली भर भरकर बाजार में टिकना मुश्किल है।
खुद शहंशाह के खास मुलुक से वहां के कपड़ा कारोबार के बारे में खबर है कि नोटबंदी के चलते अहमदाबाद में गारमेंट कारोबार की हालत खस्ता है। सबसे बुरा असर प्रवासी कारीगरों पर पड़ा है। बड़ी संख्या में कारीगर अपने गांव अपने जनपद और राज्य में वापस लौट चुके हैं। हालात में जल्दी सुधार नहीं दिखा तो बाकी लोग भी वापस पलायन पर मजबूर हो जाएंगे।

पूरे गुजरात में कारोबार का हाल लालटेन है।
वायव्रेंट गुजरात का अंधियारा इतना घना है, तो बाकी देश के गरीब पिछड़े राज्यों और जनपदों में क्या कहर नोटबंदी ने बरपा है, समझ सकें तो समझ लीजिये।
फिर जमा पूंजी गुड़ गोबर कर दियो और बनिया पार्टी बनियों को गधा समझ लियो हो गधों को सावन की हरियाली दिखा रहे हैं रेगिस्तान की रेतीली आंधी में।
पाकिस्तान को जीतने का ख्वाब दिखा कर चूना लगा दियो रे।
रामजी की सौगंध खाकर लूट लियो रे।
राममंदिर न बना डिजिटल बना दियो रे।
रथयात्रा में बनियों की शवयात्रा निकार दियो रे।
हिंदू राष्ट्र कहि-कहि के अंबानी अडानी टाटा बिड़ला राष्ट्र बना दियो रे।
महतारी को याद न करे कोय, जोरु का ख्याल भी ना होय, छुट्टा सांढ़ ने नानी याद करा दियो रे।
गनीमत है सेल्युकस कि गधों के सींग नहीं होते।
कमसकम भैंस भी होते तो कुछ करके दिखाते, सेल्युकस।
ससुर कुतवा भी अगर रहे होते तो काटते न काटते भौंकते जरूर, सेल्युकस।
सब गोमाता की संतानें हैं।
गायपट्टी के भगवे पहरुये हैं।
तानाशाह माय बाप हैं।
मारे चाहे जिंदा रक्खे।
मर्जी उनकी।
अब जिनगी पेटीएम सहारे है। कारोबार पेटीएमओ है। धंधा पेटीएमपीएम ह।
तेल कुंओं की आग में झुलसाकर सींक कबाब बना दियो है, व्यापार कारोबार का सत्यानाश कर दिया है और अब छिः चालीस फीसद की टैक्स माफी का सब्जबाग दिखाकर चंडीगढ़ की तरह नरसंहार अभियान में देश के तमाम बनियों का कैश लूटकर इलेक्शनवा जीतने का वाह क्या जुगाड़ दिलफरेब है, सेल्युकस।

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